हिंदू धर्म पर नेहरु-गांधी परिवार की सोच



अतुल शर्मा

1936 में प्रकाशित जवाहरलाल नेहरु ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि 'संगठित धर्म के प्रति मैने हमेशा दहशत ही महसूस की है। मेरे लिए धर्म हमेशा से रूढि़वादी, संकुचित और शोषण से भरा है जहां तर्क और औचित्य के लिए कोई जगह नही है।Ó

आजाद भारत में धर्म के प्रति नेहरु की सोच की पहली अग्नि परीक्षा अक्टूबर 1947 में हिंदू कोड बिल को लेकर हुआ। अक्टूबर 1947 में संविधान सभा में अंबेडकर ने इसका मसौदा पेश किया और नेहरु ने उसका समर्थन किया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बतौर संविधान सभा के अध्यक्ष इसमें दखल दिया। उनका कहना था कि इस तरह के नियमों पर पूरे देश में जनमत तैयार किया जाना चाहिए और उसके बाद ही कानून बनाया जाना चाहिए। कोड बिल पर विवाद सिर्फ सदन के अंदर ही नहीं था, बाहर भी धर्मगुरु और परंपरावादी समाजसेवक इसका मुखर विरोध कर रहे थे। पर नेहरु ने बिल पास कराने को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया, भले ही इसके लिए सभी आपत्तियों को किनारे क्यों न रखना पड़े। उसी वक्त राष्ट्रपति चुनाव भी होने थे और पटेल चाहते थे कि इस पद पर राजेंद्र प्रसाद निर्वाचित हो। उधर, नेहरु राष्ट्रपति के पद पर उस वक्त के गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को आसीन कराना चाहते थे। कांग्रेस संगठन को इन दोनों में से किसी एक को चुनना था। पटेल और प्रसाद संगठन पर नेहरु के मुकाबले ज्यादा मजबूत पकड़ रखते थे। नेहरु की तमाम आपत्तियों के बावजूद 26 जनवरी 1950 को सुबह 10:24 मिनट पर डॉ राजेन्द्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति बन ही गए।

बात तब की है जब सोमनाथ मंदिर का पुनॢनर्माण की चर्चा शुरू हुई थी। सरदार पटेल, केएम मुंशी और कांग्रेस के दूसरे नेता इस प्रस्ताव के साथ महात्मा गांधी के पास गए। महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि निर्माण के खर्च में लगने वाला पैसा आम जनता से दान के रूप में इकट्ठा किया जाना चाहिए, न कि सरकारी खज़़ाने से दिया जाना चाहिए। लेकिन इसके कुछ वक्त बाद ही महात्मा गांधी की हत्या हो गई और सरदार पटेल भी नहीं रहे। मंदिर को दुरुस्त करने की जि़म्मेदारी केएम मुंशी पर आ गई जो नेहरु सरकार में खाद्य एवं आपूॢत मंत्री थे। साल 1950 के अक्टूबर में सोमनाथ मंदिर के ख़स्ताहाल हिस्सों को ढहाया गया और वहां मौजूद मस्जिद के जैसे ढांचे को कुछ किलोमीटर दूर सरकाया गया।

हिंदू धर्म के प्रति नेहरु का नजरिया तब और ज्यादा तल्ख हो गया जब केएम मुंशी के निमंत्रण पर मई, 1951 में भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर पहुंचे थे और उन्होंने कहा था, 'सोमनाथ मंदिर इस बात का परिचायक है कि पुनॢनर्माण की ताक़त हमेशा तबाही की ताक़त से ज्यादा होती है।Ó ये वही मंदिर था जिसे दर्जनों बार आक्रांताओं द्वारा लुटा और तोडा गया। नेहरु ने राजेन्द्र प्रसाद का इस आधार पर विरोध किया कि एक धर्मनिरपेक्ष देश के राष्ट्रपति को किसी धाॢमक समारोह में शामिल नहीं होना चाहिए पर राजेंद्र प्रसाद, नेहरु की बात से बिल्कुल सहमत नही थे। राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरु को जबाब देते हुए लिखा था कि 'मैं मेरे धर्म में विश्वास करता हूं और मै आपने आप को इससे अलग नहीं कर सकता।Ó नेहरु इस बात से इतने खफा हुए कि उन्होंने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को आदेश दिया कि डॉ राजेन्द्र प्रसाद के भाषण को किसी भी सरकारी माध्यम में जगह न दी जाए। वर्तमान भवन के पुनॢनर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चा तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और पहली दिसंबर 1955 को भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने इसे राष्ट्र को समॢपत किया। नेहरु ने ख़ुद को सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार और पुनॢनर्माण से अलग रखा था और सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र तक लिखा था। उन्होंने कहा था कि सोमनाथ मंदिर परियोजना के लिए सरकारी फ़ंड का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

