मिथिलेश्वर की कहानी बाबूजी



डॉ उर्वशी, प्रोफेसर हिंदी विभाग

रांची विश्वविद्यालय ने स्नातकोत्तर हिन्दी के पाठ्यक्रम में मिथिलेश्वर जी की बहुचॢचत कहानी 'बाबूजीÓ को 2016 से शामिल किया है। चार वर्षों से इस कहानी को अपनी छात्राओं को पढ़ा रही हू?। पहली बार जब यह कहानी मैंने पढ़ी तो लेखक की शैली में इतनी खो गयी कि लगा मैं लेखक से पूछ लू?, क्या वे बाबू ललन सिंह (बाबू जी) को जानते-पहचानते हैं, उनसे मिले हैं। यह पात्र इतना जीवन्त है कि यह कहानी, कहानी नहीं लगती। इस कहानी में व्यक्ति स्वतंत्रता की भावना और नारी-पुरुष समानता को चित्रित किया गया है। मुख्य तौर पर देखें तो यह कहानी स्त्री विमर्श से ज्यादा पुरुष विमर्श दर्शाती है। अपनी जिंदगी की स्वतंत्रता को पाना जितना स्त्रियों के लिए मुश्किल है उतना ही एक पुरुष के लिए भी।

हम जब पहला पैराग्राफ पढ़ते हैं तो लगता है जैसे यह तो हम सबकी जिंदगी की सच्चाई है । जब तक लोग हमारे आसपास होते हैं हम उन में कमियां निकालते रहते हैं और जब वही व्यक्ति दूसरी दुनिया में चला जाता है तो लोग उसकी तारीफ करते नहीं थकते। बाबूजी कहानी की शुरुआत कुछ इस तरह होती है:- 'मेरे गांव में जब भी किसी की मृत्यु होती है, तीन-चार दिनों तक उसके बारे में खूब चर्चाएं चलती हैं। हर गली, हर बैठक तथा हर दालान पर बातों का विषय वही मरने वाला ही होता है। उसका दबा पड़ा इतिहास बातों-ही-बातों में एकदम उजागर हो जाता है। उसके जीवन के गुप्त और छिपे संदर्भ भी सामने आ जाते हैं। उसकी खामियां भी एकदम बेपर्दगी के साथ नजर आने लगती हैं। तब मुझे लगता है, मर जाने के बाद ही मेरा गांव किसी आदमी का सही मूल्यांकन कर पाता है।

मेरे बाबू जी के साथ भी ऐसा ही हुआ। वे जब तक जिंदा थे, गांव के किसी एक आदमी से भी प्रशंसा नहीं पा सके लेकिन अब, जबकि वे मर चुके हैं, हर बैठक और दालान में उनकी ही चर्चा शुरू है। उनकी मृत्यु का आज चौथा दिन है। इन चार दिनों के भीतर ही उनके संदर्भ में बहुत कुछ जानने-सुनने को मिला है। गांव के बड़े-बूढ़ों ने उनके बचपन और शादी-ब्याह की चर्चा खूब जमकर की है। उनके हमउम्र दोस्तों ने उनके जीवन के महत्वपूर्ण पक्षों को उजागर किया है। और फिर मेरे-सरीखे लड़कों ने तो वही कहा है, जो मैं जानता था। यानी कुल मिलाकर अधिकांश लोग उनके प्रशंसक ही हैं। लोगों का कहना है कि शराबी, वेश्यागामी चाहे वे जो भी थे, लेकिन गलत आदमी नहीं थे, कि किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा था उन्होंने, कि वे जिंदगी ढकेलते हुए और ढोते हुए नहीं, जीते हुए जी रहे थे, कि वे कभी झूठ नहीं बोलते थे; कि वे कोई भी काम छिपाकर करना पसंद नहीं करते थे; कि समस्याओं से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया, कि वे टूटना नहीं जानते थे कि वे अपने ढंग के निराले आदमी थे।।।और इसी तरह की ढेर सारी बातें पूरे गांव में प्रचारित हो गई है काश यह बातें बाबूजी की जिंदगी में ही प्रचारित हुई होती।Ó

