संतों की काली दुनिया



संजय कृष्ण

भारतीय समाज में शास्त्रों की अहम भूमिका के बावजूद गुरु के महत्व को उससे ऊपर रखा गया है। यह महत्व यहां भी परिलक्षित होता है कि शास्त्र और लोक, संत और आचार्य, ज्ञानी और मूरख सबने गुरु के महत्व को स्वीकार किया है। शास्त्र गुरु को तीनों देवता के समक्ष रखता है तो कबीर के लिए गुरु भी गोविंद से कम नहीं। सिख और तमाम संत संप्रदायों में गुरु के महत्व को देखा जा सकता है। गुरु प्रकाश के प्रतीक हैं। वे हमें अंधकार से मुक्ति दिलाते हैं। अंधकार यानी अज्ञान। हमारे समाज में निगुरा को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता।

माना जाता है, जिसने गुरु नहीं किया, उसकी मुक्ति संभव नहीं। इसलिए, भारतीय धर्म सत्ता के केंद्र में गुरु का महत्व रहा है। गुरु के ही समानांतर संतों की सत्ता भी है। संत भी अंतत: गुरु की गादी पर बैठ जाते हैं और फिर तो मठ-विहार उनके लिए भी जरूरी हो जाता है। आज हमारे समाज में न गुरु की कमी है न गुरु के नाम पर धोखा देने वालों-न आस्था के नाम पर दुकान और शोषण करने वालों की। कबीर इसलिए, बार-बार आगाह करते हैं, साईं इतना दीजिए...। उन्होंने न अपने जीवन मएण्यें मठ कायम किया न मठाधीशी की। बुद्ध के समय ही विहार अस्तित्व में आए, जहां बौद्ध ध्यान-साधना करते थे। बाद में ये भी किसी सत्ता-प्रतिष्ठान की तरह समानांतर शक्ति केंद्रों में भी तब्दील हो गए। गुरु गोविंद सिंह ने गुरु के नाम पर चल रहे भारतीय समाज में आडंबर को देख लिया था और उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को ही आगे के लिए गुरु मानने का प्रावधान कर दिया।

