ब्रह्मपुत्र के पार, बादलों के बीच



अजय शुक्ल

नाहर सिंह भंडारी। मेरा दोस्त। पता नहीं, कहां है? है भी या नहीं! यह भी नहीं जानता। सब जगह ढूंढ़ा था मैंने उसे। अंत में उसके ऑफिस भी गया। सीडब्ल्यूई आफिस, एसई फॉल्स, शिलॉन्ग। एस ई यानी स्प्रेड ईगल। यह बात कभी नाहर ने ही बताई थी...गोरालेन के आगे एक झरना है जो पंख फैलाए ईगल की तरह लगता है...उसी के बगल में है मेरा आफिस।
नाहर के बॉस कर्नल बलजीत सिंह सिद्धू का कमरा खुला हुआ था। मैंने हाथ उठा कर अनुमति मांगी। "येस, कम इन" कर्नल ने मुझे अंदर आने की परमिशन दे दी।
"सर" मैं कर्नल सिद्धू से मुखातिब था, "सर, कैप्टेन नाहर सिंह भंडारी...।"

"क्या...क्या-क्या" कर्नल सिद्धू नाहर का नाम सुनते ही हड़बड़ा कर खड़े हो गए। "आप भंडारी के घर से आए हैं?"
"नहीं, मैं भंडारी का दोस्त हूं। पटना से आया हूं। सुनील साव...दरअसल छह जून तक वह मेरे साथ पटना में ही था।"
मेरे इतना कहते ही कर्नल की आंखों में एक फ़ौज़ी की सख्ती आ गई। "सचसच बताओ–हू आ यू...मेरा ऑफिसर 15 मई से लापता है और तुम बताते हो कि वह आपके साथ पटना में था..मिस्टीरियस!" वे मुझको घूर रहे थे। उनकी आवाज़ कड़क थी।


"कर्नल साब, आपको शक़ करने का हक़ है। पर मैं कोई किडनैपर या मर्डरर नहीं। वी ग्रू-अप टुगेदर–मी एन भंडारी। बीटेक भी साथ-साथ, रुड़की से। मैं भी असिस्टेंट एनजिनिअर हूं। पीडब्ल्यूडी बिहार।"

"आयम सॉरी मिस्टर साव" मेरी बात और ओहदे से फ़र्क़ पड़ा। कर्नल बोले, "आप पूरी बात बताइए। भंडारी आपका दोस्त है तो मेरा भी बच्चा है। हीज़ प्रिटी यंग। मैं भी उसे ढूंढ़ने में जी-जान से लगा रहा हूं। देखिए यह चिट्ठी मैंने हेडक्वार्टर्स को भेजी है।" उन्होंने एक फाइल खोलकर मेरे आगे रख दी। उसमें लिखा था:
कैप्टेन एनएस भंडारी, एएसडब्ल्यू हैज़ नॉट रिपोर्टेड टु वर्क सिन्स मे 15, 1979...हिज़ फ्लैट हैज़ बीन फाउंड लॉक्ड फ्रॉम आउटसाइड। वी ट्राइड टु ट्रैक हिम डाउन ऐट हिज़ गढ़वाल एड्रेस आल्सो। ही वाज़ नॉट देयर, आइदर। हिज़ पेरेंट्स निउ नथिंग एक्सेप्ट दैट ही लेफ्ट देम फोर मन्थ्स बैक।
"कर्नल साब" मैंने कहा, "भंडारी का एक कज़िन बिल्लू बैंगलोर में पढ़ाता है।...क्या आपका फोन...?"

"बिल्कुल, आप नम्बर बताइए..मैं ट्रंककॉल बुक कर देता हूं।"
क़रीब पौन घंटे बाद कॉल कनेक्ट हो पाई। मैंने बात की। वह बिल्लू भइया से तीन साल से नहीं मिला था। चिट्ठी भी नहीं डालता–उन्होंने बताया। इस बीच कर्नल साहब ने चाय और सैंडविच मेज़ पर लगवा दिए।

"हां, मिस्टर साव, आप अपनी बात पूरी नहीं कर पाए थे" कर्नल सिद्धू ने नैपकिन से मुंह पोछते हुए कहा। अर्दली बर्तन उठाने आ गया था। चाय का आखिरी घूंट भरकर मैंने भी अपना कप उसे थमा दिया और कर्नल साहब की ओर मुखातिब हो गया।
"मैं कह रहा था सर कि भंडारी छह जून तक मेरे साथ था। वह बीमार था और उसी हालत में शिलॉन्ग लौटने की रट लगाए था..."

"बीमारी क्या थी?" कर्नल ने कुर्सी पर पहलू बदलते हुए पूछा।
"मैं उसी पर आ रहा था...भंडारी जब मेरे पास आया तो उसे बुखार था। दो डिग्री से एक पॉइंट ज़्यादा। रात काफी हो चुकी थी इसलिए मैंने मेटासिन की गोली देकर लिटा दिया था। वह तुरन्त ही सो गया था। नींद में वह थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ बड़बड़ाने लगता..."

