और तब से गांधीजी महात्मा कहलाये



श्री कैलाशनाथ मेहरोत्रा

इतिहास का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि संसार में समय-समय पर महान आत्माओं ने उत्पन्न होकर अपनी अमृतवाणी से जगत को प्रेम और शांति का संदेश दिया। भगवान राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध, कन्फ्यूसियस, जीसस क्राइस्ट आदि ने अपने चरित्र से तत्कालीन संसार पर प्रभाव डाला।
बीसवीं शताब्दी में गांधीजी का आविर्भाव हुआ, जिन्होंने युग को जो नया मोड़ दिया वह इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसके विचारों का अनेक देशों के राजनीतिक विकास में प्रभाव पड़ा है।
राजनैतिक संघर्षों के सेनानी के रूप में उनके सार्वजनिक जीवन को दो कालों में विभाजित किया जा सकता है-

1-दक्षिण अफ्रीका काल-जो सन 1893 से 1914 तक रहा।
2-हिंदुस्तान काल-जो सन 1915 से 1948 तक रहा।


दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए उन्होंने प्रवासी भारतीयों की दयनीय दशा तथा सुधारने के लिए सत्याग्रह के द्वारा जो महत्वपूर्ण कार्य किया, उससे वे प्रसिद्धि में आये और सन 1914 के मध्य तक एक सत्याग्रही नेता के रूप में सुप्रतिष्ठित हो गये।

हिंदुस्तान में बुद्धिजीवी लोग उन्हें साधारण श्रेणी के मनुष्यों से अलग, एक कल्याणकारी संत के रूप में मानने लगे।
18 जुलाई 1914 को गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका छोड़ दिया और अपने गुरु गोपालकृष्ण गोखले से मिलने इंग्लैंड गये। वहां कई माह रहने के पश्चात नौ जनवरी 1915 को वे बंबई आये।
जनवरी के द्वितीय सत्पाह में वे काठियावाड़ गये। वहां राजकोट, पोरबंदर और घोराजी की 10 दिवसीय यात्रा करते हुए उन्होंने 24 जनवरी को गोंडल पहुंचकर वहां 4 दिनों तक ठहरने का निश्चय किया।


गांधीजी के गोंडल पहुंचने की पूर्व सूचना राज्य के दीवान श्री रणछोड़दास, वृंदावनदास तथा वैद्यराज श्री जीवराम कालीदास को यथासमय प्राप्त हो गयी।

जिस प्रकार गांधीजी ने अपने असीम साहस, त्याग और विजय दृढता आदि गुणों से, दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों के प्रति अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर, राजनीतिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त की, उसी प्रकार वे भविष्य में, हिंदुस्तान में, महान कार्य साधेंगे और देश का गौरव बढ़ाएंगे-ऐसी अंत:प्रेरणा उत्पन्न होने पर आचार्य श्रीचरणतीर्थ महाराज ने गांधीजी को एक महापुरुष के रूप में आंका और शीघ्र ही उन्हें 'महात्माÓ पदवी से विभूषित करना उपयुक्त समझा। इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने गांधीजी का विशिष्ट रूप से सम्मान करने के लिए, मानपत्र छपवाया, जिसमें 'महात्माÓ पदवी का समावेश हुआ। यह निश्चय हुआ कि यह मानपत्र, गांधीजी को, रसशाला औषधाश्रम में एक स्वागत समारोह में 27 जनवरी 1915 को भेंट किया जाए।
24 जनवरी 1915 को गोंडल रेलवे स्टेशन पर दर्शकों की बड़ी भीड़ थी। डिब्बे से उतरते ही गांधीजी को पुष्पमाला पहनायी गयी। तदपोरान्त स्टेशन से बाहर आकर वह अपनी धर्मपत्नी कस्तूर बा और बच्चों के साथ चार घोड़ोंवाली बग्घी में बैठ गये। कोचवान ने घोड़े हांके। राज्य का बैंड और पुलिस आगे-आगे चले।

यह दल मुख्य सड़कों पर चलता हुआ, कन्याशाला के समीप आकर रुका, जहां गोंडल के महाराज श्री भगवत सिंहजी सपरिवार गांधीजी से मिलने आये।
गांधीजी और महाराज साहब अपनी अपनी बग्घियों से उतर पड़े और वे एक दूसरे से गले मिले। सात्विकी प्रकृति और राजसी प्रकृति के दो महानुभावों का वह मिलन अपूर्व था। कुछ समय तक वार्तालाप होने के पश्चात दल पुन: चल पड़ा और डेढ़ घंटे में दीवान साहब के बंगले में पहुंच गया।

