करम पर्व की कथा



चौराहा टीम

प्रकृति पर्व करम भादो एकादशी को मनाया जाता है। इस बार 29 अगस्त को है। करम भाई-बहन के प्रेम का पर्व भी माना जाता है। बहनें अपने भाइयों की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखकर पूजा करती हैं। करम राजा से खेतों में अंकुरित बीज की रक्षा की भी कामना की जाती है। देर शाम पाहन अखरा में करम-धरम की कथा सुनाते हैं। इस दौरान नृत्य संगीत का कार्यक्रम होता है। रात भर करम डाली के पास पूजा-अर्चना की जाती है।

दो भाई की कथा
पूजा में दो भाई करम और धरम की कथा सुनाई जाती है। मान्यता के अनुसार करम-धरम दोनों भाई बहुत मेहनती व दयावान थे। समय बीता करम की शादी हो गई। उसकी पत्नी अधर्मी और दूसरों को परेशान करने वाली विचार की थी। यहां तक कि वह धरती मां के ऊपर ही माड़ पसा देती थी जिससे करम को बहुत दु:ख हुआ। पत्नी के इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर एक दिन घर छोड़कर चला गया। करम के घर से जाते ही घर का भाग्य भी चला गया। गांववाले दरिद्र होकर दुखी रहने लगे। वहीं, लोगों की परेशानी धरम को सहन नहीं हुआ। भाई करम को खोजने का प्रण लेते हुए गांव से निकल पड़ा। कुछ दूर चलने पर उसे प्यास लगी लेकिन आस पास कहीं पानी का नामोनिशान नहीं था। कुछ दूर और चलने पड़ एक नदी दिखाई दी। वहां पहुंचा तो उसमें भी पानी नहीं था। वह काफी दुखी होकर वहां से जाने लगा। इसपर नदी ने कहा कि जबसे करम गया है हमारा भाग्य नास हो गया है। इसी प्रकार आगे आम का पेड़ मिला जिसका सारा फल सड़े हुए थे। आम पेड़ ने भी यही कहा कि करम के जाने के बाद से ही उसका यह हश्र हुआ है। करम मिले तो हमारी पीड़ा जरूर बताएं। फिर आगे एक वृद्ध मिला उसने बताया कि जब से करम गया है उसके सिर से बोझ उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। तीन-चार लोग भी सिर से बोझ नहीं उतार पा रहे हैं। मेरी बात करम को जरूर बताना।

इसी प्रकार जैसे-जैसे आगे बढ़ा पूरा प्रकृति करूण क्रंदन करता प्रतीत हुआ। सबकी एक ही कहानी। धरम आगे बढ़ा, चलते चलते एक रेगिस्तान में जा पहुंचा। वहा उसने देखा की करम धूप व गर्मी से परेशान है उसके शरीर पर फोड़े परे हैं और वह ब्याकुल हो रहा है। धरम से भाई की हालात देखी नहीं गई और घर वापस लौटने की जिद करने लगा। धरम ने वचन दिया कि आज के बाद कोई धरती पर गर्म माड़ नहीं फेंकेगा। इसके बाद करम वापस घर लौटा। रास्ते में नदी, आम के पेड़, कष्ट में पड़े वृद्ध सबसे करम ने यही कहा कि दूसरों का भला नहीं करने के कारण ही उसे यह पीड़ा मिली है। आगे ऐसा कभी मत करना।

शिकारी से किसान बनने का पर्व

मान्यता है कि करम पर्व को जनजातीय समाज के शिकारी जीवन से कृषक जीवन में प्रवेश के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इसमें करम वृक्ष को देवता तुल्य मानकर उसकी डाली की पूजा-अर्चना की जाती है। एक कहानी यह भी है कि मनुष्य को शिकारी से किसान बनने की सीख कुंवारी बच्चियों ने ही दी थी, इसलिए करम पर्व में कुंवारी कन्याओं का विशेष महत्व है।