"क्या?"
"बस एक नाम बड़बड़ाता–लिज़ी, कभी कहता, लिज़ माय डार्लिंग। सुबह उसको बुखार नहीं था। मैंने जगाया तो वह आंख खोलते ही फूटफूट के रोने लगा। फिर मुझसे लिपट गया। सुबकता रहा...मुझे बचा लो सुनील...मैं मर जाऊंगा... बचा ले दोस्त। उसके चेहरे पर एक किस्म का खौफ और आंखों में चौकन्नापन था, मानो उसे किसी हमले का अंदेशा हो।...."
बोलते-बोलते मुझे नथुनों में अचानक लैवेंडर जैसी भीनी-भीनी खुशबू का अहसास हुआ। मैं रुक गया। एक लंबी सांस खींची और कर्नल साहब की तरफ देखने लगा।


"वॉट हैपेन्ड? रुक क्यों गए?" उन्होंने पूछा।
"कैन यू स्मेल सम फ्रेग्रेन्स...सॉर्ट ऑव लैवेंडर?"
"न तो। बिलकुल नहीं। आपको पाइन की महक आ रही है। पाइन की खुशबू यहां हर वक़्त हवा में रहती है... "
लैवेंडर की खुशबू मेरे फेफड़ों तक समाई जा रही थी। मैंने एक बहुत गहरी सांस ली और खुशबू की दिशा भांपने लगा। और मुझे सोर्स मिल गया: महक मेरे बराबर रखी कुर्सी से आ रही थी। मैंने कुर्सी के कुशन पर हाथ रख दिया। कुशन गर्म था। मैं एकबारगी उठा और लॉन्ग जम्प मारकर कमरे के बाहर आ गया।
"क्यों, क्या हुआ मिस्टर साव?" कर्नल साहब भी फुर्ती से मेरे पीछे बाहर आ गए, "बात क्या हुई? उन्होंने पूछा।

"सिद्धू साब, महक बगल में रखी कुर्सी से आ रही थी"
शिलॉन्ग के ठंडे, खुशनुमा गरमी के मौसम में मेरा चेहरा पसीने से नहा गया था। कोट के नीचे शर्ट का कॉलर गीला था। दूसरी, ओर कर्नल साहब मेरी बात पर ठहाका मारकर हंस रहे थे, ''यू बिहारीज़..यू आ इम्पॉसिबल... कुर्सी से खुशबू आ रही है!! हाहाहा...हाहाहा...अरे उस सीट पर कल मिसेज़ कल्याणी कुलकर्णी बैठी थीं। यूनिवर्सिटी, 'नेहू' में फिजिक्स पढ़ाती हैं। खुशबुओं से लबरेज़ थीं..लग रहा था मानो शनेल की दुकान की सारी शीशियां उड़ेल ली हों।....हां, तो तुम बता रहे थे कि वह रात भर बड़बड़ाता रहा। फिर?"

"आगे दोपहर में भोजन के बाद वह फिर उलझन करने लगा। बोला–मैं शिलॉन्ग जा रहा हूं, अभी। साफ था वह मेंटली अनस्टेबल था। इसीलिए उसको मैं पटना में डॉ आरपी सिंह के पास ले गया। वे पटना के बेस्ट सायकायट्रिस्ट हैं। उन्होंने ट्रैंक्विलाइज़र देकर शांत कर दिया था। डॉक्टर ने अगले दिन बुलाया था। कहा था, बात करके मामला समझेंगे। डॉक्टर ने कहा, तीन या चार सेशन में ठीक हो जाएगा"
"फिर?"

"फिर डॉक्टर के पास जाने की नौबत ही नहीं आई। सुबह जब मैं जाग तो भंडारी घर में नहीं था। वह मुंह अंधेरे ही भाग गया था।"
"ह्म्म्म" कर्नल साहब बोले,"अब आप बता रहे हैं तो मुझे भी याद आ रहा है। दरअसल, वह अज़ीब ढंग की हरकतें करने लगा था। एक बार लगा कि वह ड्रग्स लेने लगा है। लेकिन यह मुमकिन नहीं लगा क्योंकि वह सिगरेट भी नहीं पीता था। दारू भी कभी नहीं। एकदम टीटोटलर। एक बड़ा बदलाव यह था कि उसने भोजन के लिए ऑफिसर्स मेस आना क़तई बन्द कर दिया...जबकि वह बैचलर था।"
"तभी तो वह इतना दुबला हो गया था। डॉक्टर ने वज़न लिया था। सिर्फ 60 किलो निकला था। पांच-दस हाइट के लिए यह बहुत कम है।"

"गलती मेरी। मैंने उसकी हरकतों को जितना सीरियसली लेना चाहिए था, नहीं लिया। और तो और एक रात मुझे शिलॉन्ग बाहरी बस्ती लाबांग में मिला। जंगल की स्टीप चढ़ाई चढ़ कर शिलॉन्ग पीक की तरफ जा रहा था। मैं एक पार्टी के बाद अपने एक सिविलियन ऑफिसर को छोड़ने गया था। बन्दा वहीं दिख गया। लंबे-लंबे डग भरते हुए वह पहाड़ी जंगल की तरफ जा रहा था। मैंने टोका तो बेवकूफों की तरह खीसें निपोर कर हंसने लगा।
बोला, " आयम गोन्ना सी माय गाल।"
"ओये, खोत्ते वहां जंगल में कौन सी गर्लफ्रेंड बैठी है?" मैंने कहा तो वह लंबे-लंबे कदमों से भागने लगा। अंधेरे में गुम होने से पहले वह एक बार रुका और पलटकर बोला, " डोन यू वरी सर...आय थिंक आयम डेटिंग अ भूत..आय विल बी फाइन।"
मुझे उसे रोक लेना चाहिए था। कर्नल साहब अचानक बड़े उदास हो उठे।
हम दोनों खामोश हो चुके थे। आदान-प्रदान के लिए अब कोई जानकारी नहीं बची थी। इस बीच दोपहर टूट कर शाम की ओर बढ़ रही थी। देश के इस हिस्से में सूरज एक घण्टे एडवांस चलता है। कर्नल साहब ने अपनी घड़ी पर नज़र डाली।"ओह, इट्ज़ थ्री ऑलरेडी। मस्ट हरी होम" कर्नल साहब मुझे देखते हुए बोले, "मिस्टर साव, चलिए घर चलते हैं। बी माय गेस्ट दिस ईवनिंग। खाना खाकर ...यस कहां ठहरे हैं आप?"