25 जनवरी को राज्य के उच्च कर्मचारियों और विशिष्ट व्यक्तियों ने गांधीजी से भेंट।
26 जनवरी को महाराज साहब ने गांधीजी को राजमहल में दावत दी। इसी दिन सायंकाल छह बजे श्री पटवारीजी के बंगले पर गोंडल राज्य और जगत की ओर गांधीजी का अभिनंदन हुआ।
27 जनवरी 1915 को गोंडल की सुप्रसिद्ध रसशाला औषधालय में गांधीजी के अभिनंदन और उनकेा मानपत्र भेंट करने का कार्यक्रम आयोजित हुआ।
5000 श्रद्धालु जन, जिनमें 1000 महिलाएं भी सम्मिलित थीं, रसशाला औषधालय में एकत्रित हुए।
जैसे ही घड़ी में 10 बजे चारों ओर शांतमय वातावरण हो गया। गांधीजी अपनी धर्मपत्नी कस्तूर बा और बच्चों के साथ सभा में आये।

सभा का कार्य पटवारीजी की अध्यक्षता में आरंभ हुआ। पहले पटवारीजी ने गांधीजी के स्वागत में भाषण दिए। तत्पश्चात वैद्यराज जीवराम कालीदास शास्त्री ने नीचे छपे हुए महात्मा पदवी के साथ मानपत्र पढ़ा।
27 जनवरी 1915
महात्मा
की पदवी और मानपत्र
।।श्रीहरिहरो कुरुतां भवतां शिवम्।।
भारत भूषण, दीन दुखहर पुण्यश्लोक
महात्मा श्री मोहनदास करमचन्द गांधीजी
के चरण कमलों में समर्पित
जगद्वंदनीय महात्मा


आप तथा आपकी अखंड सौभाग्यवती धर्मपत्नी श्री कस्तूर बा इस संस्था में पधारे, जिससे रसशाला और विशेष रूप से आयुर्वेद का मान बढ़ा-इस हेतु आप श्रीमान् का तथा पूज्य श्री कस्तूर बा का अन्त:करण से उपकार मानता हूं।

इस प्रसंग में लंबा भाषण देकर आपका समय नष्ट करना अभीष्ट नहीं है। आपका पराक्रम, आत्मभोग और आपके जीवन के प्रत्येक प्रसंग का अवलोकन, मनन करने से ज्ञात होता है कि पूर्व काल के जिन हरिश्चंद्र, श्रीराम, श्रीकृष्ण, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज आदि शिरसा यंद्य विभूतियों का गुणगान भारतवासी गाया करते हैं, उन्हीं में आपका एक चरित्र उभरता है। हिंद में दश दिशाओं में आपका जीवन चरित्र गाया जा रहा है। इतना ही नहीं सारी दुनिया के प्रत्येक देश में आपके चरित्र को आदर मिला है। इस छोटे से मानपत्र में इसका वर्णन कैसे कर सकता हूं? हिंद की सारी जनता आपकी ऋणी है, यही कहना उचित है। मैं आपके गुणानुवाद करने को प्रेरित हुआ हूं। और ब्राह्मण रूप से आपको आशीर्वाद देता हूं।
पुण्यश्लोक देशवत्सल 'महात्माÓ श्री मोहनदास करमचंद गांधी महोदयानां सपत्नीकानां चरणकमलेषु सन्मानपत्रम।
संस्कृत की तीस पंक्तियों में गांधी की महिमा का बखान है।

और फिर...
इस प्रकार रसशाला औषधालय और आयुर्वेद रहस्यार्क मासिक के सहस्रों ग्राहक, मैं और गोंडल की जनता परमात्मा से प्रार्थना करती है।

आज, आपके महान कार्यों से प्रेरित होकर, मैं अपनी संस्था की ओर से आपको महात्मा पदवी और मानपत्र समर्पित करता हूं।
महात्मा जी, आपके शरीर का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, किंतु फिर भी यहां पधारने का कष्ट किया, इसका मैं आपका उपकार मानता हूं।

