आजादी का गुमनाम सिपाही



विजय केसरी

महान स्वाधीनता सेनानी बाबू रामनारायण सिंह का संपूर्ण जीवन भारत की आजादी के नाम समॢपत रहा। आज से 134 वर्ष पूर्व चतरा जिला के हंटरगंज प्रखंड के तेतरिया गांव में उनका जन्म हुआ था। बचपन से ही उनकी पढ़ाई में रुचि रहने के कारण पिता भोली सिंह ने गांव की प्रारंभिक शिक्षा के उपरांत हजारीबाग के मिडिल वर्नाक्युलर स्कूल में दाखिला करवा दिया। स्कूली शिक्षा के उपरांत बाबू रामनारायण सिंह ने कलकत्ता के संत जेवियर्स कॉलेज से स्नातक और कानून की डिग्री ली। छोटी उम्र से ही उनमें समाजसेवा करने का गुण देखा गया। जब वे तेतरिया गांव के प्रारंभिक स्कूल के छात्र रहे, तभी से वे गरीब असहाय छात्रों को किताबें और कपड़े देकर मदद किया करते। समाज सेवा करने का उनका यह जज्बा आजीवन बना रहा।

विद्राही स्वभाव
वे एक मिलनसार व्यक्ति के साथ विद्रोही स्वभाव के भी रहे। किसी के साथ अगर कोई अन्याय कर रहा होता तो वे अन्यायी करने वाले के खिलाफ मोर्चा खोल देते और उसे परास्त कर ही दम लेते। बाबू रामनारायण सिंह के पिता भोली सिंह ने उन्हेंं ऐसा न करने की हिदायत कई बार दिया। इसके बावजूद वे अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होते। वे जितना विद्रोही स्वभाव वाले रहे, उतना ही शालीन ओर आज्ञाकारी भी थे। अपने काम के प्रति पूरी तरह निष्ठावान रहते। कानून की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात उन्होंने वकालत से अपने कैरियर की शुरुआत की। जब वे इजलास में एक वकील के रूप में अपनी बात रखते तो न्यायधीश समेत सभी बड़े वकील अचरज से उन्हेंं सुनते और देखते रह जाते। इतनी कम उम्र में उनकी वाक प्रवीणता से सभी बड़े-बड़े अधिवक्ता प्रभावित हो गए। लेकिन बाबू रामनारायण सिंह को वकालत में टिकना कहां था? उन्हेंं तो माता भारती देश सेवा के लिए पुकार रही थी।

वकालत पेशे का त्याग
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने वकालत पेशे को सदा-सदा के लिए त्याग कर स्वाधीनता सेनानी बनने का संकल्प लिया। स्वाधीनता संकल्प में उन्होंने सबसे पहले अपने भाई सुखलाल सिंह को जोड़ा और जन्मभूमि चतरा में कांग्रेस पार्टी के गठन की शुरुआत की थी। देखते ही देखते उन्होंने सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों को स्वाधीनता का संकल्प दिलाया। फिर महात्मा गांधी के निर्देश के उपरान्त वे चतरा से निकलकर कृष्ण बल्लभ सहाय, राज बल्लभ सहाय, बद्री सिंह जैसे युवा स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर स्वाधीनता के प्रचार में जुट गए। जहां भी बाबू रामनारायण सिंह की सभा होती, उनके ओजपूर्ण भाषण को सुनने के लिये सैकड़ों की संख्या में भीड़ जुट जाती। इसी भीड़ में वे लोगों को स्वाधीनता का संकल्प दिला देते। उनके भाषण का ऐसा असर होता था कि लोग हंसते-हंसते स्वाधीनता का संकल्प ले लेते। बाबू रामनारायण सिंह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जमकर और खुलकर बोला करते। इसकी खबर जल्द ही हजारीबाग के तत्कालीन कलक्टर को मिल गई। उनके निर्देश पर बाबू रामनारायण सिंह की गतिविधियों पर नजर रखी जाने लगी। उनका नाम तुरंत अंग्रेजों के हिट लिस्ट में दर्ज कर लिया गया। इस बात की सूचना जब उन्हेंं मिली तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि 'अब मेरी बातों का असर अंग्रेजी हुकूमत पर होने लगी है। अब यह कारवां महात्मा गांधी के निर्देश से आगे बढ़ता ही चला जाएगा। अंग्रेजी हुकूमत में दम है, तो गांधी के कारवां को रोककर देखे, उसक असर क्या होता है?Ó.... इसके साथ ही वे देशभर के तमाम बड़े नेताओं के सम्पर्क में आते गए। वे स्वाधीनता आंदोलन का प्रचार-प्रसार करते हुए पहली बार 1921 में गिरफ्तार हुए और जेल भेज दिये गए। 1931 से 1939 तक वे आठ बार जेल भेजे गए। इस दरम्यान उन्होंने कई राष्ट्रीय नेताओं के साथ देशभर में घुम-घुमकर स्वाधीनता का अलख जगाया। डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि नेताओं के साथ उन्होंने कई मंचों पर साझा और मजबूत उपस्थिति दर्ज की।

