पद्मश्री डॉ रामदयाल मुंडा



-गिरिधारी राम गौंझू 'गिरिराज'

सिङबोंगा सखुआ के वृक्ष में वास करते हैं, जैसे गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, मैं पेड़ों में पीपल हूं। साखू, सखुआ या साल की सबसे बड़ी विशेषता है, वह पठारी-पहाडिय़ों की चट्टानों को फोड़ कर जन्म लेता है। साखू अपनी माटी में जितने अंदर जाकर जकड़े हुए रस संचित करता है, उतना ही ऊपर गगन की ऊंचाई को छूते, उससे ऊर्जा लेता रहता है। यही कारण है कि भयानक, आंधी-पानी व बवंडर में भी साल का पेड़ धराशायी नहीं होता। इस साल पेड़ के हर अंग उपयोगी होते हैं। इसके फलों में पांच पंख होते हैं, जो पकने पर हेलीकॉप्टर की तरह दूर-दूर तक उड़ते, जहां गिरते हैं, वहीं पनप जाते हैं। यह रूपक डॉ राम दयाल मुंडा में यथावत दिखाया देता है।

सखुआ फल के ये पांच पंख की भांति डा मुंडा में सादगी, विनम्रता, कुशलता, विद्वता और नृत्य संगीत प्रियता सदैव विराजमान रहा। साखू के पेड़ जिस तरह अपनी माटी से गहरे तक जाकर जकड़े होते हैं वैसे ही डॉ मुंडा अपनी माटी से कभी अलग नहीं हुए। उनसे जीवन भर रस संचित करते रहे, जैसे साल का वृक्ष उन्मुक्त आकाश में अपना विस्तार करता है, वैसे ही डॉ मुंडा विश्व ज्ञान-विज्ञान, कला-संस्कृति ,भाषा- साहित्य, इतिहास-राजनीति आदि को आत्मसात करते रहे। इन्हेंं कभी आप एक खांटी आदिवासी मुंडा- झारखंडी रूप में पाते तो कभी एक देशी-विदेशी विशारद के रूप में। एक विलक्षण, अद्वितीय, अहंकार रहित असाधारण, अद्भुत, जिंदादिल इंसान, बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी, अविश्वसनीय कलावंत, यशस्वी, मनीषी, सर्वगुण संपन्न प्रतिमूॢत थे डा. मुंडा। इनके गुणों को लोग आज भी स्मरण करते हैं।

आइए, उनके जीवन की एक झांकी से हम परिचित हों। झारखंड में प्रमुख रूप से तीन मुंडाओं का आविर्भाव हुआ। पहले भगवान बिरसा मुंडा जिसने ब्रिटिश उपनिवेशी शासन के खिलाफ 'अबुआ दिसुम अबुआ राजÓ के उलगुलान से अंग्रेजी सरकार को कभी चैन से शासन करने न दिया। बिरसा मुंडा के 'अबुआ दिसुम अबुआ राजÓ को आगे बढ़ाया मरङ गोमके जयपाल सिंह ने, 'अबुआ झारखंडÓ अलग प्रांत आंदोलन द्वारा। मरङ गोमके के 'अबुआ झारखंडÓ को अलग राज्य के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई डा. राम दयाल मुंडा ने।

राम दयाल मुंडा का जन्म दिवड़ी, तमाड़, रांची, झारखंड के लोकमा एवं गंधर्व मुंडा की गोद में 23 अगस्त 1939 को हुआ था। यह दिवड़ी गांव प्राचीन जाग्रत लोक प्रसिद्ध 16 भूजी दुर्गा मंदिर के नाम से जगत प्रसिद्ध है। इसी मंदिर के पहान (पुजारी) इनके परिवार से ही होते आ रहे हैं। डॉ. मुंडा का पैतृक आवास इसी दिवड़ी मंदिर के परिसर में स्थित है। मां दुर्गा की विशेष कृपा इन पर रही है। तभी अपने आंगन में दिवड़ी मंदिर का एक पुरावशेष कमल उत्कीर्ण पत्थर घर के मंदिर में अवस्थित है। भले ही ये आदि धर्म के संपोषक हैं, पर, परधर्म से प्रेम भी कम नहीं रहा है।