धर्म के प्रति जवाहरलाल नेहरु और डॉ राजेन्द्र प्रसाद के बीच परस्पर विरोधी विचारों की झलक 1952 में भी देखने को मिली जब डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने काशी में कुछ पंडितो के पांव धो कर पूजा की थी। जवाहरलाल नेहरु ने राजेन्द्र प्रसाद को पत्र लिखकर अपना विरोध जताया था। इसपर डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने ज़बाब देते हुए लिखा था कि 'देश के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति भी उतना ही धाॢमक हो सकता है जितना एक साधारण और अध्येता के उपस्थिति में सभी को नीचे आना पड़ता है।Ó इसके बाद से ही नेहरु तत्कालीन उपराष्ट्रपति सरवपल्ली राधाकृष्णन को ज्यादा तवज्जो देने लगे।

एक बार लालबहादुर शास्त्री जी ने नेहरु जी से अनुरोध किया था कि वे कुम्भ के मेले में स्नान करे, क्योंकि नेहरु एक एैसे चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते है जो प्रयाग के साथ लगा है। पर नेहरु जी ने शास्त्री जी के अनुरोध को ये कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि 'वैसे मुझे गंगा नदी से बहुत प्यार है और मै बहुत बार इसमें डुबकी भी लगा चुका हूं लेकिन कुम्भ के मौके पर ऐसा नहीं करूंगा।Ó नेहरु के विपरीत शास्त्री जी को अपने हिंदू पहचान को कम कर के बताने का शौक नही था लेकिन भारत की धाॢमक एकता पर भी उन्हेंं कभी शक भी नही था। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पार्टी लाइन से हट कर तत्कालीन संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर जी से सलाह लेने में उन्होंने कोई हिचकिचाहट नहींं दिखाई। यही नहीं प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी की पहल पर उन दिनों दिल्ली के यातायात व्यवस्था की जिम्मेदारी संघ के स्वयंसेवक को दी गई थी। लालकृष्ण आडवाणीजी ने भी अपनी आत्मकथा 'मांई कंट्री मांई लाइफÓ में लिखा कि 'नेहरु जी से उलट शास्त्री जी ने कभी भी जनसंघ या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति कभी कोई पूर्वाग्रह नही रखा।Ó

इंदिरा गांधी जब सत्ता में आई तो वो समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की सबसे बड़ी ध्वज वाहक थी। उन्होंने अपना पहला शपथग्रहण भी सत्य और निष्ठा के नाम पर लिया। धर्म के मामले में इंदिरा गांधी की सोच कभी भी अपने पिता जवाहरलाल नेहरु से अलग नही रही। धर्म को लेकर इंदिरा गांधी की सोच सबके पहले गौ रक्षा आंदोलन में दिखी। काफी समय से गौ हत्या पर रोक को लेकर कानून बनाने की चर्चा और आंदोलन पूरे देश में चल रहा था पर इंदिरा गांधी इसे बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दे रही थी। अंत में संत समाज द्वारा 7 नवंबर 1966 को गोपाष्टमी के दिन संसद का घेराव करने की योजना बनाई गई।

