अशोक के पौधे

एन के झा

सुबह सुबह मयंक घर के बगीचे में बैठ गए। हल्की ढंढी प्यार चल रही थी। सर्दी का मौसम विदा होने को था। यह वसंत के आगमन की सूचना थी।

सहसा उनकी नज़र अशोक के पौधों में आ रहे नव किसलय पर पड़ी। देख कर प्रसन्न हो गए मयंक। कल तक तो ये पौधे ढ़ेर सारे पुराने पत्तों के सूख कर झड़ जाने से प्राणहीन से दिख रहे थे। आज जीवंत हो ब।मुड़ेर से लिपटी घनी मालती लता में भी नए फूल आ रहे थे। पर ये लाल,गुलाबी, पीले गुलाब के पौधे!उन्हें कलियों का अभी भी इन्तज़ार था ।

इन्हें देखते देखते ख़्यालों में डूब गए मयंक। स्मृतिपटल पर मयूरी की यादें उभर आई थीं।कितने सपने संजोए थे अपनी आँखों में उसने। आपके रिटायर होने के बाद इस फ़्लैट की ज़िन्दगी और नहीं जाएँगे हम । छोटा ही सही पर एक घर होगा हमारा। बरामदे के पास ही एक बगीचा लगाउँगी मैं । लाल गुलाबी पीले गुलाबों से सजे बगीचे की सीमा चम्पा, चमेली और हरसिंगार के पेड़ होंगे।अशोक के दो पौधे इसके द्वार पर लगे होंगे।
बारहों महीने वाली बेली और मालती लता बगीचे को अपनी सुगंध हमेशा खुशबूनुमा बनाए रखेंगे।

“चाय बन गई है “सौरभ की आवाज़ से यादों की श्रिंखला टूट गई थी ।यहीं से आओ। चाय लाकर रख दी सौरभ ने। कितना अच्छा लड़का है ! दिन भर घर के काम काज में लगे रहने के बावजूद मेरी दिनचर्या का पूरा ख़्याल रखता है।

थोड़ा संभले तो चाय की प्याली उठाई पर वापस रख दी उन्होंने ।साथ साथ सुबह की चाय बगीचे में पीने का मयूरी की आँखों में संजोया सपना याद आ गया।सपने उसके ढ़ेर सारे थे । अपना घर, अपना फूलता खुशबूनुमा बगीचा आदि । यादों में फिर खो गए मयंक।

दसेक वर्ष हो गए।लगभग दो वर्षों तक गम्भीर बीमारी से जूझते जूझते हार मान ली थी मयूरी ने।आख़िरी साँस लेते समय मौन एकटक मयंक को देखे जा रही थी, मानो कह रही हो सात जन्मों तक साथ निभाने का वादा कर एक जन्म भी आपका साथ नहीं दे सकी मैं।

और उसके वो सपने! ऑंख मूँदने से पहले एकटक देखती मयूरी ने सारे सपने मानो मयंक की ऑंखें में डाल दिए थे।अब उन सपनों को साकार कर रहे थे मयंक। घर बना लिया था, बगीचा तैयार गया था। अशोक के दो पौधे बगीचे के शुरु में ही लगाए थे मानो वे बगीचे के ही नहीं मयूरी के सपनों के द्वारपाल थे।

ख़ाली चाय की प्याली लेने सौरभ आ गया । अरे चाय नहीं पी आपने! ठंढ़ी हो गई। दूसरी बना दूँ? हाँ ।पर उसे लिविंग रूम में रखो, वहीं पीऊँगा । उठ कर लिविंग रूम आ गए मयंक।

चाय समाप्त होते ही फ़ोन की घंटी बज उठी। शैलेश थे। पापा मैं और शैलजा अगले महीने आ रहे है । एक सप्ताह रहेंगे । आप मेरे साथ आ जाइयेगा। हमने सोचा है अब आप और अकेले इंडिया में नहीं रहेंगे।हज़ारों किलोमीटर दूर विदेश में रहते हुए हम आपकी देखभाल नहीं कर सकते। ममी रहती तो कुछ दिन और वहाँ रह सकते थे,पर अब और नहीं। एक साँस में इतना कुछ कह गए शैलेश।

सोच में डूब गए मयंक। सँभले तो कहा। आ जाओ, बात करेंगे।

शैल ने ऊँची पढ़ाई की। अब बाहर रह रहे थे। अपनी ज़िन्दगी बच्चों के लिए ही जी मयूरी ने।उनकी देखभाल, पढ़ाई लिखाई के अलावा जैसे कुछ और था ही नहीं । कभी कभार जब मयंक उससे कहीं घूमने जाने की बात करते तो कहती घूमने के लिए सारी ज़िन्दगी परी है। स्कूली शिक्षा पूरी कर जब बच्चे बड़े शहर चले जाएँगे तो हम ख़ूब घूमा करेंगे । आपकी सारी इच्छा पूरी हो जाएगी ।

पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था । शैलेश ने पढ़ाई पूरी कर ली थी।बेटी पाखी के काँलेज की पढ़ाई के लिए शहर छोड़ते ही दुनियाँ छोड़ दी मयूरी ने। मानो केवल बच्चों के लिए ही भगवान ने उसे इस दुनिया में भेजा हो।

शैलेश की बातों से उधेड़बुन में पर गए थे मयंक।अगर मैं चला गया तो फिर इस बगीचे का क्या होगा?

