माया नगरी की माया



अतुल शर्मा

फिल्म इंडस्ट्री पर कुछ बोल देने मात्र से मुंबई रूठ गई। थाली में छेद होने लगे। अचानक मुंबई को इतना दर्द क्यों हो रहा है? क्यों कल तक भाजपा की बंशी बजानेवाले संजय राउत अब हर बात को शिवाजी महाराज और मराठी अस्मिता पर प्रहार मान रहे है? ऐसा क्या खास है फिल्मी सितारों में कि उनकी कोई आलोचना नहीं कर सकता। जैसे ही कोई मुंबई फिल्म इंडस्ट्री पर सवाल करता है तो वह सारे महाराष्ट्र की बेइज्जती मानी जाती है। थाली में छेद कर देता है सवाल करने वाला और मुंबई के कुछ संभ्रांत रूठ जाते है। दरअसल ये आमची मुंबई और मराठी अस्मिता के नाम पर फिल्मी दुनिया के काले कारनामों को दबाने की कोशिश की जाती है।

थाली में छेद
आप नेताओं को दिन भर पानी पी पीकर बुरा भला कह सकते हैं, गाली दे सकते हैं, सवाल पूछ सकते हैं लेकिन अभिनेताओं से नहीं पूछ सकते क्योंकि थाली में छेद हो जाएगा। दिल्ली में बैठ कर आप लगातार एक मुहिम की तरह प्रधानमंत्री की आलोचना करते आ रहे हैं और आज भी कर रहे है पर न तो दिल्ली और न ही प्रधानमंत्री नाराज है। कुछ लोग लगातार योगी आदित्यनाथ की आलोचना कर रहे है पर न तो यही नाराज हुए न ही उत्तर प्रदेश के लोग। तो आपको क्यों परेशानी हो रही है। आप प्रश्नों से क्यों भागना चाहते हो। ऐसा क्या है फिल्मी सितारों में कि वो इतने बड़े बन जाते हैं कि आलोचना के बंधन से मुक्ति पा लेते हैं। माहौल बनाने में निपुण लोगों ने 'राजनीति को भ्रष्टाचार का पर्यायवाचीÓ बना दिया, वही माहौल बनाने वाले निपुण अभिनय की दुनिया को नशे का अड्डा बताने पर नाराज़ हो जाते हैं।

मुंबई और नशा
पिछले दस बीस सालों में कई फ़ल्मिी कलाकार ड्रग्स के साथ पकड़े गए या उनपर ड्रग रखने का आरोप लगा। फरदीन खान, विजय राज, गौरी खान, ममता कुलकर्णी, परवीन बाबी, राहुल महाजन, अपूर्वाअग्निहोत्री,सूजेन खान, अंगद बेदी, मनीषा कोइराला और न जाने कितने ड्रग्स के साथ पकड़े गए। संजय दत्त, रणबीर कपूर, कंगना रनाउत और प्रतीक बब्बर जैसों ने तो खुद भी माना कि उन्हेंं नशे की आदत थी। राज कपूर और फ़रिोज़ खान की महफ़लिें आज तक मशहूर हैं।

पुराना है इतिहास
मुंबई और नशे का रिश्ता कोई नया नहीं है अमर फारूकी ने अपनी किताब 'ओपियम सिटीÓ में इस पर विस्तार से लिखा है कि 'पश्चिमी भारत के व्यापारियों के लिए अफीम का व्यापार कितना महत्वपूर्ण था, विशेष रूप से बॉम्बे और बाद में निॢमत बॉम्बे को राजधानी बनाने में इसकी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका थी।Ó चूंकि 1850 के दशक तक दक्षिण में बंबई और गोवा के उत्तर में दमन तक, पश्चिमी भारत के कई क्षेत्रों पर ब्रिटिश शासन का अधिकार नहीं था, पश्चिमी भारत में कई स्वदेशी रूप से शासित राज्यों के लिए बिहार के अफीम का उपयोग करना व्यापारियों के लिए संभव था। बिहार में उगाया और राजस्थान के माध्यम से तस्करी करके जैसलमेर फिर कराची और सागर से दमन तक।

