उलझन भरी राजनीतिक डगर से उबरना बाकी



-श्याम किशोर चौबे
वरिष्ठ पत्रकार

झारखंड के बीस वर्ष पूरे होने के ठीक चार दिन पहले थोड़ी-बहुत नोंकझोंक के बीच राज्य विधानसभा ने जनगणना काॅलम में आदिवासी सरना धर्मकोड दर्ज करने का प्रस्ताव पारित कर इसे लागू करने की गेंद केंद्र सरकार के पाले में उछाल दी। इस संवैधानिक कर्मकांड के लिए 11 नवंबर को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया था। यह लागू हुआ तो आदिवासी समाज की स्वायतता कायम होगी, वह हिंदुओं से अपनी अलग पहचान पा जाएगा। उसको अपना अलग जातीय प्लेटफार्म मिल जाएगा। यह आदिवासी बहुल राज्य है। इसमें तकरीबन 26 प्रतिशत आबादी जनजातीय है।

देश स्वतंत्र हुआ था तो यहां की जनजातीय आबादी की हिस्सेदारी 38 प्रतिशत हुआ करती थी। यह सवाल बेहद उलझन भरा है कि बीते 70 वर्षों में झारखंड की जनजातीय आबादी 12 फीसद कम हो गई यानी इतनी आबादी अन्यत्र पलायित हो गई या अन्य जातियों की आबादी इतनी अधिक बढ़ गई कि आदिवासियों का जनसंख्या-प्रतिशत बहुत नीचे आ गया? 1871 की पहली जनगणना में आदिवासियों
के लिए अलग धर्मकोड था। 1961 की जनगणना में इसे जनगणना प्रपत्र से हटा दिया गया था। तब से इसके लिए आदिवासी आवाज उठाते रहे हैं। 2011 के जनगणना फाॅर्म के अन्य जातियों के काॅलम में देश के 21 राज्यों के तकरीबन 50 लाख आदिवासियों ने अपना विरोध जताते हुए सरना धर्म भर दिया था।


20 वर्षों के झारखंड में 11 सरकारें बनीं, जिनकी मार्फत पांच व्यक्ति मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुए। प्रथम मुख्यमंत्री भाजपा के बाबूलाल मरांडी, फिलहाल सदन में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा हासिल करने के लिए स्पीकर के न्यायाधिकरण में अपनी दलीलें रख रहे हैं, जबकि बतौर मुख्यमंत्री बाबूलाल की ताजपोशी के ऐन वक्त पर 15 नवंबर 2000 की मध्य रात्रि में झामुमो के जिन महामान्य नेता शिबू सोरेन ने अपनी नाकाम
दावेदारी पेश की थी, उनके पुत्र हेमंत सोरेन अभी मुख्यमंत्री हैं। ये ही बाबूलाल मरांडी, बीच के प्रायः 14 वर्षों तक भाजपा से अलग होकर अपना दल जेवीएम चलाते रहे। इस बार साल भर पहले नवंबर-दिसंबर 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में वे मैदान मारने के बाद जेवीएम का भाजपा में विलय कराने को राजी हुए तो उनको नेता प्रतिपक्ष घोषित करने में विधानसभा में
अड़ंगा लग गया है। उन पर संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल का आरोप मढ़ दिया गया है। जाहिर है कि इसमें सत्ताधारी दल/गठबंधन की अघोषित रजामंदी है, टूल बने हैं स्पीकर। स्पीकर के नोटिस को बाबूलाल ने हाईकोर्ट में चैलेंज कर दिया है।

करीब छह साल पहले 2014 के अंतिम दिनों में हुए विधानसभा चुनाव में बाबूलाल मरांडी के नेतृत्ववाले जेवीएम के आठ विधायक चुनकर आए थे, जिनमें से छह तत्कालीन सत्ताधारी भाजपा में शामिल हो गए थे। उनके विरूद्ध इन्हीं बाबूलाल ने दल-बदल का अभियोग तत्कालीन स्पीकर, जो भाजपा के विधायक थे, के न्यायाधिकरण में चलाया था। उस मामले में चार वर्षों तक सुनवाई के बाद नए चुनाव के कुछ ही काल पहले बाबूलाल की अर्जी खारिज कर दी गई थी।

ऊपर की दो राजनीतिक घटनाओं में झारखंड की अबतक की राजनीतिक दशा-दिशा कानिचोड़ है। दल-बदल इस राज्य की सियासी रगों में समाया हुआ है, जबकि सरकारें सारा काम राजनीतिक नफा-नुकसान के हिसाब से करती रही हैं। यही
कारण है कि संभावनाओं के बावजूद इस राज्य की चैहद्दी के बाहर सकारात्मक पहचान नहीं बन पाई। नैसर्गिक रूप से इस राज्य को सबकुछ मिला हुआ है। घने जंगल, वर्षा का इफरात जल, उपज देनेवाली जमीन, जमीन के नीचे बेशकीमती खनिजों का खजाना, नदी, झरने, पहाड़, मिहनत करने वाला मानव संसाधन, प्रतिभासंपन्न युवा, समशीतोष्ण जलवायु। क्या नहीं है यहां? इसके बावजूद लगभग 40 प्रतिशत बीपीएल आबादी और शिक्षकों की घोर कमी के बीच प्राथमिक से लेकर पीजी तक की बेमतलब पढ़ाई, इस राज्य की राजनीति पर बदनुमा दाग कायम है।


