काली मंदिर से चर्च तक गंगा जमुनी संस्कृति

Johar

अनिता रश्मि

चर्च रोड! ऐतिहासिक प्राचीन काली मंदिर से प्रारंभ बहु बाजार के पास चर्च पर खत्म, जिसने जीवन के हर झंझा-तूफान को झेला फिर भी बड़े शान से खड़ा है। बीच में दो-दो मस्जिद। एक तरफ गुरुद्वारा कश्मीर वस्त्रालय के पास, दूसरी तरफ काली मंदिर के सामने महावीर मंदिर भी तो है। याने हिंदू, सिक्ख, ईसाई, मुस्लिम के धर्म स्थान एक साथ।

मेन रोड में चुरूवाला, डेली मार्केट, उर्दू लाइब्रेरी। चर्च के पास संत बरनाबास अस्पताल काफी पहले से शिद्दत से खड़ा, तो सौ साल से ऊपर की उम्रवाला संत माग्र्रेट विद्यालय, संत पॉल स्कूल कॉलेज और कई शैक्षणिक परिसरों में चिडिय़ों से चहकते बच्चों का अद्भुत संसार।

गंगा-जमुनी संस्कृति का वाहक चर्च रोड गुलज़ार रहता था, है सिख, ईसाई, मुस्लिम, हिंदू परिवारों की चहचहाहट से। एक-दूसरे के लिए, एक-दूसरे के साथ सदा खड़े, एक -दूसरे के धर्मों का आदर करनेवाले, एक-दूसरे के त्योहारों को मनानेवाले सरल-सहज लोग। ईद-बकरीद पर मीठी सेवइंया, होली-दशहरे पर पुए-पकवान, क्रिसमस पर केक-अरसा की बहार... सबके लिए।

लोहड़ी-वैशाखी पर भी साथ की कमी न थी। प्रकाश पर्व, अन्य पर्व पर प्रभात फेरी में शामिल हो जाते सभी। प्रभात फेरी रातू रोड के गुरुद्वारे से होकर मेन रोड के गुरूद्वारे में खत्म। वहां मत्था टेक लंगर चखते, सबद-कीर्तन भी सुनते।

मोहर्रम पर महबूब अंकल बाघ बनकर हर घर की ड्योढ़ी पर नाचते.... पूरा शरीर लाल रंग और चेहरा पीले-उजले रंग से रंगा... पहचान में नहीं आते। हर घर को उनकी प्रतीक्षा... ज़ाहिर है, वे घर केवल मुस्लिम के नहीं। अब धीरे-धीरे वह परंपरा ही खत्म। ताजिया देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी।

रामनवमी पर दो मुहल्लों के शेर साफा-राजसी धोती में राजा से कम नहीं लगते। जब तलवारधारी वे दोनों गले मिलते, सारे धर्मावलंबी का दिल नाच उठता। महावीरी झंडे मुसलमान भाई बनाते, रास्ते में शरबत और मीठे से सबका मन तर कर देते... अजूबा नहीं लगता कुछ... सब सहज-स्वाभाविक!

कौन किसकी सहेली, कौन किसकी चाची-चाचा, सब अपने। इसी चर्च रोड के रज़ब अली लेन में घर पर ही अपना जन्म हुआ था। गली के बाहर आते ही बेहद बुजुर्ग दंपति से भेंट हो जाती। दुआ-सलाम होता। वे जी भर दुआ देते... अल्लाह से हम सब के लिए दुआ मांगते। विवाह हो जाने के बाद और भी ज्यादा। उनसे मिले बिना हमारे पैर नहीं बढ़ते थे।

चर्च रोड में जहां एक तरफ बर्तनों की दुकानें, वहीं दूसरी तरफ कपड़ों की। क्या ऐसा था, है, जो वहां नहीं मिलता। सब कहते, यहां केवल घर बनाकर निकल जाओ, सारा कुछ उपलब्ध। सुई से लेकर फार तक, डॉक्टर से लेकर प्रसाद तक, बक्से से लेकर ऊन तक। अपर बाजार के बाद सबसे विशाल मार्केट यहीं था। चूडिय़ों की खनखनाहट के लिए आते दूर-दराज से लोग देवी मंडप के बाजू में।

