झारखंडी राजनीति की फितरत

Johar

श्याम किशोर चौबे


झारखंड की राजनीति एक लाइन में लिखनी हो तो बस इतना ही काफी है, इसकी फितरत चुनाव पूर्व मैदान में और इसके बाद विधानसभा में दिलचस्प मोड़ लेती रही है। न चुनाव तक चैन, न चुनाव के बाद। बेचैन राजनीति राज्य को जितनी तसल्ली दे सकती है, उतना झारखंड को दे रही है। परिणाम, ब्यूरोक्रेसी में बार-बार बदलाव, वक्र्स और खैरात वाले विभागों में खूब दिलचस्पी, राशि का एकतरफा प्रवाह और जनता जनार्दन के हिस्से में सपने। हर पांच वर्ष पर जब ये सपने टूटते हैं तो कम से कम आधे विधायक, कतिपय मंत्री और यहां तक कि मुख्यमंत्री भी धूल में लोटते नजर आने लगते हैं।

सोने की खान में बालू के भी लाले

पलटकर देखते हैं तो लगभग बीस साल पहले 15 नवंबर 2000 को बिहार से काटकर झारखंड नामक ‘सोने’ की जो खान यहां के निवासियों को सौंपी गई थी, उसकी अधिकतर खान-खदानें बंद पड़ी हैं और बहुतेरे नये राजनीतिक चेहरे दपदपा रहे हैं। अफरातफरी के माहौल में केंद्र का मंत्री पद छुड़वाकर जिन बाबूलाल मरांडी को भाजपानीत सरकार का मुख्यमंत्री बनाया गया था, वे बीच के 13-14 वर्षों तक ‘तलाक’ के बाद फिर भाजपा में वापस हो गये हैं। नेता प्रतिपक्ष बनाये जाने की उम्मीदें स्पीकर चेयर से उलझी हुई हैं। भाजपा की आंतरिक राजनीति में उलझकर इन्होंने राज्य के शीर्ष पद से दो वर्षों में ही तौबा कर ली थी और अगले दो-तीन वर्षों बाद तो ‘तलाक, तलाक, तलाक’ कह दिया था।

इनकी कुर्सी जिन अर्जुन मंुडा ने संभाली थी, छह वर्ष पीछे जनता ने उनको गृह वास दे दिया था। फिलहाल वे केंद्र में मंत्री हैं। मुंडा महाशय झारखंड के पहले चुनाव के बाद नौ दिनों के हिलहवाले के पश्चात दोबारा मुख्यमंत्री बने तो पूर्व में उनके ही दल के रहे को-आॅपरेटिव मंत्री मधु कोड़ा से एक सड़क के मसले पर उनका बिगाड़ हो गया। ...और इस नवोदित राज्य की राजनीति में अजीब मोड़ भी आया, जब 18 सितंबर 2006 को बतौर निर्दलीय विधायक बहुत आन, बान, शान के साथ मधु कोड़ा मुख्यमंत्री बन गए। जाहिर है, सदन में नेतृत्व का राजनीतिक गोत्र बदल गया था। एनडीए की जगह यूपीए की सरकार आ गई थी। 18 मार्च 2003 को जब अर्जुन मुंडा पहली मर्तबा मुख्यमंत्री बनाये गये थे, उसके पहले भी ऐसा ही खेल हुआ था। फर्क इतना ही था, तब यूपीए का पेंच नहीं था। सारी सिर फुटव्वल एनडीए में ही हुई थी। बाबूलाल के एक पक्षकार ने स्पीकर टेबल पर लहरा रहा तिरंगा तक गुस्से में उलट दिया था।

बेचारे कोड़ा

खैर, कोड़ा महोदय का कार्यकाल बहुत निरापद नहीं बीता। उनके सिर पर ताज रखनेवाली कांग्रेस आरंभिक दिनों से ही उनको लपेटे में लेती रही। फल यह हुआ कि 2008 का अगस्त बीतते-बीतते उनको अपदस्थ कर दिया गया और तत्कालीन झामुमो प्रमुख सांसद शिबू सोरेन की ताजपोशी करते हुए उनकी जगह पर आसीन करा दिया गया। शिबू की राह भी आसान साबित न हुई। कुर्सी बनाये रखने के लिए वे तमाड़ विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में उतरे लेकिन हार गए। बिहार से अलग कर पृथक झारखंड राज्य के गठन के लिए सर्वाधिक प्रचंड आंदोलन करने वाले इस राजनेता के साथ ऐसा संयोग दूसरी मर्तबा जुड़ा, जब हाथ लगी कुर्सी खिसक गई। इसके पहले 2005 के चुनाव के बाद उनको मुख्यमंत्री बनाया गया था लेकिन सदन ने उनका साथ नहीं दिया। वे उस समय महज नौ दिनों के मुख्यमंत्री साबित हुए थे। इस बार लगभग पांच महीने वे सत्ता शीर्ष पर रह सके।