एक सामान्य मुंडा किसान परिवार-गांव में इनका बचपन एक मुंडा बालक की तरह सब कुछ करते व्यतीत हुआ। दिवड़ी से पहले लगभग पांच किलोमीटर लूथरन मिशन स्कूल अमलेसा से 1946 से 1953 तक में इनकी मिडिल स्कूल की शिक्षा पूरी हुई। इस मिशनरी विद्यालय में समय-समय पर विदेशियों का आना-जाना लगा रहता था। इसका प्रभाव बाल राम दयाल पर गहरा पड़ा। पढ़ाई के साथ गांव में पशु चराते, बांसुरी बजाना, रात के समय गांव के अखरा में ढोलक बजाना, नाचना व गाना सीखा। खेती- बारी तो स्वाभाविक कर्म था ही। पर इतना करते हुए भी वे पढ़ाई में सदा आगे की पंक्ति में रहते थे।

आगे की पढ़ाई एस एस हाई स्कूल खूंटी में 1953 से 1957 तक में पूरी हुई। यहीं ठक्कर बप्पा छात्रावास में रहते इन्हेंं इन दोनों जगह जगदीश त्रिगुणायत जी जैसे अनुभवी, पारखी, निष्णात, कुशल शिक्षक का मार्गदर्शन एवं सहज आशीर्वाद प्राप्त हुआ। मुंडा युवा रूप में अध्ययन, गायन, वादन, नर्तन, भाषण, लेखन आदि में इनके गुरु त्रिगुणायत जी से इन्हेंं बराबर प्रोत्साहन मिलता रहा।

इसके उपरांत रांची कॉलेज एवं रांची विश्वविद्यालय रांची से बीए भूगोल एवं एमए मानव विज्ञान की पढ़ाई 1957 से 1963 तक में पूरी हुई। अपने पूरे विद्यार्थी जीवन में अपने मुंडारी भाषा, लोक साहित्य, लोक नृत्य -संगीत, एवं पंचपरगनिया, नागपुरी, हिंदी में इनकी कलम अभिराम अविराम चलती रही। आदिवासी पत्रिका, आकाशवाणी रांची केंद्र से इनकी रचनाएं प्रकाशित-प्रसारित होती रहती थीं।

सौभाग्य से अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय से प्रो. नॉर्मन जाइड का एक दल मुंडारी समूह की भाषा पर अनुसंधान के लिए आया हुआ था। इन्हेंं मुंडारी भाषा-संस्कृति का ज्ञाता की आवश्यकता थी । राम दयाल मुंडा का मुंडारी भाषा का सम्यक ज्ञान और मनमोहक बांसुरी वादन ने प्रो. नार्मन जाइड के दल का दिल जीत लिया। अनुसंधान मुंडा जी के साथ चलने लगा। इनका वीजा समाप्त हुआ। नॉर्मन जाइड के दल को वापस अमेरिका लौटना पड़ा। अमेरिका में अनुसंधान को अंतिम रूप देने के लिए राम दयाल मुंडा जी को अमेरिका बुला लिया गया। यह अमेरिकी यात्रा कई घटना- दुर्घटना में यादगार पलों में कैद है लोगों के मानस में।

अमलेसा से सीधे अमेरिका पहुंचना एक मुंडा युवक के लिए कम विस्मय की बात नहीं थी। जो बालक एन सी सी से सेना में नियुक्त होने वाला था, मुंबई फिल्म नगरी में फिल्मों का हीरो का अभिनय कर चुका था, गांव के अखरा को जागृत और आंदोलित कर लिया था, इस तरह के सपने पाले युवा मुंडा ने अमेरिका में प्रो. नॉर्मन जाइड के शोध कार्य को पूर्णता दी। फिर अपनी प्रबल इच्छा एवं गुरु प्रो. नॉर्मन जाइड के सहयोग से शिकागो विश्वविद्यालय, अमेरिका से 1963 से 1970 तक में मुंडा जी ने भाषा विज्ञान में एम. ए.एवं पीएच.डी की।