यह देवी मंडप लेन कभी रजब अली लेन कहलाया, कभी राजा बली लेन। अब तो प्रवेशद्वार को सिद्दीकी चौक का नाम मिला है। राष्ट्रीय पर्वों पर झंडा फहराया जाता है यहां। दरदरा पट्टी, डॉ. फतुल्ला रोड, विक्रांत चौक, नाजिर अली लेन, गुदड़ी, कर्बला चौक आदि... आदि भी तो चर्च रोड का ही अंदरुनी हिस्सा हैं।

यहां घर पर 'नवल भवनÓ देवी मंडप लेन में कई बार आए थे श्री भारत यायावर भाई। रांची में पी. जी. कर रहे थे। उनके साथ एक बार अशोक पागल जी। वाल्टर भेंगरा तरूण जी। कलम पकडऩा सीख रही थी उन दिनों। बाद में दूसरी इनिंग के समय जब बेटियों की पढ़ाई के कारण यहां थी, तब विद्याभूषण जी, श्रवण कुमार गोस्वामी जी, सुरभि की गोष्ठी में उषा सक्सेना दी, माया प्रसाद दी, पूॢणमा केडिया दी, महुआ माजी, अशोक पागल जी, इंटरव्यू लेने आई आलोका, फोटोग्राफर दिवाकर प्रसाद और कुछेक लोग। अब भी नवल भवन याद करता है उन्हेंं।

चर्च रोड के माथे पर एक दाग भी है। वह है इंदिरा जी की हत्या के बाद सिक्खों के नरसंहार की कोशिश में इस समुदाय के बीच पसरते भय का। मैं उस समय यहां नहीं थी लेकिन सुना था, हमारे घर ही बगलगीर मंगल चाचा ने सपरिवार पनाह ली थी। छत से कूदकर आए थे।

हां! अपने बालपन का दंगा याद है। पूरी रांची में आग लगी थी। लाल दहकते अंगारों को नवल भवन की छत से देखा था और हमें भी घर छोड़कर डोरंडा में पनाह लेना पड़ा। सब भाग गए थे....मुस्लिम-हिंदू सब। विश्वास दरक गया था। सब एक साथ खड़े पर बाहरवालों पर भरोसा न था। फिर सबने कभी आंच न आने दी दंगों की। चिंगारी देखते ही हिंदू, मुस्लिम, सिख एकजुट होकर खड़े हो जाते। दूर-दराज के लोग हथियार जमा करते, ईंट-पत्थर, शीशे के टुकड़े छतों पर एहतियातन रखे जाते लेकिन हमारी एकजुटता खत्म नहीं होती। ढाल बन जाते मुहल्लेवाले।

बचपन में चर्च रोड में देखे दंगों पर दो कहानियों ने आकार ग्रहण कर लिया -बांसुरी की चीख (मलयालम में अनुदित भी) ओस की पहली बूंद। हमारे चर्च रोड में इतना कुछ है, सबको छोटे से आलेख में समेट पाना असंभव!

--------------- अनिता रश्मि रांची में रहती हैं। पहला लघु उपन्यास 19-20 की उम्र में। पहली रचना नवतारा (संपादक -भारत यायावर) में। राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं के साथ वेब पत्रिकाओं में भी शताधिक विविधवर्णी रचनाएं प्रकाशित। साहित्य अकादमी से ऋता शुक्ल के संपादन में प्रकाशित साझा संकलन में कहानी। कहानियों का मलयालम, तेलुगु में अनुवाद। कहानी संग्रह और काव्य संग्रह का प्रकाशन शीघ्र। कई सम्मान भी झोली में।

 

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