कहानी केे मुख्य पात्र बाबूजी हैं जिनकी जिंदगी तकलीफ और अपमान से गढ़ी गई है। इस तकलीफ और अपमान में उनके खुद के परिवार का सबसे बड़ा हाथ रहा। मैं शैली में लिखी गई इस कहानी का मैं , कहानी के नायक बाबूजी के छोटे बेटे हैं । जिन्हेंं अपने पिता के अपमानित और लांछित जिंदगी की तकलीफ है और उनकी आकांक्षाओं का सहयोगी सहयात्री न बनने का मलाल।

मिथिलेश्वर स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कथा-साहित्य में एक अलग महत्व रखते है अपने कथा-साहित्य में उन्होंने ग्रामीण जीवन का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। उन्होंने समकालीन कथा जगत को संघर्षशील जीवन-दृष्टि तथा रचनात्मक सहजता के साथ साथ सामाजिक बनाने का कार्य किया है। उनका कथा साहित्य वर्तमान ग्रामीण जीवन के विभिन्न अंतॢवरोधो को उद्घाटित करता है जिनसे आजादी के बाद के ग्रामीण जीवन की भयावहता और जटिलता का पता चलता है। सीधी-सादी शैली में विशिष्ट रचनात्मक प्रभाव उत्पन्न करने में सिद्धहस्त साठोत्तरी पीढी से सम्बद्ध प्रमुख कथाकार मिथिलेश्वर जी से जब मैंने पहली बार बात किया तो लगा इतने बड़े कथाकार में इतनी सरलता कैसे। लोग तो दो चार कहानियां लिखकर ही स्वयं को दूसरी दुनिया का मान लेते हैं, वहीं इतने वर्षो से साहित्य-सृजन में संलग्न मिथिलेश्वर अखिल भारतीय मुक्तिबोध पुरस्कार सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार, श्रीलाल शुक्ल स्मृति इको पुरस्कार, अमृत पुरस्कार तथा अखिल भारतीय वीरसिंह देव पुरस्कार से सम्मानित मिथिलेश्वर जी मुझसे ऐसे बात कर रहे थे जैसे आम व्यक्ति हो। जिस तरह उनकी निराडम्बर भाषा-शैली ,पात्रों का चित्रण , जीवन-स्थितियां उनके कथा-साहित्य को विशिष्ट स्थान देती है उसी प्रकार उनका निराडम्बर व्यक्तिव उन्हेंं श्रेष्ठ इंसान घोषित करता है।

बिहार का जो क्षेत्र मिथिलेश्वर जी के कथा साहित्य के केन्द्र में है वह मिथिलेश्वर जी का अपना जाना-बूझा क्षेत्र, उनकी अपनी जमीन है। उनका कथा-साहित्य-सामाजिक अराजकता, सामूहिक नरसंहार ,अपहरण, दलित उत्पीडऩ, स्त्री शोषण, ग्रामीण जीवन की रूढि़वादिता अनपढ़ जनता की मानसिकता, ग्रामीण जीवन के विभिन्न अन्तॢवरोध को उद्घाटित करता है, जिससे पता चलता है कि आजादी के बाद ग्रामीण यथार्थ किस हद तक भयावह तथा कष्टकर हुआ है। आज शोषण के तरीके बदले हैं और विकास के नाम पर शहरी विकृतियों भी ग्राम्य जीवन में शामिल हो गयी है उनकी लम्बी कहानिया? शोषण, अन्याय, अंधविश्वास, भ्रष्टाचार अत्याचार के प्रति संवेदनशील कथाकार की रचनाएं है, जो कविता के क्षेत्र में मुक्तिबोध का स्मरण कराती हैं। मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं की तरह मिथिलेश्वर जी की लंबी कहानियां अमर्यादित, संस्कृति, अनियंत्रित जीवन-जगत को बेनक़ाब करती हुई वर्गीय चेतना को प्रमाणिक रूप में व्यक्त करती हैं। बदलते सामाजिक-आॢथक संबंध, लोगों की बद्धमूल धारणाएं, मासिक पिछड़ापन, पारिवारिक ढांचे में बदलाव , अर्थसत्ता, संस्कृति, धर्म का अन्त :संबंध , संवेदनहीनता, संकीर्णता, असहिष्णुता में अनापेक्षित वृद्धि। सत्ता एवम लोकतंत्र का पतन की लम्बी कहानियों के विषय हैं। जिन्हेंं पढ़कर समाजशास्त्रीय अवधारणा, असहाय एवम् उपेक्षित लोगों का अस्तित्व-बोध, उनका जीवन-राग, तपती-खुरदरी जमीन पर नंगे पांव चलने का एहसास स्पष्ट हो जाता है।