बिहार से कनेक्शन
1820 के दशक तक बड़ी संख्या में पारसी, मारवाड़ी, गुजराती बनिया और कोंकणी मुसलमान बंबई में अफीम के व्यापार में पूर्ण रूप से संलग्न थे। ये सब अपने व्यापार के लिए लगातार बिहार जाते रहे। कुछ ने तो बिहार से अपने अफ़ीम के कारोबार को व्यवस्थित और सुचारु रूप से नियंत्रित करने के लिए व्यापक स्तर पर व्यवस्था कर रखी थी। बिहार के किसान मजबूरी और ज़्यादा पैसे की लालच में लगातार अफ़ीम की खेती करते रहे। अंग्रेजों ने आने के बाद अफ़ीम की पुरी खेती अपने नियंत्रण में ले लिया। पर व्यापार लगातार चलता रहा और मुंबई बिहार के अफ़ीम से पैसा कमाती रही। यह इन वर्षों का पूंजी संचय था जिसने इन लोगों को बाद में औद्योगिक बॉम्बे की नींव रखने के साथ-साथ दक्षिण बंबई में भव्य सार्वजनिक भवनों की नींव रखने की अनुमति दी।

कलकत्ता बाजार
बुलियन इनफ्लो के लिए 1820-40 में बॉम्बे का हिस्सा, विशेष रूप से अफीम के लिए, कलकत्ता से बहुत बड़ा था। इस अवधि के दौरान, बिहारी अफीम भारत में सालाना 15-20 मिलियन रुपये का कारोबार करती थी जो सीधे औपनिवेशिक राज्य को लाभान्वित करती थी, बिहारी अफ़ीम से आय काफी हद तक निजी, मुख्य रूप से स्वदेशी मुनाफे का प्रतिनिधित्व करती थी। यह प्रभाव शहर के भौगोलिक बनावट में स्पष्ट था। ये सब पारसी थे जिन्हेंं अफ़ीम की कमाई से भारी लाभ हुआ था और बाद में जिन्होंने दक्षिण बंबई का विकास किया। ब्रीच कैंडी और वॉकेश्वर के मालाबार और कुंभाला हिल्स के बंगले जहां अब कुछ संभ्रांत बैठ कर तरह तरह की बातें करते है वे ज्यादातर पारसी-स्वामित्व वाले और गैर-यूरोपीय लोगों के थे।

'ओपियम सिटीÓ
'ओपियम सिटीÓ के लेखक अमर फ़ारूक़ी के एक दूसरे ग्रंथ 'डिवर्जन ऑफ़ द सबवर्सन-कॉलोनियलिज़्म, इंडियन मर्चेंट्स एंड द पॉलिटिक्स ऑफ़ ओपियमÓ (लेक्सिंगटन, 2005) के एक आसवन से यह भी पता चलता है कि यह अफीम व्यापार कैसे बंबई में सामुदायिक नेताओं के बीच विवेक का एक बड़ा कारण था। जो लगे हुए थे एक साथ चीन के लिए अफ़ीम शिपिंग मे और यही नेता कई अन्य मुद्दों पर नैतिक धर्मयुद्ध में। हम जानते हैं कि 19 वीं सदी की अंतिम तिमाही में भारतीय राष्ट्रवादियों ने अफीम के व्यापार का विरोध करने के लिए कोई झुकाव नहीं दिखाया,वास्तव में यह एक तरीक़े का मौन समर्थन था। हमारे कुछ वर्तमान राजनीतिकों की तरह जो हर बात पर उत्तर भारतीय और मराठी अस्मिता का राग अलापने लगते हैं उन्हेंं याद रखना चाहिए 'बिहार के खसखसÓ क्षेत्र जिसने बॉम्बे का निर्माण किया थाÓ इसलिए बिहारियों को बंबई में रहने का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है।

