आशुतोष राणा का रामराज्य



चौराहा. इन
महर्षि वाल्मीकि से लेकर कबीर, बाबा तुलसी, केशवदास, निराला और कुबेरनाथ राय, पं विद्यानिवास मिश्र, नरेंद्र्र कोहली, तक न जाने कितने लोगों ने राम का चरित लिखा है। बौद्ध और जैन से लेकर दक्षिण, पश्चिम, असम और पूर्वोत्तर में भी रामकथा की परंपरा मिलती है। सात समंदर पार भी राम की व्याप्ति है। सैकड़ों सालों से राम का चरित गाया जा रहा है। ऐसा चरित जो सर्वदा नवीन ही रहता आया है। जब पढि़ए, एक नई अर्थ छटा के साथ हमारे सामने राम का चरित काव्य की तरह हमारे मन-मस्तिष्क पर छा जाता है। शास्त्र से लेकर लोक तक की ऐसी व्याप्ति नजर नहीं आती। गिरमिटिया जब गए तो उनके पास कोई दूसरी पोथी नहीं थी-जो थी वह रामचरित मानस थी। तुलसी के संचारी भाव का ऐसा प्रभाव कि एक फादर उनके प्रीत में उन्मत हो गया और भारत चला गया। संस्कृत और हिंदी में रचा-बसा। रामकथा पर ऐसा शोध ग्रंथ लिखा कि आज भी वह हमें आलोकित और आप्लावित करता है। राम और उनकी कथा ऐसी है।

रामराज्य की परिकल्पना
इस कड़ी में फिल्म अभिनेता और लेखक आशुतोष राणा का 'रामराज्यÓ एक अलग और परंपरा से हटकर हमें अनुप्राणित करता है। पारंपरिक रूप से हमारे मानस में बैठे खल चरित्रों का भी ऐसा उदात्त चित्रण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। हमारी धारणाएं यहां खंडित होती हैं, लेकिन इस खंडन में कहीं कोई पीड़ा नहीं, आनंद का संचार होता है। इसलिए, पूरी कथा संरचना में दृष्टि नहीं, अंतदृष्टि का विस्तार और प्रभाव दिखाई देता है। यहां निर्जन में भी बस रस ही रस है। नीरस कुछ भी नहीं। यहां एकादश खंड हैं-कैकेयी, सुपर्ण-शूर्पणखा, पंचवटी, लंकर, पंचवटी, लंका, हनुमान, विजयपर्व कुंभकर्ण, विजय पर्व -विभीषण, विजय पर्व रावण और अंत में सीता परित्याग। हम मानते रहे कि कैकेयी एक खल चरित्र है। उसके कारण ही राम को वनवास मिला। पर, आशुतोष ने परंपरा से हटकर कैकेयी के चरित्र का अंकन किया है, जिससे आप असहमत नहीं हो सकते। यही राणा की अंतदृष्टि है। राम को वनवास कैकेयी ने नहीं दिया था। यह राम की इच्छा थी। इच्छा का हेतु भी था। हेतु क्या था? रामराज्य की स्थापना। इसको लेकर कैकेयी और राम में लंबा संवाद होता है। अंतत: कैकेयी जीवन भर के लिए उस अपराध के लिए दंड भोगने को तैयार हो जाती है, जिसमें उसका कोई दोष नहीं था। समाज के कल्याण के लिए वह जीवन भर नहीं, जन्मों-जन्मों के लिए कलंक ढोने के लिए तैयार हो जाती है। राम कहते हैं-''मैं रामराज को नहीं, रामराज्य को स्थापित करना चाहता हूं। जहां व्यक्ति से अधिक महत्व विचार को, व्यवस्था का हो। जहां प्रजा के रक्षण और पोषण का कार्य कोई व्यक्ति नहीं, अपितु विचार करते हों। प्रजा व्यक्तिपूजक नहीं, विचारपूजक हो। वह हुतात्मा के चरणों को नहीं, उनके आचरणों को धारण करे। मैं व्यक्ति के नहीं, व्यवस्था के महत्व को बढ़ाना चाहता हंू मां।ÓÓ रामराज्य की परिकल्पना यह थी और इसमें धर्म कहीं नहीं। वे आचरण, व्यवस्था और पोषण की बात करते हैं। गांधी भी इसी को बल देते थे। उनके रामराज्य में भी हाशिए के व्यक्ति की चिंता थी। वे कहा करते थे, जो भी योजनाएं बनें, हाशिए के आदमी को ध्यान में रखकर बने। वे साध्य के साथ साधन की पवित्रता पर भी जोर देते थे। यह तभी संभव होगा, जब आप चरण-चारण की दुनिया से निकलकर खुद के आचरण पर ध्यान केंद्रित करेंगे। राजनीति शुचिता और पवित्रता की मांग करती है। गांधी इसके प्रतीक और प्रतिमान थे। गांधी ने 20 मार्च, 1930 को 'नवजीवनÓ में 'स्वराज्य और रामराज्यÓ शीर्षक से एक लेख लिखा। उसे देखने की जरूरत है। एक अंश देखिए-'स्वराज्य के कितने ही अर्थ क्यों न किए जाएं, तो भी मेरे नजदीक तो उसका त्रिकाल सत्य एक ही अर्थ है, और वह है रामराज्य। यदि किसी को रामराज्य शब्द बुरा लगे तो मैं उसे धर्मराज्य कहूंगा। रामराज्य शब्द का भावार्थ यह है कि उसमें गरीबों की संपूर्ण रक्षा होगी, सब कार्य धर्मपूर्वक किए जाएंगे और लोकमत का हमेशा आदर किया जाएगा....सच्चा चिंतन तो वही है जिसमें रामराज्य के लिए योग्य साधन का ही उपयोग किया गया हो। यह याद रहे कि रामराज्य स्थापित करने के लिए हमें पांडित्य की कोई आवश्यकता नहीं है. जिस गुण की आवश्यकता है, वह तो सभी वर्गों के लोगों- स्त्री, पुरुष, बालक और बूढ़ों- तथा सभी धर्मों के लोगों में आज भी मौजूद है। दु:ख मात्र इतना ही है कि सब कोई अभी उस हस्ती को पहचानते ही नहीं हैं। सत्य, अहिंसा, मर्यादा-पालन, वीरता, क्षमा, धैर्य आदि गुणों का हममें से हरेक व्यक्ति यदि वह चाहे तो क्या आज ही परिचय नहीं दे सकता?Ó