फिर क्या था, इनके लिए अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अध्ययन- अध्यापन शोध निर्देशन, भारतीय साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन आदि के लिए द्वार खुल गए। इनकी प्रमुख कृतियों का अंगरेजी अनुवाद अध्यापन में चलने लगा। डॉ मुंडा 1970 से 1981 जून तक अमेरिका के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में पढ़ते-पढ़ाते हुए भी अमेरिकी रंग में रंग ना सके। उल्टे घोर पूंजीवादी विश्व शक्ति अमेरिकी जीवन में झारखंड का आदिम साम्यवाद, आदि धर्म, संस्कृति ,दर्शन ,अखरा की अप्रतिम सामूहिकता, एकता, प्रेम, बराबरी,सहभागिता का एवं आदिम लोक नृत्य-संगीत का विशाल अखरा इनका दिनोंदिन विस्तार पाता गया। जिसमें न केवल अमेरिका में बसे भारतीय अपितु अनेक अमेरिकी युवा -युवतियां इनके समॢपत एवं गंभीर शिष्य बनते गए। झारखंडी रंग में अमेरिकियों को डा. मुंडा ने पूरी तरह रंग दिया। पर, स्वयं पर कभी अमेरिकी रंग हावी होने ना दिया। ये था साल वृक्ष की भांति अपनी माटी की मजबूत पकड़। जब-जब गांव-घर, रांची आते और वापस अमेरिका लौटते, हर बार कभी नगाड़ा, कभी ढोल, कभी ढाक, कभी मांदर, कभी बांसुरी का बंडल आदि हवाई जहाज में लाद ले जाते। इन की बांसुरी पर एक अमेरिकी सौम्य बाला हेजेल लुत्ज राधा की तरह दीवानी हो गयी। जो अपने को मुण्डा जी पर निछावर कर दी। मुंडारी विधि से 25 जून 1972 में एक मुण्डा कन्या की तरह दिवड़ी में इन दोनों का विवाह संपन्न हुआ।

लोग अमेरिका जाने, कमाने-खाने, जीने व रहने के लिए क्या-क्या नहीं करते । इनकी नजर में अमेरिका ही स्वर्ग है और भारत तो...। पर मुंडा जी के लिए अमेरिका, अमेरिकी मूल के रेड इंडियनों को समाप्त कर पूरे यूरोप के लोगों का अमेरिकी बन बैठना और विराट उपनिवेश की पूंजीवादी महाशक्ति बन जाना सालता रहा। डॉ. मुंडा को अपनी माटी पुकारती थी। रेड इंडियन की भांति झारखंड में झारखंडी, आदिवासी व सदान-मूलवासी लोगों की होती जा रही है। यह चिंता उन्हेंं खाई जा रही थी कि देशज झारखंडियों को आंतरिक उपनिवेश के घोरतम अविराम विनाश व विस्थापन की स्थिति से कैसे बचाया जाए।

एमए करते 1970--72 में मेरी सहपाठी उषा मुंडा (डॉ मुंडा की बहन) बताती थी-दादा तो कहते हैं झारखंड में झाड़ू मारने का काम भी मिले तो मैं अमेरिका छोडऩे में 1 मिनट का समय नहीं लगाऊंगा। यह केवल कथन नहीं उसे कर्म में उतार कर डॉ मुंडा ने दिखा दिया।

