इंदिरा से हेमंत तक सिर्फ आश्वासन ही मिलता रहा



-संजय कृष्ण

55 घंटे के आंदोलन के बाद एक बार फिर टाना भगतों को आश्वासन मिला। इस बार राज्य के मुखिया हेमंत सोरेन की ओर मिला है। कैबिनेट की बैठक में उनकी समस्याओं को रखेंगे। फिर इसके बाद समाधान की राह निकालेंगे। ऐसा नहीं कि उनकी कोई ऐसी समस्या है, जिसे मानना या पूरा करना संभव न हो, लेकिन विधि का विधान देखिए, इंदिरा से लेकर अब तक हर मंच पर अपनी बात रखी, कई बार आंदोलन किए, राजभवन के समक्ष भी धरना दिए, यह एक दो साल नहीं, बल्कि आजादी के ठीक बाद से हरी उनका आंदोलन और मंाग चल रहा है, लेकिन अब तक पूरा नहीं हो सका।

गांधी के अनुयायी होने के कारण ये अपना आंदोलन अहिंसक तरीके से ही चलाते हैं। शायद, इनका इतिहास लिखा जाएगा तो इसे दर्ज करन पड़ेगा कि आजादी के बाद अपने हक के लिए सबसे लंबा चलने वाला आंदोलन टाना भगतों का रहा। मांग क्या है, अंग्रेजों द्वारा नीलाम जमीन की वापसी। ये इनका अपना हक है। उनकी यह लड़ाई वैसे तो आजादी के तुरंत बाद ही शुरू हो गई।

आजादी के तत्काल बाद, 1947 में ही इनकी जमीन वापसी का कानून बना। बिहार राज्य सरकार ने रांची जिला टाना भगत रैयत कृषि प्रत्यावर्तन अधिनियम पारित किया, जिसके अनुसार सन् 1913 से 1942 तक स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लगान नहीं देने पर नीलाम कर दी गई उनकी जमीन वापसी का प्रावधान है। उस समय, इस अधिनियम के अनुसार प्रारंभ से अब तक का कुल 358 टाना भगतों को कुल 3722.26 एकड़ जमीन वापस की गई एवं जमीन पर दखलकार विपक्षियों को कुल 13,05,669 रुपये क्षतिपूॢत के रूप में भुगतान किया गया है। बाद में पता चला, इस कानून में कुछ कमियां हैं। यह रांची तक ही सीमित था, जबकि कई अन्य जिलों के टाना भगतों को इससे लाभ नहीं मिल रहा था। फिर इस कानून को 1961-62 में संशोधित किया गया। 1968-69 में जमीन वापसी कुल 1,200 मुकदमे दायर हुए। 232 परिवारों को इसका लाभ मिला। उस समय 88 मामले लंबित रहे और 2,808 एकड़ 80 डिसमिल जमीन वापस की गई।

बिहार सरकार ने 1966 में टाना भगत बोर्ड का गठन किया, जिसमें 14 टाना भगत इसके सदस्य थे। यह बोर्ड कल्याण विभाग के अधीन था। प्रत्येक महीने इसकी बैठक होने की बात कही गई थी, लेकिन चार-पांच महीने बाद ही बंद कर दी गई। उस समय के एक टाना भगत पदाधिकारी ने लिखा है कि 'टाना भगतों को सिर्फ जमीन वापस करा देना ही पर्याप्त नहीं था। इसलिए इनकी जमीन में कृषि की सुविधा प्रदान करने के लिए कल्याण विभाग से मिलने वाली सुविधाओं में भी कृषि अनुदान आदि में बैल एवं बीज आदि के वितरण में इन्हेंं प्राथमिकता दी जाती है। जमीन वापसी कानून से लाभान्वित टाना भगतों के अतिरिक्त कुछ वैसे टाना भगतों को वर्ष 1972 में सरकारी जमीन दी गई है। कुल 389 टाना भगतों को कुल 827.06 एकड़ जमीन सरकार से बंदोबस्त की गई है। इस प्रकार बंदोबस्त की गई जमीन में अच्छी किस्म की जमीन नहीं रहने पर भूमि कर्षण विभाग से कृषि योग्य बनाने के लिए संपर्क किया जा रहा है।Ó

इस पदाधिकारी ने यह भी बताया है कि 'समय-समय पर किए गए सर्वेक्षण के आधार पर ये रांची के सदर अनुमंडल के रमांडर, बुड़मू, बेड़ो, लापुंग, लोहरदगा के कुड़ु, किस्को, लोहरदगा, सेन्हा व गुमला के घाघरा, बिशुनपुर, सिसई, पालकोट, चैनपुर, डुमरी, बसिया आदि क्षेत्रों में बसते हैं। टाना भगत परिवारों की संख्या कुल 2,356 है तथा इनकी जनसंख्या लगभग 13,000 है।Ó
पर, आज भी बहुत से टाना भगत हैं, जिन्हें न जमीन मिली न उनका हक। संघर्ष का उनका लंबा इतिहास है। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी और राहुल गांधी तक अपनी बात रख चुके हैं। फिर भी इनकी मांग पूरी नहीं हो सकी।


टाना भगतों को न्याय दिलाने के लिए परमेशचंद्र सिंह ने अखिल भारतीय टाना विकास परिषद् नामक संस्था का गठन किया था। उन्होंने टाना भगतों को इंदिरा गांधी व राजीव गांधी से मिलवाया। परमेशचंद्र सिंह ने एक लेख लिखा, 'स्वदेश प्रेमी जन जातीय टाना भगत इतिहास के परिवेश में।Ó उन्होंने अपने नेतृत्व में 28 दिसंबर, 1983 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से कलकत्ता में हो रहे अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन में मिलवाया और अपनी बात सुनाई। प्रधानमंत्री ने इन्हेंं पूर्ण आश्वासन दिया। यही नहीं, उन्होंने इनके एक प्रतिनिधि को राज्यसभा में तथा प्रांतीय स्तर पर एक प्रतिनिधि को कौंसिल में भी मनोनीत करने का आश्वासन दिया। इसके बाद 3 जनवरी, 1984 को रांची के मेसरा में अखिल भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन के मौके पर भी परमेशचंद्र सिंह ने टाना भगतों को फिर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलवाया। पर, इसी साल अक्टूबर में उनकी हत्या कर दी गई और आश्वासन भी उन्हीें के साथ दफन हो गया। पर, टाना भगतों ने हिम्मत नहीं हारी।

परमेशचंद्र सिंह ने फिर इन्हेंं प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलवाया। यह दिसंबर 1985 की बात है। टाना भगतों ने राजीव गांधी को सम्मानित कर रस्म पगड़ी और मान पत्र भेंट किया। प्रधानमंत्री ने मार्च 1986 में इनकी नीलाम जमीन की वापसी के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे को आदेश दिया। आदेश के बाद काफी लोगों को जमीनें मिलीं लेकिन फिर भी बहुतेरे टाना भगत आज भी नीलाम जमीन की वापसी के लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। झारखंड सरकार ने भी अभी तक केवल सर्वे का काम ही किया। रघुवर सरकार ने एक आयोग भी बनाया था, लेकिन वह कितना योग्य है, पता नहीं।

Fb से साभार

  राजनामा की खबरें और यहां पढ़ें