निरंतर चलने वाला जीवन
राम क्या चाहते थे और हजारों साल बाद गांधी की क्या अपेक्षा थी? और, इक्कसवीं सदी में आखिर, एक कवि-लेखक आशुतोष राणा को क्यों रामराज्य लिखनी पड़ रही है? काल के इस लंबे प्रवाह में समाज आज कहां खड़ा है? चित्त और मन के धरातल में क्या हम वहीं अटके हुए हैं? और इसलिए बार-बार हमारे चित्त में रामराज्य दाखिल हो जा रहा है? क्या इसीलिए विद्यानिवास मिश्र मानते हैं कि 'राम का निरंतर चलते रहना ही उनका जीवन है और जन-जन के पवित्र होने की यात्रा है, पवित्रता की गतिशीलता है। वन घर है तो वन संचरण भी है, जिसमें रास्ते के कांटे, रास्ते के कुश राम और सीता के पैरों में चुभकर धन्य हो जाते हैं। उस स्पर्श से-निराला से शब्द उधार लें तो -उपल 'उत्पलÓ बन जाते हैं, जो कंटक चुभते हैं वे जागरण बन जाते हैं। वन में संपादित यज्ञ के प्रसाद से राम गर्भ में आते हैं, वन में स्थित विश्वामित्र के आश्रम में राम सांगोपांग वेद की शिक्षा पाते हैं, विवाह का मुदमंगल अधिक दिनों तक नहीं रहता, राज्यभिषेक की चर्चा के अगले दिन ही वन-गमन होता है। राम पद छोड़कर वनगामी होते हैं, राजकुमार से वापस होते हैं ऐसे स्थान में, जहां नगर का प्रपंच नहीं है, जहां अर्थ की लिप्सा नहीं हैं, जहां प्रकृति के मुक्तदान से संतोष हैं, जहां छल नहीं है, सहज-सीधा व्यवहार है। वहां बीहड़ वन है, जंगली जानवर हैं; पर विचित्र प्रकार का अभय है, कोई किसी से डरता नहीं है, अपने रास्ते जाता है। इसीलिए कोई घेरा नहीं है, किसी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। राम की वनयात्रा एक सीधे-सादे आदमी की अपने पिता के सच की रक्षा में स्वयं ओढ़ी हुई यात्रा है। यह यात्रा किसी दुख के भोग के लिए नहीं हैं, एक ऐसे भोग के लिए है जिसमें सुख की प्राप्ति भी नहीं है, सुख एक-दूसरे का भाव-अभाव बांटने में है और दुख देश और व्यापक देश-परिवार छोडऩे का, यदि है भी तो उसकी पूॢत व्यापक देश और व्यापक परिवार बनाने से वन में होती है।Ó पूरी कथा में यही ध्वनि निकलती है। सुपर्णा-शूर्पणखा प्रसंग भी एक अलग दृष्टि से प्रस्तुत किया गया। यहां पिता विश्रवा से उसके संवाद को देखा जा सकता है। रावण के हठ को भी। कुंभकर्ण भी समझाता है-भ्राता दशानन, मैंने जीवपर्यंत तुम्हारी अमूर्त कल्पनाओं को मूर्तरूप प्रदान करने का कार्य किया है, तो आज भी वही करूंगा जो तुम चाहोगे। किंतु भ्राता, तुम्हारे द्वारा प्रस्तुत किए गए सभी तथ्यों पर यदि विचार करूं तब यह कहूंगा कि राम के सााि हो रहा यह युद्ध निश्चित ही हमारा अंतिम युद्ध होगा।Ó

राम का मर्म
सीता परित्याग का प्रसंग भी मार्मिक है। राम सीता का परित्याग तो कर देते हैं, लेकिन इस संकल्प के साथ कि-'मैं अयोध्या के समस्त वैभव के बीच रहते हुए जीवनभर वनवासी के धर्म का पालन करूंगा। आज से मैं सुख-शैया पर नहीं, अपितु कुश के संस्तर को भूमि पर बिछा कर अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक उस पर शयन करूंगा। जिस प्रकार वन में रहने वाले वनवासी दिवस में एक बार ही अन्न ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार मैं भी अब से मात्र एक ही बार अन्न ग्रहण करूंगा।Ó पुस्तक रामकथा को एक नए ढंग से व्याख्यायित करती है। यह हमारी पूर्व की धारणाओं को खंडित करती हुई, कथा को श्रद्धा और विवेक के साथ पढऩे का आग्रह करती है। हर चरित्र को पूरी उदारता के साथ प्रस्तुत किया गया। हर प्रसंग में एक अंतदृष्टि है। गंगा की निर्मल धारा की तरह प्रांजल भाषा अथ से इति तक हमें व्यामोह में ले लेती है। इस धारा में डुबकी लगाने का पुण्य-प्रताप भी कम नहीं।

पुस्तक : रामराज्य
लेखक : आशुतोष राणा
प्रकाशक: कौटिल्य बुक्स, 309, हरि सदन, 20, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली।
कीमत-पांच सौ रुपये।