अपने ही गांव में बेगाना: जयपाल सिंह



संजय कृष्ण

शहर में जयपाल सिंह नाम का स्टेडियम बर्बाद हो गया। उनके गांव में उनका घर ढह रहा है। उनकी कब्र भी गांव में उपेक्षित है। हम अपने नायकों का इसी तरह सम्मान करते हैं। जबकि बिरसा मुंडा के बाद जयपाल मुंडा ऐसे पहले व्यक्ति थे, जिनकी आवाज देश में नहीं नहीं, विदेशों में भी गूंजती थी। ऑक्सफोर्ड में उनकी पढ़ाई का यह नतीजा रहा कि वे आदिवासियों के हित के लिए संविधान सभा और उसके बाद संसद में अपनी आवाज उठाई। संसद में तब उन्होंने कहा था-'आदिवासियों को लोकतंत्र का पाठ न पढ़ाया जाए।' पर आज?

टकरा गांव में जन्म
खूंटी जिले का टकरा गांव में जयपाल सिंह मुंडा का जन्म बिरसा के शहीद होने के दो साल बाद 1903 में हुआ था। पहले यह रांची जिले में था, अब खूंटी जिले में। रांची से इसकी दूरी 11 मील है। उनके पिता अमरू परंपरागत रूप से मुंडा समाज के पाहन थे। पाहन यानी पुजारी। रांची से पढ़ाई की यात्रा शुरू हुई तो विदेश में जाकर रुकी। वहीं से हॉकी में अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। इसके बाद भारत लौटे से पढ़ाने का काम किया और फिर झारखंड आंदोलन में सक्रिय हो गए।

एक समय झारखंड आंदोलन की आवाज रहे जयपाल सिंह मुंडा अपने गांव में ही उपेक्षित हैं। उनके गांव में उनकी कब्र उपेक्षित पड़ी है। जबकि जयपाल सिंह मुंडा ने देश-दुनिया में अपनी प्रतिभा, कर्म, आंदोलन से साख व पहचान बनाई थी। करोड़ों आदिवासियों की आवाज को संसद में बुलंद किया। संविधान सभा में उन्होंने जोरदार तरीके से अपनी बात रखी।

जयपाल सिंह पर पुस्तक लिखे संतोष किडो कहते हैं कि झारखंड के सपूत शहीद जयपाल ङ्क्षसह मुंडा भले ही हॉकी चैंपियन के रूप में विश्वभर में अपनी एक अलग पहचान बनाई, लेकिन अपने गांव-घर और सूबे में उपेक्षित हैं। मुंडा का पैतृक घर लोग विदेशों से भी देखने आते हैं जो पूरी तरह से धंस चुका है। अब यहां सिर्फ खंडहर दिखता है। ग्रामीणों की माने यहां हर साल बड़े-बड़े नेता उनके शहादत व जन्म दिवस पर आते हैं। बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लेकिन उनके पैतृक आवास का जिर्णोद्धार अभी दूर की कौड़ी मालूम पड़ती है। जयपाल ङ्क्षसह मुंडा की पत्नी और और उनके परिवार के बाकी सदस्यों को एक ही जगह गांव में दफनाया गया है। मसना के ऊपर पत्थर लगा है। मसना की सुरक्षा के लिए चौहदी बनाकर दीवार भी खड़ी की गई है।

संविधान सभा से लेकर संसद व सड़क तक आदिवासियों की आवाज रहे जयपाल सिंह मुंडा ने झारखंड अलग राज्य के लिए अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया था, जिसका खामियाजा उन्हें व उनकी पार्टी को भुगतना पड़ा, क्योंकि कांग्रेस ने उन्हें धोखा दे दिया। संसद में नेहरू से इस पर सवाल भी किया। बाद में उन्हें विलय को लेकर पछतावा हुआ। 13 मार्च 1970 को रांची में आयोजित झारखंड पार्टी के सम्मेलन में पार्टी में लौटने की सार्वजनिक घोषणा की, लेकिन 20 मार्च को उनका निधन। बहुत कम लोग जानते हैं कि तत्कालीन बिहार सरकार में वे मात्र 29 दिन उपमुख्यमंत्री भी रहे।

कुछ महत्वपूर्ण तिथियां

1950 : एक जनवरी को जमशेदपुर में आयोजित आदिवासी महासभा में राजनीतिक पार्टी 'झारखंड पार्टीÓ की घोषणा।
1951 : मार्च में हुए प्रांतीय एवं केंद्रीय चुनाव में झारखंड पार्टी के 32 विधायक व चार सांसद पार्टी के चुनाव चिह्न मुर्गा पर जीते। रांची पश्चिम यानी खूंटी से जयपाल सिंह चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।

1957 : चुनाव में झारखंड पार्टी के 34 विधायक व पांच सांसद चुनाव जीते। जयपाल सिंह खूंटी से पुन: जीत हासिल की।

1962 : झारखंड पार्टी के 22 विधायक व पांच सांसद जीते। खूंटी से तीसरी बार जीत हासिल की।

1963 : 20 जून को झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय।
-तीन सितंबर को राज्यपाल ने रांची में उपमुख्यमंत्री की शपथ दिलाई। पंचायत एवं सामुदायिक विकास विभाग का मिला प्रभार।

-2 अक्टूबर को मंत्री पद से हटाए गए। मात्र 29 दिन मंत्री रहे।
1966 : कांग्रेस से खूंटी सीट पर लगातार चौथी बार जीत हासिल की।

1970 : 13 मार्च को रांची में आयोजित झारखंड पार्टी के सम्मेलन में पार्टी में लौटने की सार्वजनिक घोषणा की।

-20 मार्च को उनका निधन।