रंगमंच और हिंदी का हमारा समाज



डॉ विनोद कुमार
रंगकर्म निश्चित ही एक ऐसी कला है जिसमें साहित्य, संगीत, पेंटिंग, नृत्य आदि का बखूबी समावेश हो जाता है। उपन्यास या कहानी सिर्फ साहित्य की एक धारा होती है मगर रंगमंच साहित्य के साथ-साथ अन्य कलाओं से जुड़कर दर्शक के सामने प्रस्तुत होता है। रंगमंच के दो पक्ष है, साहित्यिक पक्ष और व्यवहारिक पक्ष। साहित्यिक कर्म के साथ जुड़ा है नाट्यालेख जिसके लिए रंगमंचीय तकनीक जानना बहुत जरूरी है। व्यवहार पक्ष के साथ जुड़ा है आलेख का मंचन। बंद कमरे में बैठकर लिखे गये नाटक से लेकर प्रेक्षागृह तक प्रस्तुति के दौरान जो सारा कुछ घटित होता है उसके लिए अभिनेता, निर्देशक एवं तकनीक टीम के हर सदस्य की भागीदारी से ही संभव हो पाता है। दरअसल नाटक का मंचन एक टीम वर्क है जिसमें लेखक, निर्देशक, अभिनेता से लेकर नेपथ्य में कार्य करने वाले सारे लोग बड़े महत्वपूर्ण हैं।

नाटक सिर्फ डायलाॅग नहीं होता, न ही सिर्फ साहित्यिक कृति बल्कि सामूहिक रूप से बैठकर देखने की चीज होती है, इसलिए जरूरी है कि लेखक को रंगमंच की तकनीक का ज्ञान हो। दरअसल नाट्यलेख को आप एक तकनीकी लेखन भी कह सकते है। मैं इसी परिप्रेक्ष्य में फिल्म के स्क्रीनप्ले का उदाहरण देना चाहूंगा। हो सकता है कि आप बहुत अच्छे लेखक हों, मगर जरूरी नहीं कि आप अच्छे स्क्रीनप्ले लेखक भी हों। इसलिए फिल्म में अकसर कथानक किसी और का होता है और स्क्रीनप्ले किसी और का। स्क्रीनप्ले यानी स्क्रीन पर घटित नाटक वैसे ही जैसे मंच पर। मगर मंच की अपनी सीमायें हैं। मंच पर आप बहुत ज्यादा आउटडोर नहीं दिखला सकते, बार-बार दृश्य नहीं बदल सकते।

मंच की तमाम परिधियों का ख्याल करते हुए ही लेखक मंच के कुशल कारीगर हो सकते हैं। साथ ही मैं यह भी मानता हूं कि कथ्य पर शिल्प हावी नहीं होना चाहिए। शिल्प की आवश्यकता कथ्य के बहाव और सशक्त संप्रेषण के लिए ही है।

आधुनिक हिन्दी नाट्य लेखन में मोहन राकेश का नाम एक बड़े सार्थक लेखक के रूप में उभरा। लहरों के राजहंस, आषाढ़ का एक दिन, नाटक ने साहित्य एवं मंच पर राकेश को स्थापित कर दिया। आधे अधूरे के प्रकाशन ने तो जैसे भूचाल ही ला दिया....आधे अधूरे के साथ राकेश एक समर्थ एवं सम्पूर्ण नाटककार के रूप में उभर कर आये। राकेश के ही समकालीन लक्ष्मीनारायण लाल ने कफ्र्यू एवं व्यक्तिगत नाटकों ने भी रंगमंच के विकास की दिशा में एक जमीन तैयार की।

मोहन राकेश ने ज्यादा जोर समकालीन पारिवारिक जटिलता को, मानवीय द्वंद को पकड़ने की और भाषा के द्वारा रंगमंचीय सौन्दर्य की सृष्टि करने की ओर दिया। और यह भी सच है कि राकेश ने अपने अंतिम दिनों में रंगमंच को मूलतः ‘श्रव्य माध्यम’ कहा था। नाटकीय शब्द की इसी खोज के फलस्वरूप उनके नाटकों में धीरे धीरे वाह्य उपकरण या दृश्य विधान जैसी चीजें नगण्य होती गयीं। सादगी और प्रतीकात्मकता वाला रंगमंच दरअसल राकेश के आंतरिक शिल्प की एक तलाश थी।