"नो, थैंक यू सिद्धू साहब। मेरा कमरा बुक है। होटल पाइनवुड, पोलीस बाज़ार..कल मिलता हूं न आपसे..ओके?"
"जैसा उचित समझें" कर्नल बोले, "पर पोलीस बाज़ार दूर है। मेरी जीप से चले जाइए।"
थोड़ी देर में दो जीपें आ गईं। एक जीप मुझे बिठा कर शिलॉन्ग की ऊंची लहरों की तरह उठती-गिरती सड़कों पर दौड़ चली। गोरा लेन, लोअर नोंग्रिम हिल, लाईमुखड़ा और डॉन बॉस्को होते हुए जीप किस क्षण होटल पाइनवुड आ गई मैं जान ही न पाया। मैं आंखें बंद कर अपने दोस्त नाहर भंडारी की चिंता में डूबा था। ऐसा लग रहा था कि वह या तो पागल होकर किसी शहर में बच्चों के पत्थर खा रहा है और या फिर....। उसके मरने की बात सोचना भी गवारा न था मेरे मन को।

नाहर यानी हम लोगों का नैरी। नवीं, दसवीं ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई हम दोनों ने एक साथ की थी। दानापुर कैंट के केंद्रीय विद्यालय में। उसके पिता भी फ़ौज़ी अफसर थे और तीन साल दानापुर तैनात रहे थे। जब हम लोग 12वीं क्लास में थे तब उनका तबादला हो गया था और नाहर उसके बाद एक साल तक मेरे घर पर रहकर पढ़ा था। वह फुटबॉल का बढ़िया खिलाड़ी था। लड़कियों में बहुत लोकप्रिय था। 12वीं क्लास में उसे भी एक लड़की से इश्क हो गया था। रूथ सेसिल। यही था उसका नाम। उससे मिलने के लिए वह संडे मास में भाग लेने लगा था। सेंट ल्यूक चर्च स्कूल के पीछे गंगा नदी के पास था।

नाहर की यादों की चेन तब टूटी जब फ़ौज़ी ड्राइवर को मुझे ज़ोर से हिलाकर चौथी बार कहना पड़ा कि होटल आ गया है। मैं हड़बड़ा कर उतरा और थैंक यू बोलकर होटल के भीतर चला गया और रिसेप्शन के आगे खड़ा हो गया। "टू ओ थ्री" नाम बताते ही रिसेप्शनिस्ट ने कमरे का नम्बर बताया और एक लड़का मेरी अटैची लेकर सीढ़ी चढ़ने लगा।
बड़ा खूबसूरत था 203 नम्बर कमरा। सबसे अच्छी बात उसकी खिड़की थी। बहुत बड़ी। खोलने पर नीचे घाटी का दिलकश नज़ारा। खिड़की खोलते ही पाइन की खुशबू से महकती हवा कमरे में भर गई। सूरज बिलकुल अभी-अभी डूबा था लेकिन आफ्टर-ग्लो ने वैली में कुछ लम्हों के लिए उजास भर दिया था। मैंने खिड़की के बराबर कुर्सी डाल ली और सर्विस बेल दबा दी।

"येस सर" बेयरा तुरन्त हाज़िर हो गया।
"गेट मी शीवस रीगल, बॉटल–फुल।"
"सैलड ऑर सम अपेटाइज़र....।"
"नो, जस्ट द स्कॉच एंड सम सोडा..नॉउ हरीअप।"
मैं दारू का इंतजार करने लगा और आंखें बाहर के नज़ारे जज़्ब करने लगीं। खिड़की के नीचे घाटी में बादलों के टुकड़े तैर रहे थे। दो टुकड़े ऊपर को चढ़ रहे थे। तभी पाइन की खुशबू के बीच मुझे फिर मुझे लैवेंडर की महक का अहसास हुआ। मुझे पहली बार डर महसूस हुआ। यह वही नशीली महक थी जो दोपहर में कर्नल के कमरे में रखी कुर्सी से आ रही थी।
"सर, योर ड्रिंक" बेयरा बोतल और ग्लास ले आया था। उसने मेरे पास खिड़की के बराबर मेज रखकर सब चीजें रख दीं। वह मेरे लिए पेग बनाने जा रहा था।
"नो, थैंक यू" मैंने उसे लौटा दिया।