मिथिलेश्वर जी की कहानियों में गांव अपने समस्त सुख-दुख, राग-विराग के साथ उपस्थित होता है। शहरी संस्कृति ने जिस तरह मानवीयता को विकृत तथा तिरस्कृत किया है उससे आज का गांव भी अछूता नहीं है। अपसंस्कृति और अजनबीपन ने नगरों की तरह गांवों में भी रिश्तों की गरमाहट को कम किया है। दरअसल यह बदलता परिवेश ही उनकी कहानियों में संवेदनशीलता के साथ-बुनता तथा अभिव्यक्ति पाता है। सहज संप्रेषणीयता, जीवन-सौंदर्य, अनुभवों की विविधता और विस्तार, भाषा की ताजगी तथा गहरे सामाजिक यथार्थ के बहुआयामी संवेदनात्मक चित्र उनके कथा-साहित्य की विशेषताएं हैं। इक्कीसवीं सदी के भारतीय गांवों की बेबाक पड़ताल करते हुए शहरी जीवन एवं शहरी समाज की परते उधेड़ उनकी प्रखर अन्तरकथा प्रस्तुत करती और जीवन तथा समाज की जिम्मेवार भारतीय लोकतंत्र की राजनीति का कच्चा चिट्ठा खोलती कहानियां भारतीय जीवन, समाज एवं राजनीति की महागाथा हैं।

अपने लगभग छह उपन्यासों तथा ग्यारह कहानी संग्रहों के माध्यम से मिथिलेश्वर जी ने हिंदी साहित्य को समृद्धि प्रदान की है। भारतीय जनमानस के विभिन्न पहलुओं पर केंद्रित इनकी कहानियां हमारी संवेदनाओं को उत्तेजित करती है, उन्नत बनाती है, उत्साहवर्धन करती हैं। हम कहानियों को पढ़ते-पढ़ते उस पृष्ठभूमि में चले जाते हैं तथा वातावरण को आत्मसात कर लेते हैं। यह लेखक की शैली है कि वे खूबसूरती से वस्तुस्थिति के साथ हम पाठकों को जोड़ देते हैं।

मेरी दृष्टि में 'बाबूजीÓ कहानी मिथिलेश्वर की सर्वश्रेष्ठ कहानी है। बाबूजी का वास्तविक नाम ललन सिंह है। बाबूजी का जन्म गरीब परिवार में हुआ जिसकी वजह से बचपन से उन्हेंं जीवन यापन करने लिए संघर्ष करना पड़ा। विभिन्न संघर्षों के माध्यम से उन्होंने समाज में अपना स्थान बना लिया ।इलाके के सबसे धनी गृहस्थ सुभगसिंह अपनी लड़की की शादी उनसे करते है। जिसकी वजह यह है कि उनकी लड़की को कुंवारेपन में ही लक्षण लग चुका था। शादी के बाद उनका सामाजिक स्तर घट गया पर इस बात का उनपर कोई परिणाम नहीं हुआ। शादी के बाद वे नृत्य, संगीत, नशाखोरी में घुस गए। बाबूजी रास-रंग में मस्त अपने लोगों के साथ रहने लगते हैं। यहां हम सामाजिक तौर तरीकों की दुहाई दे तो कह सकते हैं कि बाबूजी समाज में रहने के लायक नहीं थे । लेकिन यह निर्णय लेना कठिन है कि सही कौन था। उन्होंने एक ऐसी स्त्री को अपनी पत्नी के रुप में स्वीकार किया था जो कि समाज द्वारा अपनायी ही नहीं जा सकती थी तभी उनके पिता जोकि इलाके के सबसे धनी गृहस्थ थे अपनी बेटी को बाबू जी से ब्याहने को मजबूर हुए जो कि एक साधारण व्यक्ति थे।