हिन्दी नाटकों के लम्बे सफर में जो सफर भारतेन्दु हरिशचन्द्र से शुरू होकर जयशंकर प्रसाद तक गया...मोहन राकेश ने नयी जमीन ही तैयार नहीं की बल्कि एक जीवंतता लाई थी क्योंकि वह रंग चेतना से पूरी तरह लैस थे। मोहन राकेश के रंग चेतना के विकास में हम संस्कृत और अंग्रेजी नाटकों के प्रभाव को नजरअंदाज नहीं कर सकते। हालांकि राकेश के जमाने में रंगमंच के लिए भूमि तैयार हो चुकी थी लेकिन आज की तरह सुविधाओं का अभाव था। जब मोहन राकेश ने नाटक लिखने शुरू किये थे उस समय प्रायः काॅलेजों, विश्वविद्यालयों में रंगशाला थे। दरअसल राकेश अपने युग के रंगमंच की वस्तुस्थिति को पहचान गये थे और इसी को ध्यान में रखकर ऐसे नाटकों की रचना कर रहे थे जिन्हें किसी अत्याधुनिक रंगशाला की सुविधा के बगैर भी खेला जा सके। उन्होंने यथार्थवादी रंगशिल्प एवं दृश्यबंध को स्वीकार किया था।

आंठवे दशक के बाद प्रकाश योजना संबंधी संयत्रों के विकास ने नाटक के ढांचे को प्रयाप्त बदला है। आज यदि नाटककार एक के बाद एक छोटे छोटे अनेक दृश्यों की योजना करते हैं तो उनके मन में ‘फेड आउट’ और ‘फेड इन’ की संभावना रहती है। अब ‘ट्रांजिशन’ को रूपायित करना उतना मुश्किल नहीं रहा। एक ही दृश्यबंध में अनेक क्षेत्रों और धरातलों को निश्चित करके अनेक स्थलों पर चल रही घटनाओं को साथ साथ प्रस्तुत करना भी प्रकाश योजना द्वारा ही संभव है। साइक्लोरामा तथा नवीनतम प्रकाश योजना के संयत्रों ने यथार्थवादी दृश्यबंध को शक्ति दी है...एक नया आयाम दिया है।

मुखौटों का भी प्रयोग चल पड़ा है। सुरेन्द्र वर्मा के नाटक द्रौपदी में मुखौटों का उपयोग मानसिक प्रवृतियों को अभिव्यक्ति करने के लिए किया गया है। कुछ नाटक इस दौर में जो मेरी नजरों से गुजरे है उनका खास तौर पर उल्लेख करना चाहूंगा। मणि मधुकर- एकतारे की आंख, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना-बकरी, सुदर्शन चोपड़ा-काला पहाड़, गिरिराज किशोर-प्रजा ही रहने दो, मधु राय-किसी एक फूल का नाम लो, सुशील कुमार सिंह-नागपाश।

भाषिक विविधता के अतिरिक्त विषयवस्तु की विविधता भी आज के रंगमंच पर देखने में आई है। राकेश की अनुपस्थिति में कई नाटककार आगे आए है, लगातार आ रहे है। आज के नाट्य लेखन में लोकशैली की जोर शोर से अपना जा रहा है, संगीत डिजाईन किए जा रहे हैं यानि जोर म्यूजिकल्स की तरफ है। आज के अनेक प्रदर्शनों में संगीत, गीत, नृत्य, स्थितियों के मूकाभिनय, देशकाल के परिवर्तनों के कल्पनाशील प्रस्तुतीकरण, सुत्रधार आदि पारंपरिक भारतीय रंगमंच की रूढ़ियों और युक्तियों के प्रयोग में वृद्धि द्रष्टव्य है। इसमें कोई बुराई नहीं बल्कि यह एक उचित प्रयास है...नाटकों को संभावित दर्शकों तक पहुंचाने के लिए। इस संदर्भ में हबीब तनवीर एवं बलराज पंडित ने काफी अच्छे प्रयोग किए हैं। लोक शैली और लोक कलाकारों को लेकर खेला गया हबीब तनवीर का नाटक चरणदास चोर काफी लोकप्रिय हुआ है। लोक परम्पराओं से अनेक नाटकीय शैलियां विकसित की जा रही है। हिन्दी रंगयात्रा में कुछ विदेशी प्रमुख नाटककारों के अनुवाद के मंचन के महत्व को नहीं नकारा जा सकता। सोफोक्लीज, ब्रेख्त, सात्र्र, कामू, बेकेट, इब्सन, आयनेसको के नाटकों के अनुवाद के समर्थ मंचन ने हिन्दी रंगयात्रा को एक नयी सोच दी है।

