वैयक्तिक कविता



नंदकिशोर झा

कविता-जगत में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब कवि के जीवन-दर्शन का प्रभाव स्पष्ट रूप से उनकी कविताओं में परिलक्षित होता है। हरिवंश राय बच्चन और फ़ारसी शायर उमर ख़ैयाम इसी श्रेणी में आते हैं।

व्यक्ति के लम्बे जीवन काल में परिस्थितियां एवं परिवेश दोनों ही बदलते रहते हैं और इसके साथ ही बदलते रहते हैं जीवन के प्रति उसके दृष्टिकोण। कवि इसके अपवाद नहीं है। वे समयान्तराल में अपनी बदलती सोच को कविता का स्वरूप देते हैं।
अब मूर्धन्य कवि हरिवंश राय बच्चन को ही ले लीजिए। बच्चन का व्यक्तिगत जीवन-दर्शन ग्यारहवीं सदी के दार्शनिक, शायर और खगोलविद् उमर खैयाम के दर्शन से प्रभावित रहा है। इस प्रभाव की स्पष्ट छाप उनकी कविताओं में दिखती है। उमर खैयाम को 'खाओ पीयो मौज करोÓ का हिमायती माना जाता रहा है। जहां वे एक ओर जीवन को भरपूर जीने के पक्षधर थे वहीं उनके दर्शन में जीवन की नश्वरता की पीड़ा भी थी। उनकी रुबाइयां इसका प्रमाण हैं। हेमन्त स्नेही द्वारा अनूदित उमर खैयाम की इन रुबाइयों में उनके जीवन-दर्शन की झांकी दिखती है।

'हरे-भरे वृक्षों के नीचे दो टुकड़े रोटी के साथ,
मिला एक मदिरा का सागर, कविता पुस्तक मेरे हाथ।
निकट बैठ तुम गीत सुनाती छेड़े मन वीणा के तार,
यों समझो इस वीराने में मुझको मिला स्वर्ग का द्वार।Ó

और
प्राणप्रिये, ढालो मदिरा जो कर दे मेरे सब दुख दूर,
बीते पर क्यों खेद करुं मैं, क्यों समझूं कल होगा क्रूर।

जीवन की नश्वरता की पीड़ा इन पंक्तियों में-
कल किसने देखा है जग में मत गाना प्रिय कल के गीत,
आज पिला दो हो सकता है कल तक जीवन जाए बीत।
कौन कहां से आया क्यों मैं, जाने क्यों दु:ख सहता हूं,
क्या है मेरा लक्ष्य न जानूं ,अविरल जल सा बहता हूं।
जाना मुझे शीघ्र ऐसे ही जैसे मरुथल से तूफान,
क्या मालूम कहां जाना है,अपनी मंजिल से अनजान।


उनकी भौतिकवादी विचारधारा इन पंक्तियों में स्पष्ट है-

आ पास! भर दे पात्र मेरा वसंत ऋतु आने को है।
और इसके साथ ही ये पश्चाताप मिट जाने को है।
वृक्ष की सब बुलबुलें उड़तीं क्षितिज के आसपास,
पंखों में भर परवाज सब उस पार उतर जाने को है।
चाहे नौशापुर में हो या बेबीलोन में हो कयाम।
दे कभी मीठी कभी कड़वी सुरा,पर भर दे ये जाम।
जिंदगी की मय यहां हर बूंद में रिसती है यंू,
एक एक कर वृक्ष के ज्यों टूटते पत्ते तमाम।
अब बच्चन की इन पंक्तियों पर गौर कीजिए-
जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो, उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो, उतना सुन्दर साकी है,
जितना हो जो रसिक, उसे है, उतनी रसमय मधुशाला।
तथा
सुन कलकल, छलछल मधुपुर से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रुनझुन रुनझुन चल वितरण करती मधु साकी बाला।
और-
मेंहदी रचित मृदुल हथेली पर मणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकी बाला,
पाग बैजनी, जामा नीला,डाट डटे पीने वाले,
इंद्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।
बच्चन की इन पंक्तियों में जीवन की नश्वरता की पीड़ा झलकती है-
जब निज प्रियतम का शव रजनी,
तम की चादरसे ढंक देगी,
तब हम दोनों का नन्हा संसार न जाने क्या होगा।