बाबूजी के चरित्र की एक मुख्य विशेषता है कि वह लोगों की आलोचनाओं और फब्तियों से विचलित नहीं होते थे और अपने ढंग की जिंदगी जीते रहे। उनकी शादी भी एक क्रांतिकारी घटना थी क्योंकि उस वक्त गांव में एक भी व्यक्ति उनकी शादी का समर्थक नहीं था। यह उनकी जिंदगी के अनेक नए मोडो में से एक था । यह शादी उनके व्यक्तित्व के एक ऐसे पहलू से हमें जोड़ती है जहां हम उनके जिंदगी जीने के अपने निराले अंदाज से परिचित होते हैं। शायद पत्नी के व्यवहार से या अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने की प्रवृत्ति में उन्होंने शादी के बाद तबला और हारमोनियम खरीद कर अपने दोस्तों, संगीत प्रेमियों के साथ महफिल जमानी शुरू कर दी। घर में भी वेश्या के साथ नशा करते थे इसलिए पत्नी के साथ झगड़ा शुरु होता था । उनकी पत्नी मायके चली गयी।

लेखक लिखते हैं कि इससे उन्हेंं कोई तकलीफ नहीं हुई पत्नी और बच्चों के चले जाने से उन्हेंं सुख और संतोष मिला वैश्या को उन्होंने अपने साथ घर में रख लिया लेखक यहां कहते हैं कि उन्हेंं ऐसा लगता है कि गलती मां की भी थी आंखें जब मां की स्वतंत्रता का हनन बाबू जी ने नहीं किया था तो फिर मां को कोई अधिकार नहीं था कि वह बाबूजी के स्वतंत्रता का हनन करें लेकिन ऐसा हुआ और परिवार दो भागों में बट गया मामा के घर किसी तरह गुजर बसर हो रहा था लेकिन मामा जी ने कुछ वक्त बाद उन्हेंं अपने घर वापस जाने का और अपना घर आबाद करने का आदेश दिया। सपरिवार जब मा? घर वापस आती हैं तो घर का पूरा माहौल बदल चुका था। घर के भीतर आंगन में 19-20 साल की लड़की नाच गा रही थी और उसके इर्द-गिर्द हारमोनियम, तबला ,मंजीरा आदि लेकर समाजी इकट्ठा थे। उन्होंने इन लोगों को देखकर गाना बजाना बंद कर दिया।

इसी संदर्भ में भैया और बाबूजी के बीच संवाद के समय बाबूजी कहते है, 'जिम्मेदारी । कैसी जिम्मेदारी? बाबूजी गुस्से से गरजे -'तुम बिल्कुल बेवकूफ हो। मैं बार बार तुमसे कह रहा हूं कि न तो मेरी कोई पत्नी है और न बाल बच्चे।
भैया बाबू जी की इस बात से अवाक् रह गए। फिर फटी-फटी आंखों से बाबू जी को देखने लगे। बाबू जी पुन: बोले, च्च्और पत्नी। तुम बार-बार जिस पत्नी की बात कर रहे हो, उसकी तरह ढेर सारी औरतों के साथ मै रहा हूं। संभव है, उन सबों के भी बच्चे पैदा हुए हों। तो क्या उन सबों का जंजाल अपने माथे लिए फिरूं?Ó


