झारखंड की मिट्टी की सुरभि



विक्रमादित्य प्रसाद

उदासी के क्षणों में मैं अक्सर अपने इर्द-गिर्द के लोगों की रचनायें पढ़ने लगता हूँ । अनिता जी की यह पुस्तक अभी हाथ में है और इस बदलते मौसम में उसे ढलते सूर्य को देखते हुए पढ़ चुका हूँ। मेरा पाठक मन और न्यायिक दृष्टि मुझे रचना तक ही सीमित रखती है और रचनाकार लगभग गौण रहता है।
कविता क्या है? क्या वह तुकांत शब्दावली है या कुछ टेढी-मेढ़ी सीढी़नुमा पंक्तियों का शब्दाडंबर । मेरी पाठकीय दृष्टि में मन जब निर्बंध, निर्द्वन्द्व बोलता चला जाता है, शब्द और बिंब जब उससे स्वत: आ जुटते हैं, उन्हे बुलाना नहीं पड़ता, तो वह कविता हो जाती है।

अपने इसी चश्मे से मैंने इस पुस्तक को पढ़ा है और मैं यह कह सकता हूँ कि संग्रह की अधिकांश कवितायें इस कसौटी पर खरी उतरी हैं । फिर भी कई कविताएँ, जिनकी संख्या कम है, बनावटी हैं। सबसे अच्छी बात यह दिखी कि जितने भी बिंब हैं, वे आयातित नहीं हैं और शुद्ध देसज है। मैंने झारखंड के बहुत रचनाकारों की रचनाओं में सलीब, चर्च बेल, केंडल लाइट जैसे बिंबों का उपयोग देखा है । कवयित्री उस उधारू बुद्धिजीविता के छद्म से ऊपर दिखती हैं। रचनाकाल और परिदृश्य स्पष्ट रूप से झारखंड की मिट्टी की सुरभि, झारखंडी संस्कृति के सौंदर्य और उसकी गहराई को दर्शाती हैं लेकिन इसका ढिंढोरा पीटती कोई रचना नहीं दिखी। ' सरई फूल ' ' अकेला गाछ ' जैसी कविताएँ मेरे इस निष्कर्ष की गवाह हैं।

अधिकतर कविताओं के बिंब और अभिव्यक्तियांँ इतनी ताजगी लिए हैं कि पाठक रुकने को विवश हो जाता है। बानगी देखिये -
गाछ की काली ऊंचाईयांँ, अलगनी पर सुस्ताती साड़ी, हवा रंग ओढ़ लेटी है, थेथर, पुटुस आदि। झारखंड में चलते फिरते शब्द बेतरा, छउआ आदि शब्द तो पूरी तरह बिखरे पड़े हैं।
कुछ कविताओं का उल्लेख करना पाठक धर्म है -
मन के एकांत में / सागर तट की गीली रेत पर / सैकड़ों बार लिखा मैंने तेरा ही नाम ( पृष्ठ 17)


उसकी देह से माटी की खुशबू चुराई जा सकती है (पृष्ठ 22) कोयल सुबह से सांझ तक उसकी पीठ से उतरती क्यों नहीं और वह बैल चुपचाप उसे ढोते इतना शांत क्यों है? ( पृष्ठ 40)
वह घर छोटा सा / रिश्तों की आंच से / हरा-भरा था / कांँच का नहीं था / ( पृष्ठ 99)


इस कविता में प्रिंट की कुछ अशुद्धियांँ हैं। जंगल की बेटियांँ, मातृत्व, बोनसाई, एसिड अटैक जैसी कविताएँ नारीवादी कविताएँ हैं और उनमें कोई ताजगी नहीं दिखती। ' किन्नरों को समर्पित कविताएँ ' एक नयेवाद में अग्रणी भूमिका निभाने की कवयित्री की एक कवायद भर है। उसमें आयातित संवेदनाएंँ हैं।

फिर भी पूरे संग्रह की पैंसठ से सत्तर प्रतिशत कविताएँ वास्तविक, बहुत सशक्त और ताजगी से भरी कविताएँ हैं। हरी-हरी कविताएँ, गुलाब का फूल, घर, कुदाल जैसी कविताएँ आशा, विश्वास और मानवीय आस्था की चिरस्मरणीय गुणों से युक्त हैं।

और एक बड़ा सामयिक प्रश्न उठाती एक कविता 'प्रश्न बिजूका का ' -- क्या बच गये परिंदों को बचाना नहीं है। कविताओं में अतीत का आकर्षण है, वर्तमान का सत्य और भविष्य के प्रति आशंका फिर भी मूल स्वर आशा का है, उत्साह का है, आनंद का है। कई कविताओं को पढ़ते मुझे वाल्ट ह्विटमैन की कविताओं जैसी महक की अनुभूति हुई। मै समझता हूँ की 108 पन्नों की 250 रूपये मूल्य की, रवीना प्रकाशन,दिल्ली के द्वारा प्रकाशित यह कविता संग्रह पढी़ और सराही जायगी।

जिन्दा रहेंगी कविताएँ ( काव्य संग्रह ) की समीक्षा
कवयित्री - अनिता रश्मि
प्रकाशक - रवीना प्रकाशन
मूल्य - 250/-