नागरिकता से वंचित आदिवासी

Johar

ग्लैडसन डुंगडुंग

मई महीने की तपती धूप को झेलते हुए सारंडा जंगल में विचरण करते समय अचानक ही कुछ लोगों की आवाज सुनाई पड़ी। जंगल के बीचो-बीच तीर-धनुुष, बरछा, कुल्हाड़ी और गुलेल के साथ आदिवासी दिखाई पड़े। ये लोग शिकार पर निकले थे। यह कोई असामान्य बात नहीं थी। असामान्य बात यह थी कि ये आदिवासी थे पर भारतीय नागरिक नहीं। हमें देखते ही इस उम्मीद के साथ अपनी समस्या सुनाने लगे कि शायद उन्हें भी देश की नागरिकता और वन अधिकार कानून 2006 के तहत जिस जमीन पर वे काबिज हैं तथा जिस जंगल का उपयोग करते हैं उसका पट्टा मिल जाए।

हमें सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि देश की नागरिकता प्रमाणित करने के लिए उनके पास कोई सरकारी दस्तावेज नहीं है। यह सिर्फ एक छोटा सा समूह की बात नहीं है बल्कि सारंडा जंगल के अंदर इनके जैसे लगभग 800 परिवारों के 4000 आदिवासी निवास करते हैं, जिनके पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मतदाता पहचान-पत्र, राशन कार्ड या आधार कार्ड जैसे कोई सरकारी दस्तावेज मौजूद नहीं है। फलस्वरूप, वे कानूनी तौर पर भारत देश के नागरिक नहीं हैं।

ये लोग इस बात से अशांकित है कि यदि उन्हें अपनी नागरिकता प्रमाणित करने के लिए मतदाता प्रमाण-पत्र, आधार कार्ड या राशन कार्ड और वन अधिकार कानून 2006 के तहत जोत-आबाद कर रहे जमीन का पट्टा नहीं मिला तो वन विभाग कभी भी उन्हें अतिक्रमणकारी बताकर सारंडा जंगल से खदेड़ देगा। प्रतिकार करने पर घुसपैठिये या नक्सली बताकर गोली मार दी जाएगी या उनके ऊपर पुलिस अत्याचार होगा और उन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा। वे आतंकित हैं।

सारंडा जंगल के इस अतिमहत्वपूर्ण मसले को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। सारंडा का शाब्दिक अर्थ है सात सौ पहाड़ों का जंगल। यह एशिया में सखुआ का सबसे बड़ा जंगल है, जो झारखंड राज्य के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित है। यह जंगल जैव विविधता, वन्यजीवन और लौह-अयस्क के लिए प्रसिद्ध है। यह 'होÓ एवं 'मुंडाÓ आदिवासियों का निवास स्थान भी है, जहां 25,000 परिवारों के लगभग 125,000 लोग निवास करते हैं।

ब्रिटिश हुकूमत के समय वन संरक्षण के नाम पर सारंडा वन क्षेत्र के 1,99,740 एकड़ जंगल को चिन्हित कर 17 मई 1882 आरक्षित वन घोषित कर दिया गया और जंगल में निवास करने वाले आदिवासियों को वहां से खदेड़ दिया गया। यहीं से सरकार और आदिवासियों के बीच विवाद शुरू हुआ जो आजतक जारी है। जंगल में अकूत खनिज सम्पदा मौजूद होने के कारण सरकार इसे हड़पना चाहती है और आदिवासी यहां सदियों से रहते आए हैं इसलिए वे उसपर अपना मालिकाना हक की दावेदारी करते हैं। सारंडा जंगल का कुल क्षेत्रफल 86,055 हेक्टेअर है जो 860 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें 82,055 हेक्टेअर रिजर्व जंगल एवं 3,989 हेक्टेअर सुरक्षित जंगल शामिल है।

