राधाकृष्ण जी और वे मुलाकातें



अनिता रश्मि

झारखंड साहित्य की पड़ताल राधाकृष्ण की चर्चा के बिना पूरी की ही नहीं जा सकती है। राधाकृष्ण जी ने विपुल साहित्य रचा है उपन्यास, कहानी, आलेख, नाटक, व्यंग्य विधाओं में। संपादक भी वे आला दर्जे के थे। उनकी ख्याति कथाकार के रूप में कैसी थी, यह हम सबको पता है।

प्रेमचंद भी इनकी कथाओं से बेहद प्रभावित थे। वे प्रेमचंद एवं उनकी पत्नी शिवरानी देवी के बहुत करीबी हो गए थे। प्रेमचंद ने राधाकृष्ण जी के बारे में कहा था कि जब भी कथाकारों की बात होगी, राधाकृष्ण पहले पाँच में शामिल रहेंगे।... कितनी बड़ी बात... यूँ ही नहीं कहा था। सामान्य जीवन, आर्थिक संकट से आक्रांत लेकिन साहित्य संपदा से लबालब भरे राधाकृष्ण जी की जन्म शती बीत चुकी है। हमें उनके बारे में नवीन पीढ़ी को सदा बताते रहना चाहिए। नहीं तो सब मेरे जैसा ही मूर्ख साबित होंगे। छात्र जीवन में उनसे मिलने का सुखदायी अवसर मिला था। जब-तब वे मुलाकातें याद आ ही जाती हैं।

हमारे विद्यालय में ही विद्यालय स्तरीय कविता पाठ का कार्यक्रम रखा गया था। एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक संस्था आयोजक था।

मैंने नेपाली की कविता का पाठ किया था -

कब बरसेगा रेती में घन
आली री बोलो तो...


वहाँ उपस्थित कुछेक महानुभावों के वक्तव्य सुने। एक सरल व्यक्तित्व के स्वामी अध्यक्षीय वक्तव्य देने के लिए खड़े हुए। बेहद सीधे, सच्चे, सरल से धोती-कुर्ताधारी उस व्यक्ति ने ध्यान खींच लिया। पतले-दुबले... लगभग क्षीणकाय वे बोलते रहे, हम सुनते रहे। प्रभावी उपस्थिति, प्रभावी वक्तव्य! सादे, सहज उद्बोधन में कुछ था, जो दसवीं की इस छात्रा को खींच रहा था।

दूसरी मुलाकात राँची के यूनियन क्लब, थड़पखना में उसी संस्था के द्वारा आयोजित सर्व भाषा वाद-विवाद प्रतियोगिता में। निर्णायकगण में वही सरल व्यक्तित्व सामने। मेरी बहुत तबीयत खराब थी, फिर भी तर्क रखते हुए अपनी बात रखी। वे गौर से सुनते रहे। दोनों में प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार का निर्णय उनके द्वारा ही। सच में कुछ था, जो अपरिचय के बावजूद उनसे जोड़ रहा था। यह कौन सा तार था आईएससी की छात्रा को समझ तो नहीं आया था लेकिन उनका परिचय जानने के लिए उत्सुक हो उठी।

पुरस्कार समारोह के अवसर पर किसी से पूछा था " वे कौन थे? आज आए नहीं? "
" आप नहीं जानतीं? वे लाल बाबू थे। नहीं आ पाए। "
" कौन लाल बाबू? "
" अरे! अपने राधाकृष्ण जी। आप उन्हें नहीं जानतीं? उन्हें सब लाल बाबू ही कहते हैं। "


आँखों में अपरिचय अब भी। लेकिन आँखों के समक्ष घूम गया उनका व्यक्तित्व। अरे! अभी तो ' सुरभि ' की साहित्यिक गोष्ठी में उन्हें अध्यक्षता के लिए आमंत्रित करने की बात डाॅ. ऊषा सक्सेना दी ने बताई थी। उनके बारे में और जानने की इच्छा बलवती हो गई। होती गई। पढ़ी थी कोर्स में उनकी व्यंग्य रचना ' अखबार में नाम ' इसने खूब हँसाया था। फिर तो जगह-जगह ढूँढकर पढ़ती रही लाल बाबू को। घोष-बोस-बनर्जी-चटर्जी के व्यंग्य को भी। राधाकृष्ण जी के व्यंग्यकार के लिए यह नाम शायद सही था। शुरूआत में इसी नाम से लिखते थे। एम. ए. में चल रहा था उनका उपन्यास रूपांतर। उसको बाद में पढ़ा।
अगली मुलाकात आकाशवाणी राँची में युवा वाणी में कविता पाठ कर बाहर आते वक्त गेट पर हुई। उन्होंने तत्काल पहचान लिया और देर तक हाल-चाल लेते रहे। विश्वास नहीं हुआ कि लगभग एक वर्ष बाद भी पहचान गए। अपरिचय की डोर थोड़ी ढीली हुई।

आकाशवाणी आने-जाने के क्रम में दो-चार मुलाकातों ने मन में उनके घर जाने की इच्छा जगा दी थी। उन्होंने पता देकर आने का निमंत्रण जो दिया था। मैंने पाया है कि राँची के जितने साहित्यकार थे, सबमें एक मासूम विनम्रता थी। बाकियों से तो बहुत बाद में भेंट हुई थी लेकिन उस समय एकमात्र कलमजीवी राधाकृष्ण जी से ही भेंट और उनकी वह सदाशयता, नम्रता, अपनापन...। उनके विपुल साहित्य से उन दिनों मुलाकात नहीं हो पाई थी पर बहुत नाम सुना। बहुत काम किया है उन्होंने। आकाशवाणी से लेकर फिल्म की ओर भी रूख किया।

