कितना पुराना है मां दिउड़ी का मंदिर



संजय कृष्ण

दिउड़ी मंदिर को प्रशासन ने अधिग्रहण कर लिया है, जिसका वहां मुंडा आदिवासियों ने विरोध किया है। इस मंदिर का रोचक इतिहास भी है। यह इतिहास कितना सच है, इसका दावा नहीं किया जा सकता। इतिहास अनवरत शोध की मांग करता है। हम सब जानते हैं, रांची से सत्तर किमी दूर और तमाड़ प्रखंड से तीन किमी दूर रांची-जमशेदुपर मार्ग पर दिउड़ी नामक गांव में सोलहभुजी मां दुर्गा का प्राचीन मंदिर है। मां का यह मंदिर भी अति प्राचीन है। मंदिर की खास बात यह है कि यहां पर आदिवासी और ब्राह्मण दोनों पुजारी हैं। यह परंपरा कब से चली आ रही है, कहना मुश्किल है। मां का दरवाजा आदिवासी-गैरआदिवासी दोनों के लिए समान रूप से खुला है। दशहरा में यहां बलि भी दी जाती है।

गांव का नाम
गांव का वास्तविक नाम दिउरी दिरि बताया जाता है। मुंडारी में इसका मतलब होता है, जहां पाहन पत्थर की पूजा करता है। अब इसमें से दिरि शब्द लोप हो गया। हालांकि इसकी एक और व्याख्या की जाती है। देवडीह। देव-देवता और डीह यानी गांव। एक दूसरी संभावना यह भी है, दिउड़ी यानी ड्योढ़ी। मां के दरबार में आदिवासी और गैरआदिवासी दोनों हाजिरी लगाते हैं। यहां फल-फूल के अलावा बलि पूजा भी होती है। जनश्रुति तो नरबलि की भी है। पर अब यह नहीं होती। मां की एक विशेषता यह है कि वह सिंह पर नहीं, कमल पर विराजमान हैं।

निर्माण की कहानी
मंदिर का निर्माण किसने कराया, इस पर कोई एक राय नहीं है। कहा जाता है कि सिंहभूम के केरा के राजा अपने दुश्मनों से पराजित होकर दिउड़ी पहुंचे। वह अपने साथ देवी की प्रतिमा भी लेकर आए और उसे वेणु वन में जमीन के अंदर छिपा दिया। कुछ दिनों बाद मंदिर का निर्माण कर प्रतिमा स्थापित की। एक दूसरी कथा ओडिशा से जुड़ी है। ओडिशा के चमरू पंडा साल में दो बार तमाड़ के राजा को तसर बेचने आते थे। इसी क्रम में राजा के यहां पूजा-पाठ करा दिया करते। राजा ने उनसे यहीं बसने का आग्रह किया और यहीं बस गए। वे जंगल में तपस्या भी करने लगे। एक दिन तपस्या करते समय लगा कि मां उनसे मिलना चाहती हैं। ये बातें राजा को बता दीं। राजा ने जंगल साफ करवाना शुरू किया। सफाई के दौरान काला रंग का पत्थर दिखा। शाम हो गया था। मजदूर थक गए थे। वे लौट आए। दूसरे दिन देखा कि वहां एक मंदिर खड़ा है। कुछ लोग मानते हैं कि कलिंग अभियान के दौरान अशोक ने इसका निर्माण करवाया।
एक कथा और है। इस वन क्षेत्र में चरवाहे मवेशी चराने आते थे। एक गाय बांस की झुरमुट में रोज अकेली आया करती थी और अपने थन से दूध की धार जमीन पर गिराती थी। एक दिन उसके चरवाहे ने देखा कि गाय के थन से दूध की धार स्वत: गिर रही है। वहां की मिट्टी दूधिया है और उससे दूध की गंध आ रही है। चरवाहे ने इसकी चर्चा गांव वालों से की। जमीन खोदने पर देवी की प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसे स्थापित किया गया और पूजा शुरू कर दी गई। मंदिर का वास्तुशिल्प देखने यह धारणा बनती है कि इसका निर्माण ढाई हजार साल पहले असुरों ने बनावाया होगा। जब तक कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिल जाती, इन पर विश्वास करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। पर इन कथाओं से जाहिर है कि यह मंदिर अति प्राचीन है।

