साहित्य-संस्कृति के अप्रतिम योद्धा



गिरिधारी राम गौंझू ' गिरिराज '

अपने जीवन काल में जब कोई असाधारण कार्य कर जग को चकित व विस्मित कर लेता है तो दुनिया उसे असाधारण व्यक्तित्व के रूप में मानती है । डॉक्टर बी पी केशरी जी की जन्मभूमि पिठोरिया 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को पकड़वाने और कर्नल डाल्टन आदि अंग्रेजों को सुरक्षित भगाने के कारण इतिहास में बदनाम रहा है। इस कलंक को धोने का काम डॉ. केशरी ने किया है।

इसी पिठोरिया, रांची में 1 जुलाई 1933 को कृषक केशरी परिवार में केशरी जी का इस धरती में आगमन हुआ था। माता थी लगन देवी और पिता थे शिव नारायण साहू। पिठोरिया परगना बड़ा ही व्यवस्थित गांव था ।जातियों में विभाजित टोले और समुचित व्यवस्था व सुविधाएं थीं। आरंभिक अध्ययन पिठोरिया में ही केशरी जी का हुआ गांव के मौलवी और पंडित मृत्युंजय नाथ शर्मा इनके स्मरणीय प्रारंभिक गुरु रहे। पतरातू डैम के बनने से इनकी खेती की जमीन डूब गई । आर्थिक अभाव में इनकी राँची जिला स्कूल, राँची कालेज एवं एम ए हिन्दी की. पढाई पूरी हुई। संत पॉल स्कूल रांची में हिंदी व भूगोल के शिक्षक रहते एम ए हिन्दीमें प्रथम स्थान प्राप्त कर जी एल ए कॉलेज डाल्टनगंज अब मेदनीनगर में हिंदी के लोकप्रिय प्राध्यापक हो गए। पढ़ाने की कला ऐसी थी कि हिंदी के अलावे दूसरे विषय के विद्यार्थी भी इनकी कक्षा में इनके अध्यापन कौशल का लाभ लेने लगे थे।

अपने अध्ययन - अध्यापन काल में पिठोरिया के बदनाम गांव होने का पता चला तो इन्हें गहरा आघात लगा । मन ही मन में लगा इस बदनाम गांव को सुनाम में कैसे बदलें ? कि लोग मेरे कर्मों से पिठोरिया को जाने और बदनाम पिठोरिया परगनैत को लोग भूल जाएं। मन में ठान लिये तो ठान लिये। हर कीमत पर इसे वे स्थापित करने में प्राण प्रण से लग गए। इसके लिए इन्होंने तीन रास्ते अपनाए ।

डॉ. केशरी ने दूसरा महत्वपूर्ण कार्य किया नागपुरी लोक गीत की एक कड़ी " अंबा मंजरे मधु मातलैं रे , तइसने पिया मातल जाए रे " के काव्य सौंदर्य ने इनको विस्मित कर दिया। गांव के गँवारी नागपुरी लोकगीतों में काव्य शास्त्र की समस्त विशेषताओंसे परिपूर्ण, भाव, रस, छंद ,अलंकार, गुण एवं सौंदर्य का समावेश है तो क्या बाकी नागपुरी लोकगीतों में कैसा और कितना होगा ? बस, फिर क्या था, लग गए नागपुरी लोकगीतों के संग्रह के लिए तन मन से। गांव-गांव ,अखरा-जतरा रसिको, गायक कलाकारों आदि से मिल कर 1970 के पूर्व तक 500 कवियों को खोज निकाला और एक सूची प्रकाशित की -- नागपुरी कवि मनक सूची । इनकी रचनाओं और इनके परिचय से इनका निजी पुस्तकालय अटा-पटा है। इसका प्रकाशन बृहद ग्रंथ के रूप में नागपुरी कवि और उनका काव्य के रूप में हुआ। इसे प्रो. वीर भारत तलवार नागपुरी साहित्य का इतिहास ही मानते हैं नागपुरी के इन लाखों गीतों के संग्रह के आधार पर प्रो. केशरी ने डॉ. सच्चिदानंद चौधरी के शोध निर्देशन में नागपुरी गीतों में शृंगार रस विषय पर पीएच.डी. की। नागपुरी एक समृद्ध, संपन्न ,प्राचीन एवं महत्वपूर्ण भाषा को पूर्णता से स्थापित कर दिखाया । इतना विराट कार्य एक व्यक्ति द्वारा पूरा कर पाना अपने आप में अद्वितीय कार्य ही कहा जाएगा ।