निर्भीक लाल बाबू स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलनकारियों के प्रति भी उतने ही उदार थे। उनके घर पर आंदोलनकारी भोजन करते थे। कई बार परचे का मजमून लिखते। उसे ही बागी लोग बाँटते थे। रोटी आदि बनाकर घर से दी जाती। बागियों ने अपने हथियार, बमादि भी उनके घर में छुपाकर रखे। कितना खतरा था पर लाल बाबू हर खतरे को उठाने के लिए सहर्ष तैयार थे। मतलब स्वतंत्रता आंदोलन में भी उनका योगदान अप्रतिम था। ऐसे व्यक्तित्व से मिलना सच में बेहद सुखद था।

एक मुलाकात की याद अब तक जेहन में है -

स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आकाशवाणी के एक कार्यक्रम से लौटते हुए रास्ते में पड़नेवाले उनके घर पहुँच गई।
अब भी याद है, सफेद खपरैल का सामान्य मकान, कुछ सीढ़ियाँ, फिर छोटा सा बरामदा, बाईं तरफ एक कोठरी, कोठरी में एक चौकी और चौकी पर लेटे राधाकृष्ण जी... एक बड़े रचनाकार, संपादक, प्रेमचंद के चहेते। मैं चौकी पर ही बैठ गई। वे बहुत बीमार थे। कभी खाँसी, कभी हँफनी। फोन का जमाना तो था नहीं। अतः समय लेकर नहीं, अपनी सुविधानुसार गई थी... एक पंथ, दो काज... फिर भी वे बात करते रहे। आत्मीयता ऐसी कि
" तुम चर्च रोड में रहती हो, वहाँ से आई हो? मैं कई बार गया हूँ। वहाँ मेरे एक परिचित हैं... शरद बाबू...। "
"... वे मेरे चाचा हैं। ठीक घर के सामने रहते हैं। "
" अरे वाह! भई, तुम तो अब मेरी अपनी हुई। "
उन्होंने वैसी रूग्णावस्था में भी अपने बेटे शिशिर जी से मिलवाया। बेटी रीता के बारे में बताया कि वह यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करती है। अभी काॅलेज गई है। थोड़ी देर और रूको, मिलकर जाओ। "
" आप बीमार हैं। फिर मिल लूँगी। आराम करें।
" नहीं। बैठो थोड़ी देर। अच्छा लग रहा है। तुमने बीएससी पास किया है ना, बाॅटनी लेकर आगे भी पढ़ाई करो। पी जी में मेरे परिचित हैं। मैं कह दूँगा। "
ऐसी आत्मीयता कि एक सामान्य छात्रा अभिभूत।
" आपका इंटरव्यू लेने की मेरी बहुत इच्छा है। एक फोटो भी साथ में खिंचाना चाहती हूँ। "
" हाँ! हाँ! मैं भी। मैं आऊँगा चर्च रोड, तब खिंचा लेंगे साथ। "
कैमरा था नहीं, उन दिनों मोबाइल का साथ नहीं। अतः उस वक्त को भविष्य पर टाल दिया।
हाँ आग्रह पर मेरी डायरी में उन्होंने हस्ताक्षर किए। मोतियों से अक्षर... थोड़ा खींचकर लिखा " राधाकृष्ण!
" अब मुझे चलना चाहिए। "

उनसे अनुमति लेकर बाहर आ तो गई पर वे देर तक साथ रहे। फोटो में साथ होने की अधूरी कामना अधूरी ही रही। उनकी बीमारी बढ़ती गई। और एक वर्ष बाद 1979 में खत्म... सब खत्म! जैसे एक अध्याय का अंत। जैसे एक युग का अंत। लेकिन वह अंत कहाँ, शुरुआत थी। साहित्यकार अपनी रचनाओं में, अपने कर्म में जिंदा रहते हैं। उनके बाद अनेक साहित्यप्रेमियों ने उन्हें पहचाना। राँची एक्सप्रेस ने राधाकृष्ण साहित्य पुरस्कार योजना आरंभ किया, जिसमें झारखंड के नामचीन लेखक सम्मानित किए गए। शोध ग्रंथों में उनकी चर्चा आम है।

देर से सही अनेक पत्रिकाओं के राधाकृष्ण विशेषांक आए। श्रवण कुमार गोस्वामी जी, भारत यायावर जी सहित कईयों ने उनके योगदान को पुस्तकों में समेटा। पर राष्ट्रीय फलक पर उनकी जन्मशती चुपचाप गुजर गई, यह बहुत तकलीफदेह है। हाँ, जसम ने राँची में धुमधाम से मनाया।

मेरे मन में एक कील गड़ी रह गई कि हम साथ तस्वीर नहीं खींचा पाए। वे मेरे घर चर्च रोड नहीं आ पाए। सालों तक वह डायरी जगह-जगह साथ चलती रही। चतरा, संथाल परगना के बरहरवा, राँची, पाकुड़...वही मोतियों सा अक्षर... वही राधाकृष्ण का विस्तार!

लेखिका के कई महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं कविता और कहानी में भी सक्रिय। रांची की रहवासी।