हिम्बा जनजाति का जीवन गीत



शशि सिंह

दक्षिणी अफ्रीका में एक देश है नामीबिया। वहां एक जनजाति है हिम्बा। इस जनजाति में हर जन्म से जुड़ा होता है एक गीत। हिम्बाओं के जन्म के पहले से ही उनका जीवन गीत तय हो जाता है। यही गीत उनके जीवन का आधार है। हर हिम्बा की खास पहचान। हमारे आधार कार्ड से भी मज़बूत है उनकी यह संगीतमय पहचान!

इस जनजाति में जीवन का अस्तित्व जन्म के दिन से नहीं माना जाता। उस दिन को भी नहीं माना जाता जब कोई स्त्री माता रूप में किसी पुरुष का अंश धारण करती है। ये जीवन का अस्तित्व तब से गिनते हैं जब एक स्त्री के मन में यह विचार आता है कि उसे मां बनना है। है न बड़ी रोचक बात! विचार से जीवन की शुरुआत!

जब स्त्री को किसी नए जीवन का विचार आता है तब वह एकांत में किसी पेड़ के नीचे जाकर बैठ जाती है। वहां बैठ कर सृष्टि से एक गीत की अपेक्षा करती है। अपने कल्पित संतान के जीवन का राग चाहिए उसे इस गीत में, इसके लिए वह तप करती है। उसका यह तप तब तक चलता है जब तक उसके कानों में उस नए जीवन का गीत गूंजने न लगे जिसे वह अपने कोख में धारण करना चाहती है। नए जीवन का विचार एक गीत का रूप ले लेता है तब वह आबादी में लौट आती है।

लौटकर वह उस पुरुष के पास जाती है जिसे उसने शिशु का पिता होना चुना है। वह उस पुरुष को वही गीत सिखाती है जो वह सुनकर आई है। जब पुरुष गीत सीख जाता है, तब जोड़ा संसर्ग करता है। संसर्ग के समय दोनों वही गीत गाते हैं। यह नए जीवन का पहला स्वागत गान है।

स्त्री जब गर्भवती हो जाती है तब वह निर्धारित गीत समुदाय में अपने आसपास की बड़ी और बुज़ुर्ग महिलाओं को सिखाती है। ये महिलाएं इस गीत को प्रसव के समय बच्चे के स्वागत में गाती हैं। यह गीत ही वह पहचान है जिससे महीनों पहले विचार में जन्मा जीवन अपने नए शरीर की पहचान कर सके। बच्चे का जन्म होता है, यह गीत उस बच्चे से जुड़ जाता है।

जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, अन्य ग्रामीणों को बच्चे का गीत सिखाया जाता है। समुदाय में यह गीत ही अब उस बच्चे की पहचान है। खेलते-कूदते यदि बच्चा कभी गिर जाता है या कभी उसे चोट लगती है तो उठाने वाला चोटिल बच्चे को उसका गीत गाकर सुनाता है। हर अच्छे-बुरे मौक़े पर यह गीत बच्चे के साथ होता है। इस गीत के साथ ही वह बड़ा होता है। जब कभी वह कुछ अच्छा करता है तब उसके सम्मान में सभी उसके लिए उसका गीत गाते है। उसकी शादी होती है तो उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण उसका गीत ही होता है।

यदि कभी ऐसा हो जाए कि उसका व्यवहार हिम्बाओं के सामाजिक मानदंडों के ख़लिाफ़ है, तो समुदाय के लोग उसे बस्ती के सामुदायिक स्थान पर बुलाते हैं। उसे बीच में रखकर चारों तरफ़ सब एक घेरा बनाते हैं। फिर सब उसके जन्म से जुड़ा उसका जीवन गीत गाते हैं। हिम्बाओं में गलती की कोई सजा नहीं होती बल्कि सुधार होता है। उनका मानना है कि अपने गीत से सम्बन्ध कमजोर पडऩे पर ही किसी से कोई चूक होती है। चूक करने वाले को घेर कर उसके गीत का सामूहिक गान अपने गीत से कमजोर पड़े जुड़ाव को मज़बूत करने की प्रकिया है। जब अपने गीत से फिर जुड़ाव बन जाता है तो उसके मन से ग़लत का भाव समाप्त हो जाता है। गीत की सकारात्मकता उसे उसे अपने आग़ोश में ले लेती है।

जीवन के अंतिम समय में जब कोई हिम्बा अपने मृत्युशैया पर होता है तब भी सब उसके लिए उसका गीत गाते है। वह अपने गीत के साथ ही विदा लेता है। गीत और जीवन, दोनों का चक्र पूरा होता है।

लेखक पेशे से पत्रकार हैं। मूल झारखंड, रहते हैं मुंबई।

 

समाजनामा

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