सात नवंबर 1966 की सुबह आठ बजे से ही संसद के बाहर लोग जुटने शुरू हो गए थे। उस दिन काॢतक मास, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी, जिसे हम गोपाष्टमी नाम से जानते हैं। गोरक्षा महाभियान समिति के संचालक व सनातनी करपात्रीजी महाराज ने चांदनी चैक स्थित आर्य समाज मंदिर से अपना सत्याग्रह आरंभ किया। करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में जगन्नाथपुरी, ज्योतिष पीठ व द्वारकापीठ के शंकराचार्य, वल्लभ संप्रदाय के सातों पीठ के पीठाधिपति, रामानुज संप्रदाय, मध्व संप्रदाय, रामानंदाचार्य, आर्य समाज, नाथ संप्रदाय, जैन, बौद्ध व सिख समाज के प्रतिनिधि, सिखों के निहंग व हजारों की संख्या में मौजूद नागा साधुओं को पंडित लक्ष्मीनारायण जी चंदन तिलक लगाकर विदा कर रहे थे। लालकिला मैदान से आरंभ होकर नई सड़क व चावड़ी बाजार से होते हुए पटेल चैक के पास से संसद भवन पहुंचने के लिए इस विशाल जुलूस ने पैदल चलना आरंभ किया। रास्ते में अपने घरों से लोग फूलों की वर्षा कर रहे थे। हर गली फूलों का बिछौना बन गया था। नई दिल्ली का पूरा इलाका लोगों की भीड़ से भरा था। संसद गेट से लेकर चांदनी चौक तक सिर ही सिर दिखाई दे रहा था। कम से कम 10 लाख लोगों की भीड़ जुटी थी, जिसमें 10 से 20 हजार तो केवल महिलाएं ही शामिल थीं। जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक के लोग गो हत्या बंद कराने के लिए कानून बनाने की मांग लेकर संसद के समक्ष जुटे थे।

दोपहर एक बजे जुलूस संसद भवन पर पहुंच गया और संत समाज के संबोधन का सिलसिला शुरू हुआ। करीब तीन बजे का समय होगा, जब आर्य समाज के स्वामी रामेश्वरानंद भाषण देने के लिए खड़े हुए। स्वामी रामेश्वरानंद ने कहा, 'यह सरकार बहरी है। यह गोहत्या को रोकने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाएगी। इसे झकझोरना होगा।Ó इतना सुनना था कि नौजवान संसद भवन को धेरने के उद्देश्य से आगे बढने लगे। इतने में अंदर से गोली चलाने का आदेश हुआ और पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। संसद के सामने की पूरी सड़क खून से लाल हो गई। लोग मर रहे थे, एक-दूसरे के शरीर पर गिर रहे थे और पुलिस की गोलीबारी जारी थी। हजारों लोग उस गोलीबारी में मारे गए थे।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा पर इस पूरे गोलीकांड की जिम्मेवारी डालते हुए उनका इस्तीफा ले लिया। जबकि सच यह था कि गुलजारीलाल नंदा गोहत्या कानून के पक्ष में थे और वे खुद भी 'भारत साधु समाजÓ के अध्यक्ष थे और वह किसी भी सूरत में संतों पर गोली चलाने के पक्षधर नहीं थे। गुलजारीलाल नंदा को इसकी सजा मिली और उसके बाद कभी भी इंदिरा ने उन्हेंं अपने किसी मंत्रीमंडल में मंत्री नहीं बनाया।

1977 आते आते इंदिरा गांधी का झुकाव ईश्वर और मंदिरों की तरफ होने लगा। 1980 में संजय गांधी की मौत ने उन्हेंं मंदिरो के चौखटों पर सर पटकने को मजबूर कर दिया। उनमें इस परिवर्तन का श्रेय तत्कालीन रेलमंत्री कमलापति त्रिपाठी को भी जाता है जो धर्म के मामले में कुछ समय तक इंदिरा गांधी के गुरु भी रहे। कमलापति त्रिपाठी के कहने पर इंदिरा गांधी ने नवरात्र में कुमारी कन्याओं के पांव धो कर उस पानी को पिया भी था। अपने ग्रहों को ठीक करने जब इंदिरा गांधी दतिया के बगलामुखी शक्तिपीठ गई । मंदिर परिसर में स्थित धूमावती के मंदिर में जाने पर पंडितो ने इंदिरा गांधी को रोक दिया क्योंकि इस मंदिर में ग़ैर हिंदुओं का प्रवेश वॢजत था और इंदिरा ने फिरोज गांधी से शादी की थी जो पारसी थे। इंदिरा गांधी ने कमलापति त्रिपाठी को फोन कर तुरंत दतिया आने को कहा। कमलापति जी को पुजारियों को मनाने में काफी मुश्किल आई। अंत में उन्होंने पुजारियों से कहा कि मै इन्हेंं लाया हूं इसलिए आप इन्हेंं ब्राह्मण पुत्री मानकर जाने की आज्ञा दें। इंदिरा गांधी दिल्ली में लगातार महरौली स्थित कात्यायनी मंदिर जाया करती थी। 1983 में इंदिरा गांधी ने हरिद्वार में विश्व हिंदू परिषद् के सहयोग से बने भारत माता मंदिर था उद्घाटन किया।

