रांची, रंची और फांसी टुंगरी



अनिता रश्मि

चुटिया नागपुर के अपभ्रंश छोटानागपुर के इस जीवंत, ऐतिहासिक शहर राँची के मध्य में रिची बुरू है अर्थात राँची पहाड़ी। बुरू = पहाड़। आज दुकानों, पक्के मकानों, बड़ी इमारतों, झोपड़ियों अनेक उग आए मुहल्लों ने चारों ओर से उसे घेर लिया है। लेकिन एक समय ऐसा भी था, वह खुली हवा में साँस लेती थी। चारों ओर खूबसूरती की घनी हरी चादर। दूर-दूर तक खुलापन। दूर से ही शहर के कई इलाकों से नजर आती वृक्षों से आच्छादित अत्यधिक आकर्षक पहाड़ी। और ऊपर मंदिर।

इतिहास ने इसे फँसरी टुँगरी नाम भी थमाया था। और यह बेवजह नहीं था। पहाड़ी को टुँगरी भी तो कहते हैं वनवासी। यहाँ के गाछों पर कभी थे टँगे आजादी के परवाने। सर पर कफन बाँधकर निकले आजादी के दीवानों को क्रूर अंग्रेजों ने यहाँ के वृक्षों पर फाँसी दे दी थी। इसीलिए राँची पहाड़ी को कहते हैं फँसरी टुँगरी! शहर की छाती पर सदियों से शान से खड़ी इस पहाड़ी पर शिव की पूजा-अर्चना के साथ झंडोत्तोलन भी करते हैं। बड़े मीठे राष्ट्र गान संग। राष्ट्रीय पर्वों में मंदिर परिसर में लहराता है तिरंगा प्यारा। यह इकलौता देवालय है, जहाँ ईश आराधना के साथ आन-बान-शान से राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है। हर राष्ट्रीय पर्व पर पुरखों का वह अप्रतिम अबोलता सा गुम बलिदान याद किया जाता है। फिर भुला भी दिया जाता है।

देर से सही लेकिन जब मुझे यह बात पता चली, मैंने पूरी जानकारी ली और कविता ' रिची बुरू ' में तथा एक कहानी में वह बोलता बलिदान खुद-ब-खुद उतर आया।
मुझे लगता है, इतिहास की इस गाथा को बच्चे-बच्चे के दिमाग में डाल देनी चाहिए, जिससे वे जान सकें, राँची पहाड़ी मात्र भक्ति का केंद्र नहीं, राष्ट्र भक्ति का भी केंद्र बिंदु है। युवा-किशोर फँसरी टुँगरी के बारे में नहीं जानते।

हमारे झारखण्ड के बहुत से गुमनाम शहीदों को आज के युवा नहीं जानते-पहचानते। उनके बीच इतिहास बाँचने की जरूरत है, ऐसा मुझे हमेशा लगता रहा है। अतः बेचैन मन की उपज बिरसा मुंडा पर कहानी ( कथाक्रम, 2008) में लिखी। तो निकट भविष्य में अनेक शहीदों पर केंद्रित एक कहानी संग्रह जल्द आने को है।

सर्वविदित है, कालांतर में इस पहाड़ी पर देश का सबसे ऊँचा झंडा लगाया गया। लेकिन अब सिर्फ पोल है, तिरंगा गायब! अतिक्रमण और प्रदूषण की मार झेलता ढहता हुआ रिची बुरू उस विशाल तिरंगे की ताब ना झेल सका।

पहाड़ी के ऊपर प्राचीन शिव मंदिर है। अब तो बीच-बीच में कई मंदिर और विश्राम करने के लिए स्थान बन गए। हमलोग के बचपन-कैशौर्य ने टूटी, अधटूटी सीढ़ियों से ही शिव मंदिर तक की दूरी तय की थी....बारंबार की थी। ऊपर से राँची का विहंगम दृश्य अत्यधिक मनमोहक! पास ही में बड़का तालाब ( राँची झील ) सुस्ताता रहा है इसकी छाँव तले। उसी के पार से तस्वीरें भी लीं थीं नब्बे के दशक में। अक्सर नाग निकलने की चर्चा उस समय भी आम थी, जब छोटा सा मंदिर खास नहीं था। मेरे कैमरे में कैद है, उन दिनों की बड़का तालाब के पीछे से उचककर झाँकती पहाड़ी।


वहाँ प्रत्येक सावन में भगवाधारी काँवरियों की भीड़ देखते बनती थी, है। लेकिन इस बार महामारी ने ग्रहण लगा दी। हमने चर्च रोड में रात्रि के नौ-दस बजे के बाद " बोल बम " के नारों से पट जाते देखा था सड़कों को। बचपन से ही स्वर्णरेखा जाकर जल लेने जाते शिव भक्त दिखते। तने शामियाने में लाउडस्पीकर से निःसृत भक्ति गीतों की लहर और संग बोल बम!.... आकाशभेदी.... अति उत्साह से भरे। गली के मुहाने पर खड़े आबालवृद्ध उस भक्ति रस में उब-डूब करते। रातों-रात स्वर्णरेखा नदी में नहा-धोकर वहीं से जल लेकर इसी पहाड़ी मंदिर पर अनगिन सीढ़ियों को पारकर भोले बाबा को जलार्पित करने के बाद ही लोग सुस्ताते हुए संतुष्ट नजर आते। चर्च रोड के एक तरफ स्वर्णरेखा, तो एकदम विपरीत दिशा में पहाड़ी मंदिर। बीच में सच्ची भक्ति की अविरल धारा! दो छोरों की दूरी प्रत्येक श्रावणी रविवारीय रात को सिमट आती। हर गली-कूचे से।

आज बड़ा सा भव्य प्रवेश द्वार, चौड़े सोपानों के पास दो-तीन मंदिर, सीढ़ियों पर शेड, बीचोंबीच एक और देवालय आदि ने पहाड़ी को वहाँ से एकदम छिपा दिया है। गौशाला, हरमू रोड के आस-पास की ऊँची-नीची अनेक गलियाँ आपको सीधे पहाड़ी तक पहुँचा देतीं हैं। दुर्गा मंदिर, रातू रोड के सामने, मिनाक्षी सिनेमा से होते हुए सती मंदिर के पास से आराम से इससे मिलने पहुँचकर सुकून पाया जा सकता है। पर वह सुकून कम हो जाता है जब हरियाली की जगह प्रतिष्ठानों का दर्शन होता है।

रिची बुरू है हृदय राँची का। इसे बचाए-जिलाए रखने की आवश्यकता है। उसके चोक गले को अब खुलकर साँस लेने दिया जाए, खुद कह रहा अपनी बदहाली को रोता फँसरी टुँगरी।

लेखिका की कई किताबें प्रकाशित। कहानी, उपन्यास और यात्रा वृत्तांत के साथ कविता की दुनिया में भी आवाजाही। चौराहा के लिए वे लगातार रांची की गलियों पर लिख रही हैं।