कोलतार की तपती सड़क पर



अनिता रश्मि

जिरगी ने अपने गले में तांबे के सिक्के से गुंथे हार को डाला और ताखे पर रखे टूटे शीशे के टुकड़े में अपना गला निहारने लगी। दो दिन पहले ही कजरा के छेड़छाड़ के चलते शीशा गिरकर टूट गया था।

काले धागे में गुंथे सिक्कों के तांबई लालपन को गौर से देखते हुए अपने काले गर्दन को वह भूल ही बैठी। नौलखा हार पहनने की ख़ुशी उसकी आ?खों से छलक पड़ी।
माथे की ओर शीशे को ले गई, तो टूटे शीशे में आधा ललाट, एक आंख, थोड़ी सी नाक खिलखिला उठी।

कान की ओर घुमाया, कान में खुंसी जौ की नई बालियों के हरापन लिए हुए पीलेपन ने सुप्रभात कहा। तिरछे जूड़े में लाल उड़हुल, चंद पत्ते भी बड़ी उदारता से मुस्कुरा दिए। शीशे को ललाट के बीच में ला वह चमकीली बिंदी देखने लगी। इस बीच उसके होंठों पर एक प्यारी सी मुस्कान फंसी पड़ी थी। उस मुस्कान के साथ नाक की चांदी की लौंग भी हंसी।
कल ही सूरज बाबा और धरती मइया के विवाह के पर्व सरहुल के तीसरे दिन पाहन ने फूलखोंसी किया था। पाहन काली ने घर-घर जाकर सरई फूल खोंसकर आशीर्वाद की बरसा की थी। युवकों के कानों में भी सरई (शाल) पुष्प!...सरहुल परब में सफेद सखुआ फूल, गाछ सबका मान बढ़ जाता है।

पहले दिन चैत महीना के उजेरिया के तीसर दिइन से सुरू परब में साल गाछ के नीचे सरना में दो घड़े में पाहन ने पानी भरकर ढ?क दिया था। दूसरे दिन ढक्कन हटाया था। पानी एकदम कम नहीं हुआ, तो घोषणा कर दी-
- इस बेर चिंता करने का बाइत नय है। इस बेर जमकर बरसा होगा।

सब आगत की खुशी से मदमस्त। ऐसे भी धरती की बेटी बिंदी के पाताल लोक से आने की प्रसन्नता और नए फल, फूल, फसल के तैयार हो जाने के उपलक्ष्य में मनाया जानेवाला सरहुल सब प्रकृति पूजकों में उन्माद भरता है... रबी फसल के बाद धरती की संतान गाछ-विरिछ, फूइर-पात, फल से ढंकने पर मनाया जानेवाला अद्भुत वसंतोत्सव।
बिंदी साल में एक ही बार पृथ्वी पर आती है... चैत में। लोककथा में छिपी है धरती मईया और सूरज बाबा की बेटी बिंदी की कहानी।

कजरा के साथ तो उसकी जिरगी थी। वह अपने कजरा के साथ खूब नाची-गाई थी। अब तक मांदर की थाप पर कजरा के साथ थिरकते पैरों की याद बाकी है। गीत के बोल भी-
फूल गेला वन में
चरका दिसयं


चरका-चरका (श्वेत) सरई फूल से भर जाता है वन....और सरना स्थल!
सरहुल की पूजा खत्म होने के बाद नई सब्जियां बनीं थीं, सबने पहली बार इकट्ठे सरना स्थल पर ही चखा था नई फसल का उपहार। पूजा से पहले खाना वॢजत। सब कड़ाई से पालन भी करते। सरना झंडे अपनी उजर-लाल पट्टियों की आभा के साथ पूरे परिसर को घेरे हुए थे। और जिरगी को घेरे हुए था, कजरा का समॢपत प्यार।

पिछले चार-पांच दिनों से उसके हाथ-पैरों, कमर में लोच भर गई थी। कल उसने हडिय़ा जी भर कर पिया था, अब तक खुमार बाकी। हडिय़ा को दोने के कोर से पीते हुए गुपचुप कजरा को देखे जा रही थी, खूब-खूब बतिया भी रही थी ।
अचानक जिरगी की हंसी खनकती चूडिय़ों में बदल गई। कजरा ने पूछा था, -हमारे साथ बिहा करोगी?
कुहनी से टहोका दे शर्माकर पूछा था जिरगी ने - हमारे संग बिहा? काहे?