यह सरकार, वह सरकार

राष्ट्रपति शासन के बाद झारखंड की राजनीति यहां से भी एक मोड़ लेती है क्योंकि दिसंबर 2009 की कड़कड़ाती ठंड में चुनाव परिणाम आया तो एक बार फिर त्रिशंकु विधानसभा ही उभरी। जोड़-तोड़ शुरू हुई तो भाजपा के फायर ब्रांड नेता रघुवर दास ने झामुमो को पटाया और उसी गुरुजी यानी शिबू सोरेन की बतौर मुख्यमंत्री ताजपोशी कराई, चुनाव में जिनकी बखिया उधेड़ने में कोई कसर बाकी न रखी थी। इस कारीगरी के एवज में रघुवर उपमुख्यमंत्री बना दिए गए। शिबू भले ही लोकप्रिय नेता हैं लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान की कुर्सी ने कभी उनको साबित नहीं करने दिया। इस बार भी उसने छह महीने बाद मई की आखिरी चिलचिलाती धूप में उनको बेदखल कर दिया। ऐसा लगता है मानो झारखंड आंदोलन के इस बेजोड़ हीरो के नसीब में सत्ता लिखी ही नहीं, जो लिखी भी है, उसकी स्याही बहुत पनीली है क्योंकि कोयला मंत्री रहते भी उनके साथ ऐसा ही खेल हुआ था। सौ जमा दो दिनों के राष्ट्रपति शासन के बाद उभरे सियासी समीकरण ने बाजी पलट दी। हुकूमत झामुमो के बजाय भाजपा की हथेलियों पर रख देनी पड़ी। बागडोर संभालने के लिए भाजपा ने दिल्ली से अर्जुन मुंडा को भेजा। सूबे की सियासत का यही वह प्रस्थान बिंदु था, जहां झामुमो और उसके राजकुमार हेमंत सोरेन का भविष्य सुनहरे हर्फों में लिखा जाने लगा।

बेशक, इस बार झामुमो भाजपा के साथ छोटे भाई की भूमिका में आया और उसकी एक्टिव कमान नये-नवेलेे हेमंत सोरेन को बतौर डिप्टी सीएम सौंपी गई। इसी मौके ने उनकोे सत्ता प्रतिष्ठान के दांव-पेंच सीखने का मौका भी दे दिया गया। 28 महीने तक अर्जुन मुंडा के साथ साये की तरह रहे नौसिखुआ समझे जा रहे उनके डिप्टी हेमंत सोरेन ने जनवरी 2013 की 17वीं तारीख को गुनगुनी धूप में धीरे से जोर का झटका देते हुए समर्थन वापस ले लिया। जाहिर है कि फिर राष्ट्रपति शासन लग गया और झारखंड की राजनीति दिल्ली शिफ्ट कर गई। छह महीने बीतते-बीतते बरसात के आरंभिक दिनों में 13 जुलाई को हेमंत दिल्ली से लौटे तो राजकुमार से उनका ओहदा तरक्की कर राजा का हो चुका था यानी उस दिन उनकी मुख्यमंत्री के बतौर ताजपोशी हुई। इस बार साथ था कांग्रेस का। उनकी कुर्सी की मियाद 18 महीने से दस दिन कम तय थी क्योंकि दिसंबर’14 में चुनाव परिणाम आना था। इन डेढ़ वर्षों में बंदे ने थोड़ा बेहतर करके दिखाया तो चेहरा चमक उठा। यहीं से लोगबाग कहने लगे, बेटा बाप से भी गोरा।