'हां, अगर उनके जंजाल को अपने माथे नहीं लिए फिरोगे, तो फिर उनकी इज्जत बर्बाद करने का तुम्हें क्या हक था।Ó
इस बार बाबू जी गुस्से में एकदम लाल हो गए, चिल्लाकर बोले, 'ऐ लौंडे । कसकर एक झापड़ दूंगा, बस तेरी सारी हेकड़ी दूर हो जाएगी। तू मेरी बात समझने की कोशिश क्यों नहीं करता, तू बार-बार किस इज्जत की बात कर रहा है? मैं कह रहा हूं कि मैं इज्जत-विज्जत कुछ नहीं जानता। मैं सिर्फ मर्द हूं और इसीलिए कभी-कभी किसी औरत के साथ रह लेता हूं । और जिस औरत के साथ रहता हूं। उसके साथ कभी जोर-जबरदस्ती नहीं करता। वह औरत जबरन मेरे साथ नहीं रहती। मुझे उसके शरीर की आवश्यकता रहती है, तो उसे भी मेरे मर्द शरीर की चाह रहती है। हम साथ-साथ रहते। हैं। साथ-साथ आनंद उठाते हैं। फिर जंजाल मैं अपने माथे लिए क्यों फिरूं? भगवान ने मुझे हाथ-पांव दिए हैं, तो औरत को लूला-लंगड़ा तो नहीं बनाया? वह अपना भरण-पोषण खुद कर सकती है दूसरों पर आश्रित होने का सवाल ही नहीं है मैं तो कभी किसी पर आश्रित नहीं रहता।Ó
बाबूजी के इस जवाब के बाद कुछ कहने को रह नहीं गया था तो भैया बोले मैं शराबियों से बात नहीं करता मंझले भाई ने भी उनको बल देते हुए कहा अपने समाजियों को यहां से निकालो। इस बात पर बाबूजी खासे गुस्सा होते हैं और गड़ासा लेकर आंगन में उतर आते हैं उनकी विशालकाय देह देखकर सभी डर जाते हैं लेकिन गांव वालों के समझाने से की इन्हेंं यहां रहने दो इनका भी इस घर में हिस्सा है बाबू जी शांत हो जाते हैं । तथा कुछ लोग थाने भी चले गए और दरोगा भी वहां बीच-बचाव करने हाजिर हो गए यहां लेखक टिप्पणी देते हैं बाबूजी जैसी जिंदगी से उन्हेंं भी नफरत थी बाबूजी घर छोड़ दालान में कभी नहीं आते किंतु थाने से लेकर गांव तक किसी एक व्यक्ति द्वारा भी उन्हेंं समर्थन नहीं मिला विवश लाचार अपने समाजियो के साथ वे दालान में आ जाते हैं। यहां लेखक को यह महसूस होता है कि अनेक तरह की साजिश और षड्यंत्र करता उनका परिवार गलत है और बाबू जी की कोई गलती उन्हेंं खोजने से भी नजर नहीं आती।

अब बाबूजी ने नौटंकी कंपनी शुरू की और अपनी बेटी की शादी में नौटंकी का कार्यक्रम करने आते हैं । कार्यक्रम के दौरान नौटंकी की नर्तकी से छेडछाड का विरोध करते हुए उनकी मौत का इंतजाम हो जाता है। दरअसल वहां एक घटना घट जाती है "नर्तकी जब स्टेज पर आई तो दर्शकों के बीच हंगामा मच गया। बाबू रामभजन सिंह भी अपने जमाने के बड़े रंगबाज थे। उनसे रुका नहीं गया। वे अपनी जेब से सौ का नोट निकाल नर्तकी को दिखाने लगे।