-तोंय हमको बड़ी बेस लगती है।
चूडिय़ों सी उन्मुक्त हंसी उस समय भी गूंजी थी...हर द्वंद्, लिहाज से परे खिलखिलाती हंसी। धरती और सूरज बाबा के ब्याह के परब के बखत कजरा का यह पूछना कि हमारे साथ बिहा करोगी, जिरगी को उत्साह से नहला गया था।
- अगे जिरगी, कहां मर गई? जलदी आव।
-का है? काहे बुलाई?
-आइज काम पर नय जाएगी का?
-आज सरहुल बीतले एके दिन हुआ ना, फूलखोंसी हो गया कल। अब कल से जाएंगे।


माय को आश्वस्त कर वह घर के कामों में उलझ गई।
शाम को फिर अखरा में मांदर की थाप गूंजी। नसों में थिरकन बन उतरा नृत्य सबको अखरा की ओर खींच ले गया। वह भी कजरा की पांचों उंगलियां में अपनी उंगलियां फंसा झूमर में व्यस्त। रात ढले तक सब रास-रंग में सराबोर!
फिर थक-हार कर सब इधर-उधर लुढ़क गए ।
कुत्ते एक लय में भूंक कर पूरे गांव को कंपकंपा गए। रात भर कुत्तों का गीत चलता रहा। कहीं से चिरई फडफ़ड़ाई , तो कहीं तोते उड़कर एक डाल से दूसरी पर जा बैठे। सियार की हुआं-हुआं से भी कोई नहीं जगा।

भिनसरे किरण फूटते ही अलसाए लोग कसमसाए। जिरगी धीरे से उठी, कजरा के गालों को हौले से छुआ।
-उइठ। आइज तो जाय पड़ेगा।
वह कुनमुना कर करवट बदलने लगा।
-उइठ कजरा। एते मइत अलसा रे!
अहरा के पास पाकड़ गाछ के पीछे फारिग हो, सामने ही उदंड से खड़े अमरूद गाछ से डंठल तोड़ दातुन करने लगी। अधिकांश लोग जग चुके थे।

-आइज का बात? तुम एकदम रानी लखे दिख रही है।
-और तुम राजा लखे।
ठेकेदार की आज्ञा-सब नौ बजे से पहले हाजिर रहा करो।
सब तैयारी में व्यस्त। कोलतार की आधी बनी तपती सड़क उनका इंतज़ार कर रही थी।
पहले आधा गांव खेतिहर मज़दूर था। आधे गांव के पास अपने खेत। तीन साल के अकाल ने उनसे उनके खेत झपट लिए। उनलोगों की जमीन खरीदने-बेचने पर रोक लगने के बाद भी खेत औने-पौने में बिके। कुछ लोगों के बुजुर्ग तो पहले ही दारू की चंद बोतलों के बदले जमीन बेच चुके थे। मालिक मज़दूर बन अपने ही खेत में खटने लगे।

कितने मजदूर पलायन कर गए। पंजाब, गुजरात, मुंबई, दिल्ली ने कईयों को पनाह दी।
अधिकांश शहर में ही विभिन्न प्रतिष्ठान....होटल, कपड़े की दुकान, राशन, चाय-पानी की दुकान तथा अन्य जगहों की शोभा बन गए।
विभिन्न कठोर कामों ने पूरी उदारता से उन्हेंं अपना लिया।
पत्थर तोडऩे से लेकर भवन बनाने, बालू ढोने, छड़ ढोने तक में उनका 'सार्थक उपयोगÓ होने लगा।
ये और इन जैसे लोग हैं, तो हम हैं, बड़ी शिद्दत से महसूस किया गया। पहले से भी जियादा।
बहुत सारे 'फ़ालतूÓ लोग सड़क निर्माण में जुट गए। कजरा और जिरगी भी। कोलतार की सड़क पर जीवन तपते कोलतार सा बह रहा था।

***

साढ़े आठ बजते ही पगडंडी पारकर सब मजदूर शहर की छाती रौंदने चल पड़े। भर रास्ते सरई, पलाश, सेमल, कुसुम की बहार! गुलमोहर नहीं खिला था अब तक। लेकिन बस, अब खिलखिलाने को बेचैन!
महुआ पेड़ के नीचे महुआ की मदमाती, नशीली गंध फैली थी। सब बिछने में लगे थे।
एकाएक कजरा ने पूछा,

- खैनी हैं दे ना।
ब्लॉउज में खोंसे डब्बे से खैनी निकाला जिरगी ने और कजरा की ओर बढ़ाया। वे एक ही साइकिल पर शहर की तरफ़ बढ़ रहे थे। साथ में डोरिया थैली में भात, दाल जैसा पानी या पानी जैसी दाल, बारी में उगाया भतुआ का साग, रामतोरई की सब्जी , पियाज का आधा टुकड़ा और दो हरी मिर्च टिफिन कैरियर में कैद थी।