जाहिर है, बच्चन की कविताएं, चाहे वो मदिरा, साकी, मधुशाला का वर्णन करती हों या जीवन की नश्वरता का, उमर खैयाम के दर्शन से प्रभावित हैं।
बच्चन की कविताओं का दूसरा पहलू भी है। इनकी कविताओं में व्यक्तिगत जीवन में समय समय पर उभरे मनोभावों की छवि दिखती है। बानगी देखिए-
जीवन के स्वर्णिम दिनों में प्रेयसी के अथाह प्रेम में डूबे कवि के मनोभाव ने इन पंक्तियों में कविता का रूप ले लिया है-
इस पार प्रिये तुम हो मधु है,
उस पार न जाने क्या होगा।
और फिर प्रियतमा के देहावसान के बाद एकाकी जीवन का दंश झेलते हुए कवि की भावनाएं कविता के रूप में बह निकलती हैं-
भावनाओं से विनिर्मित
कल्पनाओं से सुसज्जित ,
कर चुकी मेरे हृदय का स्वप्न
चकनाचूर दुनिया।
जीवन को फिर से स्वर्णिम बनाने के शुभ चिन्तकों के दबाव से आहत कवि लिखते हैं-

बात पिछली भूल जाओ,
दूसरी नगरी बसाओ,
प्रेमियों के प्रति रही है,
हाय कितनी क्रूर दुनियां।
है चिता की राख कर में ,
मांगती सिंदूर दुनियां।
हाय कितनी क्रूर दुनिया।

लंबे अंतराल तक कवि प्रेयसी के अवसान के बाद एकाकी जीवन का दंश झेलते रहे। फिर यथार्थ का बोध उनकी इन पंक्तियों का रूप लेता है-

जो बीत गई सो बात गई।
जीवन में एक सितारा तथा,
माना वह बेहद प्यारा था,
वह डूब गया सो डूब गया।
अम्बर के आनन को देखो,
कितने इसके तारे टूटे,
कितने इसके प्यारे टूटे,
पर बोलो टूटे तारों पर,
अम्बर कब शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई।


कवि पुन: स्वर्णिम जीवन जीने की कल्पना में इन पंक्तियों में अपनी भावना प्रकट करते हैं-
कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था,
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था,
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से संवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को।

ऐसे हालात में बच्चन जी कहते हैं-
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है?
है अंधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है
अतीत के स्वर्णिम जीवन की स्मृति कवि भूल नहीं पाते हैं-
क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई,
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई,
आंख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती,
थी हंसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई।
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार माना,
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अंधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है?
है अंधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है


हिंदी साहित्य में वैयक्तिक निबन्ध की एक विधा है। आलोचकों ने ऐसे निबंध, जो मूल रूप से लेखक के विचारों के इर्द-गिर्द रचे होते हैं,को वैयक्तिक निबन्ध की संज्ञा दी और ऐसे निबंधकारों को वैयक्तिक निबंधकार कहा है ।
कई आलोचक इन्हेंं आर्म चेयर फिलॉसफर भी कहते हैं।

आर्म चेयर फिलॉसोफर कई विधाओं में मिल जाएंगे, यहां तक कि विज्ञान में भी जो अपने निबन्धों में प्रयोग के बजाए अपने विचारों को ज़्यादा तरजीह देते हैं ।
मेरी अवधारणा है कि इसी मापदंड से हिंदी कविता-जगत में ऐसे कवियों को हम वैयक्तिक कवि और उनकी कविताओं को वैयक्तिक कविता की संज्ञा दे सकते हैं।
★★★

 

आदिवासी साहित्य
राजनामा