इस अवसर पर आपके अभिनंदन समारोह में सहयोग प्रदान करने में, दीवान साहब श्री पटवारीजी, महाराज साहब के सेक्रेटरी श्रीप्राणशंकर भाई जोशी, प्राइवेट सेक्रेटरी श्री पानाचंद भाई, श्रीमान देवचंद भाई पारेख, वारिष्टर श्री गौरीशंकर प्राणशंकर व्यास आदि व्यक्तियों का आभार मानता हूं। आपको मानपत्र और महात्मा की पदवी के साथ संस्था की ओर से औषधियों की पेटी और पुस्तकें भी समर्पित करता हूं।

आज मैं इस बात से गर्व और गौरव प्रतीत करता हूं कि दक्षिण अफ्रीका में आपका अभियान सफल हुआ। इससे भारत के यश और सम्मान में अभिवृद्धि हुई है। अब स्वदेश वापस आने पर अपना शेष जीवन देश सेवा और कल्याण में व्यतीत करें।

हिंदुस्तान वापस आने पर आपको सर्वप्रथम मानपत्र समर्पित करने में, मैं अपने को भाग्यशाली मानता हूं। और भी हिंदुस्तान में पैर रखते ही, इस देश हितकारिणी संस्था में पहले पहल पधार कर इसका मान बढ़ाया, इसका मैं आपका और श्री कस्तूर बा का आभार मानता हूं।

आपका
राजवैद्य जीवराम कालीदास शास्त्री
अध्यक्ष, रसशाला औषधाश्रम
और आयुर्वेद रहस्यार्क
विक्रम संवत 1971,


माघ सुदी 12 ता 27 जनवरी 1915, बुधवार, प्रात: 9.30 बजे।
जब वैद्यराज ने मानपत्र पढ़कर उसे चांदी की मंजूषा में रखकर गांधीजी के हाथ में दिया, तो उपस्थित जन समुदाय बड़े प्रेम से महात्मा गांधी की जय बोल पड़ा। इसके बाद अपने अभिनंदन के संबंध में सबको धन्यवाद दिया और कहा-

मैं गोंडल से थोड़ा परिचित हूं, परंतु अपने घनिष्ठ मित्र रणछोड़दास भाई और अपने सहाध्यायी प्राणशंकर भाई जोशी के संपर्क से विदेश में गोंडल की याद बनी रहती थी। यहां रहते हुए धन की आवश्यकता के समय महाराज साहब की भेजी हुई रकम हजारगुणा उपयोगी हुई। दक्षिण अफ्रीका में जो सफलता मिली उसका श्रेय गोंडल महाराज को है। आपकी मदद मुझे समय पर न मिली होती तो परिणाम क्या होता, मैं कह नहीं सकता। यह देश सेवा का एक उज्ज्वल उदाहरण है, जिसका अनुसरण अन्य राजा, महाराजा को करना चाहिए। मैं पटवारीजी, प्राणशंकर भाई और वैद्यराज के मेरे अफ्रीका प्रवास में सहायक होने पर, उनको धन्यवाद देता हूं।

'वैद्यराज, संस्कृत और आयुर्वेद के प्रकांड विद्वान हैं। उनके द्वारा स्थापित रसशाला, आयुर्वेद के द्वारा जनता की सेवा कर रही है। रसशाला की ओर से प्रकाशित साहित्य जनता के लिए बहुत उपयेागी है। मैं कुछ साहित्य अफ्रीका में पढ़ता रहा। ऐसे प्रकांड विद्वान ने मानपत्र में मेरे लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया है, उनसे मुझे बहुत आनंद प्राप्त हुआ है। उन्हें मैं सदा याद रखूंगा।
आयुर्वेद के लिए मेरे मन में बड़ा स्थान है। यह हिंद की प्राचीन विद्या है जो हिंद के लाखों गांवों में बसने वाले करोड़ों मनुष्यों को नीरोग बनानेवाली विद्या है। मैं जनता को आयुर्वेद के आधार पर जीवन बिताने के लिये संस्तुति करता हूं। मैं आशीर्वाद देता हूं कि रसशाला औषधालय और वैद्यराज, आयुर्वेद के द्वारा अधिकाधिक सेवा करने में समर्थ हों।

इस प्रकार अभिनंदन समारोह समाप्त हुआ और तब से गांधीजी महात्मा कहलाए।

सरस्वती, सितंबर 1959

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