इंदिरा गांधी अपनी धाॢमक गुरु आनंदमयी मां द्वारा दी गई रुद्राक्ष और मोतियों की माला हमेशा पहनती थीं। उनके एक कमरे में कई देवी देवताओं की तस्वीरें और मूॢतया थी और वो यहां बैठकर पूजा करती थीं। उन्होंने बद्री-केदार के साथ-साथ कई दक्षिण भारतीय मंदिरों में पूजा-अर्चना की थी। वैष्णो देवी जाने के साथ-साथ वह कई बार तिरुपति भी गईं।

इंदिरा गांधी के पुत्र राजीव गांधी की मान्यता धर्म में नही थी। धर्म को लेकर राजीव गांधी की पहली अग्नि परीक्षा 1986 में हुई जब अचानक 37 साल से बंद राम जन्मभूमि का ताला खुलने का आदेश एक स्थानीय अदालत द्वारा आया। फ़ैज़ाबाद के एक स्थानीय वकील उमेश चंद्र ने जनवरी 28, 1986 को अदालत में गेट खोलने की मांग लेकर अर्जी दाखिल कर दी जिसे जज ने ये कहकर ख़ारिज कर दिया था कि केस से जुड़े सारे कागजात हाई कोर्ट में पड़े हैं जिसे देखे बिना इसपर किसी तरह का फ़ैसला लेना मुश्किल है। उमेश चंद्र ने इसके खिलाफ 31 जनवरी, 1986 को जि़ला न्यायाधीश के सामने अपील कर दी और जिला जज केएम पांडेय ने अगले दिन ही फ़ैसला सुना दिया।

धारणा है कि राजीव गांधी की सरकार ने (तब उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की ही सरकार थी) विवादित बाबरी मस्जिद का ताला इसलिए खुलवाया था क्योंकि उन्होंने मुस्लिम तलाकशुदा महिला शाहबानो के मामले को संसद से क़ानून लाकर सुप्रीम कोर्ट के गुज़ारा भत्ता पर दिए गए फ़ैसले को उलट दिया था। राजीव गांधी सरकार ने मई, 1986 में मुस्लिम महिला (विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) कानून लागू किया था। ये कानून 23 अप्रैल 1985, को शाह बानो मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को निरस्त करने के लिए लाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भारतीय दंड संहिता की धारा-125 के तहत अलग हुई या तलाक़शुदा बीवी शौहर से भरन-पोषण के लिए पैसे मांग सकती है, मुसलमानों पर भी लागू होता है।

शाहबानो केस में जिस तरह राजीव गांधी ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को सरकारी अध्यादेश से बदल दिया, उससे हिंदू तत्कालीन सरकार से बहुत नाराज़ थे। हिंदुओं की नाराजग़ी कम करने और लोगो का ध्यान शाहबानो प्रकरण से हटाने के लिए एक मुद्दे की तलाश थी और उस वक्त अयोध्या में राम मंदिर का ताला खुलवाने से अच्छा कोई और मुद्दा राजीव सरकार को समझ नही आया।

इसके विपरित राजीव गांधी के तत्कालीन संयुक्त सचिव और दून स्कूल में उनके जूनियर रहे पूर्व आइएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्ला के अनुसार राजीव गांधी को 1 फरवरी 1986 में अयोध्या के राम मंदिर का ताला खुलने की कोई जानकारी नहीं थी और ये सब राजीव गांधी के करीबी और तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अरुण नेहरु की जानकारी में हुआ जो उस वक्त लखनऊ में थे। अरुण नेहरु को मंत्रिमंडल से निकालने की वजह ही अयोध्या थी। पर 1989 के अपने चुनाव की शुरुआत राजीव गांधी ने अयोध्या से की और राम राज्य लाने का वादा भी किया था और ये दिखाने की कोशिश की थी कि वे एक अच्छे हिंदू हैं। ये अलग बात है कि राजीव गांधी ये चुनाव हार गए थे।

-लेखक के निजी विचार हैं।

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