हाल के दो दशकों में भारतीय संतों की गिरफ्तारी, उनके आचरण और चरित्र को देखें तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इसलिए कबीर ने पंद्रहवीं सदी में कह गए-संत न बांधै गांठड़ी, पेट समाता लेइ। सांई सूं सनमुख रहै, जहां मागै तहां देइं...। कहावत है, रमता जोगी, बहता पानी। दोनों जहां रुके, सडऩा स्वाभाविक है। मिथिलेश्वरजी का यह नया उपन्यास 'संत न बांधै गांठड़ीÓ संतों के चारित्रिक स्खलन, पतन, मठ और मठाधीशी के अंत:पुर की आंतरिक कहानी को हमारे समक्ष पूरी साफगोई, ईमानदारी और पूरी संवेदनशीलता के साथ रखता है। सत्तर की अवस्था में इस रचना का आना कोई स्वाभाविक परिघटना नहीं, अपने समय में हस्तक्षेप और अपनी उपस्थिति, समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का बोध भी कहीं न कहीं दिखता है। लेखक का यही काम और दायित्व है। वह समस्याओं को दूर नहीं कर सकता, समस्याओं को समाज के सामने बिना लाग लपेट के रख सकता है और यह समाज का दायित्व और कर्म है कि वह इसे किस रूप में लेता और आत्मसात करता है। यह रचना दो दोस्तों के बहाने हिंदू मठों-आश्रमों में घुस आई अनैतिकता और स्खलन की कहानी कहता है। कहानी के लिए कोई पात्र तो चाहिए ही। लोकचंद और सुकेश यही दो पात्र हैं, मुख्यत:। बचपन के दोस्त। एक नाटकीय घटनाक्रम के कारण सुकेश को अपने बचपन के साथी से बिछुडऩा पड़ता हैं। सुकेश गांव की ही एक लड़की से प्रेम करता है। लड़की के पिता को जब इसकी जानकारी होती है, वह इसके खून का प्यासा हो जाता है। फिर, सुकेश अपने गांव को छोड़ दोस्त के साथ मौसी के यहां जाता है। मौसी लेकर सुकेश को चारों धाम की यात्रा पर निकलती हैं कि एक दुर्घटना में पहाड़ स्खलन में वे मारी जाती हैं। किसी तरह सुकेश बच जाता है और आगे चलकर वह मुक्ताश्रम की स्थापना करता है। सुकेश का रूपांतरण मुक्तानंद में हो जाता है। हरिद्वार के पास उसका आश्रम स्थापित हो जाता है। पर, सुकेश, अपने घर से कोई संपर्क नहीं रख पाता। एक लंबे अंतराल के बाद बचपन का साथी लोकचंद उसे हरिद्वार में एक प्रवचन के दौरान दिख जाता है। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होता, लेकिन यह सच था। वह फिर उसके आश्रम का पता कर वहां पहुंच जाता है। किसी तरह अपने बचपन के साथी से भेंट करता है। फिर एकांत में, तब सुकेश पहचानने से इन्कार करता है। लेकिन बाद में अंतत: सुकेश लोकचंद के आगे हथियार डाल देता है। लोकचंद आश्रम में कुछ दिन रहता है। वहां की सारी गतिविधियों को नोट करता है। आश्रम द्वारा संचालित स्कूल, अस्पताल, गोशाला, औषधि केंद्र, अतिथिशाला....। लोकचंद ने जो कुछ देखा-समझा, उनमें यहां स्त्रियों की व्यापक उपस्थिति उसके मन को बेचैन कर रही थी। इसलिए, जब एकांत में, मुक्तानंद के कक्ष में मिला तो उसने अपने मन की बात सामने रख दी-''तो सुनो सुकेश, कल प्रवचन के बाद तुमसे मिलकर मेरे आगमन की सारी व्यग्रता खत्म हो गयी। तुमसे मिलने का मेरा पहला उद्देश्य पूरा हो गया। लेकिन इस आश्रम में एक दिन के अंदर ही तुम्हें लेकर मेरा अन अशांत और बेचैन हो उठा है। अभी पिछले दिनों लगातार ऐसे बड़े आश्रमों के गुरुओं और स्वामियों को जिन संगीन अभियोगों के तहत गिरफ्तार किया गया और उनके आश्रमों का जो कच्चा चि_ा सामने आया उसने ऐसे आश्रमों और उनके स्वामियों को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। तुम्हारे इस आश्रम में वैसी स्थितियों को देखकर मेरा मन विचलित और उद्वेलित है।ÓÓ लोकचंद की शंका को देखते हुए मुक्तानंद ने मित्र के मन के झाले को साफ करने की बहुत कोशिश की-''तुम्हारी बात में समझ गया लोक। तुम कहना यह चाहते हो कि इस धाॢमक-आध्या?िमक आश्रम को स्त्रियों से मुझे दूर रखना चाहिए। लेकिन यह संभव नहीं लोक। यह मेरे वश में नहीं। महात्मा बुद्ध से मैं बड़ा विचारक और उपदेशक नहीं हो सकता। वे भी चाहते थे कि बौद्ध भिक्षुओं में स्त्रियां न रहें। लेकिन आम्रपाली के तर्कों और अनुरोधों के तहत उसके आगमन को नहीं रोक सके। फिर तो बौद्ध भिक्षुओं में स्त्रियों का प्रवेश वॢजत नहीं रहा। अब तो देश और दुनिया के प्राय: हर संस्थानों में पुरुषों की तरह स्त्रियों की उपस्थिति देखी जा सकती है। मैं क्या कहकर उन्हेंं रोक सकता हूं लोक। यहां मैंने किसी को बुलाया नहीं है। स्त्री-पुरुष जो भी आये हैं, स्वत: आये हैं।ÓÓ...लेकिन ये तर्क भी उसे संतुष्ट नहीं कर पाए। आठ-नौ सालों बाद लोकचंद ने खबर पढ़ी-मुक्तानंद अपनी प्रमुख शिष्या पद्मा के यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार कर लिए गए हैं। इसके बाद लोकचंद फिर आश्रम जाता है। आश्रम पुलिस की निगरानी में है। वे आश्रम के हर वरिष्ठों से पूरे घटनाक्रम की जानकारी लेते हैं। आश्रम के शुभचिंतकों ने माना, यह आरोप निराधार है। देवी पद्मा ने नए बन रहे आश्रम के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी लेकिन महाराज ने गद्दी किसी और को सौंप दी...। मठ-मंदिरों की यह कहानी कोई नई नहीं है। अलबत्ता इस विषय पर कोई लिखने का जोखिम नहीं उठाता। हरियाणा से लेकर दिल्ली, बिहार-बनारस-अयोध्या, हरिद्वार तक फैले आश्रमों-मठों में श्रद्धा के नाम पर मानसिक-आॢथक दोहन होते आ रहा है। बहुतेरे मठों के मठाधीशों को धर्म-अध्यात्म से कोई मतलब नहीं। लठ-बंदूक और अपनी दावेदारी...। अधिकतर मठों में यही हो रहा है। राम-रहीम का हाल देख चुके हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण तक इस तरह की कहानियां मिल जाएंगी।