उसके जाते ही मैंने लाइट ऑफ कर दी और दो पटियाला बनाकर गटक लिए। तीसरा भी मैने फटाफट बनाया और उसे हाथ में लेकर मैं फिर बादलों का खेल देखने लगा। बादलों के वो दो टुकड़े जो ऊपर को चढ़ रहे थे अब मिलकर एक हो गए थे। सहसा इस बादल ने आदमी जैसा रूप अख्तियार कर लिया। मुझे लगा कि वह आदमी मुझे घूर रहा है। शायद दो पटियाला असर कर रहे थे। शायद मुझे वह चीज़ें दिख रही थीं जो वहां थी ही नहीं। शायद मैं डर रहा था। अब मुझे लैवेंडर की महक के साथ उसके फूलों का हल्का बैंगनी रंग भी महसूस हो रहा था।
" दिस इज़ नॉनसेंस" मैंने खुद से कहा और तीसरा पेग भी एक झटके में गड़प कर गया।

मैं वापस खिड़की के बाहर झांकने लगा। मैं शायद लैवेंडर की खुशबू से बच कर भाग रहा था। इधर बादल अपनी मस्ती में थे। खिड़की की तरफ आ रहे टुकड़े ने अब एक बच्चे का रूप ले लिया था। अचानक यह बच्चा फुटबॉल खेलता नज़र आ रहा था। ...येल्लो अब यह बच्चा साइकिल किक लगाते दिख रहा है। लगा कि साइकिल किक लगाने वाला नाहर ही है।
मैंने थोड़ी दारू इस बीच और गटक ली। डर मुझे दारू पिलवा रहा था और दारू मुझे डरा रही थी। मैं पीता जा रहा था और बादल का वह टुकड़ा तरह-तरह के रूप धर के खिड़की की तरफ भागा आ रहा था।

मैं दिमाग़ पर कंट्रोल खोता जा रहा था। उसने सामने तैरते बादल को शत्रु मान लिया था। और, अब मैं सड़कछाप लोफर की तरह खिड़की पर खड़े होकर गाली बक रहा था।
"आजा स्साले भूत तेरी मा x xx। निपट ले तू आज। तू भूत है तो मैं जीता-जागता इन्सान... पटक के न मारा तो मुच्छ मुड़ा दूंगा।"
लेकिन गाली गलौज का बादल पर कोई असर न पड़ा। वह आगे बढ़ता आया। अन्ततः वह खिड़की पर था और उसने मेरे दोस्त नाहर का चेहरा लगा रखा था। देखते ही देखते बादल और नाहर का चेहरा कुहासे में तब्दील हो गया। कमरा बर्फ की मानिंद ठंडा हो गया था।
जिन लोगों ने बादलों के बीच सांस ली है वे जानते हैं कि बादल कुहासा जैसे होते हैं। बादल, सांस के ज़रिए वे आपके शरीर में घुस जाता है। सांस छोड़ने पर उच्छवास बादल का हिस्सा हो जाती है। उसे पकड़ नहीं सकते। मुट्ठी में पकड़ो तो हथेली नम भर हो जाती है। बस।
यही बादल मेरे कमरे में घुस आया था। शिलॉन्ग के लिए यह सामान्य बात है। बारिश के दिनों में लोग खिड़कियां बन्द ही रखते हैं ताकि कोई चिलबिस्सा बादल अंदर रखा सामान न गीला कर दे।

बादल ठंडा होता है.... कितना? नशे में ग़ाफ़िल दिमाग़ ने खुद से पूछा। और, ख़ौफ़ज़दा दिमाग़ ने जवाब दिया–लाश जितना ठंडा। मेरी नज़र मेज़ पर रखी बोतल पर चली गई। अब भी तली में सौ-डेढ़ सौ एमएल दारू पड़ी थी। मैंने बोतल उठा ली लेकिन हाथ उसे सम्हाल न सका। वह छूट गई। उठाने की कोशिश में कुर्सी से झुका तो कुर्सी समेत भरभरा कर फर्श पर फैल गया। उठने की कोशिश में दो बार गिरा। पता नहीं दारू का नशा था या डर–मुझे लग रहा था कि उठते ही मेरा दोस्त यानी भंडारी मुझको बियर-हग में जकड़ लेगा।

लेकिन तभी मुझे लैवेंडर की महक फिर महसूस होने लगी और ऐसे खड़ा हो गया मानों मेरे घुटनों में स्प्रिंग फिट हों। पर मुझे दीवार का सहारा लेना पड़ा। मुझे ठंड लग रही थी। मैंने मुश्किल से खिड़की बन्द की और बेड पर आ गिरा। मैंने सर तक रज़ाई तान ली। मगर मेरी कंपकपी बन्द न हुई। मैंने फायरप्लेस में लकड़ियां देखी थीं। सोचा जलवा लूं। मैं उठने लगा पर उठ न सका। मुझे लगा कि कोई रज़ाई के ऊपर हाथ रखकर मुझे मना कर रहा है। मैंने डरकर रज़ाई के सिरे कसकर भींच लिए।
सहसा मुझे कानों में कुछ आवाज़ आती महसूस हुई.....सुनील...मेरे यार...।
शायद मैंने औकात से ज़्यादा दारू पी ली थी...मैं सोच रहा था....शायद मेरे कान बज रहे हैं...शायद मैं हेल्युसिनेट कर रहा हूं...शायद भंडारी मर चुका है और उसका भूत कमरे में घुस आया है...शायद..शायद।