रघुवर का उभार

इस प्रकार चैथी विधानसभा के लिए नवबंर-दिसंबर 2014 में चुनाव हुआ तबतक पूरे हिंदुस्तान की सियासत जबर्दस्त करवट ले चुकी थी। कांग्रेस पर्दे की ओट में धकेल दी गई थी और नरेंद्र मोदी का प्रत्याशित उभार हो चुका था। झारखंड भी नए किस्म के राष्ट्रवाद के झूले में झूल रहा था। जो परिणाम आये, वे चैंकानेवाले कतई न थे। एनडीए की जूनियर पार्टनर आजसू को हालांकि चार ही सीटें मिली थीं किंतु भाजपा ने अकेलेदम 37 सीटें हासिल कर इतिहास रच दिया था और कांग्रेस महज छह सीटों पर सिकुड़ गई थी, जबकि वर्चुअली हेमंत के नेतृत्व में झामुमो ने 2009 के सापेक्ष एक सीट अधिक हासिल की थी लेकिन संख्या तो 19 ही थी। यह बात जरूर हुई कि हेमंत को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी हासिल हो गई। अर्जुन मुंडा चुनाव हार चुके थे और दिल्ली सहित पूरे देश में मोदी-शाह की जोड़ी का बोलबाला था। इसलिए मुख्यमंत्री पद पर रघुवर दास का आसीन कराया जाना लाजिमी था। रघुवर ने एक नया दांव चलते हुए बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम के छह विधायकों को भाजपा में शामिल करा लिया। जेवीएम के आठ विधायक चुनकर आए थे, हालांकि खुद बाबूलाल चुनाव हार गए थे। स्पीकर न्यायाधिकरण में संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत दलबदल का मामला लगभग पूरे कार्यकाल तक खिंचा। जैसी कि उम्मीद थी, फैसला बाबूलाल के पक्ष में आया और वे हाईकोर्ट पहुंच गए। इस बीच पांचवीं विधानसभा के लिए नवंबर-दिसंबर 2019 का चुनाव आ गया।

हेमंत दमके, रघुवर अस्त

इस चुनाव में रघुवर खुद ही हार गए। पूर्वी जमशेदपुर में 25 वर्षों का उनका बना बनाया सियासी किला ध्वस्त हो गया। हराया किसने? उनके ही मंत्रिमंडल और दल के सदस्य सरयू राय ने। राय पश्चिमी जमशेदपुर से चुनाव लड़ा करते थे लेकिन रघुवर सरकार के पूरे कार्यकाल में दोनों के बीच जो तनातनी चलती रही, उसका परिणाम यह हुआ कि सरयू का टिकट दांव पर लग गया और वे भाजपा को टा-टा कह रघुवर की परंपरागत सीट पर बतौर निर्दलीय लड़ गए। छह महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव जीतकर अर्जुन मुंडा एक बार फिर दिल्ली पहुंच गए और मंत्री भी बन गए। बाबूलाल इस बार चुनाव तो जीत गए लेकिन खुद समेत महज तीन सदस्यों के संग ही। उधर हेमंत का पूरे चुनाव में डंका बजता रहा। ‘बेटा बाप से भी गोरा’ साबित करते हुए वे 30 सीटें निकाल अव्वल साबित हुए। उनके साथी कांग्रेस ने 16 और राजद ने एक सीट निकाली। इस प्रकार 81 सदस्यीय सदन में कुल जमा 47 सीटों के साथ झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने 56 इंच का सीना कर सरकार बना लिया।

बाबूलाल इस बीच मोदी के संपर्क में आ गए और अपने दल का भाजपा में विलय करा दिया। इसके ठीक पहले अतिरिक्त सावधानी और सहृदयता बरतते हुए उन्होंने अपने बुरे दिनों के साथी प्रदीप यादव और बंधु तिर्की को दल से निकाल दिया ताकि वे जहां चाहें जाएं। ये दोनों भाजपा में जाने को तैयार न थे। पेंच यहीं फंस गया। तमाम सावधानियों के बावजूद स्पीकर ने बाबूलाल को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता नहीं दी है। उन्होंने यह मसला लीगल ओपिनियन के लिए भेज दिया है। इसके पहले की तीन विधानसभाओं के कार्यकाल में दलबदल होते रहे और उन पर प्रायः अंत-अंत तक सुनवाइयां चलती रहीं। स्पीकर चेयर की यही महिमा है। पहली विधानसभा में तो प्रतिपक्ष का वैसा कुछ न रहा लेकिन सत्ता पक्ष के घटक ही तमाशे करते रहे। कश्मकश यहां तक थी कि कतिपय सदस्य ट्रेजरी बेंच से उठकर अपोजिशन बेंच पर बैठने में भी नहीं चूके।

