नर-भक्षी बना नर-हितकारी



पी के सिद्धार्थ

मैंनईटर ऑफ़ मनातू
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अपने पुलिस करियर में कई जिलों में पदस्थापित रहा। इनमें अन्य जिले अगर कहानी थे तो तत्कालीन बिहार का पलामू जिला एक उपन्यास था। इसमें कई स्तरों पर सामानांतर चलती हुई कहानियां थीं, और अनेक अलग-अलग चरित्र या किरदार थे। एक और मदन कृष्ण वर्मा, हजारीलाल शाह, परमेश्वरी दत्त झा, पूरन बाबू जैसे चरित्र थे तो दूसरी और इनके ठीक विपरीत अनोखे चरित्र भी थे।

इन्हीं अनोखे चरित्रों में एक थे मनातू के मउआर जो 'मैन ईटर ऑफ़ मनातू' के नाम से प्रसिद्ध थे। पलामू आने के बाद इनके नाम से परिचित हुआ। यह भी पता चला कि इनपर 'मैन ईटर ऑफ़ पलामू' के नाम से एक प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म भी बन चुकी थी।

एक खबर थी कि मउआर कभी एक बाघ को पिजड़े में रखा करते थे, और किसी ने विद्रोह किया या इनके विरोध में कोई बुरा काम किया तो उसे बाघ के पिजड़े में डाल दिया जाता था। शायद ये खबरें इनके पिता जी के सम्बन्ध में थीं, मगर ज़माने के फर्क के बावजूद जनधारणा में कुछ उसी प्रकार के खूंखार सामंती चरित्र वर्तमान मउआर भी माने जाते थे। मैंने सारी कहानियों का सत्यापन तो नहीं किया, मगर यह तो समझ गया कि पलामू में नक्सलवाद के कारकों में ऐसे सामंती चरित्र निश्चित रूप से थे। पलामू के कई सामंतो के पूर्व इतिहास से तो ऐसी कहानियां भी जुडी थीं कि जब जंगल में गरीब औरतें लकड़ी लाने जाती थीं तो उनमें से कुछ को निर्वस्त्र कर के कुछ सामंती तत्त्व उनकी अवमानना और प्रतारणा भी करते थे। पुलिस और प्रशासन तथा राजनीति में दबदबा रखने वाले इन सामंतों के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं होती थी। इस तरह के अपमान का बदला लेने की भावना भी नक्सली पैदा करने के कारकों में एक हुई।

इसलिए, अगर नक्ससलवाद पर नियंत्रण करना था तो सामंती तत्त्वों पर कार्रवाई जरुरी थी। अतः मैंने मनातू के प्रभारी डी एस पी से कहा कि मउआर पर कार्यवाई करने के विधानसम्मत कारण तलाशें। दो-चार दिनों में ही डी एस स पी ने बताया की मउआर के एक पुत्र पर एक गंभीर आपराधिक आरोप था, और उसपर एक वारंट भी लंबित था।

जब लंबे समय तक अपराधी फरार रहता है तो कुछ विहित प्रक्रियाएं पूरी कर उसके घर की 'कुर्की-जब्ती' की जा सकती है। अतः मैंने कुर्की-जब्ती के आदेश दिए। मगर शीघ्र ही मुझे अहसास हुआ कि स्थानीय थानेदार इतना साहस नहीं जुटा पायेगा कि मउआर के घर पहुँच कर उनके घर के सारे सामान जब्त कर सके। वह कुछ कागज़ी प्रक्रियाएं पूरी कर मामले को रफा-दफा कर लेगा। इसलिए मैंने डी एस पी को कहा कि मैं खुद कुर्की- जब्ती करने चलूँगा। डी एस पी ने कहा कि ऐसा तो कभी हुआ नहीं कि कोई एस पी यह कार्य करे; यह तो दारोगा का ही काम है। मैंने कहा की दारोगा ही करेगा, मगर मेरी उपस्थिति में।

अब तक मउआर साहब से मेरी मुलाकात नहीं थी। मैं और डी एस पी मनातू थाने पहुंचे और थानेदार को ले कर मउआर के यहाँ पहुंचे और उनके घर का एक-एक सामान, यहाँ तक कि रसोई के सारे बर्तन भी कुर्क कर लिए। दो पुरानी विंटेज गाड़ियां भी बाहर खड़ी थीं। उन्हें भी जब्त कर लिया गया।

लोगों ने बताया कि यह पहली बार हुआ था कि पुलिस मउआर के घर में घुसी थी। अतः प्रतिक्रिया की आशा की जा सकती थी। मगर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। कोई गोली नहीं चली। वास्तव में मउआर परिवार का कोई सदस्य घर में नहीं मिला। जाहिर है कि पुलिस से ही उन्हें पहले ही खबर मिल गयी होगी।

