दुनिया में फैलाया क्रिया योग: परमहंस योगानंद



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आज परमहंस योगानंद की जयंती है। उन्होंने पूरी दुनिया में क्रिया योग को फैलाया। खासकर, अमेरिका में स्थापित अपने आश्रम से लोगों को इस योग से परिचित कराया। अमेरिका में ही उनका निधन हुआ। इसका उन्हें पूर्वाभास भी हो गया था। ऐसे योगी थे, जिनके चेहरे पर मुस्कान मृत्यु के बाद भी बनी रही। उनके बाल काले ही रहे। वे सचमुच के योगी थी।

यूपी में जन्म, रांची ठिकाना

परमहंस का जन्म उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में पांच जनवरी, 1893 को एक बंगाली परिवार में उनका जन्म हुआ था। माता-पिता ने उनका नाम मुकुंद लाल घोष रखा। जन्म के कुछ समय बाद उनकी माता, उन्हेंं अपने गुरु लाहिड़ी महाशय के आशीर्वाद के लिए बनारस ले गईं। लाहिड़ी महाशय ने कहा, छोटी मां, तुम्हारा पुत्र एक योगी होगा। परम सत्य की खोज के क्रम में अपने गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरि जी के पास पहुंचे। सन 1915 में दस वर्षों के आध्यात्मिक प्रशिक्षण के बाद योगानंद जी ने संन्यास का स्वामी पद ग्रहण किया। परमहंस ने मार्च 1952 में अपना शरीर त्यागा।

रांची में योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया की स्थापना 1917 में परमहंस योगानंद ने की थी। सात मार्च, 1977 को उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी करते हुए भारत सरकार ने कहा था, 'उनका स्थान भारत के महानतम संतों में हैं। उनका कार्य लगातार बढ़ रहा है। उनकी कांति विश्व भर के सत्यान्वेषियों को ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग पर आकॢषत कर रही है।Ó युवकों की शिक्षा में परमहंस जी की गहन अभिरुचि थी। सन 1918 में कासिम बाजार के महाराज मणींद्र चंद्र नंदी ने रांची में अपने महल और पचीस एकड़ भूमि आश्रम एवं विद्यालय के लिए दान दे दी, जिसे योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय कहा जाता था। अब यह योगदा सत्संग शाखा मठ बन गया, जो पत्राचार कार्यालय एवं योगदा सत्संग पाठमाला एवं योगदा सत्संग सोसाइटी के प्रकाशनों के वितरण केंद्र का काम करता है। 1920 में उन्हेंं उनके गुरु ने अमेरिका में हो रहे उदारवादियों के विश्व धर्म सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि के रूप में भेजा। उस समय पूरे अमेरिका का दौरा किया और व्याख्यान दिया। 1936 में परमहंसजी ने योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया (वाइएसएस) को एक असांप्रदायिक और धर्मार्थ संस्था के रूप में पंजीकृत हुआ। वाइएसएस का पंजीकृत मुख्य कार्यालय योगदा सत्संग मठ है, जो दक्षिणेश्वर, कोलकाता में गंगा किनारे स्थित है।

रांची में बनाया आश्रम
रांची स्टेशन से थोड़ी दूर स्थित योगदा आश्रम शांति का परम धाम है। शहर के बीचोंबीच इस आश्रम में पहुंचने से शहर का सारा शोरगुल शांत हो जाता है। यहां आने पर लगता है, हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं, जहां सिर्फ शांति ही शांति है। प्रांगण की हरियाली, विभिन्न प्रकार के फूल खिलखिलाते हुए हर आंगतुक का स्वागत करते हैं और उन्हेंं सुकून बख्शते हैं। यहां वैसे तो हमेशा कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन शरद संगम कार्यक्रम सबसे बड़ा आयोजन होता है। यह शरद ऋतु में होता है।

कहां-कहां है आश्रम
कोलकाता, रांची, द्वाराहाट और नोएडा में आश्रम है। इनके अतिरिक्त योगदा सत्संग सोसाइटी के देश भर में दो सौ के करीब ध्यान केंद्र एवं मंडलियां हैं। विदेशों में 340 से ऊपर शाखाएं हैं। सालाना तेरह करोड़ रुपये की राशि दान के माध्यम से आती है और संस्था द्वारा संचालित कई जनहितकारी कार्यों में साढ़े बारह करोड़ रुपये खर्च हो जाती है। पूरे आश्रम का संचालन रांची से होता है जो 17 एकड़ में फैला है।