साइकिल से उतरकर, कजरा साइकिल को एक महुआ गाछ के तने से टिकाकर, खैनी बनाने लगा। डाढ़ के नीचे दोनों ने खैनी दबाया और अपनी सवारी पर सवार।
साइकिल हवा से बातें करने लगी। हवा की गुदगुदी से फिर चूडिय़ों की खनक हवा में घुलने लगी। जिरगी ने कजरा की कमर को घेरकर पकड़ लिया। अब फिज़ाओं में दोनों की हंसी थी... हम थे, तुम थे और शमा रंगीन, समझ गए ना।
घाम था कि बढ़ता ही जा रहा था।

वे वहां पहुंचे, उससे पहले ही पत्थरों के चूल्हे पर कोलतार गरम करने की तैयारी हो चुकी थी। नीम, पीपल, बरगद, गुलमोहर के नीचे साइकिलों, रंग-बिरंगे, लाल-पियर कपड़ों के मेले लगने लगे थे।
अब जिरगी, कमलिया, बसंती, सोनवा तसले में भर-भर कर गिट्टी लाने लगी। कजरा आग के ललहुन पीले रंग में गिट्टी का काला रंग घोल रहा था। उसके साथ मथुरा भी था। उनके खुले बदन से गले में बंधी ताबीज को भिगोती पसीने की धार खुशबू की तरह बिखर रही थी। गिट्टी उड़ेलने के बाद जिरगी, सोनवा बतियाये जा रही थी ।
- आइज बेटा को नय लाई सोनवा?
- कैसे लानते छउआ को, उसको बुखार है। अफीम चटाकर सुता रखे। बूढ़ी देखेगी।
उसकी बूढ़ी सास अस्सी बरस खटती रही थी। अब नहीं सकती थी। घर पर थी वह, तो सोनवा निश्चिंत हो मजदूरी करने आ पहुंची।

गुना अपने छऊआ को बड़ गाछ के नीचे चादर बिछाकर सुला आई थी। अचानक वह चीख कर रोया। रोते देख गुना दौड़ी। दुदमुंहा चींटियों के काटने से चीख पड़ा था। कभी चींटी काट लेती, तो कभी कीड़ा, जब ऐसे ही सब अपने बच्चों को पेड़ के नीचे सुलाकर काम में भिड़ जातीं। जगे रहने पर पीठ पर शॉल से बेंतरा में बांध काम करतीं रहतीं सब।


थोड़ी सी देर में गुना अपने बच्चे की भूख, तकलीफ और स्नेह की प्यास शांत कर वापस लौट आई। सब जुटीं थीं, सब लौटीं।
गुना और सोनवा भी जिरगी के गांव की ही थी। सोनवा को चार, गुना को पांच बच्चे थे। सब भगवान की कृपा से। गुना अपनी तीन बेटियों ओर एक बेटा को सरकारी स्कूल में पढ़ा रही थी। सोनवा के भी तीनों छउआ वहीं पढ़ रहे थे। मिड डे मील भी बड़ा लालच।
वैसे पढ़ा-लिखाकर अपने छउआ -पुता को आदमी जइसन बनाने की लालसा भी पूरे गांव में पसर चुकी थी। सब इसके लिए और भी खटने को तत्पर। किसी भी तरह वे सब अपने बच्चों को आदमी जइसन बना कर ही मानते।
पांच महीने के छोटका छऊआ को सोनवा अपने बेंतरा में बांध यहां ले आती। पीठ के बेंतरा में वह हुलसते रहता, वह काम में व्यस्त रहती। सो जाने पर वहीं किसी गाछ के नीचे चादर बिछाकर सुता देती। गुना भी अपने बच्चे को वहीं बगल में सुता गिट्टी, बालू में उलझी रहती।

बच्चे को सुलाने के बाद अब फिर तसला था, गिट्टी थी, आग थी, गर्म होता कोलतार था, लहकते सूरज बाबा थे। पसीनों की सौंधी गंध भी थी। जिरगी के साथ कइयों की हंसी थी। और थी, बनी-अधबनी सॢपली सड़क। दूसरी तरफ फर्राटा भरते, नई बनी सड़क के कोलतार से अपनापा जोड़ते वाहन।
अचानक सामने से एक स्विफ्ट को आते देख जिरगी की चूड़ी खनकी-देइख ना, देइख, दारू पीकर झूमते हुए गाड़ी आ रहा है।
स्विफ्ट रुकी। एक परेशान पुरुष चेहरा झांका- यहां कहीं गाड़ी बनानेवाला मिलेगा?

