झारखंड के गुमनाम क्रांतिकारी



-हिमकर श्याम

कोरोना महामारी की वजह से आज़ादी की सालगिरह पर सांस्कृतिक आयोजन तो नहीं होंगे लेकिन जश्ने आजादी को लेकर उत्साह में कमी नहीं रहेगी। हम ऐसे तमाम नायकों को याद करेंगे, जिन्होंने देश की आजादी में अपनी आहुति दी। जंगे आजादी के मशहूर नायकों को तो सब जानते हैं, मगर हजारों गुमनाम क्रांतिकारियों को बहुत कम लोग जानते हैं जिनके बलिदानों, संघर्षो और त्यागों को भुला दिया गया या जिनके बारे में लोगों को पता ही नहीं है। उन भूले-बिसरे नायकों को जानना और याद करना हर भारतवासी का कर्तव्य है जिन्होंने मातृभूमि को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उन गुमनाम सिपाहियों में कुछ नाम ऐसे हैं जिनका त्याग, जिनकी आहूति उन नामों से अधिक मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण रही है, जिन्हें इतिहास से स्थान मिलता है।

झारखंड में भी अनेक गुमनाम सिपाहियों को इतिहास के पन्नों पर वह जगह नहीं मिल पायी, जिनके वे हकदार थे। उन गुमनाम सिपाहियों ने झारखंड के कोने-कोने में अलग-अलग रूपों में आजादी की जंग लड़ी। जिसमें हजारों सिपाही शहीद हुए, न जाने कितनों को बंदी बना लिया गया। इतिहास लेखन में उन गुमनाम सिपाहियों के साथ घोर अन्याय किया गया है।
झारखंड में 1857 के महाविद्रोह से आजादी की जंग के दौरान कालापानी की सजा भुगतने वालों में सैकड़ों क्रांतिकारी शामिल हैं। इनमें ज्यादातर क्रांतिकारी गुमनाम ही रहे और इतिहास में स्थान नहीं पा सके। इनमें कंचन सिंह, सूरज मांझी, सोना मांझी, चुनमुन, विसो सिंह, हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती प्रमुख हैं।

बंगाल प्रेसिडेंसी के विभिन्न जेलों में से कुल 55 कैदियों को अलीमुर जेल से अंडमान जेल भेजा गया था। इसमें बिहार-झारखंड के 32 कैदी शामिल थे। इन पर विद्रोह, डकैती, लूट और हत्या के आरोप थे।

सूरज मांझी पर अंग्रेजों ने भाषण के माध्यम से उत्तेजना फैलाने का आरोप लगाया था। 13 नवंबर 1857 को उन्हें कालापानी की सजा दी गयी। सोना मांझी पर भी इसी तरह का आरोप था। 13 अप्रैल 1858 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी। कालापानी की सजा देने के बाद उन्हें 14 अक्तूबर 1858 को अंडमान जेल पहुंचाया गया। कंचन सिंह बड़ामहल के जमींदार थे। रामगढ़ बटालियन के विद्रोह के दौरान उन्होंने विद्रोहियों का साथ दिया था। चुनमुन हजारीबाग के रहनेवाले थे। उनपर विद्रोहियों को मदद करने का आरोप था।