फिल्म इंडस्ट्री और अपराध
1993 में संजय दत्त और 2008 के मुंबई धमाकों में राहुल भट्ट की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। नशा से लेकर घातक हथियार रखने तक का आरोप संजय दत्त पर लगा और उसे जेल भी जाना पड़ा पर दोस्ती निभाते हुए एक अच्छे दोस्त की तरह राजकुमार हिरानी ने अपने दोस्त के जीवन पर फिल्म 'संजूÓ बना दी और पूरे फिल्म में दोस्त को बेक़सूर और भटका हुआ बता दिया। सारे सबूतों के बावजूद संजय दत्त सिर्फ हथियार रखने का ही अपराध में जेल गए। जेल गए या जेल घुम कर आए ये महाराष्ट्र सरकार से पूछना चाहिए । जितना पैरोल और छुट्टी संजय दत्त को मिली अगर उसका दस प्रतिशत भी महाराष्ट्र के अन्य क़ैदियों को मिल जाता तो वे सरकार के लिए नए वोट बैंक हो जाते।

सलमान खान आज फिल्म इंडस्ट्री के बड़े कलाकार है पर शराब और नशे में उन्होंने जब मुंबई के फुटपाथ पर सोते लोगों को अपनी गाड़ी से रौंदा तो दुनिया दंग रह गयी। पर दुनिया उससे भी ज्यादा दंग ये देखकर रह गयी कि क्योंकि सलमान की गाड़ी कोई भूत चला रहा था सलमान नहीं। काले हिरण के मामले में तो और भी कमाल हो गया। आज तक पता ही नहीं चला कि वो हिरण मरे कैसे। शायद सलमान के सम्मान में सब ने ख़ुदकुशी कर ली होगी... सुशांतसिंह राजपूत की तरह।

सैफ अली खान, शक्ति कपूर, आदित्य पंचोली, सूरज पंचोली जैसों पर मारपीट और कास्टिंग काउच जैसे आरोप लग चुके हैं। सूरज पंचोली की गल्र्फफ्रेंड जिया खान ने तो ख़ुदकुशी करने का कारण लिख छोड़ा पर वो आज भी आज़ाद घुम रहा है और जिया खान की मां अपने बेटी की मौत के इंसाफ़ की लड़ाई आज भी लड़ रही हैं।

माता रानी के भक्त गुलशन कुमार की दिन दहाड़े गोली मार कर हत्या कर दी जाती है और हत्या का आरोप संगीतकार नदीम सैफ़ी पर लगता है। नदीम सैफ़ी भागकर इंग्लैंड चला जाता है और आजकल वो संयुक्त अरब अमीरात में रह रहा है। दोनों देशों के भारत के साथ प्रत्यावर्तन संधि के बावजूद नदीम सैफ़ी को भारत नहीं लाया जा सका है। राजीव राय और राकेश रौशन पर जानलेवा हमले होते हैं। दिव्या भारती को मजबूरन आत्महत्या करनी पड़ती है। प्रिटी जिंटा को अंडरवल्र्ड से धमकियां मिलती रही हैं। इसके अलावा भी बहुतों पर घरेलू हिंसा, बैंक फ्रॉड, अंडरवल्र्ड से रिश्तों जैसे तमाम आरोप लगते रहे हैं। पर कभी आपने सुना किसी खान को कभी अंडरवल्र्ड से धमकी या गोली मिली हो ? क्या कारण है कि अंडरवल्र्ड गैंग और उसके गुर्गों से अलग चलने वाले कलाकारों का कैरियर समाप्त हो जाता है। कितने ही होनहार और सफल कलाकारों को किनारे कर दिया जाता है। इन सब से परे बॉलीवुड में पाकिस्तानी कलाकारों की बाढ़ आ जाती है। हर होनहार अदाकार पाकिस्तान से, हर बेहतरीन गायक पाकिस्तान से। भारत के बेहतरीन गायकों के कैरियर को ख़त्म करने का एक सुनियोजित षड्यंत्र बहुत सुचारू रूप से चल रहा है। सोनू निगम और अभिजीत सिंह इसके तत्कालीन उदाहरण है। इन सब के बावजूद आप किसी पर उंगली नहीं उठा सकते।