11 मई 1980 को गोस्सनर कॉलेज, रांची में डॉ. कुमार सुरेश सिंह कुलपति, रांची विश्वविद्यालय, कविरत्न शारदा प्रसाद शर्मा द्वारा रचित दो नागपुरी गीतों की पुस्तक 'भगवान एक पूरब केÓ (बिरसा मुंडा पर आधारित) और 'विप्लवी महानÓ (ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव पर आधारित) का लोकार्पण संपन्न हुआ। इसी कार्यक्रम में डॉ बीपी केशरी ने कुलपति डॉ कुमार सुरेश सिंह से विनम्रता पूर्वक पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा-सर अभी आप हमारे कुलपति हैं, क्यों नहीं झारखंड की भाषाओं का एक स्वतंत्र विभाग खोल देते हैं? इतना सुनना था कि डॉ कुमार सुरेश सिंह ने तत्क्षण कहा- मैंने खोल दिया, इसका डायरेक्टर कौन होगा? तभी मेरे मुख से डॉ राम दयाल मुंडा का नाम निकल गया। उसे तत्क्षण स्वीकृत कर लिया गया। उन्होंने दूसरा नाम पूछा। प्राचार्य डा.निर्मल मिंज ने भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के उपनिदेशक डा.फ्रासिस एक्का का नाम लिया। यह भी स्वीकृत हुआ। तीसरे नाम पूछने पर प्रफुल्ल कुमार राय ने डॉ विसेश्वर प्रसाद केशरी का नाम लिया। तीनों नाम सर्वसम्मति से .स्वीकृत हो गये। दूसरे दिन डॉ. कुमार सुरेश सिंह ने डॉ. बी.पी. केशरी, प्राचार्य निर्मल मिंज, प्रफुल्ल कुमार राय, प्रो.आर पी साहु को अपने आवास पर बुला कर सारी औपचारिकताएं पूरी की ।और इस तरह जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची खोल दिया डा. कुमार सुरेश सिंह ने। डा. राम दयाल मुंडा अपने आने की स्वीकृति अमेरिका से ही दे दी। डा. फ्रासिस एक्का निर्देशक के रूप में ही आने की इच्छा व्यक्त की जो पूरी न हो सकी। डा. बी.पी. केशरी जी.एल.ए.कालेज, डालटनगंज से आ कर 6-8-1980 को इस विभाग के संस्थापक प्राध्यापक के रूप में योगदान दिया और 15 जून 1981 को जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के रूप में डा. राम दयाल मुंडा ने योगदान दिया।

डा. मुंडा और डॉ. केशरी की राम- लक्ष्मण की जोड़ी के आ जाने से विभाग का ही उदय नहीं हुआ, झारखंडी भाषा-साहित्य, कला-संस्कृति, राजनीति- इतिहास, अखरा के नृत्य- संगीत आदि का भी नवोदय हुआ। विभाग में सर्वप्रथम डॉ मुंडा ने शिक्षकों व विद्याॢथयों के साथ स्वयं श्रमदान से अखरा का निर्माण विभाग में स्थापित किया। ऐसा कर अखरा द्वारा आदिम साम्यवाद, सामूहिकता, सहभागिता, एकता, प्रेम, बराबरी, सहिया-मितान, मदइती, पंइचा आदि समरस संस्कृति को पूरी मजबूती के साथ स्थापित कर दिया। जहां सांस्कृतिक महोत्सव, सरहुल, करम के अतिरिक्त साहित्यिक, राजनीतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते आ रहे हैं। इसके साथ डॉ मुंडा एवं डॉ. केशरी ने बौद्धिक धरातल पर बिखरे, टूटे, फूटे, लुटे, छूटे झारखंड आंदोलन को शक्ति प्रदान किया। झारखंड की नौ भाषाओं के पढऩे वालों का उत्साह, जोश और उल्लास की कोई सीमा नहीं रही। विभाग डॉ. मुंडा के नेतृत्व और डॉ. केशरी के सहयोग से सफलता की ऊंचाई छूने लगा।
डॉ. मुंडा ने अपने जीवन में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किया। वे बहुमुखी प्रतिभा के सिरमौर थे। वे भाषा- साहित्य, कला- संस्कृति, सामाजिक, राजनीतिक, धाॢमक, आॢथक आदि हर क्षेत्र के हरफनमौला, यशस्वी- मनीषी कलाकार एवं विद्वान थे। झारखंड के लिए ऐसा कोई काम न छूटा जो इनकी दृष्टि में अनिवार्य था। इनके व्यक्तिगत गुणों की अगर सूची बनाई जाए तो कई -कई पृष्ठ रंग जाएंगे। अपने किसी कर्म के लिए इन्हेंं कभी पछतावा नहीं रहा। ये निष्पृह, निस्वार्थ, मिशन की भावना से हर इच्छित कार्य करते रहे । जो थोड़े से लोग इन पर दोष देखते हैं, वे दोष डॉ मुंडा के नहीं, देखने वालों की दृष्टि के दोष हैं। कुछ आलोचकों ने विधाता या गुरु की भांति इस जन्म में इनको इतना तक कहा कि इन्हेंं यह नहीं करना चाहिए था, ऐसा करना चाहिए था, इनके समान करना चाहिए था। इन्हेंं राजनीति में कभी नहीं आना चाहिए था आदि आदि। मुंडा जी जैसी महान हस्ती के लिए ऐसे सुझाव, सुझाव देने वाले की महानता ही कही जाएगी। डॉ मुंडा अपने, युग धर्म-कर्म एवं विचारधारा के एक स्वतंत्र प्रतिमान थे और आगे भी बने रहेंगे।

