नागपुरी गीतों का सौंदर्य



डॉ. विद्योत्तमा निधि

गीत काव्‍य जीवन और जगत के सौंदर्य की अनुभूति की कलात्‍मक अभिव्‍यक्‍ति है। सौंदर्य है जहां, आकर्षण है वहां। जहां आकर्षण है, वहीं कला है और जहां कला है, वहीं कल्याण है और है सत्य का उद्घाटन । तभी गीत काव्य साहित्य सत्यम शिवम सुंदरम का संगम है। गीत काव्य किसी भी भाषा का हो, थोड़े में बड़ी गंभीर बात कहने की कलात्मक विधा है । तभी बिहारी लाल ने कहा है---" देखन में छोटे लगै, घाव करे गंभीर" सादरी गीत का सौंदर्य बोध अप्रतिम है। ऐसी पंक्तियां हृदय को मोह लेती हैं या झकझोर देती हैं । दिल के जलने का बिंब लोक कवि कैसे देता है :- जंगल पहाड़ जलता है तो सारी दुनिया देखती है ,पर दिल के जलने को कोई नहीं देख पाता ---

" वन पहाड़ पोडे़ सेके सब केउ देखै ना रे ।
भीतरे कलेजा जले केउ नितो जानैं।"

गरीबी में कभी कोई बनबाला अपने आचरण से कुल को डुबो देती है तो लोक कवि की पीड़ा भरी ठीस निकल जाती है ---
"काठी बेचे गेले असुरिन बांस बेचे गेले गे
मेठ संगे नजइर मिलाले ,
मुंशी संगे लासा लगाले गे।
कचिया लोभे कुल के डूबा ले,
रुपया तेहें जाइत डूबाले गे।"


निरर्थक शब्दों के प्रयोग से भी लोक कवि गीतों में कैसा चमत्कार उत्पन्न कर देता है। ध्वन्यात्मक नाद सौंदर्य की छवि तो सुने---
" बुदू मछइर खुदुर बुदुर।
पोठी मछइर झलक मारे ----
बुदू मछइर लुटुर पुटुर।
पोठी मछइर झोर भेलइ।"

इस गीत में छोटी बुदू और उससे थोड़ी बड़ी मछली पोठी का सालन खुदुर- बुदुर और लुटुर-पुटुर में ध्‍वनि की मधुरतासुनाई पड़ती है।
लोक कवि कितनी गंभीर बात को सामान्य बिम्‍ब से कितना गंभीर प्रहार करता है ---
"ओ हो रे बूढ़ा बुबकल रे ,
काचा धाने हंसुआ चलाए।"

इसमें बिगड़े मिजाज के बूढ़े ने पके धान पर नहीं, कच्चे धान पर हँसुआ चलाया है ।इसका बिम्‍ब कहाँ इंगित करता है।
आगे देखें,आज का पढ़ा-लिखा युवा स्‍नातक हो गया है , पर उसकी किस्मत में ना तो नौकरी है और ना उसकी जोड़ी बन पा रही है। वह इतना बदनसीब है कि इस बेकार को ना कोई कन्या दे रहा है ,ना उसके हाथों में घड़ी बंध पा रही है। बेरोजगारी की त्रासद का कितना सजीव चित्रण है इसमें ---
"पढ़ले आइए बीए. नौकरी नइ मिलउ रे
हाथे नखउ घड़ी रे ,नसीबे नखउ जोड़ी ।"

समय बीत जाने पर कोई कहीं का नहीं रह जाता ।नमक, तेल तरकारी उधार ले सकते हैं, पर गुजरा समय कोई उधार नहीं दे सकता ।
" ओ दे ओ दे रे समय खेल धीरे-धीरे।
समय के पइंचा देइ राखू नि।
समय गेल धीरे-धीरे ।
नून तियन पँइचा रे, समय कइसन पँइचा।
समय घुरी निहीं आवे रे।
समय गेल धीरे-धीरे ।"

जीवन के समय को कोई खरीद नहीं सकता। इसे लोक कवि ने कितने मार्मिक भाव से बाणी दी है ---

"आखिर एक दिन काया निपटे छोडी़ माया ।
जिनगी के निहीं राखब किन
जियब कतइ दिन।
अबकी मिलन आहे कठिन ।"

वर्षा ऋतु के ध्वनि-सौंदर्य का शब्द चयन कैसा अनुप्रास की बहार ले आया है इस गीत में---

" झर झर झरे झिकोर, हर्षित नभ करे टंकोर।
बिहसत बड़ी जोरे।
गिरत परत लपटि परत ,बदरी झूमि परे भाई
बरखा ऋतु सुंदर सुख करे।"

ग्रीष्म ऋतु के कठिन ताप से पशु - पक्षी एवं जीव- जंतुओं की क्या दुर्दशा हो रही है ,उसका चित्रण कवि कितनी सजीवता से किया है ----
"लकलकात अकबकात तीतिर मेंजूर
झूंड़ भीतरे हो।--- कोकिल रव पंचम तान झींगुर रव से फाटत कान, अकबक मन करे। कहीं ना कल पड़त पल,
लकलकात धक-धक जीव करे हो।"
कवि का चमत्कार उलट बाँसी में कैसे दिखाई दे रहा है ---