जेल में भी रहे सक्रिय

बाबू रामनारायण सिंह की गिनती अब राष्ट्रीय नेताओं में होने लगी। वे हमेशा सभाओं और स्वाधीनता सेनानियों से विचार-विमर्श में व्यस्त रहते। स्वाधीनता का प्रचार-प्रसार और सभाएं ही अब उनकी जिंदगी बन गई। बिषम परिस्थितियों में भी उन्होंने संयम और धैर्य को कभी खोया नहीं बल्कि डंटकर मुकाबला किया। 1934 में जब देश में जबरदस्त भूकंप आया, तब कई कांग्रेसी नेताओं को स्वंय सेवा करने के लिए जेल से छोड़ा गया था, किंतु बाबू रामनारायण सिंह को जेल में ही बंद रखा गया। वे इससे तनिक भी विचलित नहीं हुए और जेल के अंदर स्वाधीनता सेनानियों को गुप्त रूप से प्रशिक्षित करते रहें। वे जेल से ही गुप्त चिट्ठियों के माध्यम से बाहर हो रहे स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रहे। स्वाधीनता आंदोलन के साथ वे समाज सेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। समाज के छोटे से छोटे लोगों की जरूरतों को समझते हुए उसके स्थायी निदान के लिए आवश्यक परामर्श और मदद किया करते। किसी भी विषय पर उनका दृष्टिकोण बिल्कुल सुस्पष्ट रहा। उन्होंने ढ़ुलभूल और स्वार्थ की राजनीति कभी नहीं की। 1921 से 1926 के दौरान जब महात्मा गांधी का आगमन बिहार की धरती पर हुआ तब बाबू रामनारायण सिंह, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, जय प्रकाश नारायण, श्रीकृष्ण सिन्हा जैसे नेताओं के साथ कदम से कदम मिलाकर आयोजनों को सफल बनाने में सक्रिय रहे थे।

गांधी से प्रभावित
महात्मा गांधी, बाबू रामनारायण सिंह की स्वाधीनता आंदोलन में सक्रियता को देखकर बहुत प्रभावित हुए थे। गांधी ने इसका जिक्र बाबू रामनारायण सिंह को लिखे पत्रों में दर्ज किया। देश की आजादी के बाद गांधी की तरह बाबू रामनारायण सिंह भी चाहते थे कि कांग्रेस पार्टी को विलोपित कर दिया जाए और सत्ता संचालन के लिए एक अलग से राजनीतिक पार्टी का गठन हों। किन्तु ऐसा संभव नहीं हो पाया। आजादी के बाद सत्ता के रूख से बाबू रामनारायण सिंह बहुत दुखी हुए। अपने दुख को उन्होंने सार्वजनिक भी किया। किन्तु इसका रत्तीभर भी असर कांग्रेसी नेताओं पर नहीं पड़ा। 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या से वे काफी मर्माहत हुए। केंद्रीय सत्ता की दिशाहीनता देख उन्होंने कांग्रेस पार्टी से त्याग पत्र दे दिया। 1951 में उन्होंने हजारीबाग से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और सांसद बने। संसद में उन्होंने पहली बार अलग झारखंड की मांग रखी थी। अलग झारखंड की मांग की अनिवार्यता पर उन्होंने लोक सभा में यादगार भाषण दिया। बाबू रामनारायण सिंह ने लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विदेश नीति की जमकर आलोचना की। वे गांधी के ग्राम स्वराज की नीति को लागू करना चाहते थे। गांवों के विकास के साथ शहरोत्थान के पक्षधर रहे बाबू रामनारायण आजीवन सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लड़ते रहे।

नेहरू की नीतियों की आलोचना
जम्मू-कश्मीर पर नेहरू की नीतियों का उन्होंने जमकर आलोचना किया। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर में लागू दो विधान-दो निशान के विरोध में एक-विधान-एक निशान का जो आंदोलन की शुरुआत हुई, उस आंदोलन में बाबू रामनारायण सिंह बढ़चढ़ कर हिस्सा लिये। इस बात की पुष्टि बाबू रामनारायण सिंह और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बीच हुए पत्राचार से होती है। संविधान निर्माण सभा के सदस्य के रूप में भी उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया था।

स्वराज लूट गया
देश की आजादी के नौ वर्षाें बाद केन्द्रीय सत्ता की दिशाहीनता पर बाबू रामनारायण सिंह ने 'स्वराज लूट गयाÓ नामक पुस्तक लिखकर जबरदस्त विरोध दर्ज किया। इस पुस्तक की चहुंओर जमकर चर्चा हुई। केंद्रीय सत्ता के विरूद्ध इस पुस्तक ने देशवासियों सहित सभी नेताओं को एक नई दृष्टि और स्वर प्रदान किया। 1964 में बाबू रामनारायण सिंह की मृत्यु 79 वर्ष की उम्र में हुई। अब वे हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने राजनीति की शुचिता, सत्ता के विकेन्द्रीकरण, ग्राम-स्वराज, समाज सेवा के पक्ष और अन्याय के विरुद्ध उठ खड़े होने का जो विचार दिया, सदा देशवासियों को प्रेरणा देता रहेगा। बाबू नारायण सिंह के विचार आज भी देशवासियों के मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।