इनका व्यक्तित्व इतना विराट था जिसे प्राय: इनके अपनों ने, आदिवासियों ने, झारखंडियों ने, झारखंड सरकार तक ने नहीं पहचाना। जिस व्यक्ति को निॢवरोध राजनीति में विजयी होना था उसे स्वार्थ लोलुप राजनीति एवं दलाली संस्कृति ने कभी इन्हेंं विजयी होने न दिया। ये मुंडा जी की हार नहीं झारखंडियों की हार कही जाएगी। जिसने झारखंड के प्राचीन गौरवशाली इतिहास एवं महानतम समरसता की आदिम साम्यवाद की संस्कृति को झारखंड ही नहीं पूरे देश और विश्व में स्थापित करने का सपना देखा था, उसे पूरा किए बिना ही 30 सितंबर 2011 को अपने पुरखों के लोक में चले गए। पर उनकी आत्मा, (जीव,रोवा?) झारखंड में अपना काम अब भी कर रही है और आगे भी करती रहेगी। इनका एकमात्र पुत्र प्रो. गुंजल इकिर मुंडा केंद्रीय विश्वविद्यालय, झारखंड अपने सहयोगियों के साथ अपने पिता के विराट सांस्कृतिक बिरासत अभियान को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हो कर अहॢनश लगे हुए हैं।

डॉ राम दयाल मुंडा, 1981 से1999 तक विभागाध्यक्ष रहते प्रतिकुलपति 1985 से1986, कुलपति 1986 से 1988 में बने तो, विश्वविद्यालय के लिए कई उल्लेखनीय कार्य हुए । सितंबर 1999 में विभाग से वे सेवानिवृत्त हुए, पर अब तक किसी भी शिक्षक का इस विभाग से विदाई समारोह नहीं हुआ। मुंडाजी अपने अंतिम समय तक विभाग के हर आवश्यक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, सरहुल, करम आदि में पूर्ववत उसी जोशो- खरोश के साथ बने रहे । दर्जनों राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अधिकारी व सदस्य रहे। 2010 से 2011 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य बने। इनकी सेवाओं का इतना विस्तार था कि उन्हेंं पूर्ण रूप से देना संभव नहीं। अभूतपूर्व कार्य किया अपने जीवन काल में डॉ. मुंडा ने। जीवन भर झारखंड के कल्याण के लिए इन्होंने अपने को समॢपत कर दिया था।