क्रिया योग का पुनरुत्थान

2012 में आश्रम में क्रिया योग की 150 वीं वर्षगांठ मनाई गई। परमहंस जी ने अपनी योगी कथामृत में एक अध्याय क्रियायोग विज्ञान के लिए समर्पित किया है। स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि यह वही विज्ञान है, जिसकी भगवान कृष्ण ने भागवतगीता में चर्चा की है और जिसका ज्ञान महर्षि पतंजलि को भी था। यह एक सरल मन:कायिक प्रणाली है, जिसके द्वारा मानव-रक्त कार्बन रहित तथा ऑक्सीजन से प्रपूरित हो जाता है। इस अतिरिक्त ऑक्सीजन के अणु जीवन प्रवाह में रूपांतरित होकर मस्तिष्क और मेरुदंड के चक्रों को नव शक्ति से पुन: पूरित कर देते हैं। प्राकृतिक नियम या माया के अंतर्गत मनुष्य की प्राण शक्ति का प्रवाह बहिॢवश्व की ओर होता है, जिससे उस शक्ति का प्रवाह इंद्रियों के दुरुपयोग के कारण व्यर्थ ही खत्म हो जाता है। मानसिक प्रक्रिया प्राण शक्ति अंतर्जगत की ओर बहती है और मेरुदंड-स्थित सूक्ष्म शक्तियोंं के साथ पुन: मिल जाती हैं। इस प्रकार प्राण शक्ति के प्रबलीकरण द्वारा योगी के शरीर तथा मस्तिष्क के कोष आध्यात्मिक अमृत से पुनर्नवीन हो जाते हैं। परमहंस जी ने कहा था, क्रिया योग गणित की तरह काम करता है। इसके परिणाम सुनिश्चित हैं।

सामाजिक दायित्व
योगदा सत्संग सोसइटी स्कूलों, कालेजों, अस्पतालों, डिस्पेंसरी तथा चिकित्सा शिविरों का संचालन करती है। पूरे भारत में योग्य विद्याॢथयों को छात्रावृत्तियां प्रदान करती है। अनाथालयों एवं कुष्ठ रोगियों की कालोनियों को सहायता प्रदान करती है। प्राकृतिक आपदाओं से ग्रसित लोगों की आपातकालीन सहायता भी उपलब्ध कराती है।

संन्यास प्रशिक्षण एवं विश्व प्रार्थना मंडल
1917 में योगदा सत्संग सोसायटी आफ इंडिया एवं 1925 में लॉस एंजिलिस में सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप के अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय की स्थापना के साथ जो कार्य शुरू किया गया, वह आज भी अनवरत जारी है। परमहंस जी की रचनाएं, उनके व्याख्यान, कक्षाएं, अनौपचारिक भाषण आदि का प्रकाशन के साथ-साथ, जिसमें क्रिया योग ध्यान पर विस्तृत पाठशाला शामिल है, यह सोसाइटी योगदा सत्संग, सेल्फ रियलाइजेशन मंदिरों, आश्रमों एवं ध्यान केंद्रों की देखभाल करती है, जो पूरे विश्व में फैले हुए हैं।

योगी कथामृत
योगी कथामृत परमहंस योगानंद के जीवन एवं उनकी शिक्षाओं की गाथा है। यह उनकी ऐसी आत्मकथा है, जिसका देश-दुनिया के सभी महत्वपूर्ण भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इसका पहला प्रकाशन 1946 में हुआ था। तब से हर साल यह छपता था। विश्व के कई विश्वविद्यालयों में यह पाठ्य पुस्तक के रूप में भी स्वीकृत है। इसे शताब्दी के श्रेष्ठतम सौ आध्यात्मिक पुस्तकों में चुना गया है। परमहंस के विलक्षण बचपन के अनुभव, किसी ब्रह्मज्ञानी गुरु की उत्साही खोज में सारे भारत भर के अनेक संतों एवं ज्ञानियों से मुलाकातें, अपने गुरु के आश्रम में 10 साल का प्रशिक्षण आदि का जिक्र बड़े सरल ढंग से किया गया है।