झारखंड के वीर सिपाही ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ 17 वीं शताब्दी से ही लड़ते चले आ रहे थे लेकिन उनके नाम और वीरता को इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं किया गया। इन क्रांतिकारियों को उनके गाँव-पंचायत के लोग भी नहीं जानते। सरकारी दस्तावेजों में भी अधिकांश का नाम दर्ज नहीं है। सूबे की सरकारों ने तो उन्हें भूला ही दिया। झारखंड की धरती पर 1766 का पहाड़िया विद्रोह रमना अल्हाड़ी के नेतृत्व में शुरू हुआ था। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पूरा झारखंड सुलह उठा। रमना अल्हाड़ी के प्रमुख सैन्य अधिकारी थे करिया पुजहर। रमना की हत्या के बाद उन्होंने भूमिगत होकर पहाड़ियों को संगठित किया और अपने लड़ाकू साथियों का नेतृत्व किया। चेंगरू सांवरिया और पांचगे डोम्बा पहाड़िया के साथ मिलकर 1772 में राजमहल के उधवा नाला के निकट अंग्रेजों को पराजित कर रमना अल्हाड़ी की हत्या का बदला लिया। रमना अल्हाड़ी ने विद्रोह की जो चिंगारी सुलगाई थी वह आनेवाले 200 वर्षों तक जलती रही। पटना स्थित अभिलेखागार में संताल परगना के पर्चे, पुस्तकें व स्वतंत्रता सेनानियों की जो डायरियाँ उपलब्ध हैं उनमें संताल के इन गुमनाम सिपाहियों और शहीदों का जिक्र मिलता है। इनमें रमना अल्हाड़ी, करिया पुजहर, सरदार चेंगरू सांवरिया, पांचगे डोम्बा पहाड़िया, जबरा पहाड़िया गुरू धरमा पहाड़िया, भगीरथ सरदार, अर्जुन गृही समेत कई सिपाहियों के नाम दर्ज हैं। पहाड़िया योद्धा दूसरे महायुद्ध में सुभाषचन्द्र बोस के साथ भी थे।

1779 में चुआड़ का दूसरा विद्रोह हुआ, जिसकी वागडोर चुआड़ की रानी शिरोमणि के हाथ मे थी। रानी ने 124 गांवों को संगठित किया। जमींदारों के घरों पर हमले किये। मिदनापुर में अंग्रेजी सेना और रानी की सेना के बीच युद्ध हुआ जिसमें काफी अंग्रेज सैनिक मारे गये। मिदनापुर में ही रानी को कैद कर लिया गया, फिर धोखे से मार दिया गया। उधर पोराहट के राजा अर्जुन सिंह के नेतृत्व में सिंहभूम के हजारों ‘हो’ वीर, गोनो हो, डबरु मानकी, खरी तांति आदि ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया था। 15 फरवरी, 1858 को अर्जुन सिंह को धोखे से गिरफ्तार किया गया।

1856 में हजारीबाग के संतालों का एक भीषण विद्रोह हुआ था। इस विद्रोह के नेता लुबिया मांझी और बैरू मांझी थे। इनमें कई ऐसे संताल थे जो 1855 के विद्रोह में भी शामिल थे। तब संतालों ने हजारीबाग, खड़गडीहा, बेरमो के आसपास विद्रोह कर दिया था। उस संताल विद्रोह के नेता थे रुपु मांझी, अर्जुन मांझी। यह विद्रोह गोला, चितरपुर, पेटरवार और पुरुलिया तक फैल गया था। अंग्रेजों ने रुपु मांझी के घर को फूंक दिया था। हूल विद्रोह के समय वीरभूम जिले के कातना गांव लूटने के आरोप में कुरान मांझी, विसु मांझी, रूसो मांझी, मोहन मांझी, बागुद मांझी, कालू मांझी, कांचन मांझी, धुनाय मांझी, सिंगराय मांझी और लुकुन मांझी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था।
1857 की क्रांति का सबसे बड़ा और निर्णायक युद्ध चतरा में हुआ था। 1760 से 1834 तक चतरा छोटानागपुर का प्रशासनिक मुख्यालय था। 1857 में चतरा में ही छोटानागपुर में फांसी का पहला स्थान बना। 3 अक्टूबर 1857 को चतरा में 150 सैनिक मारे गये थे। 4 अक्टूबर को सूबेदार जयमंगल पांडेय और नादिर अली खां को फांसी दी गयी। 77 क्रांतिकारियों को एक ही गड्ढे में दफन कर दिया था, जबकि 77 क्रांतिकारियों को आम के पेड़ों पर लटकाकर फांसी दी गयी थी। जयमंगल पांडेय व नादिल अली साह के बारे में कुछ जानकारी तो लोगों को मिल जाती है, लेकिन उनके साथ शहीद करीब 150 अन्य क्रांतिकारियों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसी तरह 20 अक्टूबर 1857 को रांची में 20 क्रांतिकारियों और 24 अक्टूबर 1857 को 23 क्रांतिकारियों को फांसी दी गयी। चतरा युद्ध की विजय ने ही हजारीबाग जिले में आंदोलन को कुचल दिया।