"तू डर मत, तू तो मुझे ही खोजता यहां आया है न!? लो, में खुद तेरे पास आ गया।" मुझे फिर आवाज़ सुनाई दे रही थी।
"तू कौन है, भंडारी है?" मैंने खुद को रज़ाई में दफ़न करने की कोशिश करते हुए सवाल पूछा। पर यह क्या? मेरे मुंह से सवाल नहीं बस गों-गों की आवाज़ निकल रही थी।
"सुनील मैं भंडारी ही हूं, नाहर। तेरा नैरी। बोलने की कोशिश मत कर। मैंने तेरी आवाज़ बांध रखी है। क्योंकि मुझे अपनी कहानी सुननी है। अगर तेरी ज़बान पर लगाम न लगाऊंगा तो मुझे टोकता ही रहेगा। तू कितना बातूनी है, मैं बचपन से जानता हूं..."
मैं सुन रहा था। आवाज़ भंडारी की ही थी। मैं सुनने के अलावा कुछ और करने में समर्थ भी न था। न उठने की ताकत थी न हिम्मत। आवाज़ मेरे कानों में आती रही।
"...और सुनील, आग नहीं जलवाना। मैं तो बादल बन कर तेरे पास आया हूं। आग में बादल नष्ट हो जाते हैं। मैं नष्ट हुआ तो मेरी आपबीती कौन सुनेगा।"

मैंने फिर जवाब देने की कोशिश की। मगर गले से गों-गों की आवाज़ ही निकली। मेरे कान फिर उसकी आवाज़ सुनने लगे...
"अब तू सुअर की तरह गों-गों करना बंद कर और मेरी कहानी सुन। ठीक? हां तो मैं फरवरी एंड में अपने घर नरेंद्र नगर गया था। चार मार्च को वापस चला। पांच मार्च को मैंने चारबाग से जीएल एक्सप्रेस पकड़ी। जीएल सात तारीख को पांच घण्टे लेट रात आठ बजे गौहाटी पहुंची। तब तक शिलॉन्ग के लिए आखिरी टैक्सी जा चुकी थी।
"अगले दिन नाश्ता करके मैं शिलॉन्ग की टैक्सी पकड़ने को चल दिया। मैं टैक्सी स्टैंड जाने के लिए सड़क पार कर रहा था कि एक युवती सामने से दौड़ते हुए आई और मुझसे टकरा गई। वह कत्थई स्कर्ट और आसमानी ब्लाउज़ पहने थी। वह आयम सॉरी कहकर चल दी। उसके बाल भूरे थे। मुझे टैक्सी पकड़ने की ज़ल्दी थी। मैं आगे बढ़ गया। तभी मेरे नथुनों में पता नहीं कहां से लैवेंडर की खुशबू भरने लगी। पता नहीं क्यों मेरे मन में लड़की को फिर देखने की इच्छा जग गई। मैं पलटा और देखा–लड़की थोड़ी दूर जाकर खड़ी हो गई थी और मुझे ही देख रही थी।
"इस बीच एक अधेड़ सरदार जी ने टैक्सी लाकर मेरे आगे खड़ी कर दी।...साहब शिलॉन्ग? भावताव के बाद मैं टैक्सी में बैठ गया। सरदार जी बोले: आप बैठो, मैं टैक्सी स्टैंड का टैक्स देकर आता हूं। दो मिनट में वे लौट आए। गाड़ी स्टार्ट की और मेरी तरफ घूमे–सर एक लड़की लिफ्ट मांग रही थी। लोकल है। मैंने कहा कि साहब से पूछ कर बताता हूं।
"मैंने मना कर दिया। क्या पता कि कोई इंसर्जेंट हो–नगा या मिज़ो। तिस पर मैं था फ़ौज़ी अफसर। टेररिस्ट का टारगेट ...सरदार जी ने पहला गियर डाल दिया। अचानक मेरी नज़र फिर पीछे चली गई। टकराने वाली लड़की मुझे ही देख रही थी। लैवेंडर की महक फिर मेरे नथुनों में बसती जा रही थी।
थोड़ी ही देर में टैक्सी दिसपुर पारकर पहाड़ी रास्ते मे चढ़ने लगी। मैं ठंडी हवा और दिलकश नज़ारों का स्वाद लेने लगा। क़रीब डेढ़ घंटे बाद नोंगपोह आ गया। नोंगपोह यानी मुसाफिरों के लिए नाश्ते-पानी का बढ़िया अड्डा। सरदार जी ने गाड़ी रोक दी। कुछ खाने-पीने के बाद टैक्सी वापस शिलॉन्ग के रास्ते पर दौड़ने लगी। पर तभी आ गई घनघोर बारिश और सरदार जी की गाड़ी के वाइपर भी फेल हो गए। गाड़ी सड़क किनारे खड़ी करनी पड़ी। कुछ देर बाद बारिश धीमी हुई तो सरदार जी लघुशंका का इशारा करके बाहर चले गए।

"तभी मुझे ठक-ठक की आवाज़ सुनाई दी। सर घुमाकर देखा तो खिड़की के पीछे एक युवती खड़ी थी। शुभ्र-धवल गाउन और हाथ मे छाता। काला। उसने एक बार फिर उलटी उंगलियों से खिड़की के शीशे पर ठक-ठक की।