"मकरा कर जाल में बाघ बाझी जाए,
केके कहों के सुनी के पतियाए
एरी एरी एरी चिमटी ऊपर हाथी चढ़े।
चील के चेंगना खाए ,
उड़त बोकली के पोठी धरी खाए ।"


इसका सौंद्‍र्‌य भाव देखिए कि बाघ फँस गया है मकडे़ के जाल में।चींटी के ऊपर हाथी सवार है।और चूजा चील को पकड़ कर खा रहा है । तालाब की छोटी मछली बगुले को पकड़ ली है ।
विरह के मारे केवल घर-आंगन सूना नहीं हुआ है ,छाती की पसलियों में घुन लग गया है। इसमें क्‍या कमाल का बिम्‍ब है---

"कवन कसुरे दइया ,बिछुरलैं मोरे पिया ।
एको छन लागत निहीं बेसे,
छोड़ी राखलैं दूर देसे।
घर रे अंगना सून, पँजरा में लागै घुन।"

नायिका का पति काला है । सभी के पति गोरे हैं, पर नायिका इस बात से संतुष्ट है कि उसका पति अखरा के नृत्य- संगीत का प्रेमी है।और नृत्य- संगीत का प्रेमी प्यारा होता है--

"सउबक पिया गोरे-गोर, मोर पिया करिया ।
करिया मोर पिया रे कतइक सुंदर लागे ।
सउबक पिया हर जोतैं , मोर पिया घरे घर ।
घर बुला पिया रे, माठा खेले जाए । "


सादरी समाज में बेटी- बेटे के जन्म से समान सुख मिलता है । बेटे के घर में जन्म लेने से पिता झूम झूम कर मांदर बजाता है ,तो बेटी के जन्म लेने से मांदर को सजा- संवार कर बजाता है ।मां कहती है-- बेटी के जन्म लेने से अखरा ( नृत्य स्थल) सुहाना हो जाता है।बेटी रसिक के घर में जाती है तो दामाद मांदर बजाता है और बेटी अखरा नाचती हैं अर्‌थात्‌ दोनों का नाचते-
गाते,कमाते-खाते जीवन होगा----

"बेटा जन्म देले गे आयो ,
घुमरी घमरी माँदर बजाए रे।
सपरी सपरी मांदर बजाए ।
बेटी जे जन्माले आयो ।
अखरा के सोहान करे रे।++++
एगोट ,दुलारी बेटी ,
दुलारी बेटी रसिका घरे दियालक रे।
रसिका बेटा मांदर बजाए ।
दुलारी बेटी अखरा खेले रे।"


जरा सादरी गीतों की सुन्‍दरता का बोध इनके जीवन के सौंद्‍र्‌य से बिलग नहीं है,तभी तो बेटी के घर में जन्म लेने से घर में उजाला हो जाता है और होता है मां का कोख पवित्र --

"भल भेल धिया भेल, घर हूं इंजोर भेल ।
हाय रे बिधना माय,कोखि धिया सिरजावल ।
धिया सिरजावल, कोखहूँ पवित्र भेल ।"


सादरी संसार में बेटी को विवाह देना को मुहावरे में बेटी बेचना भी कहते हैं,क्योंकि वर पक्ष कन्या पक्ष वाले को कन्या मूल्य के रूप में प्रतीकात्मक मूल्‍य देते हैं। इसी से कन्या बेचने का अर्थ लेकर बेटी, पिता से कहती है कि ए बाबा तुम्हारे घर में तो गाय-बथान है।गाय- भैंस का बथान न बेच कर तुमने अपनी बेटी को बेच दिया। तब पिता बेटी को समझाते हुए कहते हैं। उसने कितनी सार्थक बातें की--- गाय-भैंस तो हमारे घर चलाने के लिए है। उसे कैसे बेच सकता हूं । लेकिन तुम बेटी कुटुम की संपत्ति हो ----
"मचियाहीं बैठल बाबा हामर
सुनू बाबा विनती हामर ।
गाय बथान बाबा,भैंस बथान जे।
सेइयो बाबा निहीं बेचली ।
बेचली तो बेटी आपन ।
गाय बथान बेटी ,भइँस बथान जे ।
सेइए बेटी घर कर खुरजी।
तोहें बेटी कुटुम कर धन । "


ऐसे अनेक सादरी गीत हैं जिनमें काव्य सौंदर्य बोध झलक मारते हैं ।ऐसे सौंदर्य बोध से भरे गीतों के भाव पक्ष रस को उद्‍भूत करते हैं ।विभिन्न रसों का उद्‍रेक इन सादरी गीतों में उमंगता है । ये रस ही आनंद देते हैं और आनंद ही सौंदर्य बोध को जागृत कर काव्य के सत्यम शिवम सुंदरम को चार चांद लगाते हैं ।


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