"भारतीय सिनेमा " का इनसाइक्लोपीडिया



चौराहा टीम
अनामिका प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक "भारतीय सिनेमा " वस्तुतः भारत की सभी भाषाओँ के सिनेमा का इनसाइक्लोपीडिया है| हम सिनेमा की बात करते है तो अक्सर यही समझा जाता है कि बम्बई में बनने वाली हिन्दी फि़ल्में ही भारत का सिनेमा है। यह धारणा केवल उत्तर भारत और हिन्दी भाषी प्रदेशों के निवासियों की ही नहीं है, देश के बड़ी आबादियों वाले कई महानगरों के अधिकांश निवासी भी ...

गौरवपूर्ण साहित्यिक शब्द-यात्रा



साहित्य अमृत के रजत जयंती अंक का संपादकीय लिखते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। यह प्रसन्नता तब और भी बढ़ जाती है, जब इतने लंबे लॉकडाउन के बाद यह अंक आपके समक्ष आ रहा है। किसी साहित्यिक पत्रिका का पच्चीस वर्ष तक नियमित-निर्बाध प्रकाशन निश्चय ही एक गौरवमयी उपलब्धि है।

झारखंड की मिट्टी की सुरभि



विक्रमादित्य प्रसाद

उदासी के क्षणों में मैं अक्सर अपने इर्द-गिर्द के लोगों की रचनायें पढ़ने लगता हूँ । अनिता जी की यह पुस्तक अभी हाथ में है और इस बदलते मौसम में उसे ढलते सूर्य को देखते हुए पढ़ चुका हूँ। मेरा पाठक मन और न्यायिक दृष्टि मुझे रचना तक ही सीमित रखती है और रचनाकार लगभग गौण रहता है।

अनगढ़ किरदार को गढ़ती "तू जमाना बदल"



राजीव कुमार ओझा

काव्या पब्लिकेशन्स अवधपुरी भोपाल से प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार राजेश पटेल की पुस्तक एक निहत्थी क्रांति " तू जमाना बदल " पाठकों को चुनार विधान सभा क्षेत्र से विधायक रहे यदुनाथ सिंह के व्यक्तित्व, कृतित्व से परिचित कराती है।
किसी नामचीन शख्सियत के जीवनवृत्त को लिपिबद्ध करना दुधारी तलवार पर चलने जैसा जटिल काम होता है।इसमे लेखक को पक्षपाती होने से भी बचना होता है और मिथ्या यशोगान ...

मिथिलेश्वर की कहानी बाबूजी



डॉ उर्वशी

रांची विश्वविद्यालय ने स्नातकोत्तर हिन्दी के पाठ्यक्रम में मिथिलेश्वर जी की बहुचॢचत कहानी 'बाबूजीÓ को 2016 से शामिल किया है। चार वर्षों से इस कहानी को अपनी छात्राओं को पढ़ा रही हू?। पहली बार जब यह कहानी मैंने पढ़ी तो लेखक की शैली में इतनी खो गयी कि लगा मैं लेखक से पूछ लू?, क्या वे बाबू ललन सिंह (बाबू जी) को जानते-पहचानते हैं, उनसे मिले हैं।

और किला ढह गया



सारिका भूषण
सब कुछ तो बिल्कुल वैसा ही था । संगमरमर के चिकने फर्श , भांति - भांति के बोनसाई से सजे हुए गमले , दीवारों पर लगी बड़ी - बड़ी पेंटिंग्स , चमकते हुए झाड़ - फानूस , खिड़कियों पर झूलते हुए रेशमी पर्दे ......सभी आज भी वैसे ही अनुशासित दिख रहे थे जैसी उन्हें रहने की हिदायत दी गई थी ।

कर्नल साहब की दाढ़ी



अजय शुक्ल

थोड़ी-सी लंबी पर करीने से छंटी सफेद दाढ़ी। वैसे ही धवल, रेशमी बाल। छरहरी काया और छह फुट को छूता क़द। कर्नल कालरा जब शाम के वक़्त अद्धी का कुर्ता और अलीगढ़-कट पाजामा पहन कर टहलने निकलते तो वे रिटायर फ़ौज़ी कम मक़बूल फिदा हुसैन ज़्यादा लगते थे। फ़ौज़ीपन का ज़रा-सा स्वैग ज़रूर था जो 70 साल की उम्र के बावजूद चाल में बरकरार था।
 

आदिवासी साहित्य