पद्मश्री डॉ रामदयाल मुंडा में राम के आदर्श थे तो कृष्ण के यथार्थ भी। राम का आदर्श इनकी सादगी, विनम्रता, कुशलता, विद्वता एवं मर्यादित जीवन में दिखाई देता है। कृष्ण गो चारण करते थे तो डा मुण्डा हल जोतते थे। कृष्ण जैसे बांसुरी बजा कर सबको सम्मोहित कर लेते थे, वैसे ही डॉ मुंडा भी अपनी बांसुरी से सबको विमुग्ध कर लेते थे। कृष्ण जैसे राधा तथा गोप- गोपियों के साथ रास लीला रचाते थे वैसे ही मुंडा जी गांवों के अखरा में युवा एवं बालाओं के संग जदुर आदि नृत्य-संगीत के रसानंद में सराबोर कर देते थै। कृष्ण ने जैसे पाञ्चजन्य शंख बजाकर युध्द का उद्घोष किया था और सेना में शक्ति का संचार किया था, वैसे ही डॉ मुंडा ने ढोल-नगाड़ा बजा कर झारखंड आन्दोलनकारियों की सामूहिक शक्ति में उत्साह, उमंग व जोश भरा था। कृष्ण ने गीता का संदेश दिया था तो मुंडा जी ने आदि धर्म का व्याख्यान दिया। कृष्ण ने महाभारत का नेतृत्व किया, तो डॉ मुंडा ने झारखंड महाउलगुलान का सफल नेतृत्व किया। राम त्रेता के, कृष्ण द्वापर के तो डॉ. राम दयाल मुंडा झारखंड, देश तथा विश्व में आदिम साम्यवाद के शोषणमुक्त, आडंबरहीन समरस संस्कृति नवनिर्माण युग के महानायक थे।

1987 में कुलपति रहते रूस में डॉ. मुंडा के नेतृत्व में भारत महोत्सव के अवसर पर झारखंड का युद्ध नृत्य पइका की जो अद्भुत प्रस्तुति हुई कि रूसी जनता एवं सरकार की मांग पर 15 दिन के स्थान पर दो महीने तक प्रदर्शन करते रहे। इस तरह डा मुण्डा ने झारखंडी नृत्य-संगीत की लोकप्रियता व श्रेष्ठता को विश्व रंगमंच पर स्थापित कर दिया।

डॉ मुंडा की सांस्कृतिक, बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक, नृत्य-संगीत कला जगत की उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने 2007 में संगीत नाटक अकादमी का एवं 31 मार्च 2010 को पद्मश्री का सम्मान व पुरस्कार प्रदान किया। देश, विदेश व प्रदेश से अनेकानेक सम्मान, पुरस्कार एवं मोमेंटो इनको मिलते रहे हैं। मोमेंटों से इनका बैठक खाना पूरी तरह सजा हुआ है। इनकी इच्छा थी कि झारखंडी भाषा-साहित्य, कला-संस्कृति; नृत्य-संगीत अकादमी सत क्रियाशील रहे। हर गांव एवं शिक्षा केंद्रों (विश्वविद्यालय स्तर तक) में सामाजिक समरसता बनाए रखने हेतु अखरा आज के संदर्भ में अनिवार्य रूप से बने। हर बच्चे को उसकी मातृभाषा से राष्ट्रभाषा हिंदी एवं अंतर्राष्ट्रीय भाषा अंगरेजी की शिक्षा प्राथमिक स्तर से ही मिले। इनके संस्कार व शिक्षा के लिए इनके पारंपरिक लोक साहित्य, संस्कृति व लोक नृत्य- संगीत से अलग न रखा जाए। किसी भी बच्चे को उसकी जड़ से ना काटा जाए। तभी वह अपनी प्रतिभा को विकसित करने की क्षमता विकसित कर सकेगा और ऊंचे गगन तक अपनी, क्षमता व योग्यता स्थापित करने में सफल होगा।

डॉ राम दयाल मुंडा का समग्र रचना संसार 50 से भी ऊपर हैं। इनमें से कुछ प्रमुख बहुचॢचत पुस्तकों की चर्चा थोड़े में यहां रखना समीचीन होगा-

1-1966 में अपने अमेरिकी गुरु प्रो. नॉर्मन जाइड के साथ 100 मुंडारी जदुर गीतों का अंगरेजी अनुवाद प्रकाशित हुआ, जो अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने के लिए तैयार किया गया था।

2-1967 में हिसिर (गले की माला) मुंडारी कवियों की रचनाओं का संकलन है। मुंडारी जनजीवन की अभिव्यक्ति का सौंदर्य और आशावाद के भाव इसमें देखे जा सकते हैं।

