आशुतोष राणा का रामराज्य



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महर्षि वाल्मीकि से लेकर कबीर, बाबा तुलसी, केशवदास, निराला और कुबेरनाथ राय, पं विद्यानिवास मिश्र, नरेंद्र्र कोहली, तक न जाने कितने लोगों ने राम का चरित लिखा है। बौद्ध और जैन से लेकर दक्षिण, पश्चिम, असम और पूर्वोत्तर में भी रामकथा की परंपरा मिलती है।

आलोचकों की दृष्टि में छायावाद



सुरेश कुमार

सन् 1920 के दौर हिन्दी साहित्य में काफी उथल-पथल भरा रहा हैं।एक ओर राष्ट्रीय चेतना और स्वाधीनता का उदय हो रहा था, वहीं दूसरी तरफ सुधारवादी दृष्टिकोण भी विकसित हुआ। इसका कारण यह था कि हिन्दी साहित्य में सन् 1920 के बाद ‘माधुरी’,‘चांद’,‘सुधा’, मनोरमा, ‘विश्वमित्र’ और विशाल भारत’ जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं का जन्म हो चुका था ।

कोलतार की तपती सड़क पर



अनिता रश्मि

जिरगी ने अपने गले में तांबे के सिक्के से गुंथे हार को डाला और ताखे पर रखे टूटे शीशे के टुकड़े में अपना गला निहारने लगी। दो दिन पहले ही कजरा के छेड़छाड़ के चलते शीशा गिरकर टूट गया था।

रंगमंच और हिंदी का हमारा समाज



डॉ विनोद कुमार

रंगकर्म निश्चित ही एक ऐसी कला है जिसमें साहित्य, संगीत, पेंटिंग, नृत्य आदि का बखूबी समावेश हो जाता है। उपन्यास या कहानी सिर्फ साहित्य की एक धारा होती है मगर रंगमंच साहित्य के साथ-साथ अन्य कलाओं से जुड़कर दर्शक के सामने प्रस्तुत होता है।

क्या सत्यनारायण नाटे को जानते हैं



अमन चक्र

साहित्य! खासकर हिन्दी साहित्य में लगभग सभी साहित्यकारों का सफर संघर्षमय होता है। सत्यनारायण नाटे भी इससे अछूते नहीं थे। सत्यनारायण नाटे ने अपने जीवन में ईमानदारी का साथ जितनी सच्चाई से निभाया, वह किसी अन्य के वश में कतई नहीं हो सकता।

"भारतीय सिनेमा " का इनसाइक्लोपीडिया



चौराहा टीम
अनामिका प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक "भारतीय सिनेमा " वस्तुतः भारत की सभी भाषाओँ के सिनेमा का इनसाइक्लोपीडिया है| हम सिनेमा की बात करते है तो अक्सर यही समझा जाता है कि बम्बई में बनने वाली हिन्दी फि़ल्में ही भारत का सिनेमा है। यह धारणा केवल उत्तर भारत और हिन्दी भाषी प्रदेशों के निवासियों की ही नहीं है, देश के बड़ी आबादियों वाले कई महानगरों के अधिकांश निवासी भी ...

गौरवपूर्ण साहित्यिक शब्द-यात्रा



साहित्य अमृत के रजत जयंती अंक का संपादकीय लिखते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। यह प्रसन्नता तब और भी बढ़ जाती है, जब इतने लंबे लॉकडाउन के बाद यह अंक आपके समक्ष आ रहा है। किसी साहित्यिक पत्रिका का पच्चीस वर्ष तक नियमित-निर्बाध प्रकाशन निश्चय ही एक गौरवमयी उपलब्धि है।
 

आदिवासी साहित्य