मैला आंचल का उपसंहार और गीता

Johar
भारत यायावर

मेरी एक प्रारम्भिक कविता है : आदमी कहां-कहां पीडि़त नहीं है कविता इस प्रकार है :

यह बार-बार हर बात क्यों टिक जाती है रोटी पर?
यह बार-बार हर रोटी फैल कर क्यों हो जाती है एक व्यवस्था?
यह बार-बार हर व्यवस्था क्यों हो जाती है एक राक्षस?
क्यों लील जाती है लोगों की सुख- सुविधा?
क्यों लगा दिया जाता है किसी नए सूरज के उगने पर प्रतिबंध ?
आदमी कहां-कहां पीडि़त नहीं है
अपने होने से नहीं होने के बीच!

मैं इस कविता में यह कहना चाहता हूं कि कोई भी विचार-दर्शन के आधार पर सत्ता-व्यवस्था बनती है, फिर भी साधारण मनुष्य जन्म से मृत्यु तक पीडि़त अवस्था में जीता है। मैंने 1980 में प्रकाशित लंबी कविता 'झेलते हुएÓ में पूंजीवादी और समाजवादी दोनों तरह की व्यवस्था की असंगतियों-विसंगतियों को उजागर करते हुए कुछ बातों को अभिव्यक्त किया था। कुछ कम्युनिस्ट कठमुल्लों ने तब उसका विरोध किया था । आज 'मैला आंचलÓ के उपसंहार को पढकर अपनी ये कविताएं याद आईं।

रेणु यह सिद्धांत देते हैं कि मिट्टी और मनुष्य से गहरी मुहब्बत ही इसका हल है। खेतों में फसलों की बहार हो और मनुष्य के ओठों पर मुस्कुराहट हो। लेकिन यह किसी प्रयोगशाला में नहीं बनती। रेणु साम्राज्य लोलुप देशों के वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं का और मानवतावादी दर्शन के अप्रासंगिक हो जाने का अद्भुत शब्द-चित्र प्रस्तुत करते हैं। इनके वाक्यों को अलग-थलग कर पढऩे से इन शब्दों का अर्थ व्यापक रूप से प्रभाव डालता है :

लेबोरेटरी !...
विशाल प्रयोगशाला ।
ऊंची चहारदीवारी में बन्द प्रयोगशाला।...
साम्राज्य-लोभी शासकों की संगीनों के साये में वैज्ञानिकों के दल खोज कर रहे हैं, प्रयोग कर रहे हैं ।...
गंजी खोपडिय़ों पर लाल- हरी रोशनी पड़ रही है।
... मारात्मक, विध्वंसक और सर्वनाशा शक्तियों के समिश्रण से एक ऐसे बम की रचना हो रही है जो सारी पृथ्वी को हवा के रूप में परिणत कर देगा...
ऐटम ब्रेक कर रहा है
मकड़ी के जाले की तरह !
चारों ओर एक महा-अन्धकार !
सब वाष्प !
प्रकृति-पुरुष.. अंड- पिंड!
मिट्टी और मनुष्य के शुभचिंतकों की छोटी सी टोली अंधेरे में टटोल रही है
अंधेरे में वे आपस टकराते हैं।
...वेदान्त...भौतिकवाद... सापेक्षतावाद...मानवतावाद।... हिंसा से जर्जर प्रकृति रो रही है।
व्याध के तीर से जख्मी हिरण-शावक -सी मानवता को पनाह कहां मिले?
... हा- हा-हा !
अट्टहास!
व्याधों के अट्टहास से आकाश हिल रहा है।
छोटा-सा, नन्हा-सा हिरण हॉफ रहा है
छोटे फेफड़े की तेज धुकधुकी! ...नहीं, नहीं! यह अंधेरा नहीं रहेगा।
मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूंजती है- पवित्र वाणी!
उन्हेंं प्रकाश मिल गया है।
तेजोमय!
क्षत-विक्षत पृथ्वी के घाव पर शीतल चंदन लेप रहा है
प्रेम और अहिंसा की साधना सफल हो चुकी है ।
फिर कैसा भय !
विधाता की सृष्टि में मानव ही सबसे बढ़कर शक्तिशाली है ।
उसको पराजित करना असम्भव है,
प्रचण्ड बमों से भी नहीं ...
पागलो!
आदमी आदमी है, गिनीपिग नहीं। सबार ऊपर मानुस सत्य!