पलामू का राजहरा गांव का नाम भी इतिहास के पन्नों से गायब है। 1857 की क्रांति में विद्रोहियों द्वारा बंगाल कोल फैक्ट्री राजहरा में आग लगा देने और उनकी मशीनों को क्षतिग्रस्त कर देने के बाद अंग्रेजों ने इलाके के 500 लोगों को बरगद के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी गयी थी। इस बड़ी घटना का जिक्र अधिकांश इतिहासकारों ने नहीं किया है। सिर्फ बंगाल गजट में इस घटना का जिक्र है। पलामू के इतिहास के लेखक हवलदारी राम गुप्त ने भी अपनी पुस्तक में इस बात का जिक्र किया है।
झुमरी तिलैया की धरती एक ऐसे दंपत्ति की गवाह रही है जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी ज़िंदगी की बाज़ी लगा दी और दशकों तक उन्हें जेल की सलाखों के पीछे यातनाएँ सहनी पड़ीं। हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती और लिली चक्रवर्ती की ज़िंदगी गुमनामी में गुज़री। हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती को ब्रितानी सरकार नें 'अथ्राबाड़ी मेल ऐक्शन' कांड के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया था। वह कई साल तक देश की विभिन्न जेलों में बंद रहे। फिर उन्हें कालापानी की सज़ा सुना दी गयी और अंडमान स्थित सेलुलर जेल भेज दिया गया। पति के जेल जाते ही लिली चक्रवर्ती ने क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और 1941 में उन्हें बांग्लादेश के चटगाँव में हुए शस्त्रागार लूट कांड के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया गया था। वह 1952 तक बांग्लादेश की बोरिशाल जेल में क़ैद रहीं।


भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की पहल पर लिली चक्रवर्ती को बांग्लादेश की जेल से रिहा किया गया। उनकी सुध लेना तो दूर मौत पर शोक तक जतानेवाला कोई नहीं था। 1930 में गांधी जी के आह्वान पर स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले बोकारो जिले के हंसलता गांव के पूरबटांड़ टोलावासी स्वतंत्रता सेनानी चुनू महतो को ऐसे ही भूला दिया गया। चुन्नू 1934 व 1942 में दो बाद जेल गये। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गोमिया थाना पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर हजारीबाग सेंट्रल जेल भेजा। यहां इन्हें कठोर दंड दिया गया। इसके बावजूद उनमें देशप्रेम का जज्बा कम नहीं हुआ।

1857 के विद्रोह के समय छोटानागपुर क्षेत्र में शहीद जीतराम ने बेदिया टिकैत उमरांव सिंह, शेख भिखारी ने एक साथ ओरमांझी के मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला था। 1858 को शहीद टिकैत उमरांव सिंह और शेख भिखारी को गिरफ्तार कर फांसी दे दी गयी। उस समय शहीद जीतराम अंग्रेजों की पकड़ से बाहर रहे और आंदोलन को जारी रखा। अपनी छापामार युद्ध कला और संगठनात्मक क्षमता के कारण जनता ने भी जीतराम का साथ दिया और कई बार लड़ाकू साथियों की मदद से अंग्रेजों पर धावा बोला और उनकी नींद हराम कर दी। 23 अप्रैल 1858 को गगारी और खटंगा गांव के बीच मेजर मेकडोनाल्ड की फौज ने जीतनाथ बेदिया और उनके साथियों को घेर लिया। आत्मसमर्पण नहीं करने पर मेजर के आदेश पर जीतराम बेदिया को उसके घोड़े सहित गोली मार दी गयी और उनके शव व घोड़े के शव को साथ में एक गड्ढे में दफना दिया गया।

बिरसा के उलगुलान के दौरान एक बड़ी घटना घटी थी। तत्कालीन रांची जिला के गुटूहड़ निवासी मंगन मुंडा के पुत्र हतिराम मुंडा को अंग्रेजों ने जिंदा दफन कर दिया था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जिंदा दफन करने का शायद ही कोई दूसरा उदाहरण हो।

 

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