दरअसल, हमारे यहां आज भी ऐसा होता है। बाराती, नाचने वालियों को रुपया दिखाते हैं, तो वे स्टेज से उतर उनके पास आती हैं। फिर करीब ही बैठकर कोई गीत सुनाती हैं। गीत से प्रभावित हो बाराती हाथ का रुपया उन्हेंं दे देते हैं और नाचने वालियां खुशी-खुशी स्टेज पर चली जाती हैं। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। वह नर्तकी स्टेज से उतरकर रामभजन सिंह के आगे बैठ गई। रामभजन सिंह अपने दो-तीन साथियों के साथ उससे गीत सुनने और भद्दे-भद्दे मजाक करने लगे। काफी देर तक वे लोग उससे गंदे-गंदे मजाक करते रहे, लेकिन वह उन लोगों के उस गंदे मजाक का प्रत्युत्तर नहीं दे रही थी, शायद इसीलिए उन लोगों ने उसे एक पैसा भी नहीं दिया। निराश होकर वह मुंह लटकाए स्टेज पर जा चढ़ी । और मैंने देखा, इसी समय बाबू जी के चेहरे की त्यौरियां एकदम बदल गईं। तबला छोड़ वे स्टेज पर खड़े हो गए। फिर कड़ी आवाज में बोले, 'ए बाबू साहब! पास बुलाकर मुजरे वाली को बेइज्जत क्यों किया?Ó

बाबू की कड़ी आवाज पूरे वातावरण में फैल गई। दर्शकों के बीच चारों ओर सन्नाटा छा गया। फिर तत्काल ही रामभजन सिंह तमतमाकर उठे और गुस्से में बोले, 'बेइज्जती, कैसी बेइज्जती? रंडी की इज्जत ही कहां होती है कि बेइज्जती का सवाल उठे?Ó

'आपको नहीं मालूम, बाबू जी गरजे, 'आप अपने घर की जिन औरतों को इज्जतदार समझते हैं, उनसे ये रंडियां हर मायने में सही और अच्छी हैं।Ó

राम भजन सिंह बाबूजी की इस बात से बेहद नाराज हुए वे उन्हेंं घूरने लगे। जिससे गरज कर बाबूजी ने पूछा घूर घूर कर क्या देख रहे हैं। आपके घर की औरतें पर-आश्रित हैं वह सारे गलत काम छुपाकर करती हैं क्योंकि वह हर चीज के लिए आप पर आश्रित हैं लेकिन यह औरतें पूरी तरह से स्वतंत्र हैं वह अपने मजे के लिए कमाती खाती हैं और अपनी किसी भी इच्छा के लिए किसी पर आश्रित नहीं है।

राम भजन बाबू इस बात पर आग बबूला हो जाते हैं कि बड़े घर की औरतों की तुलना यह नर्तकी से कैसे कर सकता है । मौके का फायदा उठाकर बड़े भैया ने हल्ला मचाया शराबी है मारो मारो और तभी भैया के चार पांच आदमी लाठी लेकर जो पहले से ही तैयार थे बाबूजी को चारों ओर से घेरकर मारना शुरू कर देते हैं। बाद में उनके समाजियो ने उन्हेंं टांग कर कस्बे के अस्पताल तक पहुंचाया। शादी तो धूमधाम से हो गई लेकिन बाबू जी शादी के तीसरे दिन टन्गा कर घर आए । धीरे-धीरे सारे समाजियो ने उनका साथ छोड़ दिया लेकिन एक नर्तकी जिसकी वजह से यह लड़ाई हुई थी वह अंत तक उनकी सेवा में लगी रही। वह उनकी नौटंकी की सबसे मशहूर नर्तकी थी। पर पता नहीं क्यों, वह बाबू जी को छोड़ चंपत नहीं हुई जैसे बाकि के सब हो गए।

'आज मैं यह सोचता हूं, तो मुझे लगता है, उसके मन में भी बाबू जी के सही होने का अहसास जाग गया था। शायद इसीलिए वह अंत तक उनसे जुड़ी रही थी।

दालान में बाबूजी की सेवा करती वह मशहूर नाचने वाली कहीं से भी मशहूर नहीं लगती। बिलकुल साधारण औरतों की तरह ही दिखती। पता नहीं, बाबू जी की स्थितियों ने उसे इस कदर बना दिया था, या किसी समस्या ने, कुछ भी मालूम नहीं। वह हमारे परिवार के किसी भी सदस्य से बोलती नहीं थी।