तलवार से भी धारदार दल-बदल

बीस वर्षों के झारखंड के इतिहास में दल-बदल तलवार से भी तेज धारदार राजनीतिक हथियार साबित हुआ। इसकी पेचीदगियों को देखते हुए काट के बतौर राष्ट्रीय स्तर पर हाल-फिलहाल एक नया नुस्खा आजमाया जाने लगा है, विधायकों का इस्तीफा कराकर अपने दल में शामिल करा लेना और उपचुनाव में उनको जैसे-तैसे जीत दिला देना। कोविड-19 ने भले ही बचत की सीख दी हो लेकिन चाहे दल-बदल हो कि इस्तीफा-इस्तीफा का खेल, दोनों बेहद खर्चीले हैं। आम आदमी भले ही रोटी-सब्जी की जगह रोटी-नमक से काम चला ले लेकिन गांधी, विनोबा, नेहरू, जेपी, लोहिया, एसपी मुखर्जी और अटल-आडवाणी के देश की राजनीति राजशाही हो गई है, जिसमें खर्च की कोई सीमा नहीं। झारखंड तक कोरोना वाॅयरस के अदृश्य पांव तो आ गए हैं लेकिन इस्तीफे का खेल अभी नहीं पहुंचा है लेकिन कोरोना की नाईं उसके अंदेशे से कोई बेफिक्र भी नहीं है।

क्या खोया, क्या पाया

बीस वर्षों में झारखंड ने क्या-क्या खोया-पाया? साढ़े चार हजार करोड़ का सरकारी बजट 86 हजार करोड़ और इसके ठीक समानांतर 86 हजार करोड़ कर्ज तक पहुंच गया। 14 वर्षों तक राजनीतिक अस्थिरता के बाद राजनीतिक स्थिरता ने दस्तक दी। यही वह दौर था, जब विधानसभा के एक-एक कार्यकाल में तीन-तीन, चार-चार सरकारें बनीं और गिरीं, राष्ट्रपति शासन भी लगा लेकिन क्या मजाल जो पट्ठों ने एक बार भी मध्यावधि चुनाव की नौबत आने दी हो। उसी में उलटफेर कर दूसरी, तीसरी और चौथी सरकार बनाते रहे। सपनों के झारखंड में अंधाधुंध शहरीकरण का जलवा रहा। गांव अपनी किस्मत पर संतुष्ट रहे। चुनाव के ऐन पहले दिल और दल बदलना एक तरह से शगल बन गया, हालांकि चुनाव बाद भी इसकी चहल-पहल रहती है। स्वर्ण भंडार भले ही सामने नहीं आ सका, बालू पर भी आफत हो गई। हर सरकार पिछली वाली को भ्रष्ट साबित करने में कोई चूक नहीं करती, यानी भ्रष्टाचार वाला तत्व स्थायी भाव बन चुका है। राजनीति सर्वथा अविश्वसनीय हो चुकी है लेकिन दूसरे नगरों/राज्यों में रोटी की तलाश में गए तकरीबन छह लाख झारखंडियों को कोरोना काल में ट्रेन-प्लेन से घर ले आने और रिवर्स माइग्रेशन के समय मजदूरों को राज्य की शर्तों पर भेजने का नेक कार्य कर हेमंत सोरेन ने जो नाम कमाया है, वह राज्य को आगे ले जाने में भी कायम रहे तो राजनीतिक विश्वसनीयता भी कायम हो सकेगी।

------- केतात, पलामू मेें जन्म। डालटनगंज, अब मेदिनीनगर में गे्रजुएशन करने के दौरान से ही पत्रकारिता से जुड़ाव। रांची में पीजी-हिंदी करने के समय दैनिक रांची एक्सप्रेस से जुड़े। इसके बाद दैनिक आवाज, दैनिक देशप्राण, दैनिक झारखंड जागरण होते हुए दैनिक जागरण के राज्य ब्यूरो चीफ पद से सेवानिवृत्त। ‘हिंदी इंडिया टुडे’ सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में फ्रीलांसिंग भी। न्यूज-18, एबीपी आदि खबरिया चैनलों में वाद-विवाद में भी शरीक।

 

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