ईश्वरीय ऊर्जा की खोज में है जीवन आलोक

Johar

मुरारी मयंक

आपका भीतरी विकास इस बोध पर निर्भर करता है कि शांति व संतुष्टि पान का एकमात्र तरीका अपने विषय में सोचना बंद करना है। जब आपको यह समझ में आता है कि हर समय बोलते रहनेवाला मैं कभी संतुष्ट नहीं होता तो आपका विकास आरंभ हो जाता है।
------- माइकल ए. सिंगर

रात का अर्थ अंधेरा है। इससे डर लगता है। लेकिन अंधकार हमें रोशनी के अलावा कई बातें सिखाती है। लेकिन जीवन में अंधेरे का साथी कौन बने ? चंद्रमा को देखने से मानसिक शक्ति प्राप्त होती है, जीवन में मिठास का संचार होता है। जीवन में आये अंधेरा को अर्थ मिलता है। हम मानते हैं कि शुभ की शुरूआत ब्रह्मबेला से होती है। सूरज का क्षितिज पर आगमन हुआ, तो जीवन में ऊर्जा का संचार हुआ। यह संदेश सर्वव्यापक है। इस चिंतन ने जीवन के आधे भाग यानी रात की महता को गौण मान लिया। हम रात को सो कर बीता देते है। अच्छा करना हो, तो सुबह का इंतजार। लेकिन ऐसी बात नहीं है। अंधकार केवल शून्य नहीं। यह प्रकाश की तुलना में ज्यादा सबक देता है। इसे स्वीकार करे तो शब्दों के स्वर सुनाई पड़ेगे। यह परेशानी दूर करने का कारगर हथियार बनेगा।

जीवन द्वंद्व है। अच्छा और बुरा। प्रकाश और अंधकार। इस कारण प्रकाश की तरह भी अंधकार जरूरी है। कई बातें जीवन की रौशनी में नहीं सीखी जा सकती। वह रात के अंधेरे में संभव है। हमें अंधेरे को स्वीकार करना होगा। अमेरिकी आध्यात्मिक गुरू बारबारा ब्राउन टेलर की एक किताब है-लर्निंग टू वॉक इन द डार्क है, जिसमें वह इस मान्यता को चुनौती देती है कि अंधकार डराता है। वह खराब है। यह मान्यता प्राय: व्यापक है कि आप अंधेरे में है यानी ईश्वर का आप पर विश्वास नहीं है। जबकि ऐसी बात नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भादो कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ। इस तिथि को सबसे ज्यादा अंधेरा रहता है। मानव का ईश्वर के साथ नजदीकी के लिए अंधेरा जरूरी है। यह ईश्वर को जानने का आधार देता है। आमंत्रण देता है। अंधेरा एवं एकांकी में साधना कर गौतम बुद्ध ने दुनिया को प्रकाशमान किया।

टेलर अपनी किताब में यह बात लिखती है कि मानसिक और शारीरिक शक्ति, लक्ष्य की प्राप्ति और सच्ची आस्था अंधेरे में ही हासिल की जा सकती है। अंधेरा हमें रौशनी के अलावा कई और बातें सिखाती है। अंधेरा में धीरे-धीरे चले। इससे बुद्धि और विवेक पैदा होता है। हमारे जीवन में भय से मुक्ति मिलती है। और तब हम ईश्वर के समीप होते हैं। वह कहती है कि ऐसा करने के लिए चंद्रमा को आधार बनाना चाहिए। उसके उदय और अस्त का समय निश्चित है। उदय के साथ योजना बनाईये और जब सारी रौशनी खत्म हो जाए, तब परीक्षण करे। अंधेरा में भी एक रौशनी होती है। उसे पहचाने।