लेकिन यह आदमी आदमी है, पर यह आदमी क्या है और इसका असली स्वरूप क्या है? इसे अभिव्यक्त करने के लिए फणीश्वरनाथ रेणु ब्रह्म के विराट और दिव्य रूप को याद करते हैं :

अनेक वक्त्र नयनम
अनेक अदभुत दर्शनम
अनेक दिव्य आभरणम
दिव्य अनेकोद्यतायुधम.....

यह आदमी ही अपने समुच्चय में दिव्य है अनेक चेहरे और आंखों वाला, अनेक आयुधों से युक्त असंख्य हाथों वाला, दर्शनीय, दिन में हजारों सूर्य सा दीप्त। यह आदमी ही है जिसके प्रारंभ, मध्य और अन्त के बारे में ठीक-ठीक नहीं जाना जा सकता । यह मनुष्य ही है, जो स्वयंभू है, ब्रह्म का परम तेज है। यह जनता ही जनार्दन है। नर में नारायण को देखने के लिए इस जनशक्ति पर आस्था रखकर ही कहा जा सकता है: नान्तमन मध्यमन पुनस्तवादिम पश्यामि विश्वेश्वरविश्वरूप

मैला आंचल जनचेतना का उपन्यास है। जनशक्ति को उद्घाटित करते हुए फणीश्वरनाथ रेणु श्रीमद्भगवत गीता के विश्वरूप प्रसंग को इसी संदर्भ में रखते हैं ।

मैला आंचल के उपसंहार को पढ़कर आश्चर्यचकित रह जाता हूं। प्रयोगशाला, वैज्ञानिक अनुसंधान, तृतीय विश्वयुद्ध की आतंककारी छाया, साम्राज्यवादी धनलोलुपता, भारतीय जनतंत्र का व्यक्तिपूजा में बदल जाना, गांधी की सेवा की हत्या हो जाना, मानवता की आर्तनाद करती पुकार और अचानक गीता के श्लोक को रखकर जनता को ही जनार्दन के रूप में स्थापित कर देना पूरे उपन्यास की दिशा को ही जगमगा देता है । फिर नव शिशु की किलकारियों से एक स्निग्ध वातावरण का निर्माण होता है ।

फणीश्वरनाथ रेणु की यह मानवतावादी दृष्टि उनको तमाम तरह की नकारात्मक शक्तियों से उबार कर जनशक्ति की अदम्य ऊर्जा से जोड़ती है।

यही रास्ता है! मैला आंचल एक रास्ता दिखाता है । यह रास्ता प्रेम का है । बच्चों की हंसी से यह निॢमत किया जा सकता है।

यह जाति, समूह, सम्प्रदाय, ऊंच-नीच, दलों के दल-दल से ऊपर उठाकर समरस जीवन की ओर सेवा की भावना से मनुष्य को संचालित करने को उत्प्रेरित कर सबसे ऊपर उसके सत्य को स्थापित करता है । यह नर में नारायण की खोज है!

मनुष्य के प्रति लगाव और व्याकुलता से भरा हृदय रखने वाले फणीश्वरनाथ रेणु इसी भावना के कारण कालबद्ध होकर कालातीत हो जाते हैं।

------------ भारत यायावर हजारीबाग में रहते हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी और रेणु के साहित्य पर गंभीर काम। एक दर्ज से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। खोजीवृत्ति के रचनाकार। हाल में राधाकृष्ण संचयन का संपादन-प्रकाशन। विनोबा भावे विश्वविद्यालय में अध्यापन। मोबाइल नंबर: 6207264847।

 

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