अभिनय की भाषा शरीर है। इस शारीरिक भाषा के सहारे हम अपने चरित्र को अभिव्यक्त करते हैं। ग्रोस्तोव्स्की ने नाटक के मंचन के लिए कहा था कि उन्हें सिर्फ अभिनेता और दर्शक चाहिए। वह स्क्रिप्ट के मुहताज नहीं थे। इसी शरीर को आधार में लेकर आज कई तरह की अभिनय-पद्धतियाँ चल पड़ी है, जैसे मनोशारीरिक अभिनय। यह ग्रोस्तोव्स्की के ‘थियेटर’ से प्रभावित अभिनय पद्धति है जिसे बादल सरकार ‘थर्ड थियेटर’ कहते हैं। इसमें अभिनेता यांत्रिक गतियों से काम लेते हैं। सिर्फ शरीर और कुछ ध्वनियाँ एवं प्रकाश के सहारे अभिनय को आयाम दिया जाता है।

नाट्य समीक्षक जयदेव तनेजा के शब्दो में-

‘‘गरीब रंगमंच के प्रवत्र्तक पोलैंड के महान नाटककार ग्रोस्तोव्स्की से दीक्षित होकर हिन्दी के विजय सोनी ने एक क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने की जबर्दस्त कोशिश की। उन्होंने मुक्तिबोध की प्रसिद्ध लम्बी कविता अंधेरे में को आशंका के द्वीप नाम से जिस शैली में प्रस्तुत किया वह सचमुच ही हिन्दी रंगमंच के लिए एकदम अभूतपूर्व थी। एकदम सादे नंगे मंच पर केवल एक प्रकाशवृत और सिर्फ काली जांघिया पहने छः अनाम पात्र अपने शरीर की अस्थियों और मांशपेशियों, रूपाकारों, मुद्राओं और गतियों तथा कुछ अस्फुट स्वरों द्वारा कविता के निहित अर्थों को बिम्बात्मक और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति देते थे। इस प्रस्तुति ने एक बिलकुल नये प्रकार के नाट्यानुभव से हमारा सामना कराया और आज की सामाजिक राजनीतिक आर्थिक स्थितियों के क्रूर शिकंजे में फंसे शोषित, पीड़ित, त्रस्त और आतंकित उस आम आदमी की भयावह जिन्दगी और नियति के लिए जिम्मेदार हमारी आदमखोर व्यवस्था तथा स्वयं आम आदमी की अलगाववादी घातक प्रकृति को बेनकाब किया। प्रस्तुतिकरण और अभिनय पद्धति की दृष्टि से भी यह प्रदर्शन विशेष उल्लेखनीय रहा। विजय सोनी मानते हैं कि जब कलाकार अपने को शारीरिक और सांस्कृतिक बाधाओं तथा शिकंजों से मुक्त कर लेता है, तभी वह जीवन्त अभिनय की ओर अग्रसर होता है। ग्रोस्तोव्स्की के लिए जीवन्त अभिनय का अर्थ है जहां अभिनेता के आंतरिक संवेग ही मूर्त हो जाएं दृश्य बन जाएं और देह लुप्तप्राय हो जाए।’’

