आलोचकों की दृष्टि में छायावाद



सुरेश कुमार

सन् 1920 के दौर हिन्दी साहित्य में काफी उथल-पथल भरा रहा हैं।एक ओर राष्ट्रीय चेतना और स्वाधीनता का उदय हो रहा था, वहीं दूसरी तरफ सुधारवादी दृष्टिकोण भी विकसित हुआ। इसका कारण यह था कि हिन्दी साहित्य में सन् 1920 के बाद ‘माधुरी’,‘चांद’,‘सुधा’, मनोरमा, ‘विश्वमित्र’ और विशाल भारत’ जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं का जन्म हो चुका था । इन पत्रिकाओं के संपादक सुधारवादी दृष्टिाकोण को लेकर हिन्दी साहित्य में आएं थे। सन् 1920 से ही हिन्दी साहित्य में ‘छायावाद’ की सुगबगाहट जोर पकड़ने लगती है।

हिन्दी के अधिकांश लेखक और संपादक छायावाद को अपने-अपने दृष्टिकोण से देख और परख रहे थे। लेकिन छायावाद का कोई स्पष्ट अर्थ और स्वरुप तय नहीं हो पा रहा था। छायावाद शब्द हिन्दी में कैसे चला और कहां से आया इसको लेकर भ्रम की स्थति पैदा हो गई थी। हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक इलाचन्द्र जी ने विश्वमित्र पत्रिका में ‘वर्तमान हिन्दी कविता’( विश्वमित्र जनवरी 1933) शीर्षक छायावाद को लेकर लेख लिखा था। इस लेख में उन्होंने बताया था कि साहित्यालोचकों ने हिन्दी साहित्य में छायावाद शब्द को बेलागाम चला दिया है। इलाचन्द्र ने छायावाद को लेकर इस प्रकार लिखा हैं,‘‘‘‘छायावाद’’ शब्द हिन्दी में कब, किसने, चलाया, यह तथ्य हमारे साहित्य के इतिहास में सदा के लिए रहस्मय रह जायगा। जहां तक मेरा ख्याल है, किसी वर्तमान हिन्दी कवि ने इसका प्रचलन नहीं किया है। किसी अज्ञात रसिक( अथवा यह कहिए कि अरसिक!) साहित्यालोचक ने इसे साहित्यालोचन के क्ष्ेात्र मे इस प्रकार बेलगाम चला दिया, जैसे पेशेवर जालसाज गुप्त रुप से जनता में जाली सिक्के चलाकर स्वयं अदृश्य ही रह जाते हैं। जाली सिक्कों का गुप्त प्रचलन होने पर भी लोग जानते हैं कि ये जाली हैं!; पर ‘‘छायावाद’’ दिनदहाड़े हमारे शब्द शास्त्रियों तथा साहित्याचार्यौ के सामने व्यवह्त हो रहा है। किसी की नजर में वह नहीं खटकता; कोई यह नहीं कहता( अथवा कहने का साहस नहीं है) कि यह शब्द जाली है, इसे साहित्य के उत्तरदायित्वपूर्ण बाजार में मत चलाओं।’’

इलाचन्द्र का कहना था कि आलोचकों ने ‘छायावाद’ की जांच-पड़ताल किए बिना हड़बड़ी में चला दिया है। तत्कालीन आलोचकों ने ‘छायावाद’ को ‘मिस्टिसिज्म’(उलेजपबपेउ) से जोड़ा था। इलाचन्द्र ने अपने लेख में स्पष्ट रुप से कहा था कि छायावाद को मिस्टिक शब्द से नहीं जोड़ा जा सकता है। उन्होंने ऐसे आलोचकों को जमकर फटकारा था जो छायावाद को मिस्टिसिज्म से जोड़कर कर देख रहे थे। इलाचन्द्र ऐसे आलोचकों पर व्यंग्य करते हुए लिखा था,‘‘ पहले -पहल इस अभिनव शब्द का प्रचलन चाहे किसी ने किया हो, पर इसका प्रचलन इतनी सीघ्र गति से बढ़ता गया कि किसी उत्तरदायित्वशील व्यक्ति को उस पर करके उसे स्वीकार या अस्वीकार करने का किचिंत अवकाश नहीं मिला। साहित्य-क्षेत्र में अराजकता की एक प्रचण्ड लहर की अदम्य गति इस प्रकार व्याप्त हो गयी कि उसका निरोध असम्भव सा हो गया। पेशेवर साहित्यिक रिपोर्टर धूमकेतु की तरह ‘‘छायावाद’’ के आगमन की सूचना दुनिया-भर को देने लगे, लेखकगण बिजली की स्फूर्ति उस पर आश्यचर्यजनक टिप्पणियां लिखकर और उस उलेजपबपेउ का नया संस्करण बताकर संसार -भर के ‘‘मिस्टिकों’’ का श्राद्ध करने लगे। कबीर की शामत आयी,‘‘गीताजंलि’’ का तर्पण हुआ, वाल्ट हिटमैन को कब्र में छठी का दूध याद आने लगा। और मजा यह है कि हिन्दी-जनता को जतलायाजाने लगा कि कबीर का उलेजपबपेउ और हमारे ंकवियों का नवीनता एक ही है। रसज्ञों को यह बतलाने की आवश्यकता न होगी कि ‘‘मिस्टिसिज्म’’में और हमारें कवियों के ‘‘छायावाद’’में जमीन-आसमाना का अंतर है।’’ दरअसल, इलाचन्द्र ‘‘छायावाद’’ शब्द के साथ इसको हिन्दी में चलने वाले लेखकों और आलोचकों पर सवाल उठा रहे थे। तत्कालीन आलोचकों ने जिस मिस्टिसिज्म से छायावाद को जोड़ा था, उसका अर्थ ‘‘कुहरावाद’’ लगाया होगा।