पूरे देश की तरह इस राज्य में भी राजनीतिक दलों ने अपने कैडर के प्रशिक्षण से तौबा कर ली है। आरंभिक स्तर पर राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में दरी बिछाने से लेकर बैनर-पोस्टर टांगने के अलावा चर्चा, पर्चा और खर्चा का पैटर्न ही समाप्ति की ओर है। चुनाव के समय आकाओं का माथा ठनकने पर अन्य दलों से जिताऊ नेताओं को आयात कर लेने की परंपरा कायम की जा चुकी है। ऐसे आयातितों पर लगे दाग-धब्बों की कतई परवाह नहीं की जाती। इससे बचे-खुचे कैडर में असंतोष और दल के प्रति नाराजगी पैदा होती है। विधायक, सांसद खुद को अफलातून और बहुत हद तक अल्लामियां मानने की प्रवृत्ति से लैस हो चुके हैं। इसलिए दलीय और क्षेत्रीय निष्ठा सिरे से गायब होने लगी है। दल में जो पावरफुल है, उसकी बंदगी करो, अपना काम निकालो, अगले चुनाव और उसके बाद के भी चुनाव से लेकर अपनी कई पीढ़ियों तक के लिए धनागम के उपाय करो। ले-देकर यही नीति राजनीति का केंद्रबिंदु बन गई है। अवाम को भावनाओं से भर दो ताकि वह अपने दिल-दिमाग पर ताला लगा दे। वोट बैंक बनाने के लिए सस्ता-सुविधाजनक उपाय जरूर करो, भले ही इससे प्रतिभा कुंठित हो और अन्य वर्ग स्वयं को उपेक्षित-तिरस्कृत महसूस करे।इन परिस्थितियों का सीधा लाभ नौकरशाही को मिलता है और हर कोई देख रहा है, नौकरशाही जो चाहती है, वही होता है। राजनेताओं में राजाओं और नौकरशाही में गौरांग अफसरों की छवि पैबस्त हो गई है।

ऐसे में यह सवाल बिलकुल स्वाभाविक है कि वर्ष 2000 या उसके पहले वाला ही झारखंड है? विकास नहीं हुआ? लोग आगे नहीं बढ़े? नहीं, कतई नहीं। जमाने के साथ झारखंड भी बदला है। बिहार से अलग अस्तित्व ग्रहण करने के बाद खुद की बजटिंग, केंद्र व अन्यान्य वित्तीय संस्थाओं की मदद से बढ़े धन प्रवाह और नित नई योजनाएं लागू होने से स्वाभाविक तौर पर विकास के कई कार्य हुए। इतना भी न हो तो कुछ खास वर्गों की झोलियां कैसे भरें? इससे एक खास वर्ग बहुत लाभान्वित हुआ। दलाल  और ठेकेदार दिन दूनी, रात चैगुनी तरक्की करने
लगे। इनके चक्कर में जितने महाप्रभु फंसे, वे चाहे राजनेता हों या नौकरशाह, उनमें से कई केस-मुकदमों और जेल-जमानत की अंधेरी गुफा में चक्कर काटने को विवश हो गए। काल के प्रवाह से नेतृत्व वर्ग भले ही बेखबर रहता हो लेकिन अवाम ने बहुत कुछ सीखा। उसने बेखबर नेतृत्ववर्ग को चुपचाप ठिकाने लगाने की कला सीखी और पिछले दो चुनावों में बहुमत की सरकारें बनाना भी सीखा। उसने लोकसभा में हवा का साथ देना सीखा तो तुरंत बाद विधानसभा में उसी हवा के विपरीत चलना भी सीखा।


ऐसा नहीं है कि 2014 में बनी भाजपा नेतृत्ववाली बहुमत की रघुवर सरकार ने खराब प्रदर्शन किया। उसने किंचित अविश्वसनीय से अपने चुनावी पार्टनर आजसू का प्रेशर कम करने की नीयत से ही जेवीएम के छह विधायकों का दल-बदल करा लिया था, भले ही इसका संदेश बहुत ही गलत गया। उसने कई अच्छे काम किए लेकिन 2019 में तमाम पैंतरेबाजियों के बावजूद उसको धूल चटाने में इसी पिछड़ी अवाम ने कोई मरौव्वत नहीं की। यहां तक कि मुख्यमंत्री, विधानसभाध्यक्ष आदि-आदि कई जानी-मानी हस्तियों को हाशिये पर ला खड़ा किया। इसका कारण विचारते हुए और निवारण करते हुए वर्तमान हेमंत सरकार यदि नहीं चली तो कोई काम काम न आएगा। नये चलन के अनुसार स्वयं को सेवक कहने वाला
नेतृत्ववर्ग अवाम के सामने सिर झुकाकर चलने के बजाय सीना तान कर चलने की कोशिश करेगा तो वह सोच ले, आज तुम्हारी बारी तो कल हमारी बारी।