3-1967 एवं 2000 में सेलेद (विविधा) में मुंडारी, नागपुरी पंचपरगानिया एवं हिंदी रचनाएं अनुवाद के साथ प्रकाशित है। मुंडा जीवन दर्शन, इनका उन्मुक्त प्रकृत प्रेम, सौंदर्य बोध, स्वदेश प्रेम, उनकी संस्कृति, इनके जीवन की सरलता इसमें स्पष्ट रूप से उभर कर आई है।

4-1969 में बिरसा मुंडा के आंदोलन के गीतों का अन्वेषणपूर्ण संकलन है।

5-1974 में मुंडारी गीतकार श्रीबुदु बाबू और उनकी रचनाएं प्रकाशित हुई। इसमें मुंडारी भाषा में चैतन्य महाप्रभु की राधा-कृष्ण भक्ति की प्रेम लीलाओं के अद्भुत गीत हैं, जो सूर, मीरा, रसखान आदि के गीतों से भी अधिक मधुर और प्रिय प्रतीत होते हैं। इसका मुंडारी के साथ हिंदी अनुवाद भी इसमें दिया गया है।

6-1976 में जैनेन्द्र के उपन्यास कल्याणी का, 1977 में नागार्जुन के उपन्यास जमनिया के बाबा का,1979 में जयशंकर प्रसाद के नाटक ध्रुवस्वामिनी का एवं 1980 में इसी के उपन्यास तितली का, 1981 में दिनकर की रश्मिरथी का अंगरेजी अनुवाद इन्होंने अपने अमेरिकी सहयोगी प्रो. पॉल स्तानेस्ला के साथ किया। इनके अतिरिक्त भी अनेक कृतियों का अनुवाद इन्होंने किया है।

7-1978 मैं कुछ नए नागपुरी गीत पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें नए युगबोध, नए बिंब- प्रतीक एवं भावों की रचनाएं संकलित हैं।
8-1979 मैं मुंडारी व्याकरण प्रकाशित हुई। इसे मुंडारी का भाषा वैज्ञानिक मानक व्याकरण माना जाता है। यह पुस्तक केंद्रीय मुंडारी रूप हंसद: मुंडारी को प्रभावी बनाता है।

9-1980 में एअ कानि को आया। मुंडारी के नौ विभिन्न प्रसंगों के जीवंत यथार्थ एवं आदर्श प्रस्तुत करने वाली कथाओं का यह संकलन है।
10-1980 मैं नदी और उसके संबंधी तथा अन्य नगीत अपनी तरह की अद्भुत छोटी-छोटी रचनाएं हैं ,पर इनके भावों में इतनी गहरी दृष्टि एवं इतना सूक्ष्म विश्लेषण है कि मुंडा जी की काव्य प्रतिभा को देख कर चकित हो जाना पड़ता है।

11-1985 में वापसी ,पुनॢमलन और अन्य नगीत पुस्तक हिंदी में आई। ये लंबी कविताएं हैं। नई दृष्टि, नई भावनाओं व आधुनिक चेतना का सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक क्षरण को व्यंग्यात्मक शैली में अभिव्यक्त करने वाली रचनाओं का संकलन है। ये रचनाएं स्वतंत्र शैली की है।

12-2000- में बिरसा मुंडा पुस्तक हिंदी में आई ,जो महाश्वेता देवी की बांग्ला पुस्तक का अनुवाद है।

13-2001 में आदिवासी अस्तित्व और झारखण्डी अस्मिता के सवाल पुस्तक आई। इसमें आदिवासियत पर गंभीर विश्लेषण है। आदिवासियों के पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धाॢमक मूल्यों का सम्यक विवेचन झारखंड के आदिवासियों के परिप्रेक्ष में किया गया है ।

14-2009 में आदि धरम इन की अंतिम और सर्वोत्तम कृति है। इनके सहयोगी हैं रतन सिंह मानकी। डॉ. मुंडा को अमर कर देने के लिए यह ग्रंथ अपने आप में समर्थ है। आदि धरम समस्त आदिवासियों के लिए स्वत:स्फूर्त प्राकृतिक धर्म है। इसका न कोई मसीहा है, न पैगंबर, न संस्थापक न मंदिर, गिरजा, मस्जिद, मठ-मिशन है। इसमें न स्वर्ग की परिकल्पना है , न नरक की। मरने के बाद आत्मा का अपने ही घर में वास होता है। विविध संस्कारों एवं लोक उत्सवों के मंत्र इसमें मुंडारी एवं हिंदी में दिए गए हैं, जो विभिन्न अवसरों में प्रयुक्त होते हैं। ये आदि धर्म के मंत्र संस्कारित होकर वेदों के मंत्र बने प्रतीत होते हैं। एक समान भाव भूमि, एक सी कामना, एक से विचार इसके प्रमाण हैं।