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मनातू मउआर के घर की कुर्की-जब्ती की कोई प्रतिक्रिया मउआर की ओर से नज़र नहीं आई। इससे जिले की कलक्टर का मनोबल काफी बढ़ा, और जब मैं दो-तीन दिनों की छुट्टी गया तो इस बीच उन्होंने खुद भी उनके घर में छापामारी कर डाली। इस बार प्रतिक्रिया हुई, और मउआर ने कलक्टर पर मुकदमा ठोक दिया, जिससे वे वर्षों तक, पलामू से रुखसत होने के बाद भी, जूझती रहीं। इस घटना ने मेरे मन में उस वक्त कई सवाल खड़े किये। मुख्य सवाल यह था कि इस सामंत ने मेरे ऊपर मुकदमा नहीं डाल कर कलक्टर पर ही क्यों मुकदमा किया? मैंने इस विषय पर कुछ सुधी लोगों और अधिकारियों से चर्चा की। उनका यह मानना था कि मउआर मेरी गतिविधियों और न्याय से प्रेरित अन्य कार्रवाइयों पर निगाह रखे हुए थे, अख़बारों के माध्यम से और जनता के माध्यम से। उन्हें यह स्पष्ट हो गया था कि मैं व्यक्तिगत राग-द्वेष से प्रेरित हो कर, या व्यक्तिगत लाभ के लिए, कोई काम नहीं करता। उनके विरुद्ध मैंने जो कार्यवाई की उसके न्यायोचित कारण स्पष्ट थे। उनके बेटे के खिलाफ वारंट था। उसने गंभीर अपराध किया था। वह फरार चल रहा था। इसलिए कुर्की-जब्ती वैधानिक और उचित कार्रवाई थी। दूसरी और कलक्टर ने जो कार्रवाई की उसके पीछे ऐसा कोई औचित्य नहीं था। उस कार्रवाई को प्रशासन और कलक्टर महोदया के व्यक्तिगत बल-प्रदर्शन के रूप में देखा गया। इसलिए मउआर के मन में अन्याय-पीड़ित होने की भावना बनी।
कलक्टर पर मुकदमा ठोकने के उपरांत मउआर ने मेरे द्वारा अपने विरुद्ध की गयी करवाई का भी एक जबरदस्त प्रत्युत्तर मुझे दिया, जो नितांत अप्रत्याशित था और नितांत असंभावित भी!

शायद यह एक रविवार था, और मैं थोड़े इतमिनान के भाव से अपने आवासीय कार्यालय में बैठा हुआ था। एक अत्यंत वरीय पत्रकार देवव्रत जी भी मेरे कार्यालय कक्ष में बैठे हुए थे। वे पत्रकार कम और मेरे मित्र अधिक थे। गाँधीवादी थे, खादी की फुलपैंट-शर्ट पहनते थे और जब मर्जी मेरे घर-परिवार के सदस्य की तरह पहुंच कर कभी-कभी गप-शप करते थे। चूँकि मैं भी अहिंसा और सत्य व न्याय की बात करता था इसलिए मुझसे अच्छी पटती थी। आज इतवार था, इसलिए हाज़िर थे।

किसी भी वक्त किसी को भी मेरे निवास में आने से नहीं रोकने का मेरा लिखित निर्देश था हाउस गार्ड को। गार्ड सिर्फ व्यक्ति की तलाशी ले कर सुरक्षा के पहलू पर नज़र रखने का अपना वैधानिक दायित्व निभा सकते थे। 8-10 एकड़ में फैला हुआ आवासीय परिसर था। अतः मुख्य गेट पर तलाशी के बाद लंबी दूरी तय करके ही कोई आ सकता था। आने के बाद सिर्फ मेरे आवासीय कार्यालय-कक्ष के बहार खड़ा सिपाही ही उसे रोक सकता था। उस सिपाही ने आ कर कहा कि एक व्यक्ति मिलना चाहते हैं। मैंने कहा, आने दो। जल्द ही ऊपर की और उठी और मुड़ी हुई मूछ वाले एक उम्रदार सज्जन भीतर पधारे। मैंने उन्हें बैठने को कहा और पूछा कि मैं उनकी क्या सहायता कर सकता था। वे बैठ गए। उन्होंने अपना परिचय दिया कि वे मनातू के मउआर जगदीश्वर जीत सिंह हैं। मैंने तब इस ख्यात व्यक्ति को पहली बार देखा। मैंने पूछा, कैसे तशरीफ़ लाये? उन्होंने कहा कि उन्हें मुझसे शिकायत थी कि मैं उनको बहुत बुरा आदमी समझता था। मैं चुप रहा, और उनकी ओर जिज्ञासा भाव से देखता रहा। फिर मैंने देवव्रत जी की ओर देखते हुए कहा : "मैं भगवद्गीता का उपासक हूँ, और यह मानता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर वही परमात्मा स्वयं आत्मा के रूप में विराजमान है, इसलिए मूलतः हर व्यक्ति अच्छा ही नहीं, डिवाइन या दिव्य है - ममैवांशो जीव लोके जीव भूतः सनातनः। अतः मैं यह कैसे कह सकता हूँ कि आप या अन्य कोई भी व्यक्ति बहुत बुरा है? क्यों देवव्रत जी, क्या मैं ऐसा नहीं सोचता और कहता हूँ?"
देवव्रत जी ने सर हिला कर मेरा समर्थन किया।
मउआर साहब के हाथों में एक लंबा कागज़ था, गोल लपेटा हुआ, जैसे दीवार में लटकाने वाले किसी देश का नक्शा हो। मउआर ने उस कागज को मेरे टेबुल पर फैला दिया।