एक और खास बात जो नजर आ रही है वह हे नाट्य समीक्षाओं की बाढ़...पत्रिकाओं में नाट्य समीक्षाएं छप रही है जो दर्शकों की नाट्य चेतना को विकसित करने में बहुमूल्य भूमिका अदा कर रही है। सैद्धांतिक पक्ष से हटकर अब व्यवहारिक पक्ष का मंचन पर ज्यादा दखल है। अब नाटकों में साहित्य से ज्यादा ट्रीटमेंट यानी प्रस्तुति पर बल दिया जाता है। इसका श्रेय राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को जाता है।

सामाजिक परिवर्तन के तेवर वाले नाटक पिछले दशक से खास तौर पर मंचित होने शुरू हो गये। नाटकों के आलेख और मंचन दोनों ही दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। साथ ही इन्हीं दिनों समांतर कम खर्च पर जन जीवन से जुड़ा मनोशारीरिक रंगमंच का भी आरम्भ हुआ। शिल्पगत ही नहीं कथ्य की दृष्टि में भी बदलाव आया। वस्तुतः यह सारे परिवर्तन तीसरे रंगमंच की शुरूआत है। ब्रेख्त, रिचर्ड शेकनर और ग्रोटोस्की का प्रभाव भी हिन्दी रंगमंच पर काफी गहरा पड़ा है। मुहावरे और तेवर बदले हैं। साम्प्रतिक जीवन से जुड़े नाटक प्रस्तुत किए जाने लगे हैं। शुतुरमुर्ग, सिंहासन खाली करो, त्रिशंकु, एक था राजा, बकरी जैसे समस्यामूलक नाटकों ने अपनी पहचान बनाई है। राजनैतिक विषयों पर नाटक लिखे जाने लगे हैं। नये नये नाट्य दल गठित होकर आवाम तक पहुंचने की छटपटाहट में समसामयिक विषयों पर नाटक मंचित करने लगे है। हिन्दी रंगनाटकों की यात्रा राकेश की मृत्यु के बाद बहुत आसान नहीं समझा जाना चाहिए। मगर तमाम कठिनाईयों को पार कर रंग नाटक की यात्रा सार्थक रही है। थोड़े से वक्त के लिए आर्ट फिल्मों से एक खतरा था जो खत्म हो गया।

मगर अब इस रंग यात्रा में एक ठहराव की स्थिति नजर आती है। कारण साफ है अब लोग प्रेक्षागृह में जाने की बजाय अपने घर की सुविधाजनक स्थिति में कोई भी टी॰ वी॰ सीरियल देख लेना चाहते हैं और वह भी मुफ्त। टी॰वी॰, सेटेलाइट चैनेल, केबल चैनलों एवं ओ.टी.टी. प्लेटफार्मस जैसे दृश्य माध्यमों की सहजता की वजह से भी हिन्दी रंगनाट्य यात्रा पर असर तो पड़ा ही है। ढेरों चैनल आ रहे है, फिल्में और सीरियल्स चले आ रहे हैं, ‘फैशन शोज’ और सेक्स की भूखी जनता को ‘लाइव परफारमेंसेज’, परोसी जा रही है और अब तो इंटरनेट का भी क्रेज बढ़ता जा रहा है। यू ट्यूब तो है ही। इस रफ्तार भरी जिन्दगी में रंगयात्रा के विकास पर इसका असर पड़ना ही था...वैसे भी हिन्दी प्रदेशों में सांस्कृतिक गतिशीलता थोड़ी मद्धम है।

