लावारिस लाशों का करते हैं अंतिम संस्कार



रांची : "अपने लिए जिए तो क्या जिए, ऐ दिल,तू जी जमाने के लिए" उक्त गाने की पंक्तियों को चरितार्थ कर रहे हैं राजधानी के निवारणपुर स्थित आम्रपाली अपार्टमेंट निवासी जाने-माने समाजसेवी तुषार कांति शीट। समाजसेवा का जुनून उनके सिर चढ़कर बोलता है। शीट ने मानव सेवा की अद्भुत मिसाल पेश कर समाज के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनके द्वारा किए गए कार्य समाजसेवा के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए अनुकरणीय ही नहीं, बल्कि प्रेरणास्रोत भी है।

पेशे से व्यवसायी शीट हमेशा पीड़ित मानवता की सेवा में समर्पित रहते हैं। समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने और इस क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए देश की दर्जनाधिक ख्यातिप्राप्त संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। शीट शहर की लोकप्रिय सामाजिक संस्था श्रीरामकृष्ण सेवा संघ के सहायक सचिव हैं। मानव सेवा के प्रति उनकी अभिरुचि बचपन से ही रही है।

छात्र जीवन से ही उन्होंने मानवसेवा के क्षेत्र में बढ़ -चढ़कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया। स्कूली शिक्षा प्राप्त करते समय ही उन्होंने आगे चलकर समाज सेवा करने का संकल्प लिया। अपनी पारिवारिक और व्यावसायिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए वह विभिन्न प्रकार के सामाजिक कार्यो में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। वह मृत्योपरांत शवों के अंतिम संस्कार में भी भाग लेते रहे हैं। वह बताते हैं कि अबतक तकरीबन छह हजार शवों के अंतिम संस्कार में शामिल हो चुके हैं। वहीं, अपने स्तर से दर्जनों लावारिस लाशों की अंत्येष्टि कराकर उन्होंने पीड़ित मानवता की सेवा की अद्भुत मिसाल पेश की है।

मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हावड़ा स्थित गोविंदपुर गांव निवासी श्री शीट इस संबंध में रोचक जानकारी देते हुए बताते हैं कि स्कूली जीवन में सहपाठियों की एक टीम बनाई थी। गांव में जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी, तो उसके अंतिम संस्कार में उपयोग में आने वाली सामग्री को सब मिलजुल कर इकट्ठा करते थे और संबंधित परिजनों को उपलब्ध करा देते थे। उनकी शव यात्रा में भी शामिल होते थे। पढ़ाई के दौरान गांव में यह सिलसिला लगातार जारी रहा। तत्पश्चात नौकरी की तलाश में वर्ष 1990 में रांची आ गए। यहां पहले हिंदपीढ़ी मुहल्ले में किराए के एक मकान में रहना शुरू किया। वहां पर एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता रंजीत दास से उनकी मुलाकात हुई। उनसे मुलाकात के बाद समाजसेवा का जुनून और परवान चढ़ने लगा। आसपास में किसी व्यक्ति की मौत हो जाती थी, तो उनके अंतिम संस्कार के लिए सामान जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे। तत्पश्चात निवारणपुर में रहना शुरू किया। इस बीच समाजसेवा के क्षेत्र में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने का क्रम जारी रहा। उन्हें पता चलता कि किसी व्यक्ति की मौत हो गई है और उसके परिजन उसका अंतिम संस्कार करने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं, आर्थिक रूप से बेहद गरीब हैं, तो वैसे लोगों को भी उन्होंने मदद पहुंचाना शुरू किया। कई लावारिस लाशों की अंत्येष्टि उन्होंने अपने खर्च पर कराई।

शीट बताते हैं कि अबतक 70 लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार वह अपने खर्च पर कर चुके हैं। वह बताते हैं कि पीड़ित मानवता की सेवा के इस कार्य में उन्हें समाजसेवी राजीव रंजन, आनंद रंजन घोष, हीरक दत्ता, राकेश कुमार सिंह सहित अन्य सहयोगियों का भी महत्वपूर्ण सहयोग मिलता है।

शीट पर्यावरण प्रेमी और पशुप्रेमी भी हैं। वह कहते हैं कि मानव सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है। पीड़ितों और गरीबों की सेवा करने से सुखद अनुभूति होती है।

 

शहरनामा