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जब मउआर ने मेरे टेबुल पर अपना कागज फैलाया तो मैंने पाया कि यह गांवों का नक्शा था। मेरा आधा टेबुल उस नक़्शे से भर गया। देवव्रत जी ने भी उस नक़्शे को हैरत से देखा।

"देखिये सिद्धार्थ साहब, यह नक्शा। मेरे अधिकार में 5000 एकड़ जमीन है", कह कर मउआर ने मुझे वे गांव दिखाना शुरू किया जहाँ-जहाँ वे जमीनें थीं। फिर उन्होंने कहा, "ये पाँच हज़ार एकड़ जमीनें मैं आपको देता हूँ। आप जिसे चाहिए दे दीजिये। मुझे यकीन है, आप सही लोगों को देंगे।"

"शुक्रिया मउआर साहब। मगर यदि आपने ये जमीनें गरीबों में खुद बाँट दी होतीं तो नक्सलवादी आपके पीछे इस कदर हाथ धो कर नहीं पड़े होते", मैंने कहा।
"मुझसे मेरी सम्पति कोई जबरदस्ती बंदूक दिखा कर नहीं ले सकता। उसी की कोशिश ये करते रहे हैं", मउआर ने कहा।

मैंने मउआर साहब को चाय पिलाई और कुछ देर की चर्चा के बाद ससम्मान विदा किया। उन्हें छोड़ने बाहरी द्वार तक आया। लौट कर कलक्टर साहिबा को फोन लगाया, और उन्हें उस बात की सूचना देते हुए यह आग्रह किया कि वे जमीनों को गरीबों-भूमिहीनों में तुरंत बंटवाने के लिए आवश्यक कार्रवाई करें। इससे नक्सलवाद के नियंत्रण में मदद मिलेगी। मोहतरमा ने कहा कि उनके पास जमीन की शिनाख्त और माप-तौल करने वाले कर्मियों की बहुत कमी थी, और यह काम तुरंत होने की कोई गुंजाइश नहीं थी। इतनी जमीन बांटने में 5 से 10 साल लग सकते थे।

मैं निराश नहीं हुआ। मैंने स्वयंसेवी संस्थाओं की एक बड़ी गोष्ठी बुलाई और उन्हें यह दायित्व दिया कि वे भूमिहीन लाभुकों का चयन कर उन्हें इन जमीनों पर काबिज करें। स्थानीय थानेदारों को इसमें मदद करने का निर्देश दिया कि इस प्रक्रिया की निगरानी करें और सहयोग करें।

चूँकि यह सारी घटना एक पत्रकार के सामने घटित हुई इसलिए अगले दिन मउआर के इस स्वैच्छिक भूमि-दान की खबर अख़बारों में सुर्ख़ियों में आई जिसका नक्सलवादियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। बाद में जब एक बड़े नक्सलवादी नेता श्री कामेश्वर बैठा संसद सदस्य बने और 20 वर्षों बाद उनसे पलामू सर्किट हाउस में उनसे पहली बार मुलाकात हुई तो उन्होंने इस जमीन वितरण का हवाला देते हुए बताया की उस वक्त उनके नक्सली साथियों ने आकर उनके सामने बंदूकें पटक दी थीं, यह कहते हुए कि अब बन्दूक उठाने की क्या जरुरत है जब प्रशासन खुद वे ही काम करने लगा है जिसके लिए वे लड़ रहे थे। तब बैठा जी ने उन्हें यह बुद्धि दी थी कि यह चार दिनों की चांदनी है, और कुछ दिनों बाद सारा मामला यथावत हो जायेगा।

बाद में कलक्टर महोदया ने मेरी ए सी आर में यह प्रतिकूल टिपण्णी लिखी कि श्री सिद्धार्थ रेवेन्यू कानून नहीं जानते, और अपना काम छोड़ कर रेवेन्यू मममलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करते रहते हैं, और लोगों को जमीन बांटने जैसे काम करते हैं जो उनका काम नहीं है।
लेकिन इस प्रसंग ने मेरी उस धारणा की पुष्टि की कि हर मनुष्य के भीतर गहरे कहीं अच्छाई और दिव्यता होती ही है, जिसके जग जाने पर वह दानव से देव बन सकता है। दुमका में हज़ारों सालों से अपराध को अपना पेशा बना कर रखने वाले एक क्रिमिनल ट्राइब के साथ किये गए मेरे पूर्व के प्रयोगों ने इसे पहले ही सिद्ध किया था।

पी के सिद्धार्थ पलामू के sp रह चुके हैं। उनकी संस्मरणों की किताब आने वाली है। उसका यह अंश है।

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