क्या सत्यनारायण नाटे को जानते हैं



अमन चक्र

पलामू के इस लेखक को कौन याद करता है

साहित्य! खासकर हिन्दी साहित्य में लगभग सभी साहित्यकारों का सफर संघर्षमय होता है। सत्यनारायण नाटे भी इससे अछूते नहीं थे। सत्यनारायण नाटे ने अपने जीवन में ईमानदारी का साथ जितनी सच्चाई से निभाया, वह किसी अन्य के वश में कतई नहीं हो सकता। वे सभी के साथ एकदम खरा संवाद स्थापित करते थे...कभी करैले को शहद में डूबा कर किसी को नहीं परोसा। एक ईमानदार लेखनी उनके जीवन की सच्ची पूंजी रही है। उनके साहित्य सृजन में एक जिजीविषा होती थी। जितनी निष्ठा से वे कहानियां लिखते थे, उतनी ही दिलचस्पी कविताएं, लघुकथाए, समसामयिक लेख आदि लेखन में रखते थे।

छोटा कद, बड़ा काम
सत्यनारायण नाटे हिंदी के सिद्धहस्त साहित्यकार थे। वर्ष 1954 से निरंतर 2017 तक लगभग सभी विधाओं में लेखन करते रहे। हिंदी के लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं छपती रहीं। साहित्य-सेवा के लिए नाटे को कई संस्थानों से सम्मानित भी किया जा चुका है। सत्यनारायण नाटे जरूर छोटे कद के थे, मगर गहरी सोच व बड़े विचार अपने लेखन में रखते थे। उनकी भाषा एकदम सरल, सहज और ग्राह्य होती थी। उनकी जिंदगी में कई मोड़ आए, मगर कभी उनकी कथाओं में कोई मोड़ नहीं दिखता था, कोई घुमाव नहीं होता था....स्पष्टता व सादगी होती थी। उन्हेंं जो दिखता था और उनके अन्तर्मन को छूता था, उसे कथा का विषय बनाते थे। जिस समय लघुकथा को सम्मानित विधा का दर्जा नहीं प्राप्त था,लम्बी कहानियों का दौर था,तब वे लघुकथाओं को बहुत ज्यादा तरजीह देते थे। लघुता (लघुकथा) में संपूर्ण व्यापकता को समेटने की कोशिश करते थे। समीक्षकों/समालोचकों के द्वारा उनकी लघुकथाओं को कई पुस्तकों में उद्धृत एवं संकलित भी किये गये।


हर विधा में लेखन

सत्यनारायण नाटे ने गंभीर विषयों पर तो लेखन किया ही, साथ ही हास्य-व्यंग्य की रचानाएं भी खूब की...हास्य-व्यंग्य को वे गंभीरता से लेते थे।हास्य-व्यंग्य में भी उनकी अच्छी पैठ थी...लतीफा लेखन ने उन्हेंं काफी ख्याति दिलायी। धर्मयुग का 'रंग और व्यंग्यÓ , साप्ताहिक हिन्दुस्तान का 'सबरंगÓ, मनोरमा का 'छींटे और बौछारÓ, नवनीत में 'हंसी के बुलबुलेÓ लोगों को हंसने को मजबूर करते थे। अपने बच्चों को वे शाम में सोते समय प्रेरक कथाएं सुनाया करते थे, जिसके कारण बाल साहित्य के प्रति उनका झुकाव हुआ। उन्हेंं पत्र-पत्रिकाएं एवं पुस्तकें पढऩे का शौक आरम्भ से था। उनके मासिक बजट में पत्र-पत्रिका एवं पुस्तकों के खर्च शामिल होते थे। पुस्तकों के पढऩे से उन्हेंं लेखन करने की इच्छा होती थी,लेकिन लिख नहीं पाते थे।लिखना सीखे इलाहाबाद जाने के बाद।

इलाहाबाद में बदल गया नाम

सत्यनारायण नाटे का मूल नाम सत्यनारायण लाल सिन्हा था। नाटे नाम का परिवर्तन भी इलाहाबाद में ही हुआ.... डालटनगंज से मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद 1953 में इलाहाबाद चले गये थे। इलाहाबाद के.पी. कॉलेज में साहित्यिक माहौल था। वहां समय-समय पर साहित्यिक कार्यक्रम हुआ करते थे। उन कार्यक्रमों में इलाहाबाद तथा निकटवर्ती क्षेत्रों के साहित्यकारों को ससम्मान बुलाया जाता था। सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, इलाचंद जोशी, प्रेमचंद, भगवतशरण उपाध्याय आदि प्राय: वहां कार्यक्रमों में आते थे। भगवतशरण उपाध्याय का भतीजा दिवाकर जी से सत्यनारायण नाटे का परिचय कार्यक्रमों के दौरान ही हुआ था। परिचय मित्रता में बदल गई और भगवतशरण उपाध्याय के घर पर सत्यनारायण नाटे का आना-जाना शुरु हो गया था। उन्हेंं भगवतशरण उपाध्याय का रचना संसार देखने-पढऩे को मिला...उनका अध्ययन कक्ष मोटी-मोटी किताबों से भरा हुआ था। भगवतशरण उपाध्याय , सत्यनारायण नाटे की प्रेरणा पुरुष थे। सत्यनारायण नाटे कॉलेज से प्रकाशित होने वाली वाॢषक पत्रिका अमर वीणा के सम्पादक भी थे।

सत्यनारायण नाटे का जन्म 5 अगस्त 1935 को डालटनगंज में हुआ था। ये तीन भाई और एक बहन थे। आरंभिक एवं माध्यमिक शिक्षा डालटनगंज में ही हुई थी। उच्च शिक्षा की व्यवस्था डालटनगंज में नहीं होने के कारण उन्हेंं इलाहाबाद जाना पड़ा था।बिहार सरकार के पुलिस विभाग में 37 वर्षों तक सेवा देने के बाद 1993 में सेवामुक्त हुए थे। 1954 से निरंतर लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, रेखाचित्र, कविता, बाल रचनाएं, सामाजिक/राजनीतिक/सांस्कृतिक/आध्यात्मिक लेख, लतीफे आदि में सक्रिय रहे। अंतिम समय में तीन उपन्यास भी लिखे। अलग-अलग विषयों पर अब तक आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।वर्ष 2016-2017 में झारखंड शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्, रांची द्वारा भाषंजलि(5वीं कक्षा की पुस्तक) में दो रचनाएं शामिल हुई थी। शैक्षणिक काल में ही इनके पिता की मृत्यु हो गयी थी, लेकिन उनके दोनों भाई अमर बहादुर सिन्हा और कुअर बहादुर सिन्हा इनका आधार बने हुए थे। वे उन्हेंं पिता की मृत्यु का तनिक भी एहसास नहीं होने दिए.....घर की आॢथक स्थिति कमजोर होने के बावजूद इनका सहारा बने हुए थे। सत्यनारायण लाल सिन्हा को सत्यनारायण नाटे बनाने में इनके भाइयों का सबसे बड़ा योगदान रहा है, ऐसा स्वयं अपने संस्मरण में सत्यनारायण नाटे ने कहा है। सत्यनारायण नाटे अंतिम सांस तक लिखते-पढ़ते ही रहे। अपने ज्ञान की अकुत संपत्तिा को अपनी संतान के भरोसे छोड़कर आठ जनवरी 2017 को वे संसार से विदा हो गये। संतान में दो पुत्र व दो पुत्रियां हैं।

अमन चक्र, सत्यनारायण नाटे के पुत्र हैं। डालटनगंज में रहते हैं। कविता कहानी के साथ रंगों से भी खूब प्रेम हैं।