पेड़ों के रास्ते ही आएगी हरियाली



टी. एन. मिश्र

सुखद, समृद्ध एवं सुरक्षित जीवन के लिए हमें पेड़ों की बहुसंख्यक उपलब्धता, शुद्ध पर्यावरण एवं पर्याप्त पानी आवश्यक हैं। झारखंड जैसे वन प्रदेश में पेड़ों के रास्ते ही खुशहाली आएगी। एक समाचार के अनुसार वन विभाग 2.20 करोड़ पौधे लगाएगा जिस क्रम में फलदार पौधों को प्राथमिकता दी जाएगी। पिछले छह महीनों में कितने पौधे लगाए गए तथा उनके वृक्ष बनने तक पौधों के संरक्षण हेतु क्या व्यवस्था की गई है, यह एक जांच का विषय है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए सबसे जरूरी है जल एवं जंगलों का संरक्षण। कहा गया है कि एक वृक्ष दस पुत्र समाना, जल ही जीवन है, पेड़ से जल और जल से जीवन। पेड़-पौधों की जड़ें कठोर चट्टानों को भी भेद कर उन्हेंं छिद्रदार बनाते हैं, जिससे वर्षाजल रिस-रिस कर भूगर्भ जल भंडारों को भरते रहता हंै। वृक्ष हमारे द्वारा छोड़े गऐ जहर (कार्बन डाइऑक्साइड) सोख लेते हैं तथा हमारे लिए अमृत (ऑक्सीजन) उपलब्ध कराते हैं। पेड़ बादलों को वर्षा के लिए आकॢषत करते हैं। नदियां भी तभी जीवित रह पाती हैं जब तक उनके किनारों पर पेड़-पौधों की उपस्थिति बनी रहती है। उदाहरण के लिए रांची की जीवन रेखा कहलाने वाली हरमू नदी जब सालों भर बहती रहती थी तब उसके दोनों किनारों पर जंगल विद्यमान थे जिन्हेंं काटकर नष्ट कर दिया गया। वृक्षों को काट दिए जाने के फलस्वरुप आज हरमू नदी बेपानी हो गई है।

एक समाचार पत्र में प्रकाशित लेख के अनुसार धुर्वा क्षेत्र में स्मार्ट-सिटी निर्माण के क्रम में 900 पेड़ काटे जाएंगे। वन विभाग की हाई पावर कमिटी ने स्मार्ट सिटी निर्माण करने वाली कंपनी एल एंड टी. को नौ सौ पेड़ों को काटने की अनुमति दे दी है। पेड़ काटने के विरोध में 30 सितंबर 2020 को वार्ड सं 39 के पार्षद वेद प्रकाश सिंह 20-25 स्थानीय लोगों के साथ कार्यस्थल पर पहुंचे और पेड़-कटाई का काम बंद करवा दिया। उन लोगों ने यह भी कहा कि 40-50 वर्ष पूर्व जब यहां हटिया कारखाना लग रहा था तब पर्यावरण सुरक्षा के लिए ही ये पेड़ लगाये गए थे।

मेरे विचार से सड़कों के चौड़ीकरण के लिए जब पेड़ों को हटाना आवश्यक हो उन्हेंं काटने के बजाय आवश्यक दूरी पर शिफ्ट कर देना चाहिए। आज के दिन इसके लिए कारगर तकनीक एवं मशीनें उपलब्ध हैं। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य में सड़कें चौड़ीकरण के लिए पुराने और बड़े पेड़ों की सिंटिग पद्धति लागू है। राजरप्पा कोलियरी क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण हेतु पेड़ों को काटने के बजाय आवश्यक दूरी पर शिफ्ट किया गया है। मेरा अनुरोध है कि झारखंड सरकार की वन विभाग वाली हाई पावर कमिटी इस तथ्य को संज्ञान में लेते हुए यहां भी पेड़ों की शिफ्टिंग प्रक्रिया लागू करे ताकि पर्यावरण सुरक्षित रह सके।
सरकार एवं समाज को जलस्रोतों के विकास तथा वर्षा जल संरक्षण के लिए पूरी मुस्तैदी से कार्य करना चाहिए। इन आवश्यकताओं की पूॢत में कोताही करने का परिणाम कोरोना महामारी से भी भयंकर होगा। जल संकट की महामारी से बचने के लिए इकलौता वैक्सिन वर्षा-जल संरक्षण है। सौभाग्यवश हमारे झारखंड में प्रचुर वर्षाजल (1300-1400 मि.मी. प्रतिवर्ष) उपलब्ध है जिसका 80 प्रतिशत भाग बहकर नदी-नालों से होते हुए बहकर व्यर्थ बरबाद हो जाता है। यदि विभिन्न तरीके अपनाते हुए उपलब्ध जल का 50 प्रतिशत हम संरक्षित कर लें तब हमारा पूरा राज्य पानीदार बन जाएगा।

बढ़ती आबादी द्वारा भूगर्भ जल के अति दोहन तथा खाली किए गए भूगर्भ जल भंडारों की रिचाॄजग के अभाव में भूगर्भ जलस्तर भयानक रूप से नीचे खिसक चुका है जिसके फलस्वरूप सभी कुंए सूख गए हैं तथा कई घरों के कम गहराई वाले ट्यूबवेल पानी देना बंद कर चुके हैं।


