‘पुरुबे बनिजिया’ परंपरा, अर्थ और पलायन

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संतोष कुमार राय

भारत में पलायन का इतिहास बहुत मार्मिक और करुणाजनक है। पलायन सिर्फ एक शब्द मात्र नहीं है। पलायन शब्द के भीतर जैसा दर्द, दंश और टीस भरी है उसे शब्दों शायद ही बताया जा सके। लेकिन पलायन का इस दर्द को भोजपुरी के गीतों में, परंपरागत ग्रामीण गीतों में, प्रेम संबंधी गीतों में, बिरह संबंधी गीतों में, श्रृंगार संबंधी गीतों में पलायन को बहुत हद तक उतारा गया है। आज मजदूरों के पलायन को मीडिया ने हूबहू दिखाया तो लोगों की आँखें भर आयीं, दर्द जमीन पर उतर आए, पाँवों के छाले परत-दर-परत चिथड़े की तरह उभर कर आम जनमानस की आँखों में चुभने लगे। आज की पीढ़ी को पलायन का ऐसा भयानक रूप देखने को मिला जिसकी शायद ही किसी ने कल्पना भी की हो। लेकिन जरा सोचिए जब मीडिया ऐसी नहीं थी और सरकार और सत्ता पलायन करने वालों का सर कलम करने के लिए बेताब रही हो, तब क्या बीता होगा उन लोगों पर जो अपना धर्म-कर्म बचाने के लिए पलायन का रास्ता चुने होंगे।

आज जब हमने पलायन को देखा तो हमे सहज ही भोजपुरी के सैकड़ों गीत याद आ गए जो अपनों के पलायन के दर्द में लिखे गए होंगे। लोक में इस तरह के गीत दो तरह के मिलते हैं। पहला वह जो आम लोगों के बीच से निकले और दूसरा वे जिन्हें कुछ लोक कलाकारों ने आगे बढ़ाया। भोजपुरी के महान कलाकार भिखारी ठाकुर का पूरा का पूरा ‘बिदेशिया’ पलायन से ही तो जुड़ा हुआ है। महेंद्र मिश्र और इस तरह के अनेक लोगों ने पलायन को अपने गीतों में जीवंत किया है।

यदि पलायन के मुख्य रूपों की बात की जाय तो भारत में सबसे पहले बहुत बड़े पैमाने पर पलायन मुगलकाल में हुए। उसके बाद पलायन अंग्रेजों के समय में हुआ। फिर बहुत बड़ा पलायन स्वाधीनता के समय भी हुआ। इस साल स्वाधीनता के बाद का सबसे बड़ा पलायन देखने को मिला। लेकिन ये तीनों कालखण्डों के पलायन की तासीर बिलकुल अलग-अलग रही है। मुगलकाल के पलायन धर्म और प्रतिष्ठा बचाने के लिए हुए। लोग मुगलों के आतंक से मजबूर होकर अनेक जगहों पर विस्थापित हुए, बसे और उजड़े लेकिन अपने धर्म से समझौता नहीं किया। और यह कोई एक दो दिन, माह या वर्ष तक नहीं चला। यह कई सदियों और अनेक पीढ़ियों तक चला। हर पीढ़ी ने अपनी अगली पीढ़ी को वही संस्कार दिया जिसमें धर्म और प्रतिष्ठा की रक्षा करना जीवन का प्राथमिक उद्देश्य था। दूसरा और सबसे दर्दनाक पलायन अंग्रेजीराज में हुआ। इस समय भारत से बड़े पैमाने पर मजदूरों का पलायन अंग्रेजों के दूसरे उपनिवेशों में हुआ जिसका केंद्र पूरब यानि कोलकाता था। यही कारण है कि बिदेशीया और कहरवा में कोलकाता को पूरब कहकर संबोधित किया गया है। भोजपूरी क्षेत्र में एक पूरबी गीत बहुत मसहुर है... गवाना कराई पिया हो, घरे बैठवला, अपने बसेला पिया हो पुरुबे बनिजिया। यह पुराना और पारंपरिक गीत है। कुछ दूसरे गीत जो आधुनिक काल में लिखे गए हैं। भारत में कोयला क्षेत्र को लेकर लिखा गया... सुनि ला कि झरिया मे कोइला बिचाला, पानी ह खराब सब लोग संवराला, एक त हउवें सांवर अउरी होके अइहें करिया, पहुंचले कि ना, उठे हिय मे लहरिया पहुंचले कि ना। एक ऐसा ही गीत मजदूर के बाहर जाने पर उसकी पत्नी के शब्दों में गया गया है... घास गढ़ब खेत में चराइब हम बकरी, जेठ करिहें अलगा चाहे ताना मारी नागरी, अपना सइयाँ से कराइब नाही नोकरी...

यहाँ गीतों के भाव को जब हम टटोलते हैं तो पता चलता है कि ये गीत परिवार से अलग दूसरे शहरों में काम करने वाले कामगारों के परिवार के लोग अपनी असहनीय पीड़ा को व्यक्त करते हैं। लेकिन अतीत के पलायन में और वर्तमान के पलायन में बुनियादी भिन्नता है। अंग्रेजों ने पानी की जहाजों में भर-भरकर भारतीय मजदूरों को उनके घरों से इतने दूर लेकर चले गए जहाँ से वे वापस नहीं आ पाये। इसमें कोई भी मजदूर इच्छा से नहीं जाता था बल्कि लोगों को जबरन ले जाया जाता था। अपनों से बिछुड़ने का दर्द दोनों ओर बराबर रहा, ऊपर से उन गिरमिटिया मजदूरों को जो कष्ट मिले उससे आम जनमानस बहुत भयभीत हुआ। इसीलिए कोई अपने परिवार के लोगों को बाहर नहीं जाने देता था। लेकिन वर्तमान में यह स्थिति बदली और लोग गाँवों को छोड़कर धड़ल्ले से शहरों की ओर सपरिवार पलायन करने लगे। शहर इस ठसाठस भरने लगे और गाँव वीरान होने लगे। सरकार भी शहरों को ही औद्योगिक संसाधन का केंद्र बनाने लगी।

इस बार का पलायन उल्टा हुआ है। पहले मजदूरों का पलायन गाँव से शहरों की ओर होता था लेकिन इस बार का पलायन शहरों से उन्हीं गाँवों की ओर हुआ, जिन्हें लोग उपेक्षित मानकर छोड़ गए थे। एक बार फिर गाँव के पुराने खंडहरों के प्रति विश्वास बढ़ा है और लोग बड़ी संख्या में शहरों से अपर कष्ट उठाते हुए गाँव वापस आए हैं। पहले के गीत कुछ और थे लेकिन अब के गीत कुछ और होंगे। इस महामारी में शहर अब बसर योग्य नहीं रहे। इसलिए बसर के गीत एक बार फिर गाँव के खेत-खलिहानों, बाग-बगीचों, डाँड-मेढ़ पर केंद्रित होंगे। प्रकृति अपने तरह से परिवर्तन करती है और मनुष्य अपनी तरह से। अभी तक मनुष्य करता रहा लेकिन इस बार प्रकृति ने किया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस महामारी के बाद भारत किस ओर बढ़ता है। गाँव की मद्धिम चाँदनी की ओर या शहर की चमकती बिजली की ओर।


 

शहरनामा