गोस्सनर कॉलेज , राँची के संस्थापक प्राचार्य डॉ निर्मल मिंज के साथ हीडा. बी पी केशरी, जी एल ए कॉलेज , डाल्टनगंज में नागपुरी, मुंडारी और उरांव (कुडुख) का अध्ययन-अध्यापन राँची विश्वविद्यालय, रांची में आरंभ करने वाले सदैव स्मरणीय रहेंगे । झारखंड की मातृभाषाओं की पढ़ाई प्राथमिक विद्यालय स्तर से विश्वविद्यालय स्तर तक करने के आंदोलन 1912 से छोटानागपुर उन्नति समाज , आदिवासी महासभा, झारखंड पार्टी आदि के द्वारा एवं मरङ गोमके जयपाल सिंह, योगेंद्रनाथ तिवारी,बड़ाईक ईश्वरी प्रसाद सिंह, राधाकृष्ण, सुशील कुमार बागे डा. बी पी केशरी,डा.श्रवणकुमार गोस्वामी, प्रफुल्ल कुमार राय,जगतमणि महतो आदि ने धारदार आंदोलन किया।

1971- 73 में नागपुरी, मुण्डारी व उराँव भाषाओं से आरंभ किया गया। आगे चल कर 7 भाषाओं नागपुरी, मुंडारी , उरांव , खड़िया, संताली, हो के बाद कुरमाली, पंचपरगानिया , खोरठा की पढ़ाई क्रमश: 50 अंक से आरंभ कर100, 200, 300 फिर ऑनर्स के 800 अंकों की पढ़ाई 1982 तक होने लगी ।

रांची विश्वविद्यालय, रांची में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग खुलवाने का श्रेय डॉ. केशरी को जाता है। शारदा प्रसाद शर्मा की दो नागपुरी गीतों की पुस्तक --भगवान एक पूरब के और विप्लवी महान के लोकार्पण के अवसर पर लोकार्पणकर्ता दक्षिणी छोटानागपुर के कमिश्नर सह रांची विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ कुमार सुरेश सिंह से उक्त विभाग खोलने का विनम्र अनुरोध डॉ. केशरी ने किया। इसे कुमार सुरेश सिंह ने स्वीकार कर लिया और उन्होंने कहा --मैंने विभाग खोल दिया उसका डायरेक्टर कौन होगा ? मैं वहां उपस्थित था । मेरे मुख से तब डा.रामदयाल मुंडा का नाम निकल गया, जिसे डॉ. कुमार सुरेश सिंह ने स्वीकार कर लिया। दूसरे नाम पर डॉ निर्मल मिंज ने भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के डिप्टी डायरेक्टर, डा. फ्रासिस एक्का का नाम लिया। ये भी स्वीकृत हुआ। तीसरे नाम पर डा. बी पी केशरी का नाम पी के राय ने लिया। सर्वसम्मति से तीनों नाम स्वीकृत हो गये। डॉ.कुमार सुरेश सिंह ने दूसरे दिन इन सब को अपने आवास पर बुलाकर आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर ,विभाग खोल दिया।

6-8-1980 को डा. बी पी केशरी ने जी एल ए कालेज डालटेनगंज से आ कर योगदान दिया ।15-6-1981 को डा. राम दयाल मुण्डा नेअमेरिकी विश्वविद्यालय के अध्यापन को त्याग कर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग राँची विश्वविद्यालय, राँची में अध्यक्ष एवं प्रोफेसर के रूप में योगदान दिया। डा.फ्रासिस एक्का अध्यक्ष पद पर ही आना चाहते थे।जो संभव न हो सका। तैयार नया विभाग झारखंडी भाषाओं की पढ़ाई आरंभ कर दी।