हमारे देश में खनिज सम्पदा का दोहन और औद्योगिकरण का इतिहास सारंडा जंगल से ही शुरू होता है, जहां देश का 25 प्रतिशत लौह-अयस्क मौजूद है। देश की पहली स्टील कंपनी 'टाटा स्टीलÓ ने 1925 में यहां लौह-अयस्क का खान कार्य शुरू किया था। आज सारंडा जंगल में 14,410.09 हेक्टेअर पर लौह-अयस्क के 50 खनन परियोजनाएं चल रही हैं। इसके अलावा राज्य सरकार ने 22 नया लौह-अयस्क का लीज दिया है। भारत सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवत्र्तन मंत्रालय से अंतिम मंजूरी मिल जाने के बाद 9,337.54 हेक्टेअर जंगल पर खनन कार्य शुरू हो जाएगा। विकास एवं आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर सारंडा जंगल से प्रतिवर्ष लगभग 3000 करोड़ रूपये के मूल्य का लौह-अयस्क उत्खनन किया जाता है। विडंबना यह है कि यहां के 80 प्रतिशत आदिवासी बच्चे कुपोषित हैं एवं 70 प्रतिशत आदिवासी महिलाएं खून की कमी से जुझ रहीं हैं। यहां विकास गौण है।

सारंडा जंगल में देश की बड़ी-बड़ी खनन कंपनियां कार्य कर रही है लेकिन यहां के आदिवासियों को रोजगार नहीं मिलता है। उन्हें रोजी-रोटी कमाने के लिए महानगरों की ओर पलायन करना पड़ता है। देश के अलग-अलग हिस्से में पलायन करने वाले आदिवासी कोरोना वायरस से संक्रमित होकर लौटे हैं। मौलिक सवाल यह है कि ये आदिवासी किस-किस से लड़ें? अपनी आजीविका के लिए? रोजगार के लिए? कोरोना वायरस से? वन अधिकर के लिए या नागरिकता हासिल करने के लिए?

सारंडा जंगल के 4000 आदिवासियों के नागरिकता की जमीनी हकीकत का पता लगाने के लिए आदिवासी समन्वय समिति ने बीहांड़ में स्थित 17 वनग्रामों का सैंपल सर्वे किया है। इन गांवों में 431 आदिवासी परिवारों के 1918 लोगों निवास करते है, जिनके पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मतदाता पहचान-पत्र, राशन कार्ड या आधार कार्ड जैसे कोई पहचान-पत्र मौजूद नहीं है।

2014 में आदिवासी समन्वय समिति के संयोजक सुशील बरला ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से इस मसले पर हस्तक्षेप करने की मांग की थी। आयोग ने संविधान की धारा 338 (क) का उपयोग करते हुए 17 अक्टूबर, 2014 को झारखंड सरकार को आदेश दिया था कि इन्हें जल्द से जल्द मताधिकार पहचान-पत्र, राशन कार्ड एवं आधार कार्ड जारी किया जाये। साथ ही सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा एवं स्वाथ्य जैसे बुनियादी सुविधा उपलब्ध किया जाये। आयोग ने 15 दिनों के अन्दर कारईवाई कर जवाब देने को कहा था बावजूद इसके राज्य सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं किया।

2014 में झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी सिंहभूम जिले के उपायुक्त अब्बुबक्कर सिद्दिकी ने कहा था कि मुझे इस बात की अशांका है कि किसी के पास वोटर कार्ड नहीं है। उन्होंने इसपर जांच और कार्रवाई करते हुए चुनाव से पहले मतदाता सूची में इन आदिवासियों का नाम शामिल कर उन्हें वोट देने का अधिकार सुनिश्चित करने का वादा किया था। लेकिन यह भी चुनावी जुमला बनकर रह गया। ऐसा लगता है कि अब नौकरशाह भी राजनेताओं जैसा ही वादा करने के बाद भूल जाते हैं।

पिछले कुछ वर्षों के अंदर बंगलादेश, पाकिस्तान और आफगनिस्तान के लगभग 20,000 लोगों को भारत की नागरिकता दी गई है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि सारंडा जंगल के 4000 आदिवासियों को अबतक सरकार भारतीय नागरिक मानने को तैयार नहीं है। इन लोगों को जंगल का अतिक्रमणकारी बताया जाता है। यदि इन्हें नागरिकता नहीं माना जाता और वन अधिकार से बेदखल किया जाता है तो वे भूखे करने को विवस हो जायेंगे। क्या कभी इन्हें न्याय मिलेगा?

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ग्लैडसन डुंगडुंग मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। देश-विदेश में आदिवासी सवालों को उठाते रहे हैं। झारखंड के ज्वलंत मुद्दों पर एक दर्ज से अधिक हिंदी-अंग्रेजी में पुस्तकें प्रकाशित।

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नोट : ये लेखक के अपने विचार हैं और इसके लिए वे खुद उत्तरदायी हैं। चौराहा डॉट इन से सहमति जरूरी नहीं।


 

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