जीवन में प्रकाश के एक दूसरे क्षितिज को उदभाषित करना है, तो रात को रहबर बनाना होगा। अंधेरे के साथ बैठे। यह जीवन में प्रकाश देगा। पहले अंधेरा होता है, तब प्रकाश का आगमन होता है। जीवन पहले मां के गर्भ में रहता है। बीज पहले जमीन के अंदर सोया रहता है। वहां अंधेरा वास करता है लेकिन वही ऊर्जा है, जो जीवन को प्रकाशित करता है। बीज को वृक्ष बनाता है। ऊर्जा और प्रकाश एक ही सिक्के के दो हिस्से है। मां के पेट में जीव का निर्माण नौ माह तक अंधेरे में होता रहता है। कोई भी महान सृर्जन अंधेरा में ही होता है। हरेक प्राणी, वनस्पति या जीव जंतु का निर्माण या सृर्जन अंधेरे में धरती या जननी के गर्भ में चलता है। अंधेरा सृर्जन काल होता है। खिलने के लिए सूर्य की जरूरत है। प्रगति के लिए रौशनी चाहिए लेकिन सृर्जन एवं शक्ति संचयन दिन में संभव नहीं। दिन में शक्ति का क्षय होता है।

एक बार झारखंड के संताल की परिस्थिति देखने के लिए काका कालेलकर घूम रहे थे। सांझ के समय एक गांव में पहुंचे। वहां लोगों के साथ वार्तालाप शुरू हुआ। धीर धीरे प्रकाश कम होने लगा। वहां के एक गृहस्थ को काका ने कहा कि -अंधकार हो चला है, दीया ले आयें, तो अच्छा होगा ! गांव का वह व्यक्ति आश्चर्य से काका को देखने लगा और बोला-दीया ? हम लोग दिया कभी इस्तेमाल नहीं करते है। सूरज छिप गया कि हमारा कारोबार समाप्त हो जाता है। फिर सुबह की पौ फटी की हमलोग अपने अपने काम में लग जाते हैं। काका कालेलकर स्मरण में लिखा कि- मनुष्य की बस्ती में अंधेर का यह साम्राज्य ? मैं बड़ी चिंता में डूब गया। पर इन लोगों को इसका कोई बुरा नहीं लगता। अंधेरा तो रात को आयेगा ही । उसका दुख मनाना चाहिए, यह बात भी इन लोगों के दिमाग में नहीं आती। काका लिखते है कि-भारतीय संस्कृति, जीवन और भारतभूमि पर बराबर बोलते रहने वाले, मुझे इस दीप विहीन जीवन की तब कल्पना ही नहीं थी। थोड़ी देर सोचने पर मुझे लगा कि, वस्तुत: इन लोगों पर तरस खाने के बदले मुझे खुद अपने आप पर ही तरस खाना चाहिए।

नरेश मेहता कहते है कि जैविकता में संस्कार भरने के लिए ही यह उदघोष किया गया है। जीवन का प्रायोजन ही काव्य है। असुरतत्व से सुरत्व की ओर जाना ही काव्यात्मकता है ंऔर उपनिषद उसे ही तमसो मा ज्योर्तिगमय कहता है। यह एक आवहान जगाने का काम है, ताकि हमारे शब्द, रूप, सत्य, प्रकाश को अमरत्व ऋतु रूप में प्रस्थापित किया जा सके। प्राकृतिक प्रकाश में मनुष्यता होती है, तो प्राकृतिक अंधकार में आत्मीयता का वाश होता है। यह अंधकार चिंतन का अवसर प्रदान करता है। अंधकार आत्मनिरीक्षण का स्थान है। जब हम ज्योति की ओर गमन की बात कहते है, तो उसका अर्थ होता है कि भीतर के तम और कलुष को मिटाकर आत्म प्रकाश से स्वयं को आलोकित करे। अंधकार इस आत्म प्रकाश से आलोकित करने में पोषण का काम करता है। सारी रात घर में प्रकाश के तले रहनेवाला व्यक्ति को भी सोने के लिए, ध्यान-साधना के लिए अंधकार को ओढऩा ही पड़ता है। दिन में भी सोने और साधना के लिए प्रकाश को मद्धिम कर दिया जाता है ताकि भीतर के आलोक को उदभाषित किया जा सके। व्यक्ति के थकान को दूर करने में जितना नींद का योगदान होता है, उतना ही उस अंधकार को भी होता है, जिसके आगोश में व्यक्ति निश्चित होकर सोता है।