"मैंने दरवाज़ा खोल दिया। वह अंदर आ गई। सुर्ख लिपस्टिक। बेहद सुंदर। और बेहद परेशान। मैंने उसे सहज करने के लिए पूछा–इस जंगल में यह पोशाक? शादी करके आ रही हो या करने जा रही हो..। बात सुनकर वह मुस्कराई। बोली: मेरी शादी तो बहुत पहले हो गई थी। अब तो नई डेट तलाश रही हूं।
"मैं हंस पड़ा। मैट्रीआर्कल समाज की खासी लड़की के लिए इस तरह हंसना-बोलना कोई बड़ी बात नहीं। वे सशक्त होती हैं। मर्दों के कदमों के पीछे-पीछे चलने वाली तो बिल्कुल नहीं।
"सरदार जी आ गए थे। पानी रुक गया था। उन्होंने गाड़ी आगे बढ़ा दी। मैं लड़की से बतियाने लगा। मैंने जब उसे बताया कि मैं फौज़ में एनजीनियर हूं तो वह बोली–मेरा हबी भी फौज़ में था। इन्फैंट्री में। मारा गया।

"यह सुनकर मैंने रोनी सूरत बना ली। वह देखकर हंसने लगी। बोली, डोंट फील सैड ऑर सॉरी। ही वज़ पास्ट। तभी सरदार जी मोड़ का अंदाज़ लगाने में चूक गए और बचाव में उन्हें बहुत तीखा टर्न लेना पड़ा। उधर टैक्सी मुड़ी और इधर वह सुंदर लड़की मेरे ऊपर पसर गई...और पसरी पड़ी रही। मोड़ खत्म हो गया। गाड़ी सीधी सपाट सड़क पर दौड़ने लगी। पर वह वैसे ही पड़ी रही।

"मैंने उसे हाथ से परे करने की कोशिश की। वह एक आंख खोलकर कुनमुनाई: हे गाय, एम आय हर्टिंग यू?...डोंट बी अ स्पोइल स्पोर्ट...आय जस्ट वान्ना लव..लव ..एंड मेक लव। कम शो सम शिवेलरी। रेस्पेक्ट अ लेडी...हर विशेज़।
"अंधा क्या चाहे–दो आंखें। और, कुंवारा अंधा क्या चाहे? मैंने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं और उस युवती की प्रॉपर्टी बन गया।
"टैक्सी शिलॉन्ग के गाड़ीखाना इलाके में खड़ी हो चुकी थी। सरदार जी ज़ोरज़ोर से शोर मचा रहे थे: उतरिए साहब, शिलॉन्ग आ गया। वह लड़की कहां चली गई? मैं परेशान था।
"मैं टैक्सी से उतर गया। सरदार जी को भाड़ा दिया और उनके कान में खुसफुसा कर पूछा: वो कुड़ी कित्थे चली गई? सरदार जी कुछ देर मुझे घूरते रहे। फिर बोले: आप कुछ नशा करते हो क्या? नोंगपोह के बाद पता नहीं क्या हुआ कि आप लगातार खुद से बातें करते रहे। फिर आप सीट पर लेट गए और सीट को चूमने-चाटने लगे। कुछ देर और आप उह-आह करते रहे। फिर सो गए।

"मैं सरदार जी को क्या जवाब देता। मैंने झुक कर अपनी अटैची उठाई तो मेरी नज़र अपनी शर्ट की जेब पर चली गई। वहां लाल सुर्ख लिपस्टिक के तीन गहरे दाग मौजूद थे। मैंने गहरी सांस ली। मेरे कपड़ों से लैवेंडर की खुशबू आ रही थी। मेरे ऑफिस की जीप मुझे लेने आई थी। मैं मुस्करा कर उस पर बैठ गया। मैं मूर्खों की तरह सोच रहा था और मूर्खों की तरह कुछ समझ नहीं पा रहा था।

नाहर भंडारी का मोनोलॉग जारी था। मैं अब भी बोल नहीं पा रहा था। कोशिश करता भी तो गों-गों की आवाज़ ही निकलती। जिन लोगों को कभी चापा (nightmare) ने जकड़ा है, वे जानते हैं कि उस नीम बेहोशी और असहाय स्थिति में गला कैसी आवाज़ निकालता है। मुझे फिर लैवेंडर की खुशबू महसूस हो रही थी। प्रतिक्रिया में गले ने फिर गों-गों किया, जिस पर भंडारी ज़ोर से हंसा।
"लैवेंडर की महक से तू परेशान न हो जस्ट टेक अ डीप ब्रेथ ऐन लिसेन... हां तो मैं शर्ट में लगे लिपस्टिक के निशानों पर हाथ फेरते हुए घर आ गया। ड्राइवर ने सामान रखा और मेरे लिए भोजन लेने ऑफिसर्स मेस चला गया। मैंने शॉवर लिया और भोजन का इंतज़ार करने लगा।
"खाना सजा कर ड्राइवर चला गया। मैं डाइनिंग टेबल पर आ गया। मैंने रोटी और चिकेन का टुकड़ा तोड़ कर कौर मुंह में डाला ही था कि वही लैवेंडर की महक फिर नाक में समाने लगी। मैंने अंडे की भुर्जी चखी: लैवेंडर। पाइनएपल रायता: लैवेंडर। हड़ कर मैंने पानी पीकर देखा। उसमें भी वही। लैवेंडर।
"मेरी भूख खत्म हो गई। मैंने पूरा भोजन आसाम ट्रिब्यून पर उड़ेला और आवारा कुत्तों को खिलाने बाहर निकल गया। दो-तीन पुचकारों में चार कुत्ते आ गए। सड़क किनारे अखबार खोल कर खाना रखकर मैं वापस चल दिया। पीछे से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। अचानक भौंकना रुक गया और कुत्ते रोने लगे। मैंने पलट कर देखा: कुत्ते दूर खड़े होकर भोजन की तरफ देख रहे थे और आसमान की तरफ़ मुंह उठा कर रो रहे थे।