फादर हॉफमेन ने अपने विशाल ग्रंथ इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका में इन महत्वपूर्ण मंत्रों को जान बूझकर स्पर्श तक नहीं किया है। बीज निकाल कर फल देने का सा काम हुआ है। सुंदर, मधुर, पवित्र, लोक कल्याणकारी एवं जड़ चेतन को समान भाव से देखने, मानने, जानने व समझने वाले मंत्र आदि धर्म की महानता और सर्वश्रेष्ठता को प्रतिपादित करते हैं। इसी प्रथम आदि धर्म से अन्य सारे धर्म की बातें अन्य सभी धर्मों में लिए गए हैं ,केवल उसके कहने, करने, मानने के तरीके को कुछ बदल या परिवर्तन कर दिए गए हैं, ऐसे स्पष्ट प्रमाण इसमें दिखाई देते हैं। आदि धर्म मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ नहीं मानता वह प्रकृति, संस्कृति और जड़ चेतन व मानव के बीच समन्वय तथा सामंजस्य स्थापित करता है। यहृ आदिधर्म आदिम साम्यवाद को, सामूहिकता को, सहभागिता को तथा प्रकृति और मानव के बीच समरसता को बनाए रखने पर बल देता है। आदिधर्म में समस्त सृष्टि के सजीव-निर्जीव के कल्याण की कामना है।

प्राचीन आदिवासी संस्कृति की देन है भारतीय संस्कृति। मुंडाजी रसिक प्रकृति के होने के कारण इनकी नृत्य संगीत प्रियता अपनी पराकाष्ठा पर थी। वे एक कवि, लेखक ,अनुवादक व चिंतक थे। इनकी कई आलोचनात्मक पुस्तकें हैं। भाषा-शैली मुंडारी की प्रकृति के अनुरूप मुहावरेदार, कहावतों से युक्त, लोक शैली से परिपूर्ण हैं। इनकी काव्य रचनाओं में पहाड़ी झरनों का सा निर्मल, स्वच्छ मिठास की अनुभूति होती है। अनुभूतियों की गहराई छायावादी प्रेम और सौंदर्य का उत्कर्ष इनमें दिखाई देता है। इनके संभाषण एवं लेखन में विद्वता नहीं आम आदमी की बोलचाल के देशज शब्दों से युक्त भाषा होती थी। इससे लोक व विद्वान दोनों समान रूप से लाभान्वित होते थे। इनकी समस्त रचनाओं में मुंडा, आदिवासी व देशज झारखंडी संस्कृति की महानता झांकती है। आदि धर्म आदिवासियों के लिए स्वतंत्र कोड बने इसके लिए डॉ मुंडा जीवन भर लगे रहे।डंके की चोट पर आदि धर्म और संस्कृति को झारखंड, देश एवं विश्व कल्याण के लिए डा. मुण्डा ने सर्वोत्तम माना है।इसके लिए वे जीवन भर समॢपत भाव से प्रयत्न करते रहे। विश्व के अनेक देशों के अतिमहत्वपूर्ण संगोठयिों, जर्नलों, पत्र-पत्रिकाओं में और अपनी कृतियों में महान आदिवासी संस्कृति के आदिम साम्यवाद की गाथा प्रस्तुत करत रहे। ऐसे महानायक थे झारखण्ड के पद्मश्री डा. राम दयाल मुंडा।

लेखक डॉ रामदयाल मुंडा के साथी-सहयोगी रहे हैं। रांची विवि के क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषा विभाग के विभागाध्यक्ष रहे।

संपर्क-9631444940।

 

समाजनामा

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