देश का सबसे बड़ा शवागर



डॉ०हरेन्द्र सिन्हा। 9 अगस्त।
झारखंड राज्य में बुंडू प्रखंड के अंतर्गत चोकाहातू नामक गांव काफी समय से चर्चा में रहा है जिसका कारण वहां पाए जा रहे लगभग 7623 मेगालिथ्स हैं। चोकाहातू रांची से लगभग 70 किलोमीटर दूरी पर अवस्थित है। इसका सबसे पहला ऐतिहासिक संदर्भ 1871 में छोटा नागपुर के तत्कालीन कमिश्नर इ.टी. डाल्टन ने अपने यात्रा विवरण में दिया है जो एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल में प्रकाशित भी हुआ था।

दरअसल अपनी सरकारी यात्राओं के क्रम में जब कमिश्नर डाल्टन चोकाहातू गांव की तरफ से गुजर रहे थे तो कुछ ग्रामीणों ने उन्हें जिज्ञासा वश गांव के अंदर पत्थरों के बड़े-बड़े शवागारों के होने की सूचना दी। जब उन्होंने जाकर उन्हें देखा तो उन्होंने पहचाना कि वह मेगालिथ्स हैं और बाद में उन्होंने अपने कर्मचारियों को लगाकर इनकी गणना भी कराई तो मालूम हुआ कि वहां कुल मिलाकर 7623 मेगालिथ है जो विभिन्न प्रकार के हैं तथा लगभग 7 एकड़ में फैले हुए हैं।

चूंकि उस समय पुरातत्व का इतना महत्व भारत में नहीं था अतः यह सूचना सिर्फ सरकारी दस्तावेजों में क़ैद होकर रह गई। आगे चलकर जब इस क्षेत्र में थोड़ी बहुत पुरातात्विक गतिविधियां प्रारंभ की गईं तो बाहर के या दक्षिण भारत के जो विद्वान क्षेत्र में आए उन्होंने इन्हें पहचाना कि ये मेगालिथ्स हैं और इसके महत्व को भी उन्होंने समझा और अपने अपने ढंग से इनकी व्याख्या की ,प्रकाशन भी कराया। उन दिनों इस अत्यंत महत्वपूर्ण खोज को एक रोमांचक पुरातात्विक सूचना समझ कर दुनिया ने ग्रहण किया होगा लेकिन इसका पुरातात्विक महत्व कितना रहा यह अब समझ में आने लगा है। फिर भी सरकारों को, चाहे वह केंद्र सरकार हो चाहे राज्य सरकार, किसी को अभी तक समय नहीं मिल पाया है कि इनकी सुधि ली जाए, इन्हें संरक्षित किया जाए इनका सम्यक आलेखन कराया जाए और पुरातत्वविदों से इसका सही अध्ययन करा कर इन्हें प्रकाशित कराया जाए।

वर्ष 2000 में 15 नवंबर को झारखंड राज्य का जन्म हुआ जिसकी वजह से बिहार राज्य के कला संस्कृति विभाग के इस क्षेत्र में अवस्थित कार्यालयों के लिए पदाधिकारियों कर्मचारियों को बिहार से इस राज्य के लिए ही स्थानांतरित किया गया जिस के क्रम में मुझे भी यहां पदस्थापित किया गया। कला संस्कृति विभाग के अंतर्गत रहते हुए कला संस्कृति के अलावा मैंने पुरातत्व के संदर्भ में भी व्यक्तिगत तौर पर छानबीन शुरू की। स्थानीय मित्रों, सहयोगियों और पत्रकारों के सहयोग से मैंने पूरे राज्य में एक नेटवर्क सा स्थापित किया जिससे मुझे लगातार राज्य के अंतर्गत पाई जाने वाली पुरातात्विक सामग्रियों एवं स्मारकों की सूचना लगातार मिलती रही। जब मुझे चोकाहातू की जानकारी हुई कि यहां बहुत बड़ी संख्या में मेगालिथ्स हैं, तो मैंने तुरत वहां जाना तय किया क्योंकि जब मैं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में कार्यरत रहने के दौरान 19778-79 में नागपुर में पदस्थापित था। उस समय आंध्र प्रदेश में और दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में मुझे काम करने का मौका मिला जिसके अंतर्गत मुझे मेगालिथ्स की खुदाई करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ था जिससे मेरी स्वाभाविक रुचि मेगालिस में जागृत हो गई क्योंकि पूरी दुनिया के लिए आज भी मेगालिथ निर्माता रहस्य बने हुए हैं कि वह कौन थे, उनकी जीवन-शैली क्या थी, इनकी दैनिक गतिविधियां क्या थीं। इसके बारे में कोई विस्तृत जानकारी अभी तक नहीं प्राप्त हुई है क्योंकि इन सब से संबंधित कोई भी हैबिटेशनल साइट अभी सही ढंग से नहीं खोजे जा सके हैं और जिन पर दावा किया जाता है कि वह मेगालिथिक हैबिटेशनल साइट है, वह भी अभी पूरी तरह से विद्वानों में स्वीकार्य नहीं है।

