हिंदी सिनेमा का पहला आदिवासी नायक



अश्विनी कुमार पंकज

पिछले साठ सालों से झारखंड में लूथर तिग्गा एक अनजाना, अनसुना और मामूली नाम है। रांची के चुटिया स्थित ढुमसा टोली में रहता है यह 87 वर्षीय बूढ़ा। जिसके घर के सामने से रोजाना सैंकड़ों गाड़ियां गुजरती हैं, पैदल वाले पार होते हैं, अगल-बगल के दूकानों में सुबह-शाम भीड़ जमा रहती है पर कोई नहीं जानता कि यहां एक लीजेंड्री आदिवासी अभिनेता रहता है। भारतीय सिनेमा में काम करने वाला झारखंड ही नहीं बल्कि देश का पहला आदिवासी। ऋत्विक घटक जैसा विश्वविख्यात फिल्मकार जिसके काम और अभिनय से इतने प्रभावित थे कि अपने साथ मुंबई ले जाना चाहते थे। पर आर्थिक परेशानियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते जिसे इस बेहतरीन ऑफर को ठुकरा कर अपने लिए गुमनामी चुनना पड़ा।

यह बहुत कम लोगों को पता है कि भारतीय सिनेमा में आदिवासी कलाकारों को ‘इंट्रोड्यूस’ करने का श्रेय विश्वप्रसिद्ध सिनेकार ऋत्विक घटक को है। जिन्होंने 1958 में रिलीज अपनी पहली कॉमर्शियल सिनेमा ‘अजांत्रिक’ में झारखंड के दो आदिवासी कलाकारों लूथर तिग्गा और पझुरनी उरांव को बतौर कलाकार पेश किया था। इस लिहाज से ये दोनों भारत के पहले आदिवासी अभिनेता-अभिनेत्री हैं। झुरनी जुलियुस तिग्गा द्वारा कांके में स्थापित-संचालित धुमकुड़िया स्कूल में शिक्षिका थी। उसका वास्तविक नाम परसादी मिंज है। जुलियुस तिग्गा की पत्नी उसे लेकर शूटिंग पर जाया करती थी। उनका परिवार आज भी कांके में है, और लूथर तिग्गा के अनुसार अब वह इस दुनिया में नहीं है।

इन दोनों के अलावा अब क्लासिक कही जाने वाली इस बांग्ला फिल्म में रातू थाना के रानीखटंगा गांव के सैंकड़ों आदिवासियों ने नृत्य-गीत एवं हाट-बाजार के दृश्यों में सहयोगी भूमिकाएं की थीं। लोकप्रिय बांग्ला अभिनेता काली बनर्जी की मुख्य भूमिका वाली ‘अजांत्रिक’ में लूथर और परसादी लगभग सात मिनट तक पर्दे पर कुड़ुख भाषा में संवाद बोलते हुए नैसर्गिक और सहज अभिनय के साथ दिखाई पड़ते हैं। फिल्म में केंद्रीय पात्र 1920 के मॉडल की एक शेवरलेट कार है जो खटारा है और कभी भी बेकार हो सकती है।

लूथर तिग्गा जब ‘अजांत्रिक’ के समय का अनुभव सुनाने लगते हैं तो आप कई ऐसी घटनाओं और प्रसंगों में खुद को ठिठका पाते हैं। जैसे वो बताते हैं कि रामगढ़ के रेलवे स्टेशन पर कई दिनों तक फिल्म की शूटिंग हुई। इस दौरान रोज रांची से रामगढ़ आना-जाना होता था। यात्रा के दौरान ऋत्विक घटक ‘मधुमति’ की कहानी उनको सुनाते और उनसे राय लेते। लूथर तिग्गा का कहना है कि ‘मधुमति’ में दिलीप कुमार और मधुबाला को लेने की सलाह उन्होंने ही को दी थी। जिसे ऋत्विक घटक ने सुनते ही मान लिया था। ध्यान रहे कि पुनर्जन्म पर आधारित भारत की यह पहली ब्लॉकबस्टर फिल्म है जिसे बिमल राय ने निर्देशित किया था। आदिवासी पृष्ठभूमि पर निर्मित इस फिल्म में मधुबाला ने एक आदिवासी लड़की का रोल किया है।

60 सालों से गुमनामी में जी रहे लीजेंड्री आदिवासी एक्टर लूथर तिग्गा की ये कहानी जब आप पढ़ रहे हैं, ‘अजांत्रिक’ फिल्म की टीम का कोई भी मुख्य सदस्य इनके सिवा जीवित नहीं है। न ऋत्विक घटक, न काली बनर्जी, न कैमरामेन दिनेन गुप्ता, न संगीतकार उस्ताद अकबर अली खान और न ही वह कार जिसके ईर्द-गिर्द पूरी फिल्म घूमती है। जगन्नाथपुर का पुराना मंदिर और रामगढ़ घाटी भी वैसी नहीं रही, जहां इसके कई दृश्यों की शूटिंग हुई थी। लेकिन लूथर तिग्गा हमारे बीच में हैं। एक जीवित और लीजेंड्री इतिहास। स्वस्थ और जिंदादिल।

जब भी झारखंड के फिल्म इतिहास की बात होती है ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढइबो’ का लोग जिक्र करते हैं, यह भूला दिया जाता है कि 1958 की ‘अजांत्रिक’ में न केवल झारखंड की आदिवासी संस्कृति, कलाकार, गीत-संगीत, नृत्य और शत-प्रतिशत लोकेशंस है बल्कि इसके कहानी-पटकथाकार सुबोध घोष भी हजारीबाग में ही जन्मे, पले-बढ़े और शिक्षित हुए थे। अफसोस होता है कि झारखंड में बड़े-बड़े फिल्मकार हैं। फिल्म इतिहास को लिखने और पढ़ाने वाले कई स्वयंभू ‘भीष्म पितामह’ हैं। मास कम्युनिकेशन के अकादमिक संस्थान हैं। और पिछले कुछ सालों से यहां एक फिल्म बोर्ड भी है। सरकार द्वारा दो-तीन फिल्मोत्सवों का भी आयोजन यहां हो चुका है। जिनमें मुंबई से बुला-बुला कर लोगों को सम्मानित किया गया है। पर न तो अविभाजित बिहार में और न ही बीस वर्ष का होने जा रहा झारखंड में किसी ने भारत के इस पहले आदिवासी और लीजेंड्री कलाकार की खोज खबर लेने की सोची।

लूथर तिग्गा का 6 अगस्त 2020 को निधन हो गया। ak pankaj ने कुछ महीने पहले लिखा था।

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