इलाचन्द्र की बात माने तो ‘कुहरावाद’ कोई रहस्मय शब्द न होने के कारण छायावाद शब्द को चला दिया। इलाचन्द्र जोशी अपनी बात रखते हुए लिखते हैं,‘‘ जिस अज्ञात, असंस्कृत व्यक्ति ने पहले -पहल इसे चलाया उसने अपने मन में शायद उलेजपबपेउ का अर्थ लगाया ‘‘कुहरावाद’’। अंग्रेजी में उपेज कहते हैं कुहरे को। उस गुप्त, अनाम,अपरचित,रहस्मय व्यक्ति ने शायद यह ख्याल किया कि उलेजपबपेउ भी उपेज(कुहरा) से निकला है। इसलिए उसका शब्दार्थ ‘‘कुहरावाद’’ हुआ। पर ‘‘कुहरावाद’’ काई रहस्मय शब्द न होने से ‘‘छायावाद’’ शब्द का प्रचलन कर दिया। सम्भवतः उसकी धारएा यह थी कि जो कविता अस्पष्ट हो तथा छाया अथवा अस्फुट संकेत द्वारा ही अपना भाव व्यक्त करती हो वही उलेजपब है। जब पाश्चत्य रसज्ञों ने रवीन्द्रनाथ की कविताओं को उलेजपब चवमउे बतलाया, तो हमारे कुछ धुरन्धर साहित्यचार्यों ने उसका अर्थ लगाया था ‘‘कूट कविता’’। अर्थात जिस कविता का अर्थ समझ में आसानी से न आ सके। यह मूर्खता की हद थी। इसी ‘‘कूटवाद’’ के अर्थ में ही प्रारम्भ में ‘‘छायावाद’’ की उत्पŸिा हुई। आज भी बहुत से लण्ठों की धारणा है कि जिस कविता का अर्थ स्पष्ट नहीं होता है वही ‘‘छायावादी कविता’’ है।’’3 देखा जा सकता है कि इलाचन्द ने बड़े ही कठोर शब्दों में छायावाद को ‘मिस्टिसिज्म’ से जोड़ने वालों की निंदा की थी। दरअसल, इलाचन्द्र शब्दहीन और अर्थहीन कविता के समर्थक नहीं थे। उन्होंने ऐसे कवियों की आलोचना की जो सिर्फ ‘आह-भरे’ वाली कविता हिन्दी- जनता को परोसना चाह रहे थे। यहां तक कि छायावाद शब्द को लेकर जो गफलत चल रही थी, उसको उन्होंने दूर करने का प्रयास भी किया था।

सरस्वती’ पत्रिका के अगस्त 1928 के अंक में संपादक ने ‘छायावाद’ को लेकर अपना संपादकीय लिखा था। सरस्वती पत्रिका का यह संपादकीय कई माइने में महत्पूर्ण है। पहली बात यह है कि इस संपादकीय में ‘छायावाद’ को ‘ मिस्टिसिज्म’ से नहीं जोड़ा गया था। इस संपादकीय में दूसरी बात यह कही गई कि छायावाद के नाम से जो कविताएं लिखी जा रही है, सब कविताएं विशेषता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं। इनमें से कुछ कवियों की रचनाएं हीन श्रेणी की भी है। ‘सरस्वती’ के संपादकीय में लिखा गया,‘‘ छायावाद के नाम से हिन्दी में जितनी कविताएं प्रकाशित हो रही हैं उनमें यदि एक भी अच्छी कविता है तो उसी एक कविता से हमें छायावाद की परीक्षा करनी चाहिए। यदि उसमें कुछ विशेषता है तो यह दृढ़तापूर्वक कहा जा सकता है। कि छायावाद में कुछ विशेषता है। परन्तु हमें यह समरण रखना चाहिए कि छायावाद में विशेषता मान लेने पर भी हम यह नहीं कह सकते कि छायावाद के नाम से आज-कल जो कुछ कविताएं निकल रही हैं वे सभी विशेषताओं से युक्त हैं।’’