ये मठ और साधु अपनी उज्ज्वल परंपरा को ही कलंकित करते हैं। अब देखिए, जिस उज्ज्वल परंपरा के संवाहक स्वामी विवेकानंद थे। जिन्होंने हिंदू धर्म की ध्वजा को विश्व में फैलाया, उसी के अनुयायियों ने खुद को अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त करने का आवेदन दे दिया। अब समझिए, विवेकानंद के अनुयायी गेरुआधारी विवेकानंद और हिंदू धर्म को कितना समझ पाए होंगे? वे परमहंस के परम ज्ञान से कितना लाभान्वित हुए होंगे? घर-परिवार छोड़, गेरुआ पहन संन्यासी हुए, लेकिन ज्ञान के नाम पर शून्य? एक और मठ की बात बताऊं। अधिकतर उनके शिष्य विदेशी हैं। योग का परम प्रसाद बांटते हैं। उनके शिष्य पढ़े-लिखे वैज्ञानिक चेतना से संपन्न हैं। कुछ तो बड़ी नौकरियां छोड़कर आए, लेकिन वे अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सके। लेकिन वे दुनिया को योग का ज्ञान बांट रहे हैं। इस तरह धर्म एक धंधा बन गया। जिनके पास साधना नहीं होगी, उनके मठ तो राम-रहीम के आश्रम में ही बदल जाएंगे।
मिथिलेश्वर जी ने अपने इस उपन्यास में इसी विषय को उठाया है। कबीर की बानी खुद में एक सार्थक हस्तक्षेप है, लेकिन देखिए, कबीर पंथी अब जगह-जगह मठ बना लिए हैं। आखिर, सत्य के पिपासुओं को मठ की क्या दरकार? मठ होंगे तो झगरा भी होगा। कबीर ही कह गए हैं, संतों घर में झगरा भारी। कहा गया है, पानी पीजिए छान के, गुरु कीजिए जान के। गुरु तो कुम्हार है, वह शिष्य को तैयार करता है। वे अंधे कूप में ढकेलता नहीं। सुकेश न चाहते हुए भी आखिर, दलदल में फंसता जाता है और आखिर में एक दिन काल कोठरी नसीब होती है। मित्र के नाते लोकचंद ने आगाह किया, लेकिन सुकेश पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। समझना चाहिए, धर्म आंतरिक रूपांतरण की प्रक्रिया है, धंधा नहीं।

पुस्तक: संत न बंधे गांठड़ी
प्रकाशक: लोक भारती, प्रयागराज
कीमत: 300

 

आदिवासी साहित्य
राजनामा