समीर चौधरी : मध्यमैदान के बेताज बादशाह

सुभाष चंद्र डे, खेल पत्रकार

कुल तीन बार संतोष ट्रॉफी राष्ट्रीय फुटबॉल चैंपियनशिप में बिहार राज्य टीम का प्रतिनिधित्व करनेवाले रांची के थड़पखना निवासी समीर चौधरी को पिछली सदी के पचास के दशकों में बिहार तथा रांची के फुटबॉल में मध्य मैदान का बेताज बादशाह माना जाता था। राष्ट्रीय फुटबॉल चैंपियनशिप में उन्हेंं वर्ष 1952, 1954 और 1957 में बिहार राज्य का प्रतिनिधित्व करने का गौरव प्राप्त हुआ था। दुबले-पतले एवं कमजोर दिखनेवाले समीर चौधरी के अंदर छुपी क्षमता का अंदाजा फुटबॉल मैदान पर उनके प्रतिपक्षी खिलाडियों को नहीं हो पाता था।

अपने तेज दिमाग व फुरती की बदौलत विपक्षी खिलाडिय़ों के बेहतर से बेहतर आक्रामक मुवों को पलक झपकते ही निरस्त कर देने की अद्भुत क्षमता उनमें थी। उनकी स्कूली शिक्षा रांची जिला स्कूल में हुई थी और उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में अपने जीवन की पहली फुटबॉल प्रतियोगिता में भाग लिया था। उसी साल (1948) उन्होंने जमशेदपुर में आयोजित अंतर स्कूल फुटबॉल प्रतियोगिता में रांची स्कूली टीम का प्रतिनिधित्व किया। इस दौरान उन्हेंं बिहार के पूर्व राज्य खिलाड़ी राजो प्रसाद के बेशकीमती सुझावों एवं दिशा निर्देशों का भी लाभ मिला। रांची की सीनियर डिवीजन फुटबॉल लीग में उन्होंने पहली बार वर्ष 1951 में रांची यूनियन क्लब की टीम की ओर से भाग लिया। वर्ष 1952 में उन्हेंं रांची की शक्तिशाली आरएफसी की टीम का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। उसी साल मात्र 17 वर्ष की आयु में उन्हेंं बिहार राज्य टीम के लिए चुने जाने का गौरव भी प्राप्त हुआ। अगले वर्ष दुर्भाग्यवश चेचक से पीडि़त हो जाने के कारण वह बिहार टीम का प्रतिनिधित्व नहीं कर सके। उपलब्धियों की दृष्टि से वर्ष 1954 उनके फुटबॉल जीवन का श्रेष्ठ समय रहा। उनके प्रतिनिधित्व में यूनियन क्लब की टीम ने उस साल तीन शीर्ष फुटबॉल प्रतियोगिताएं, रांची सीनियर डिवीजन फुटबॉल लीग, मुद्रिका कप व मुरी में आयोजित होनेवाली अर्सेनल शील्ड फुटबॉल चैंपियनशिप जीती। उसी साल उन्होंने अंतर विश्वविद्यालय फुटबॉल चैंपियनशिप में पटना विश्वविद्यालय टीम का प्रतिनिधित्व तो किया ही, पटना में आयोजित होनेवाली प्रतिठति श्रीकृष्ण गोल्ड कप फुटबॉल प्रतियोगिता में पटना एकादश की ओर से खेलने के लिए विशेष निमंत्रण भी मिला।

ओलिंपिक खेलों में भाग लेनेवाली भारतीय टीम के विरुद्ध बिहार एकादश टीम की ओर से उन्हेंं तीन बार खेलने का भी दुर्लभ गौरव मिला था। ये मैच पहले 1952 की भारतीय ओलिंपिक टीम के खिलाफ दो बार वर्ष 1952 में दानापुर और दूसरी बार गया में तथा तीसरी बार 1956 ओलिंपिक में भाग लेनेवाली भारतीय टीम के विरुद्ध रांची में हुए थे। वर्ष 1955 में उन्हेंं कोलकाता की ईस्टर्न रेलवे टीम के लिए खेलने का निमंत्रण भी मिला था, लेकिन रांची में एनसीडीसी (नेशनल कोल डेवलपमेंट कार्पोरेशन), जिसे अब सीसीएल के नाम से जाना जाता है, में कार्यरत रहने का कारण उन्होंने ईस्टर्न रेलवे के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। बाद में वे अपने इस निर्णय का बहुत अफसोस किया करते थे। उन्होंने वर्ष 1959 में मात्र 24 साल की उम्र में फुटबॉल से संन्यास ले लिया था।

समीर चौधरी अपने खेल जीवन में रांची के ही एक पूर्व खिलाड़ी मोहम्मद वसी के खेल से सबसे ज्यादा प्रभावित थे। वे कहा करते थे कि मो। वसी का खेल देखकर ही उन्हेंं सेंटर हाफ पोजिशन में खेलने की प्रेरणा मिली थी। समीर चौधरी अपने समय के रांची के फारवर्ड खिलाडिय़ों में बीएसपी (1) की टीम के हरि सिंह राणा को सबसे ज्यादा खतरनाक माना करते थे। अन्य फारवर्ड खिलाड़ी जहां गेंद को रिसीव कर उसे अपने नियंत्रण में करने के बाद ही उस पर शॉट लगाया करते या स्थित के अनुरूप कारवाई किया करते थे, वहीं खेल के दौरान गेंद यदि हरि सिंह की पहुंच में होती, तो वे उसे बिना रिसीव किये ही उस पर झन्नाटेदार वॉली शॉट जमा दिया करते थे, जो पूरी प्रतिपक्षी रक्षापंक्ति को असहाय कर दिया करता था। रोचक बात यह है कि समीर चौधरी को जीवन में कभी किसी प्रशिक्षक से फुटबॉल खेलने का प्रशिक्षण नहीं प्राप्त हुआ। उन दिनों रांची में फुटबॉल प्रशिक्षक ही नहीं हुआ करते थे। इसीलिए चौधरी ने फुटबॉल खेलने के बारे में जितना भी सीखा, जो कुछ भी सीखा, वो सब रांची के ही अन्य खिलाडिय़ों को खेलते देखकर। अच्छी बात तो यह रही कि उन दिनों रांची में फुटबॉल का स्तर बहुत ही अच्छा था और यहां एक से बढ़ कर एक स्तरीय खिलाड़ी हुआ करते थे, जिनके साथ अभ्यास करते करते अन्य खिलाड़ी भी अपनी क्रीड़ा कुशलता में पारंगत हो जाया करते थे।

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