हिंया तो नय, आगे एक ठो दुकान है।-सुकरा आगे बढ़ा। और सब भी देख रहे थे।
-कोई एक साथ चलो न। किसी मैकेनिक को लाना होगा।
-अभी? साब, अभी तो काम है।
पसीना पोंछते हुए कजरा बोला-सुकरा, जा।
जिरगी ने झांका। तीन लोग। एक महिला आगे की सीट पर रूमाल से हवा करती हुई। पीछे की सीट पर दो बच्चे।
- तुम तीनों यहीं रुको, मैं आता हूं।
- ठीक है। जल्दी आना। इतनी गर्मी में हम कोलतार के बीच तो भून जाएंगे।
गाड़ी में घूमे से एतना गरमी छटक रहा है, सड़क पर चलतय तो....। - बसंती बोलते ही चुप भी हो गई।
बेलचा से कोलतार-गिट्टी को एकसार करने, एक ड्रम में कोलतार उबालने का काम जारी था। जिरगी से नहीं रहा गया।
-मेमसाब, बाहर आइए, एकदम ठंडा हवा लगेगा। उस चट्टान पर बैठिए ना।


उन्हेंं बात जंची। थोड़ी सी देर में तीनों शाल गाछ की छांव तले चट्टान पर। पुटुश की घनी झाड़ी गुलाबी फूलों से लदी। बीच में झांकते, काले, पके फलों के गुच्छे... मोती के काले दानों जैसे। वे तीनों गौर से देखने लगे।
- ई फर बड़ी बेस है। हमीन सब खाते हैं। खाइएगा?
वह दो-चार गुच्छों को छुड़ा, मोती से काले, छोटे फलों को हथेली में भरकर लेती आई।
- नहीं-नहीं! फेंक दो। जहर-वहर...।
मेमसाब की लगभग झिड़की से वह खिलखिला उठी।
- खूब अच्छा लगता है। खाने के बाद ना जानिएगा।
फलों को मुंह में चुभलाती वह फिर चैत्र की तपती दुपहरी का हिस्सा बन गई।

थोड़ी देर बैठने के बाद मेमसाब उठ खड़ी हुईं। साथ ही दोनों बच्चों को भी इशारा किया। एसी कमरों में रहने, एसी गाडिय़ों में घूमने, एसी मॉल में खरीदारी करने, एसी हॉल में मूवी देखने की आदी मेमसॉब तथा बच्चों को याने पूरी फैमिली को वहां की धूप-हवा रास नहीं आ रही थी।
बहुत गर्मी है, बहुत गर्मी है। और नहीं झेल सकती मैं-कहती हुई वे आगे बढ़ गईं। बच्चे भी गाड़ी की ओर बढ़े। एकाएक उनकी निगाहें जिरगी पर पड़ी।

आग के पास खड़ी वह माथे पर भारी तसला थामे हंसे जा रही थी। आग की पीली-लाल लपलपाहट से बेपरवाह। उसको इस तरह इत्मीनान से हंसते देख मेमसाब पहले तो एकटक देखती रह गईं। फिर चूडिय़ों सी खनकती हंसी ने उनके तन-बदन में आग लगा दी।
सामने सवेरे से महुआ बिछती कुछ लड़कियां, बच्चे, औरतें अपनी मौनी, दौरी में महुआ के ढेर से महुआ उठाकर रख रही थीं। मेम साहब ने उधर मुंह फेर लिया।

थोड़ी देर में मैकनिक को लेकर साहब हाजिर! देखा, अभी भी मजदूर अपने काम में व्यस्त हैं। आग की लपलपाती जीभों पर कोलतार का ड्रम चढ़ा है। पिघला कोलतार सड़क पर उड़ेला जा रहा है। जिधर रोड तैयार था और भी तपन थी। खूब चमक रहा था नया-नया कोलतार... नया रोड....तीखी धूप से धुला हुआ।
एकदम सहज-सरल मजदूरों में से मीठे गलेवाले बंदी की आवाज़ फ़िज़ा में लहराई-
महुआ रे महुआ पत्तई
महुआ पत्तई सोये झाईर गेल रे
डारी में खोंस लगे
खोंचा में फूल रे
फूल कीरे धरती सोभय रे।


महुआ की टोकरी सर पर थामे एक पंक्ति में लौटती लड़कियां हंस पड़ीं।
कुछ देर की मशक्कत के बाद गाड़ी ठीक हो गई। चारों पसीना पोंछते हुए गाड़ी पर सवार हो गए। इतनी देर में ही उनके हैंकी भीग गए थे। गाड़ी आगे बढ़ी। फिर तेज गति से छू-मंतर।
- हुंह!... बहुत गरमी हय...बहुत गरमी हय।
गाड़ी के अंदर की ठंडी हवा को चिढ़ाता हुआ हंसमुख मथुरा का स्वर था यह। जिरगी और कजरा के होठों पर फिर से हंसी खिल उठी।
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अनिता रश्मि रांची में रहती हैं। कई उपन्यास, कहानी संग्रह प्रकाशित। कविता के साथ यायावरी पसन्द।

 

आदिवासी साहित्य