इन्हीं कारणों से चोकाहातू मेगालिथ्स में मेरी रुचि पैदा हुई, जब मैंने लोगों से उनके बारे में सुना। सबसे पहले मैं मार्च 2001 में वहां दो स्थानीय लोगों के सहयोग से अकेला ही पहुंचा और जो कुछ भी मैंने देखा मैं दंग रह गया, क्योंकि मैंने इसके बारे मे जो सुन रखा था कि यहां करीब 7500 से अधिक मेगालिथ्स हैं, जब वह स्थल मेरे आंखों के आगे आया तो मुझे यकीन नहीं हो रहा था। पहले अन्वेषण में मैंने इन शवागारों की संख्या और इनके विस्तार के क्षेत्र का अध्ययन किया। जब मुझे यह एहसास हो गया कि कर्नल डाल्टन ने अपने प्रतिवेदन में बिल्कुल सही सूचनाएं लिखी थीं तब मैंने तय किया कि अब एक टीम लेकर यहां फिर से आना होगा और इसकी संरचनाओं एवं प्रकार का अध्ययन करना होगा। यह एक ही प्रकार के हैं कि कई प्रकार के हैं यह भी देखा जाना आवश्यक था क्योंकि वहां पहली नजर में जो शवागार दिखे थे उन में मुझे स्पष्ट तीन चार प्रकार दिखे तो मैंने तय किया कि मैं जल्द ही एक टीम लेकर आऊंगा।

किंतु, आने में कुछ समय लग गया और नवंबर 2002 में हम लोग अपनी पूरी टीम लेकर आए जिसमें मेरी पत्नी, जो पुरातत्वविद थीं और मेरे साथ ही पदस्थापित थीं, स्वर्गीय नूतन सिन्हा, मेरे सहयोगी स्वर्गीय कुमार आनंद और छायाकार के रूप में शिव गुप्ता थे।

हमने बहुत सारे शवागारों के माप लिए और पाया कि कोई कोई पत्थर 4.5 मीटर तक की लंबाई का था जो टेबलेटॉप के रूप में चार स्तंभों पर टिका कर रखा गया था।धीरे धीरे हमने लगभग 5 घंटों में काफी जानकारियां एकत्रित कर ली जिन्हें बाद में रेडिकल और अखबारों में भी प्रकाशित कराया गया। इस अन्वेषण के आधार पर हमने यहां तीन प्रकार के मेगालिथ्स पाए जिनमें डोमेन, टेबल टॉप और मेनहिर प्रकार थे। हमें मेनहिर का एक ही उदाहरण, गांव की सड़क के पास ही, देखने को मिला वह भी लगभग जमीन के ऊपर 6.5 फीट की उंचाई का था और बगल की ओर थोड़ा झुका हुआ था। एक डोलमेन के एक स्तम्भ पर कमल पुष्प जैसी एक ख़ूबसूरत, आकृति उत्कीर्ण थी।

ग्रामीणों द्वारा इसकी समुचित देखभाल नहीं हो पा रही है इसका कारण संभवत है यह है कि अभी तक इसका महत्व और मूल्य ग्रामीण सही ढंग से नहीं समझ पाए हैं। गाय के गोबर के उपले इन मेगालिथ्स पर आसानी से देखे जा सकते हैं। इसके अलावा यह भी सूचना है कि जब लोगों को पत्थर की आवश्यकता होती है तब इन्हीं में से पत्थर निकाल कर इस्तेमाल कर लिए जाते हैं। इन कारणों से आवश्यक यह है कि जल्द से जल्द इसके संरक्षण की कार्रवाई की जाए, इसके प्रति जागरूकता के लिए कुछ कार्यक्रम आयोजित किए जाएं ताकि लोग इसके संरक्षण में मदद कर सकें, इस पूरे क्षेत्र की घेराबंदी कर दी जाए जिससे यहां गाय बैलों का निर्बाध रूप से आना और इस पूरे स्थल को गंदा करने जैसी घटनाएं न घटें और साथ ही यह भी कोशिश की जाए के कुछ चुनिंदा मेगालिथ्स को पुरातात्विक प्रक्रिया से खोद कर देखा जाए कि इनके अंदर क्या सामग्री है और उनसे इनके निर्माताओं पर क्या प्रकाश पड़ सकता है।