सरस्वती’ के संपादक ने छायावाद के संबंध में कुछ और लिखने से पहले यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि वह छायावाद से अनभिज्ञ है। इस संपादकीय में पंत जी का उल्लेख किया गया लेकिन पंत जी छायावादी हैं या नहीं यह बात पंत जी पर ही छोड़ दी गई थी। कवि सुमित्रानंदन पंत जी की कविताओं को लेकर यह जरुर लिखा गया कि उनकी कविताओं में मिस्टिसिज्म’ नहीं है। पंत जी को लेकर संपादकीय में इस प्रकार से लिखा गया था,‘‘ छायावाद की विशेषता से हम अनभिज्ञ हैं। इसलिए इसके सम्बन्ध में कुछ लिखने का साहस नहीं कर सकते। परन्तु पण्डित पद्यसिंह शर्मा ने अपने भाषण में जिस ‘पल्लव’ का उल्लेख किया है उसकी अधिकांश कविताएं ‘सरस्वती’ में हम प्रकाशित कर चुके हैं। हम यह तो नहीं जानते कि ‘पल्लव’ के रचयिता श्री सुमित्रानन्दन पंत अपने को छायावादी कवि मानते हैं या नहीं। परन्तु यदि छायावाद ‘मिस्टिसिज्म’ का द्योतक है तो हमने उन कविताओं में उसकी झलक नहीं देखी है। पन्त जी की रचनाओं में सर्वत्र विस्मय का भाव है।’’

आचार्या नंददुलारे बाजपेयी हिन्दी साहित्य के बड़े आलोचक माने जाते हैं। इन्होंने छायावाद पर बड़ी गंभीरता से विचार- विमर्श किया था। नंददुलारे बाजपेयी ने ‘वर्तमान हिन्दी कविता’(माधुरी जनवरी 1928) और ‘अधुनिक हिन्दी कविता में छायावाद’( माधुरी श्रावण 306 तुलसी संवत 1986 वि) लेख लिखकर छायावाद के कवियों का सटीक मूल्यांकन पेश किया था। नंददुलारे बाजपेयी ‘वर्तमान हिन्दी कविता’ लेख में छायावाद कवियों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए इस बात को विशेषतौर पर रेखाकित किया कि अधिकांश युवा कवियों की कविताओं में एकरुपता का ही स्वर दिखाई देता है। आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी के शब्द इस प्रकार हैं,‘‘ हिन्दी में छायावाद के जितने वर्तमान कवियों की ओर मेरी दृष्टि पड़ी है, उन सबों की रचनाओं में ‘ह्तंत्री’,‘वीणा’,‘अंतस्तल’, ‘नीवरता’ आदि कतिपय शब्द मिलते है। ऐसा मालूम होता है कि यह कवि -वृंद एक ही राग आलपने के लिए अपनी- अपनी वीणा लाकर जुटा है, और अपने सम्मिलित संगीत (बीवतने) द्वारा हिंदी का कोई महान उपकार कर देने पर तुला है; पर न तो ऐसे कोर्सो से कभी किसी भाषा का उपकार हुआ है और ना भविष्य में होने की आशा ही है।’’6 हंलाकि इस लेख में बाजपेयी जी ने प्रसाद,पन्त और निराला की पं्रशशा भी की थी।

छायावाद को लेकर तत्कालीन पत्र- पत्रिकाओं में गंभीर बहस चली थी। अधिकांश आलोचकों और संपादकों ने छायावाद को ‘मिस्टिसिज्म’ से जोड़कर नहीं देखा था। जिन आलोचकों ने छायावाद को रहस्यवाद से जोड़ने की कोशिस की उनकी तीखी ओलाचना भी उस दौर में हुई थी। इस दौर के अधिक से अधिक आलोचक और संपादक ने पंत, प्रसाद,निराला और महादेवी वर्मा की कविताओं की सरहना की थी लेकिन अनुभव हीन और अर्थहीन कवियों कविताओं की जमकर आलोचना की थी।

सुरेश कुमार गंभीर अध्येता हैं। प्रयागराज में रहते हैं। लेख की तसवीर खुद मुहैया कराई है। छायावाद की छाया’ यह व्यग्य चित्रं माधुरी पत्रिका में चैत्र, 306 ,तुलसी संवत 1982वर्ष,8 खण्ड,2, सख्यां,3।