बगीचे में हर सुबह बैठना नियमित रूप से शुरु कर दिया था मयंक ने।
गुलाब की खिलती पंखुरियों में मयूरी की मुस्कुराहट देखते मयंक। मालती लता के फूलों की सुगंध उन्हें मयूरी पास ही होने का एहसास दिलाती।और पत्तों की खरखराहट में मयूरी के पद चाप सुनते।

शैलेश और शैलजा आ गए। साथ उनके पाखी भी थी।पाखी को साथ देखकर अचंभित हो गए मयंक। पूरे परिवार को एक साथ देखकर प्रसन्न थे मयंक ।उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। तुम सब तैयार हो जाओ । सौरभ से सबके लिए नाश्ता बनाने को कह कर बाज़ार निकल गए। पाखी की पसंद की सब्ज़ी लाने। शैलेश और शैलजा के आगमन की तैयारी पहले ही कर ली थी मयंक ने। पर पाखी प्यारी बेटी थी, हूबहू मयूरी की छाया प्रति हो जैसे । उसकी पसंद भी शैलेश से भिन्न थी।

भोजनोपरान्त सभी साथ बैठे। बात शुरू की शैलजा ने। पापा हमसब लोगों ने तय किया है अब आप हमारे पास ही रहेंगे। अच्छा संयोग है पाखी की नौकरी भी हमारे ही शहर में है। बिना यात्रा की परेशानी उठाए आप अपनी इच्छा के अनुसार कभी हमारे और कभी पाखी के पास रहेंगे । इतनी दूर रहते हैं आप हमेशा आपकी चिंता रहती है। विदेश में रहते हुए बार बार नहीं आ सकते हम। और आएँगे भी तो कितने दिन के लिए? इसीलिए मैं ने पाखी को भी साथ चलने को कहा, जानती हूँ, आपकी लाड़ली है वो।

भाभी ठीक कह रही हैं। अब आप और यहाँ नहीं रह सकते, यह पाखी थी।
याद है तीन चार साल पहले आपको जब आप बार बार बीमार होते थे तो भैया को आने में चौबीस घंटे भी नहीं लगते थे,तब वो इंडिया में थे,अब यह नामुमकिन है ।

पिछले दो वर्षों में आप और कमजोर हो गए हैं ,देख रही हूँ मैं,शैलेश ने पुष्टि की ।

विचार करता हूँ, बताऊँगा। कहा मयंक ने।
और गम्भीर चिन्तन में डूब गए मयंक ।इतने वर्षों से मयूरी के सपने जी रहा हूँ ,इस बगीचे की देखभाल करते हुए, कैसे इनके बिना जी सकूँगा में?

शैल !क्या वहाँ मैं छोटा ही सही, एक बगीचा लगा सकता हूँ जिसमें मयूरी के सपनों के पौधे हों? शैलेश से पूछा मयंक ने।

पापा ये पौधे यहाँ की जलवायु में ही फल फूल सकते हैं, वहाँ की कठोर सर्दियों के मौसम में जीवित नहीं रह सकते, जवाब दिया शैलेश ने।

सोच विचार में पर गए थे मयंक।जब ये छोटे पौधे जिन्होंने अभी सिर्फ़ कुछेक वसंत ही देखा है,जिजीविषा से भरपूर हैं ये फिर भी वैसे मौसम में उल्लासित नहीं रह सकते तो सारी ज़िन्दगी यहाँ की आबोहवा में जीने के बाद इस ढलती उम्र में वहाँ रह पाऊँगा मैं?

ढलती उम्र का अहसास शारीरिक क्षमता के ह्रास से होने लगा था उन्हें। प्रकृति के इस शाश्वत सत्य को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।

उधेड़बुन में पर गए मयंक।
किससे मन की बात शेयर करें? किससे सलाह लें? मयूरी की याद फिर आ गई।

देर तक सोच विचार कर तय किया मयंक ने। अब वे बच्चों के साथ ही रहेंगे ।

बच्चों ने सब कुछ समेटने निपटाने की तैयारी शुरु कर दी ।पर अनमने से रहने लगे मयंक।

और प्रस्थान का समय आ गया। सुबह सुबह तैयार होकर बगीचे में बैठ गए मयंक। कभी फूलों को एकटक निहारते, कभी लता की पत्तियों को छूते रहते मानो उनसे बात कर रहे हों।

“पापा गाड़ी आ गई है ,सारा सामान रखा जा चुका है चलिए बैठ जाइए”,यह शैलजा थी।भावना के सागर में डूबे मयंक बिना कुछ बोले कार मे बैठ गए । आज उन्हें लग रहा था जैसे वे मयूरी से अन्तिम विदा ले रहे हों ।नज़र उनकी अशोक के पौधों पर तब तक टिकी रही जब तक वे आँख से ओझल नहीं हो गए, मानो उनसे कह रहे हों मयूरी के सपनों का ख़्याल रखना।