"मैं तेज़ कदमों से चल कर सीधे बेड पर लेट गया। आंख बंद की तो गौहाटी से शिलॉन्ग का सफर और उस लड़की से मुलाक़ात का मंजर दिमाग़ में सिनेमा की रील की तरह चलने लगा। बारबार। लगातार। मैंने नींद की गोली निकाली और गटक ली।
"सुबह उठा तो सात बज़ चुके थे। शरीर मे कुछ भारीपन था। पर आलस की गुंज़ाइश न थी। आठ बज़े ऑफिस पहुंचना था। फटाफट तैयार हुआ। कॉर्नफ़्लेक्स का नाश्ता किया। वर्दी पहनते-पहनते ड्राइवर जीप लेकर आ गया। बाहर सड़क पर आया। देखा अखबार में रखा खाना वैसा का वैसा पड़ा था।
"ऑफिस पंहुचते ही काम में डूब गया। थोड़ी देर में कर्नल सिद्धू ने मुझे बुलाकर कुछ ऐसा अर्जेंट काम पकड़ा दिया कि मुझे न लंच का होश रहा न शाम होने का।

"होश तब आया जब लैवेंडर फिर महकने लगा। मैंने घड़ी देखी। चार बज़ रहे थे। मैं कमरे से बाहर निकल आया। सूरज डूबने वाला था। मैं लॉन में टहलने लगा। सहसा मुझे फड़फड़- फड़फड़ जैसा कुछ सुनाई दिया और फिर कोई चीज़ एकदम-से मेरे बालों को सहलाते हुए गुज़र गई। मैंने ऊपर देखा। एक बड़ा-सा चमगादड़ पाइन ट्रीज़ के बीच इधर-उधर उड़ रहा था। देखते ही देखते वह एक पेड़ की डाल से चिपक कर उलटा लटक गया।
"मेरा टहलना जारी था। टहलते-टहलते एक बार मुझे लगा कि जैसे कोई पुकार रहा है। दिमाग़ के तर्कशील कोने से निर्देश मिला–इग्नोर कर दो। इग्नोर करने की नौबत नहीं आ पाई क्योंकि इस बार आवाज़ साफ थी,
हल्लो...
आवाज़ और उसके साथ लैवेंडर की खुशबू मेरे पीछे से आई थी। मैं मुड़ा। वही लड़की खड़ी थी। मुस्कुराते हुए। ब्लैक इवनिंग गाउन। कमर पर पतली-सी लाल बेल्ट। सर पर लाल बकेट हैट। पांवों में रेड स्टिलटोज़। और ओठों पर लिपस्टिक। सुर्ख, लाल।
आ यू सरप्राइज़्ड, मिस्टर भंडारी?–वह बोली। आवाज़ में शहद घुला था।
नो। आय फील आयम ब्लेस्ड, यंग लेडी...मीज़.. आय कुडंट कैच योर नेम यस्टडे...
"मेरा सारा खौफ खत्म हो गया था। वह मुझे अपनी ओर खींच रही थी। मेरे दिमाग़ में भूत, चुड़ैल या किसी किस्म की पैरा-नॉर्मल शै का नामोनिशान न था। मेरे भीतर इच्छाओं का ज्वार उठ रहा था। क्या काम-कामनाएं इतनी बलवती हो सकती हैं कि आदमी में डर ही खत्म हो जाए? मौत का डर भी खत्म हो जाए?
"हम दोनों बाहें फैलाकर आगे बढ़े और आलिंगनबद्ध होकर एक-दूसरे को पागलों की तरह चूमने लगे। कुछ देर बाद हम लोग लॉन में ढह गए। भावनाओं का अतिरेक अब सीमाओं को तोड़ने की ओर बढ़ रहा था कि मेरे अर्दली की आवाज़ ने रंग में भंग डाल दिया।

...साहब ड्राइवर नहीं है। उसकी बीवी बीमार हो गई है। वह उसे अस्पताल दिखाने गया है। सिद्धू साहब से पूछ कर वह जीप भी ले गया है...
"सांसों को संभालते हुए हम दोनों उठ खड़े हुए। सूरज डूबे देर हो गई थी। मेरे पास कोई वाहन भी न था। तुम कैसे आई थीं–मैंने उससे पूछा। वह बोली–पैदल..घर पास ही है, नोंग्रिम हिल में। यह बस्ती मेरे रास्ते में थी। मुझे लाईमुखड़ा जाना था।
"चलो मेरे साथ, मैंने कहा। वह मेरी बाहों में झूल गई और लरजते शरीर, थिरकते कदमों के साथ हंसते-बतियाते चल दी। उसका नाम एलिज़ाबेथ लिन बरुआ था। एलिज़ाबेथ ईसाई नाम। लिन यानी उसकी खासी ट्राइब की उपजाति और बरुआ यानी पति का सरनेम। पति असमिया ब्राह्मण था वह फ़ौज़ी अफसर था। किसी जंग में मर गया था।