फिर एक सुबह एकदम तड़के ही उसके रोने और सुबकने की आवाज हमारे कानों में आई। हम किवाड़ खोल दालान पर आ गए। टोला-पड़ोस के लोग भी वहां जुटने लगे। हम दालान के अंदर घुसे। हमने देखा, बाबू जी मर चुके थे। उनका लंबा-तगड़ा शरीर एक चादर से ढंका था। उनकी खटिया के पैताने माथा झुकाकर बैठी वह नाचने वाली फूट-फूटकर रो रही थी तथा उनके सिरहाने शराब की तीन बोतलें रखी थी। दो बोतलें तो खाली थीं, लेकिन एक बोतल में आधी शराब बची थी। मैंने अनुमान लगाया, मरने से पहले बाबू जी ने इसी आधी शराब को पिया होगा।

खैर...जो भी हो, अब हमारे बीच बाबू जी नहीं हैं । वे सही थे या गलत इसका अंदाजा भी आप लगा ही लेंगे। मुझे तो आपसे अब सिर्फ यही कहना है कि बाबू जी की आधी बोतल शराब अब भी मेरे पास बची हुई है। इसे लेकर मैं सोच में पड़ गया हूं। कभी सोचता हूं, गटागट गले के अंदर इसे उड़ेल दू?। फिर सोचता हूं, नहीं, इस बोतल को ले जाकर सीधे भैया के माथे पर पटक दूं। हालांकि अभी तक कुछ भी नहीं किया है मैंने, लेकिन कुछ-न-कुछ तो मुझे करना ही है।Ó

भारतीय समाज के विभिन्न दुखते पक्षों पर केंद्रित मिथिलेश्वर जी की रचनाएं नैतिक दृष्टि से लोक मानस की संवेदनाओं को उन्नत बनाती हैं। इनकी कहानियां पाठकों को आत्मसात करने पर मजबूर करती हैं, पाठक हर कहानी के किसी न किसी पात्र के रूप में स्वयं को पाता है। उस समय, घर, पात्र, वातावरण को करीब से महसूस करता है। अब तक सौ से अधिक कहानियां, छह उपन्यास, संस्मरण, निबन्ध, आत्मकथा, टिप्पणियां, दर्जनों समीक्षात्मक लेख लिख चुके मिथिलेश्वर जी की अनेक कहानियां, देशी-विदेशी भाषाओं में अनूदित हुई हैं तो उसकी एकमात्र वजह है कहानियों में अभिव्यक्त संसार जो उतना ही वास्तविक लगता है जितना की हमारे आस-पास फैला वास्तविक जगत। ये कहानियां असाधारण महत्व की है- शिल्प और कथ्य दोनों स्तरों पर।

मुख्यत: ग्रामीण जीवन से जुड़े कथानकों के प्रति समॢपत कथाकार मिथिलेश्वर सीधी सादी शैली में विशिष्ट रचनात्मक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। कैमरे की सी नजर वाली उनकी कलम जीवन के हर पहलू पर चली है तथा बारीकी से चली है। चालीस पचास वर्ष पूर्व लिखी गयी उनकी कहानियां भी वर्तमान से उतनी ही जुड़ी हुई महसूस होती हैं जितनी की समकालीन कहानियां। यही लेखक की जीत है, उसकी लेखनी की जीत है। मैंने अपने साहित्य जीवन में न जाने कितनी कहानियां पढ़ी होंगी परंतु ऐसी कहानियां कम देखी हैं। मिथिलेश्वर जी की कहानियां पाठकों की अंगुली बेहद अबोधता से पकड़ लेती है तथा कहानियों में व्यक्त चरित्र, नायक, खलनायक, प्रकृति सबसे विस्तार में मिलवाती हैं। इस दृष्टि से इनकी कहानियों का पढ़ा जाना एक नए, व्यापक, देशज और सार्वभौम अनुभव का निर्माण करता है।