असुर कथा
हां, असुरों द्वारा निर्माण की कथा भी कम रोचक नहीं है। असुर यहां की प्राचीन जाति है, जो तकनीकी दक्षता में आगे थी। लोहा गलाने की पद्धति इसके पास थी। राज्य में मुंडाओं के आगमन से बहुत पहले से असुर रह रहे थे। इनका संबंध द्रविड़ कुल से है। उन्होंने ही शायद मां के मंदिर का निर्माण किया हो।
प्राचीन मंदिर का अग्रभाग त्रिरथाकार है। दो प्रस्तर खंडों को जोडऩे के लिए किसी प्रकार के गारे का उपयोग नहीं किया गया है। प्रस्तर खंड काफी चिकने एवं समतल हैं। मंदिर का निर्माण एक ऊंचे चबूतरे पर पर किया गया है, जिस पर चढऩे के लिए उत्तर दिशा में सीढिय़ां बनाई गई थीं। चबूतरे का निर्माण प्रस्तर खंडों से किया गया था। चह चतुर्भुजाकार है। मंदिर का प्रवेश द्वार पूरब दिशा की ओर है। प्रवेश द्वार का चौखट प्रस्तर खंडों से बना है। इस चौखट का भीतरी भाग लकड़ी का बना हुआ है और किवाड़ चौखट से ही संबंद्ध है। पर अब इस पुराने मंदिर के चारों ओर बड़ा बारामदा बनाया गया है। एक बड़ा स गोलाकार गुंबद। भक्तों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए मंदिर का विस्तार किया गया है। हालांकि काम आज भी चल रहा है। गर्भगृह का द्वार थोड़ा संकीर्ण है। इसलिए भक्त सिर नीचे कर ही मां का दर्शन कर पाते हैं। गर्भगृह में मां की 16 भुजी प्रतिमा स्थापित है। मां की प्रतिमा साढ़े तीन फीट ऊंंची है जो काले रंग के प्रस्तर खंड पर उत्कीर्ण है। दुर्गा के बाएं चार हाथों में धनुष, ढाल, परम एवं फूल है लेकिन शेष चार हाथों में आयुध क्षतिग्रस्त रहने के कारण स्पष्ट नहीं है। देवी के दाहिने हाथों में तलवार, तीर, डमरू, गदा, शंख, त्रिशूल आदि हैं। उनका बाया पैर मुड़ा हुआ है और दाहिना पैर कमल पर है। वह बाजूबंद, कमरधनी, बाली आदि आभूषणों से सज्जित हैं।

भगवान शंकर की प्रतिमा
मां की प्रतिमा के ऊपर भगवान शंकर की मूर्ति है। इनके एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे हाथ में डमरू है। शंकर की मूर्ति के ऊपर बैताल की मूर्ति है। दुर्गा की मूर्ति के नीचे दाहिनी तरफ गणेश की मूर्ति है। गणेश की मूर्ति के ऊपर एवं दुर्गा की मूर्ति के पाश्र्व भाग में लक्ष्मी एवं सरस्वती विराजमान हैं। दुर्गा एवं अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों का निर्माण एक ही प्रस्तर खंड पर किया गया है। दुुर्गा की प्रतिमा के बगल में 11 वीं-12 वीं शताब्दी के शब्द उत्कीर्ण हैं। आस्था ही नहीं, अब यह पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान हो गया है, जहां हर दिन भक्त आते हैं। मनौतियां मांगते हैं।

झारखंड के पर्व, त्योहार और पर्यटन स्थल पुस्तक से लिया गया है।