"लोअर नोंग्रिम हिल का मोड़ आते ही वह मुझसे छिटक कर दूर खड़ी हो गई। बोली–बस, आगे मैं चली जाऊंगी। मैंने बहुत ज़िद की–एक कप कॉफ़ी ही पिला देना। वह न मानी और अकेले चली गई। कुछ ही क़दम जाकर वह घर के लिए मुड़ गई।
"अब वह कब मिलेगी–यह सवाल उसी पल से मुझे मथने लगा और अगले दिन काम पर से लौटते हुए भी मैं यही सोच रहा था कि उसके घर जाऊं या नहीं। जैसे ही लोअर नोंग्रिम हिल का मोड़ आया, मैं गाड़ी रुकवा कर उतर गया। और लो! वह मेरे सामने खड़ी थी!! बोली–चलें? उसने हाथ बढ़ाया। मैंने पकड़ लिया। दूसरे हाथ से ड्राइवर को लौट जाने का इशारा किया और कंधे पर हाथ धर कर बोला–चलो।

"आज हैपी वैली चलते हैं। आधे घंटे की चढ़ाई के बाद हम हैपी वैली में थे। बड़ी-बड़ी चट्टानों वाली इस खूबसूरत जगह हम घंटों प्रेमालाप करते रहे। पर एक सीमा तक। नो–वह साफ-साफ बोली और मेरे चेहरे पर उतर आए गुस्से और फ्रस्ट्रेशन को अपने किस से दूर करते हुए मेरा हाथ पकड़ कर वापस चल दी।
"हैपी वैली के बाद उसने मुझे अगले दिन शिलॉन्ग पीक पर बुलाया। शिलॉन्ग पीक शहर से 15 किमी दूर है। मैंने साथ चलने का ऑफर किया। वह बोली, अपनी चिंता करो। मैं लोकल हूं। आ जाऊंगी। ठीक नौ बज़े।

"अगले दिन जब रात नौ बज़े मैं शिलॉन्ग पीक पहुंचा, वह वहां पहले से बैठी मिली। उसकी खूबसूरती ग़ज़ब ढा रही थी। उसने पेल येलो ड्रेस पहन रखी थी। सी-थ्रू शियर ड्रेस। हम 11बज़े तक चूमते-लिपटते रहे। इस रात भी उसने सीमा न तोड़ने दी।
"रात बहुत हो गई है। वह बोली, अब तुम जाओ। और तुम? वह बोली, मैं अकेले आऊंगी। जीप में डर लगता है। पर कैसे आओगी, मैंने ज़िद की? वह बोली, ज़िद न करो माय बेबी। मैंने फिर भी ज़िद की तो वह मुस्कराईं और बोली, उठ जाओ,ध्यान से देखो...
"वह खुद भी दोनों बाहें फैला कर खड़ी हो गई। अगले पल वह पहाड़ की चोटी से कूद गई। पहले नीचे की ओर गई फिर ग्लाइड करते हुए ऊपर आई और मेरे पास आकर चक्कर काटते हुए वह शिलॉन्ग शहर के ऊपर तैरते हुए गुम हो गई।
"ढाई हजार मीटर के अल्टीट्यूड में रात की ठंड के बावजूद मेरा पूरा शरीर पसीने से भीग गया। मेरे पैरों की ताक़त खत्म हो चुकी थी। पूरा शरीर कांप रहा था। बड़ी मुश्किल से मैंने जीप स्टार्ट की। घर पहुंच कर सुबह गौहाटी के लिए रवाना हो गया। सुनील गौहाटी स्टेशन पर मैंने सोचा कि कहां जाऊं तो मुझे तेरी ही याद आई। लगा कि तू ही मुझे इस आफत से बचा पाएगा।
"मैं पटना की टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गया। ट्रेन के खुलते ही देखता हूं कि एलिज़ाबेथ सामने की सीट पर बैठी है। मेरी ओर देख कर मुस्कराईं। बोली–मत जाओ..तुम मेरे हो...हमेशा के लिए.. हमेशा से। चलो, वापस चलो मेरे साथ...यह आत्मा...यह शरीर...सब कुछ तुम्हारा है। शिलॉन्ग में नहीं रहना तो यहीं गौहाटी में रह जाओ। बस ब्रह्मपुत्र मत पार करो...

"क्यों, ब्रह्मपुत्र क्यों न पार करूँ? मैंने पूछा।
वह बोली, क्योंकि हम खासी लोग ब्रह्मपुत्र पार नहीं करते।
"तभी मुझे खिड़की के बाहर नीचे विशाल जलराशि दिखाई दी। ट्रेन ब्रह्मपुत्र के पुल से गुज़र रही थी। एलिज़ाबेथ चीखी–डोन लीव मी माय लव...डोन-डोन डोन्ट। इतना कहकर वह भागकर ट्रेन से कूद गई और ब्रह्मपुत्र के ऊपर से उड़ते हुए गुम हो गई।
"ट्रेन पटना की ओर बढ़ चली। मुझे तेज़ बुखार चढ़ गया था। सुनील उसी हालत में मैं तेरे पास पहुंचा था। तूने मेरी बड़ी सेवा की। मुझे लगा कि ट्रांसफर कराके एलिज़ाबेथ से बच जाऊंगा। लेकिन, पटना पहुंचकर मुझे लगा कि मैं उसके बिना जी नहीं पाऊंगा। और, मैं पटना, तुम्हारे घर से भाग आया। सॉरी सुनील।
....जारी