आधुनिक हिन्दी नाटकों के मंचन की सबसे बड़ी समस्या है दर्शकों का अभाव। तमाम रंगमंचीय उपलब्धियों के बावजूद सहज दर्शकों का अभाव एक त्रासद स्थिति है। दर्शक भी हैं तो एलीट वर्ग के, अभिजात्य, समीक्षक, रंगकर्मी वगैरह। बंगाली, मराठी, गुजराती नाटकों की तरह हिंदी नाटक का जुड़ाव जनसामान्य से नहीं हो पाया है। अच्छे साहित्य के लिए पाठक नहीं है, रंगमंच के लिए दर्शक नहीं। मेरा यह अनुभव सिर्फ छोटे, मझौले शहरों, कस्बों का नहीं बल्कि बड़े शहरों का भी है। लोगों ने बहुत सारे कारण गिनाये हैं- मसलन फिल्में, टीवी, सेटेलाइट चैनेल लेकिन इन सारे दृश्य माध्यमों के बावजूद बंगला, गुजराती, मराठी, थियेटर के लिए सहज दर्शकों की भरमार है। हिंदी प्रदेशों में सांस्कृतिक सोच की कमी इसका सबसे बड़ा करण है। नाटक चाहे रंजीत कपूर का हो, सत्यदेव दुबे का या राजेंद्र नाथ का...स्थितियां कमोबेश एक समान ही है। एनसीपीए (टाटा थियेटर, मुम्बई) को वार्षिक सदस्यता के लिए ‘ड्राइव’ करना पड़ा है। पृथ्वी थियेटर और श्रीराम सेंटर के पास अपने दर्शक हैं, जिनका वह अड्डा है उन्हें हम जेनुइन दर्शक नहीं मान सकते। भोपाल में हिंदी भवन के बावजूद रंगमंच की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। एनएसडी में निकले छात्र को रेपटरी और टीवी सीरियलों में अपने आपको झोक देना पड़ता है। विश्वविद्यालय की भूमिका इस सिलसिले में नगण्य रही है।

क्लासरूम और सेमिनारों से उठकर निरंतर जांच-पड़ताल करते हुए वर्कशाप चलाने चाहिए और जनचेतना से जुड़कर ऐसे नाटक लगातार करते रहना चाहिए, जिससे दर्शकों का सीधा जुड़ाव थियेटर से हो। सफदर हाशमी और हबीब तनवीर के प्रयोग ज्यादा कारगर रहे है। लेकिन उन्हें नुक्कड़ या लोकमंच का सहारा लेना पड़ा है। जरूरी है बंगला, मराठी, गुजराती के कामर्शियल थियेटर और उनके लोकमंच जात्रा, तमाशा, भवई की तरह हिंदी में भी लोकनाट्य शैली को अपनाया जाये तभी हिंदी थियेटर सही अर्थों में जिंदा रह सकता है।

हिन्दी रंगमंच के खिलाफ एक सोची-समझी साजिश राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से आरंभ हुआ है। हिन्दी में मौलिक नाटक नहीं है इसलिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को अन्य भाषाओं में खासकर विदेशी या फिर अन्य भारतीय भाषाओं के नाटक लेने पड़ते है। यह एकदम बकवास है। हिंदी में नाटकों की भरमार है, स्क्रिप्ट बैंक है, लेकिन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय वालों को पता है कि किस मलाई से ज्यादा घी निकल सकता है।

सचिवालय के फाइलों की तरह विकास की रफ्तार बहुत ही धीमी है... जहां हम पढ़ते है...गांवों में पीने का पानी अगले दस वर्षों में, पूर्ण साक्षरता अगले बीस वर्षों में...यानि हम भविष्य में जीने वाले लोग हैं तभी तो हम विमर्श करते हैं संभावनाओं पर। मेरे विचार से जब तक सामाजिक संरचना के विकास की प्रक्रिया तय नहीं हो जाती तब तक हमें साहित्य...कला...संस्कृति...फिल्म की बात सोचने का क्या हक बनता है?

किसी भी स्वस्थ समाज के लिए कला एवं संस्कृति का महत्व है लेकिन यह तभी संभव है जब समाज में खुशहाली हो...विकास के योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ने का कोई ब्लू प्रिंट हो।

बहरहाल...कला संस्कृति की निरंतरता के लिए हमारे पास भोपाल का माॅडल है...भारत भवन के चलते ही भोपाल में रंगमंच को एक नयी दिशा मिली है। मैं जानबूझ कर कोलकता और मुंबई की चर्चा नहीं कर रहा हूं जहां थियेटर अपने उच्चतम शिखर पर है...जहां नाटक देखना एक स्टेटस सिम्बल है। हिन्दी प्रदेशों में रंगमंच की हालत खस्ता है। राजनैतिक और प्रशासनिक सम्पर्कों के जरिये जो नाटक होते हैं उन्हें मैं साहित्यिकता से दूर मानता हूं...सामाजिक सोच से काफी दूर।