भौतिकता की अंधी दौड़ के बावजूद समाज और आम आदमी नायकों में चरित्र खोजता है। नायक का फर्ज बनता है कि वह केवल जोड़-तोड़ और तीन-तिकड़म में ही न उलझा
रहे, खुद को आकर्षक सांचे में ढाले भी, ताकि उसकी राह का अनुसरण करनेवालों की तादाद बढ़ती चली जाय। ऐसा न करनेवाले को जनता ही चलता कर देती है। फिर वह या तो खुद का सांचा बनाने की कला सीखता है या वक्त का इंतजार करता है।

हाल यह कि हम भले ही न कह सकेें कि कौन ऐसा नेता है, जिसने दल बदला नहीं लेकिन इतना तो सच है ही कि कौन ऐसा दल है, जिसमें दलबदलुओं की फौज नहीं। जो नेता दल बदलते हैं, उनमें या तो दिल नहीं होता या फिर वे दिल से काम लेना नहीं चाहते। वे जब अपने दल के ही विश्वसनीय नहीं तो जनमानस के दिल में कैसे बैठेंगे? जनप्रतिनिधियों और अवाम में दिल से दिल का लगाव न हो तो जनकल्याण का मकसद छिटक जाता है। दरअसल झारखंड के साथ यही हुआ है।

जब यह बिहार का अंग था, तब थोड़े में संतुष्ट होनेवाले यहां के जनप्रतिनिधियों को दबाव में रखकर इसके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता था और अब अपना अलग अस्तित्व पाने के बाद देसी जनप्रतिनिधियों की अपरिमित ख्वाहिशों ने इसकी नैया डुबो दी। इस प्रकार यहां राजनीतिक माहौल बना ही नहीं। भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल के देसी नेता दिल्ली के इशारों पर ता-ता थइया करने को विवश होते हैं, जबकि झारखंडी और छोटे दल अपने बड़े नेताओं के गुलाम। राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकशाही के अभाव और मंथन, आपसी चर्चा-परिचर्चा की निहायत कमी के कारण आंतरिक गुटबाजी, स्वार्थपरता, मौकापरस्ती और चाटुकारिता का ऐसा भ्रमजाल खड़ा हो गया है, जो विकास की राह में रोड़ा ही नहीं, चट्टान बनकर अड़ गया है।

आज का जनमानस भ्रष्टाचार को बहुत संजीदगी से नहीं लेता। इस विषय पर उसने एक हद तक माफी देने की कला सीख ली है। उसके दिल में संभवतः यह बात बैठ गई है कि भ्रष्टाचार इस देश की सार्वकालिक समस्या है। यदि ऐसा न होता तो त्रेता में राम और द्वापर में कृष्ण को अवतार न लेना पड़ता। ... लेकिन वह चाहती है कि उसका भी विकास हो, उसको भी सामान्य नागरिक सुविधाएं मिलें, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, बिजली जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति में बहुत तरद्दुद न हो। दूसरी बात कि उसका नेता सर्वसुलभ हो। इतना तो हो ही कि वह सबकी सुने और जनजीवन के सामान्य कार्य-व्यापार में यदि नौकरशाही अड़ंगा डालती है तो वह रोकने में सक्षम हो। नौकरशाही अपने राजनीतिक आकाओं की विद्या-बुद्धि का आकलन कर चलती है। वह ऐसा घोड़ा है, जिसका सवार यदि मजबूत हो तो बिना लगाम थामे भी वह सही दिशा में दौड़ता रहेगा। जैसे ही उसको पता चलता है कि शहसवार कमजोर है, वह उसको जमीन पर गिरा-पटकने में कोई चूक नहीं करता।

चूंकि झारखंड में राजनीतिक वातावरण नहीं बना, संवैधानिक और सचिवालयीय कार्य-प्रणाली में कमजोर किंतु सर्वथा स्वार्थपरक नेतृत्ववर्ग सत्ता में आता रहा, इसी कारण देश का नंबर एक राज्य बनने की संभावनाओं वाला झारखंड बीस वर्षों में भी वह स्थान न बना सका, जिसका वह हकदार है। यह सोचने की बात है कि अपने बैच के टाॅपर आइएएस अधिकारी भी इस राज्य में कूढ़मगज जैसा काम क्यों करते हैं? नेतृत्ववर्ग को जनता के बीच मक्खन से भी अधिक कोमल और ‘चाकरों’ के बीच अनुशासनप्रिय कठोर मालिक का बर्ताव करने कीकला खुद में विकसित करनी ही होगी। वे समदर्शी भले ही न हों लेकिन ऐसा दिखने की कला भी उनको जाननी होगी, तभी एक तो उनकी सर्वस्वीकार्यता होगी, दूसरे राज्य विकास के पथ पर गति पकड़ेगा और पूरे देश में इसकी अपनी छवि निखरने लगेगी।

लेखक के ये निजी विचार हैं। झारखंड में पत्रकारिता की लंबी पारी। अब स्वतंत्र लेखन।