मेरी रूचि झारखंड के मेगालिथ्स में 1995 में तब पैदा हुई जब बिहार सरकार द्वारा कला संस्कृति प्रक्षेत्र का अतिरिक्त प्रभार मुझे रांची क्षेत्र (दक्षिण बिहार) के लिए मिला। इस क्रम में मुझे पटना से बार-बार रांची बैठक आदि में भाग लेने के लिए आना पड़ता था। ऐसी ही यात्राओं के दौरान मैं सहज उत्सुकता वश और पुरातात्विक गतिविधियों में रुचि रखने तथा प्रशिक्षण मुख्यत होने के कारण झारखंड के विभिन्न आंतरिक स्थलों तक पहुंच जाया करता था। इस क्रम में मैंने देखा कि यहां मेगालिथ्स की भरमार है और मैं दक्षिण भारत में देख चुका था कि वहां कितनी बड़ी संख्या में मेगालिथ्स पाए जाते हैं। मैंने उत्खनन के दौरान मेगालिथ्स का गहन अध्ययन भी किया था जिससे मेरी जिज्ञासा हमेशा जगी रहती थी कि मैं मेगालिथ्स के बारे में और अधिक जान सकूं।

तो झारखंड के आंतरिक स्थलों में आते जाते मैंने पाया कि मुण्डा जनजाति में यह शवों की अंतिम क्रिया में मेगालिथिक परंपरा अब भी क़ायम है। तभी मैंने एक परियोजना पर कार्य शुरू किया कि "क्या मुण्डा जनजाति मेगालिथ निर्माताओं की वंशज हैं।" संभावना तो हो रही है पर अभी डी.एन.ए. टेस्ट आदि जैसी वैज्ञानिक पद्धतियों से भी इसकी जांच कर लेनी जरूरी है।

एक घटना इसी बीच घटी कि डेक्कन कॉलेज, पुणे के एक शोधार्थी रांची आए थे उन्होंने मुझसे बहुत सारी जानकारियां इस परियोजना की ली। मैंने सरलता पूर्वक उन्हें मदद कर दी और उसके कुछ ही समय बाद मैंने देखा कि उन्होंने मुंबई में एक सेमिनार में इसी विषय पर एक पेपर प्रस्तुत कर दिया। अब वह प्रयत्न भी करते हैं तो मैं उनसे संपर्क नहीं रखता, ऐसे लोगों से मुझे बचाव करना पड़ता है।

अगर पूरे झारखंड राज्य को देखा जाए जो मुख्य रूप से यहां चार पांच प्रकार के मेगालिपथ्स ही मिलते हैं जबकि दक्षिण भारत में लगभग 3 दर्जन से अधिक प्रकार के मेगालिथ्स पाए गए हैं जिनके संबंध में काफी शोध हुआ है। काफी नई जानकारियां भी सामने आई हैं, लेकिन अभी भी इनके बारे में बहुत विस्तार पूर्वक हम नहीं जानते हैं और अभी भी यह माना जाता है कि संभवतः यह जिप्सी किस्म के लोग रहे होंगे, बंजारे किस्म के लोग रहे होंगे जो आज यहां हैं, कल वहां हैं। इसीलिए इनका कोई स्थाई निवास नहीं मिल सका है हालांकि इस दिशा में खोज लगातार जारी है। ये मेगालिथ्स पूरी दुनिया में पाए गए हैं और इनकी और सबसे पुरानी तिथि 8000 ईसा पूर्व आंकी गई है जो स्कॉटलैंड स्वीटजरलैंड आदि जैसे देशों में है। हमारे देश में सबसे पुराना मेगालिथ्स जम्मू कश्मीर क्षेत्र में गुफक्राल में पाया गया है जो लगभग 2000 ईसा पूर्व का समझा जाता है।

(लेखक झारखंड संस्कृति विभाग के पूर्व अधिकारी हैं। पुराविद हैं और कई स्थलों की खोज की है।)

 

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