समस्याओं की जड़
दरअसल,आजकल सुदर्शन न्यूज़ पर जिस तरह यूपीएससी में ज़कात फाउंडेशन की भूमिका को लेकर आशंका जाहिर की जा रही है, उसी तरह से बॉलीवुड की हर समस्याओं की जड़ में जाएं तो पता चलेगा कि सभी समस्याओं के जड़ में बॉलीवुड पर राज करने वाले कुछ परिवार हैं जिनके संबंध अंडरवल्र्ड के साथ हमेशा से चिह्नित रहे है। जो मनोरंजन के नाम पर भी बहुत सोची समझी साजि़श के तहत आपको नीचा दिखाते है। हमारी फिल्मों में पुजारी हमेशा धूर्त और चालक होगा पर मौलवी साहब तो सबसे चरित्रवान होंगे। हर दूसरी फ़ल्मि में आपके भगवान को बेइज्जत किया जाता है और अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर आपको चुप करा दिया जाता है। फिल्मों से भजन गायब हो गए और चुपके से कव्वाली ने जगह ले ली। इन सारे फ़साद की जड़ में फर्क केवल फंडिंग की है। बॉलीवुड में दाऊद और अंडरवल्र्ड के दूसरे कई गुर्गों का पैसा लगता है और उनकी एक ख़ास क़ौम से नफऱत जग ज़ाहिर है। जब फंडिंग का सोर्स ही गलत है तो उसके परिणाम भी गलत ही होंगे। बॉलीवुड के अपराधीकरण और मज़हब से नफऱत की जड़ में यही फंडिंग है।

सुशांत की हत्या भी इसी की एक कड़ी है। कंगना, रवि किशन या ऐसे तमाम कलाकारों पर जो हमले हो रहे है वो सभी इसी की कडिय़ां हैं। अच्छी बात ये है कि अब जनता सब जानती है और पब्लिक सेंटिमेंट धीरे-धीरे बदल रहा है। सुशांत के मामले में न्याय के लिए जैसा अपार जनसमर्थन मिला वो एक सकारात्मक शुरुआत है। और यही कारण है गैंग की बौखलाहट का। उन्हेंं पता चल चुका है कि उनकी पोल धीरे धीरे ही सही, खुल रही है। अब वो जमाना गया जब कोई 'पाकिस्तानी बच्चों को पाकिस्तान पहुंचाने बिना वीज़ा के पाकिस्तान पहुंच जाए और पूरा पाकिस्तान उन्हेंं सर आंखों पर बैठा ले या प्यार की ख़ातिर वायुसेना का एक नौजवान आफ़सिर पाकिस्तानी जेल में रहे और वहां की एक नरम दिल वकील उसे छुड़ाने के लिए उसका केस लड़ेÓ जैसी फिल्में बना कर बेवक़ूफ़ बनाते थे और करोड़ों कमाते थे। आज हर भारतीय को कूलभूषण जाधव और अभिनंदन याद है। इसीलिए ये इतने हैरान परेशान होकर दूसरों को गालियां दे रहे हैं। खुद को बचाने के लिए आमची मुंबई और मराठी अस्मिता की बातें करने लगे हैं क्योंकि बचाव के लिए इनके पास कोई और तर्क नहीं है। अभी और तमाशे होंगे, बस आप देखते जाइये। भरपूर मनोरंजन भी होगा। बस आप टिके रहिएगा और इनके मनसूबों को कामयाब नहीं होने दे क्योंकि पहले भी नशा था आज भी नशा है, पहले भी नशे का पैसा था आज भी नशे का पैसा है।

-लेखक के ये निजी विचार हैं।

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