आदि काल से हो रही है सूर्य की पूजा



संजय कृष्ण

दुनिया की प्राचीन सभ्यताओं में सूर्य पूजा के अवशेष मिलते हैं। पाषाण और नव पाषाण काल में भी, जब लोग गुहा और कंदराओं में रहते थे, एक तरह से वे सूर्य की पूजा करते थे। तब यह आदिम स्वरूप रहा होगा। सूर्य नव पाषाण काल की महान सांस्कृतिक देन है। इसे आप पहले विश्व धर्म भी मान सकते हैं। मेन, मिन, मोन, मुन, हर, हिर, होर, हुर-ये शब्द रूप नव पाषाण काल की सूर्य कथा के चिन्ह स्वरूप हैं। मन, मिन आदि वृषसूर्य के मूल नाम हैं और हर हेर आदि किशोर सूर्यदेव के नाम। दोनों के मिलन से अरमिन और मेनहिर बने हैं। गौर करें शिव का भी एक नाम हर है-हर हर महादेव।

सूर्य न केवल प्रकाश देता है बल्कि गर्मी भी। आज के इस सभ्यताओं के युग में भी सूर्य का कोई विकल्प नहीं, बल्कि अब दुनिया सौर ऊर्जा की ओर बढ़ रही है। ऐसे में हम सूर्य की महत्ता समझ सकते हैं। इस महत्ता को वैदिक ऋषियों ने भी समझा था। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में एक श्लोक है 'सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च'। यह श्लोक भी सूर्य को ऊर्जा मानता है।
इसी तरह ब्रह्मांड में अनेक सूर्य की बात कही गई है-सहस्र सूर्य। इसका प्रमाण ऋग्वेद(9.114.3) में मिलता है-'सप्त दिशो नानासूर्या:। देवा आदित्या ये सप्त।' यानी सूर्य अनेक हैं। यहां सात सूर्य से आशय सात सौरमंडल से है। लेकिन विज्ञान ने अभी तक एक ही सौर मंडल का पता लगा पाया है। वैदिक ऋषियों ने बताया है कि सूर्य के चारों ओर विशाल गैस का भंडार है-ऋग्वेद(1.164.43) में मंत्र, 'शकमयं धूमम् आराद् अपश्यम्, विषुवता पर एनावरेण- सूर्य के चारों और दूर-दूर तक शक्तिशाली गैस फैली हुई हैं।

ब्रह्म पुराण में सूर्य की महिमा इस तरह गाई गई है---

विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः।
लोक प्रकाशकः श्री माँल्लोक चक्षुर्मुहेश्वरः॥
लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः॥
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।
एकविंशतिरित्येष स्तव इष्टः सदा रवेः॥


' विकर्तन, विवस्वान, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान, लोकचक्षु, महेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, कर्ता, हर्त्ता, तमिस्राहा, तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा और सर्वदेव नमस्कृत- इस प्रकार इक्कीस नामों का यह स्त्रोत भगवान सूर्य को सदा प्रिय है।'


वेद के साथ लोक में भी सूर्य का महत्व है। ऐसा मान सकते हैं कि लोक से ही वेद की यात्रा आरम्भ हुई। आदिवासी समाज भी सूर्य की पूजा करता है। सूर्य को झारखंड में सिंगबोंगा कहते हैं। एक जाति हर 12 साल पर सूर्य की पूजा करती है-इसे सूर्याही पूजा कहते हैं। 12 साल के महत्व को समझे-12 राशियों को बारह सौरमास माना जाता है। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। इस राशि प्रवेश से ही सौरमास का नया महीना ‍शुरू माना गया है। सौर-वर्ष के दो भाग हैं- उत्तरायण छह माह का और दक्षिणायन भी छह मास का। जब सूर्य उत्तरायण होता है तब हिंदू धर्म अनुसार यह तीर्थ यात्रा व उत्सवों का समय होता है। पुराणों अनुसार अश्विन, कार्तिक मास में तीर्थ का महत्व बताया गया है। उत्तरायण के समय पौष-माघ मास चल रहा होता है। 12 राशि, 12 महीना। यह 12 का अंक महत्वपूर्ण है सृष्टि के लिये भी।

लोक आस्था का पर्व छठ सूर्य की उपासना का ही पर्व है। यहां 4 दिनों तक मनने वाला पर्व पहले डूबते सूर्य को जल अर्पित करता है फिर उगते। यह सबसे महत्वपूर्ण है। दूसरा, इसमें कोई कर्मकांड नहीं। इसलिए किसी ब्राह्मण की भी जरूरत नहीं। नए अन्न ही भगवान को समर्पित किया जाता है।

कह सकते हैं दुनिया का हर कोना सूर्य की उपासना करता है-रूप अलग अलग भले हों। गायत्री मंत्र सूर्य को ही समर्पित है। सूर्य है तो जीवन है, सृष्टि है, संसार है।