केशरी जी का तीसरा सबसे असाधारण कार्य रहा झारखंड आंदोलन के बिखरते स्वरूप को बौद्धिक दिशा देने का। डाल्टेनगंज में रहते केशरी जी ने जय झारखंड के द्वारा1972 से 78 तक नागपुरी भाषा- साहित्य, कला- संस्कृति, इतिहास एवं झारखंड आंदोलन को सकारात्मक दिशा देने का काम किया । तब डॉ. केशरी झारखंड पार्टी के उपाध्यक्ष थे और एन ई होरो उसके अध्यक्ष। झारखंड आंदोलन की वास्तविकता ,22 जिलों का झारखंड ही क्यों? , झारखंडी भाषाओं की समस्याएं एवं समाधान, मैं झारखंड में हूं, झारखंड की कुछ जरूरी बातें आदि पुस्तकों का प्रकाशन हुआ।झारखंड विषयक व्याख्यान समय- समय विभिन्न संगोष्ठियों केशरी जी देते रहे। पुस्तकों तथा पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से झारखंड आंदोलन की दलाली संस्कृति से मुक्त करने का प्रयास करते रहे। झारखंड समन्वय समिति के संयोजक के रूप में डॉ केशरी के योगदान को अभूतपूर्व तो कहा ही जा सकता है । झारखंड विषयक समिति के सदस्य के रूप मेंडा. मुंडा के साथ केंद्र सरकार से जो बातें स्पष्ट रूप से पहली बार रखी गई मौखिक और लिखित रूप में वह प्रभावी रहा। झारखंड के अविराम शोषण को समझने के लिएये सारे कार्य पर्याप्त थे। जिसने आगे चलकर अलग झारखंड राज्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

झारखंड का प्राचीन इतिहास यहां के सदान-आदिवासियों की सामाजिक समरसता- सहभागिता का इतिहास रहा है ।यहां हजारों वर्षों से आदिम साम्यवाद की व्यवस्था कायम थी ।कुछ वर्षों पहले झारखंड बनने के पूर्व गांव घरों में ताले नहीं लगते थे। लोग ईमानदार, मेहनती, नृत्य-संगीत के अनन्य प्रेमी,उत्सवधर्मी समाज, शोषण मुक्त, आडंबरहीन सामूहिक जीवन था। इसे उजागर किया केशरी जीने। सदान-आदिवासियों का इतिहास कभी रक्त रंजीत नहीं रहा। हर बाहरी आने वाले को झारखंडियों ने कोना और दोना देकर स्वागत किया सहिया मिता एवं मदइती की सामाजिक समरसता झारखंड को आज भी बांधे हुए है। ऐसे इतिहास को जागृत करने वाले केशरी ने अंतिम समय में वामपंथी विचारधारा अपना लिए। झारखंड के सामाजिक, राजनीतिक, भाषिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक जगत में किए गए । इनके कार्य असाधारण रहे। यशस्वी लेखक, चिंतक, कवि और राजनीतिज्ञ लोग इन्हें मानते थे।

इसके अतिरिक्त आंतरिक उपनिवेश, वैश्वीकरण, विश्व बाजार, विश्वग्राम आदि के मकड़जाल में झारखंड का भरपूर शोषण जारी है। अमेरिका में रेड इंडियनों को समाप्त कर पूरा यूरोप अमेरिकी बन बैठे हैं।वैसे ही झारखंड में भी हो रहा है। झारखंड की भाषा- संस्कृति आज बाहरी दबाव में शून्य की ओर बढ़ रही है।

डॉ. केशरी का व्यक्तित्व बहुआयामी व बहुमुखी रहा है।वे जितने अच्छे शिक्षक थे उतने ही अच्छे लेखक और सामाजिक संगठन कर्ता,एवं कुशल वक्ता थे।बीते अपने अंतिम समय में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने पिठोरिया में नागपुरी संस्थान खोलकर झारखंडी भाषा-साहित्य, कला- संस्कृति, इतिहास , सामाजिक व राजनीतिक स्थिति को दिशा देने का अद्भुत कार्य किया है। इनकी लगभग 40 से अधिक पुस्तकें इनके असाधारण कार्य के साक्षी हैं । 14 अगस्त 2016 को इन्होंने इस धरती से हमेशा के लिए विदा ले लिया।