इसलिए कहा गया है कि अंधेरे में ऊर्जा की खोज करे। शक्ति संचय करे। तो, आलोक से जीवन भर जायेगा। अंधकार में ईश्वरीय रहस्य छिपा है। कदाचित इसी कारण ध्यान का उपयुक्त समय संधिबेला को बताया गया। जब न अंधेरा रहे, और न प्रकाश। ध्यान में व्यक्ति सदैव ही ऊर्जा के संरक्षण में रहता है। इसीलिए रात्रि पहर में, जब प्रकृति शांत होती है, हम ईश्वर के नजदीक होते हैं। मानव को ईश्वर का सान्निधय अंधेरा में प्राप्त हुआ। मुहम्मद साहब हो या संत फ्रांसिस या कोई हिंदू संत। सभी विभूतियों ने पहाड़ों की कंदराओं में साधना की, और प्रकाश पाया। कहते हैं कि ईश्वर ने अब्राहम से रात में मुलाकात की थी। और सिनाई के पहाड़ पर अंधेरे में मोजेज को टेन कमांडमेंट्स सौंपे थे। ईसा मसीह का पुनर्जीवन अंधेरे में हुआ, श्रीकृष्ण अंधेरे में इस धरती पर आये। सभी धर्मों ने अंधेरे में ही ईश्वर की खोज की। प्रार्थना हो या साधना। इसके लिए अंधेरे को उपयुक्त माना। अंधेरे के शून्य में ईश्वर हमारे ज्यादा समीप होते हैं। उनकी ऊर्जा का प्रवाह हम पर बेरोकटोक होता है।

रात हमारी दोस्त है। वह दिनभर के थकान को मिटाता है। दुख के आंसु को नींद की मिठास देता है। दर्द को रात में ही मरहम मिलता है। रात के अफसाने हजार हैं। वह हमारे गम को अंधेरे में छिपा लेता है। दिन तो हमसे भागता है लेकिन रात ही है, जो हमारे साथ ठहर जाता है। खुबसूरत चांद के साथ, रात की रानी की महक के साथ, हरसिंगार से पटी धरती के साथ। झींगुर के गुनगुनाहट और जुगनू की चमक के साथ एक स्वर देता है- रात सहेली है, जल गये दीये। रात ही है, जिसमें आत्मा रूपी दीये आलोकित हो पाते हैं। दिन में समय कहां ? समय है, तो चैन कहां ? रात है, तो शांति है। और शांति है तो सुकून। एक रास्ता है। जब हम समस्त जीवन का विचार करते है, तो यह प्रतीत होता है कि जगत का अंधकार और हदय का अज्ञान दो भिन्न बातें नहीं हैं- एक ही है। अंधकार का भी उतना ही व्यापक और सार्वभौम सत्ता है, जितना प्रकाश का होता है।

यही कारण है कि बचपन में इन रातों का इंतजार रहता था। तब भरपूरा परिवार साथ होता था। मां साथ रहती थी। दादी की कहानियां रास्ता दिखाती थी। शक्ति की एक पूंज जिसके माध्यम से सितारों में ध्रुवतारा खोजते थे। मंगल और शुक्र को तलाशते थे। उसके माध्यम से बालक धु्रव और गुरु वृहस्पति की कहानियां सुनते थे। पढ़ते थे। तब रात में एक प्रकाश होता था, जिसमें हम अपना संबंध बनाते थे। आज भी यह संबंध कायम है। थोड़ा परिवर्तित रूप में। तब धु्रवतारा के बहाने रास्ता एवं दिशा का ज्ञान करते थे। आज उन्हीं तारों में हम अपने नाते रिश्तेदारों को खोजते है। चंदा को मामा बनाते है, तारे को अपने पूर्वज यानी दादा, नाना, भाई बंधु। यही तो बचपन में सिखाया और बताया गया। जो इस दुनिया से चले जाते हैं, वे ही तारे बन जाते हैं। अंधेरी में तारों के बीच मां की खोज करते हुए कब नींद आ जाती है, यह रात का ही करामात है। जीवन में हवा और पानी की तरह रात का महत्व है। ये जीवन को आयाम देते हैं। जीने का। एक विश्वास का। ठीक उसी तरह जब अंधेरी एवं बरसाती रात में बादलों से चांद झांका करता है।


 

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