वर्षाजल संरक्षण हेतु सतही जल-भंडारों का निर्माण एवं भूगर्भजल भण्डारों का पुनर्भरण (रिचाॄजग) दोनों ही आवश्यक हैं। भूगर्भजल भण्डारों का पुनर्भरण बेहतर है इसलिए कि इससे संरक्षित वर्षाजल वाष्पीकरण द्वारा नष्ट नहीं होता, मनुष्य एवं जानवरों के त्यक्त मल-मूत्र द्वारा जल दूषित नहीं होता, सतही क्षेत्र नहीं डूबते तथा विकेंद्रित स्तर पर कम लागत में लोगों को शुद्ध जल उपलब्ध रहता है।

केंद्र एवं राज्य सरकार की पहल से जल एवं मृदा संरक्षण हेतु प्रारम्भ की गई जल समृद्धि योजना मील का पत्थर साबित हो रही है। इसके तहत जगह-जगह ट्रेंच कम बंद (टी.वी.सी.) का निर्माण एवं मेड़बंदी (फिल्ड बंद) की जा रही है ताकि 'खेत का पानी खेत में, गांव का पानी गांव में, बह कर न जाए रेत (नदी) मेंÓ चरितार्थ हो सके। इसी प्रकार नाला सफाई योजना, वर्षा जल को रोकना तथा भूक्षरण को नियंत्रित करना आदि कार्य किए जा रहे हैं ताकि उक्त स्थल के भूगर्भ जलस्तर को उपर उठाया जा सके। ग्रामीण कोरोना जैसी महामारी से सबक लेकर मनरेगा से जुड़कर आॢथक लाभ भी प्राप्त कर रहे हैं। अभीष्ट जल संरक्षण होने तक इन कार्यों को जारी रखना एक चुनौती है।

उपरोक्त कार्यों के अतिरिक्त कुछ ऐसे बिंदु हैं जिन पर समाज एवं सरकार को ध्यान देते हुए सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए। जैसे खासकर गर्मी के दिनों में जलापूॢत के क्रम में राशनिंग की नौबत न आए इसके लिए रूक्का, हटिया एवं कांके जैसे डैमों की जल भंडारण क्षमता, उनका डिसिंििल्ट तथा चैड़ीकरण द्वारा बढ़ाई जाए। रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेंटिग के लिए ओडिशा सरकार के जल संरक्षण मंत्रालय द्वारा अपनाई जा रही पद्धति झारखंड सरकार को भी लागू करना चाहिए जहां संबंधित स्ट्रक्चर बनवाने का आधा खर्च लाभुक को सब्सिडी के रूप में दिया जाता है। रांची नगर निगम द्वारा लागू किया गया शर्त कि स्ट्रक्चर नहींं बनवाने वालो को डेढ़ा होंल्डिंग टैक्स देना होगा कारगर नहीं हो रहा है। भूगर्भ जल भंडारों के पुनर्भरण हेतु खेल-मैदान, पार्क एवं अन्य खाली जगहों में पडऩे वाले वर्षा जल को ढलानों की दिशा में ट्रेंच-पिट बनाकर भूगर्भ में संरक्षित किया जाना चाहिए।

पिछले 12 फरवरी 2020 को रांची नगर निगम ने सरकार से 19 करोड़ रुपये की मांग की थी ताकि बीत चुके गर्मी में जल संकट से निजात पाने हेतु विभिन्न वार्डाें में 106 एच.वाइ.डी.टी. (उच्च प्रवाही नलकूप) तथा 265 मिनी एच.वाइ.डी.टी. लगाए जा सकें। मेरे विचार से यह एक अस्वस्थ परंपरा है क्योंकि इससे भूगर्भ जलस्तर और नीचे जायेगा फलत: उक्त नलकूपों के अगल-बगल के चापानल एवं ट्यूबवेल से पानी मिलना कम या बंद हो जाएगा।

झारखंड राज्य में 'जल जीवन मिशनÓ के कार्यान्वयन के लिए पांच जून 2020 को भारत सरकार ने वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए 572 करोड़ रुपये की राशि अनुमोदित की है। उक्त मिशन का उद्देश्य 2024 तक प्रत्येक ग्रामीण को प्रतिदिन 55 लीटर शुद्ध जल मुहैया कराना है। आशा की जाती है हमारी सरकार इस प्रस्ताव के कार्यान्वयन पर प्राथमिकता के आधार पर कार्यवाही कर रही है।

नीति आयोग द्वारा कम्पोजिट वाटर मैनेजमेंट इन्डेक्स के तहत राज्यों को उनकी जल संरक्षण दक्षता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। झारखंड प्राय: नीचे के स्थिति में पाया जाता है। विश्वास है झारखंड सरकार और यहां का समाज गुजरात तथा तमिलनाडु जैसे राज्यों का अनुसरण करते हुए वर्षाजल संरक्षण के मुद्दे पर जागरुक होंगे एवं प्रतिस्पर्धा में उपर उठने का भरपूर प्रयास करेंगे।

जल संचयन को लेकर काफी काम किया है। हरमू में रहते हैं।