संस्कृत के श्लोकों से सजा है जगन्नाथ मंदिर



अनिता रश्मि

झारखण्ड की राजधानी राँची के बड़कागढ़ में पुरी के जगन्नाथ मंदिर की तरह एक भव्य, विशाल, अति ख़ूबसूरत मंदिर है। इसमें जगन्नाथ, सुभद्रा और बलराम के विग्रह की पूजा होती है। ये विग्रह मिट्टी, पत्थर से नहीं, लकड़ी से निर्मित हैं।

हमारे बचपन, कैशोर्य, युवावस्था की गलियों में कैद है इस देव स्थान की प्राचीन तस्वीर। बड़े से टीले पर चारों ओर के परकोटे से घिरा अद्भुत मंदिर। शायद तब इतनी भव्य सीढ़ियाँ नहीं थी। हर राँचीवासी की तरह अक्सर हम मंदिर जाते रहते। रथ मेला के समय तो एक बार जा
ना ही जाना होता।

1691 अर्थात सोलहवीं शताब्दी में बड़कागढ़ के राजा ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने इसे बनवाया था। बाद में साहित्यकार मुक्ति शाहदेव के पिताजी जगन्नाथपुर देवालय न्यास समिति के ताउम्र कोशाध्यक्ष सह अध्यक्ष रहे स्व. ठाकुर राधेश्याम शाहदेव जी ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था।

इसके निर्माण के लिए भुवनेश्वर से कारीगर बुलाए गए थे।
कालांतर में पुनः उद्धार के समय भुवनेश्वर के ही मिस्त्री, कारीगर आए थे। भवन की सारी सामग्री भी वहीं से मँगवाई गई थी। मिस्त्री संस्कृत के श्लोक पढ़ते जाते, उसी के आधार पर कारीगर दीवारों, गुंबदों का निर्माण करते...एक अनोखी रीति...हर श्लोक के साथ अलग संरचना।

इस भव्य देवालय में हर साल बरसात में विशाल मेला लगता है। एक बार तब, जब सुभद्रा, जगन्नाथ, बलराम पास ही स्थित मौसी बाड़ी में जाते हैं। पुरी के तर्ज पर इस समय रथ यात्रा निकाली जाती है, जिसमें हजारों की संख्या में भक्तगण रथ की रस्सी खींचने के लिए दूर-दराज से खिंचे चले आते हैं। इसे चलती रथ मेला कहा जाता है।

ऐतिहासिक रथ मेला की गूँज और धूम दूर-दूर तक है। हम भाई-बहन और बुआ-चाची बाबूजी संग रस्सी थामकर चलती भीड़ के साथ-साथ चलते हुए मौसी बाड़ी पहुँच जाते थे। वहाँ टीले के ऊपर से चुपचाप गहमागहमी का, लाउडस्पीकर के भक्ति गीतों का आन्नद लेते रहते।

एक-दो बार केवल मौसी बाड़ी में ही प्रणाम कर लौटने की स्थिति बनती। खासकर जब भीड़ अथाह हो।

रथ मेला के दिन बूँदा-बादी अवश्य होती और भक्तगण कह उठते होनी ही है... यह जगन्नाथ भगवान का आशीष बरस रहा है।
जनजातीय लोगों की भक्ति, रथ खींचने का जज्बा और उत्साह देखते बनता। लाल पाड़ की श्वेत घुटनों तक बँधी साड़ी, फूल-पत्तियों से सजे तिरछे जूड़े, हँसुली-तगड़ी के गहने से सजी गात, माथे, गले, हाथ-पैरों, कुहनियों-सुपली तक गोदने के गहने से सजी जनी मन और रंग-बिरंगे कुर्ते, रंगीन धोती, कमर-माथे पर बँधे पड़िया लुग्गा से निर्मित गमछे, सर पर मोर पँख या फूल-पत्ते सजाए मरद...पूरा मेला परिसर इनकी रौनक से जगमगाता रहता।


उधर पूरे मेन रोड का सन्नाटा बोल उठता। सबके कदम बस, मेले की ओर जा रहे होते।

नौ दिनों में तीनों भाई-बहन मौसी बाड़ी से वापस आते हैं। फिर खूब भीड़ जुट आती है। रथ की रस्सी थामने को हजारों हाथ उठ जाते हैं। इसे घुरती रथ मेला कहते हैं। दस दिनों तक मेले की गहमागहमी। सामने ही छोटे से टीले पर मौसी बाड़ी...एक छोटा सा मंदिर। आस-पास टीलों पर अनेक घर बन गए अब तो। अपनी गाड़ी से सीधे चिकनी सड़क के सहारे ऊपर पिछवाड़े के विशाल द्वार तक पहुँच सकते हैं। काफी विकसित हो गया है यह भीड़-भाड़वाला इलाका। नहीं तो बीच का रास्ता एकदम निरापद था। इन दिनों पूरी राँची और आस-पड़ोस के इलाकों से सभी धर्मों के लोगों की भीड़ देखते बनती थी। अभी भी वही भीड़ लगती है। रंग-बिरंगे वस्त्रों, रंग-बिरंगे स्थानीय भोजन, रंग-रंग के तमाशे अब भी नजर आ जाते हैं।

कोई नट-नटी मेला परिसर में तनी रस्सी पर अपनी बच्ची-बच्चे को चलाकर जैसे जीवन के तने तार पर सधे कदम रखने का गुर सिखा रही होती है, तो कहीं फूल-मालाओं की सुगंध, सिंदूर की पुड़िया में कोई सुहाग बाँट रहा होता है। मेला पहले से भी ज्यादा भव्य हो चुका है अब। इन दिनों बड़े व्यापारिक केंद्र में तब्दील हो जाता है यह देवालयी इलाका। बर्त्तनों की दुकानें अलग से सज जाती हैं, जहाँ हर तरह के बर्त्तन, खेती के औजार एक ही जगह आसानी से मिल जाते हैं। हमने भी अलभ्य से लगनेवाले लोहे के बर्तनों को यहाँ से खरीदा है।

वैसे सालों भर पूजा-अर्चना के लिए भक्तों की भीड़ दिखलाई पड़ती है। प्रत्येक दिन एक निश्चित समय पर भोग लगाया जाता है। भोग का प्रसाद पाने के लिए सब लालायित। आस-पास की खूबसूरती भी बेहद मनोरम! ऊपर से राँची के उस क्षेत्र का मनमोहक, विहंगम दृश्य देख दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं लोग।
दर्शनीय!! चित्ताकर्षक!! पीछे झाँकता एच. ई. सी.।
जे.एस.सी.ए. स्टेडियम जाते हुए पीछे से ताकता देवालय आपके पाँव थाम लेता है। आप ठहरकर उसके पृष्ठ भाग के भी आकर्षण में वैसे ही बँध जाते हैं, जैसे सामने के।

अब भी है यह झारखण्ड की शान!!...शान से खड़ा हुआ।

 

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