रंगमंच के लिए आधारभूत संरचना की कमी के बावजूद जो नाटक खेले जाते हैं उन्हें मैं सचमुच एक बड़ा काम मानता हूं। लेकिन आधारभूत संरचना के लिए प्रशासन को संस्कृतकर्मियों के साथ बैठकर करनी चाहिए...सिर्फ सम्पर्कों के आधार पर गिने चुने लोगों के साथ नहीं।

हिन्दी रंगमंच बहुत ही खर्चीला हो गया है। दृश्यबंध, रूपसज्जा, कोरियोग्राॅफी, प्रेक्षागृह, कलाकारों का मानदेय, यातायात, लगातार महीनों तक रिहर्सल, पब्लिसिटी- यानी प्रोसेनियम थियेटर अब इतना महंगा होता जा रहा है कि डर लगता है सोचकर कि हिन्दी रंगमंच को पंजाबी और बंगला थियेटर की तरह कहीं समझौते न करने पड़ जाये। बड़े शहरों में प्रायोजक भी मिल जाते है, मगर छोटे शहरों में प्रायोजक का मिलना बहुत मुश्किल है। सरकारी मदद एक ‘रैकेट’ है और सरकार के चक्रव्यूह में फंसकर मैंने बहुत सारे ‘क्रिएटिव’ लोगों को बरबाद होते देखा है।


रंगमंच में विश्वविद्यालयों की भूमिका अहम हो सकती है। बी॰ए॰ स्तर से ही रंगमंच का एक पेपर होना चाहिए जहां नाटक के गंभीर पठन पाठन के साथ-साथ मंचन को भी शामिल करना होगा। इसके लिए आवश्यक है ‘थियेटर एप्रिसियेशन’ का एक अलग कोर्स जिसकी बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है। संवादहीनता के इस दौर में सांस्कृतिक चेतना के विकास के लिए और कुशल शिक्षण के लिए भी रंगमंच एक सशक्त हथियार भी है और कवच भी।

समाज में रंगमंच के नाम पर एक शून्य पसरता जा रहा है। समाजशास्त्रीय अनुभव यह है कि नयी पीढ़ी के रंगमंच के क्षेत्र में सन्नाटे की कई वजहें है। नयी पीढ़ी ने रंगमंच में दिलचस्पी लेनी छोड़ दी है। सेटेलाइट चैनेल, इंटरनेट, फैशन परेड एवं रेव पार्टीज की तरफ युवा पीढ़ी का झुकाव होता जा रहा है। कारण है बाजारवाद और अचानक पैसे की भूख ने रंगमंच और कलाकर्म को पीछे ढकेल दिया है। अब नाटक प्रस्तुत करना एवं इसमें दिलचस्पी लेना अवारगी से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता।

रंगमंच को पुर्नजीवित करने के लिए हमें लोकशैलियों से जुड़ना होगा। लोक शैलियों के वाद्य यंत्रों और आमजन की समस्याओं से रूबरू होकर बहुत कम खर्च में नाटकों का प्रदर्शन करना होगा तभी रंगमंच जिन्दा रह सकता है।

इतिहास छोड़कर हमें अब संभावनाएं तलाशनी है। सोच पैदा करनी है रूचि पैदा करनी है युवा पीढ़ी में। उन्हें संस्कारित करना है कि रंगमंच के साथ जुड़ाव से उनका व्यक्तित्व कैसे सुगठित हो सकता है। रंगमंच के जरिए भाषा, माॅडुलेशन, मूवमेंट सही ढंग से आंखों का इस्तेमाल, अभिव्यक्ति आदि विकसित होता है। रंगमंच सिर्फ अभिनय नहीं बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण में एक सशक्त हथियार है। रंगमंच से जुड़कर आदमी में इतना आत्मविश्वास आ जाता है कि वह किसी भी सेमिनार, इन्टरव्यू या प्रेजेन्टेशन में अपने आप को संपूर्णता एवं सहजता से प्रस्तुत कर सकता है।

नाटक, फ़िल्म, कविता आदि विधाओं में सक्रिय। नाटक और कविता की कई पुस्तकें प्रकाशित। फ़िल्म आक्रांत भी बनाई। रांची में निवास।