झारखंड में श्रीरामोपासना

डॉ०बिरेन्द्र साहु

झारखंड क्षेत्र भूगर्भिक संरचना के दृष्टिकोण से अति प्राचीन भू-भाग है। आरम्भ से अब तक यह क्षेत्र कई नामों से जाना जाता है। वैदिक काल के ऐतरेय ब्राह्मण में झारखंड क्षेत्र को पुण्ड्र कहा गया है, महाभारत काल में पुंडरीक और अर्कखंड व कर्कखंड, नागवंश काल में हीरानागपुर, सोनानागपुर, सुतियानागपुर व चुटियानागपुर मुगल काल में कोकराह, खोखरा, खुखरा व झारखंड, ब्रिटिश काल में छोटानागपुर एवं स्वातंत्र्योत्तर काल में झारखंड व वनांचल नाम से भी जाना गया है।
झारखंड प्रदेश के लोगों का भगवान श्रीराम पर अनन्य विश्वास एवं श्रद्धा रही है संवत 1742 में रांची स्थित चुटिया में दो मंजिला राम मंदिर आज भी विद्यमान है। सिंहासन पर मुकुट धारी जगत जननी श्रीसीता तथा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की मनोहारी प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित हैं। चुटिया का यह मंदिर नागवंशी राजाओं की स्थापत्य कला का एक सुंदर नमूना है
रांची गुमला मार्ग में आंजन धाम है अंजन एक अति प्राचीन धार्मिक स्थल है आँजन को महावीर हनुमान का जन्म स्थल माना जाता है। इनका जन्म आंजन पहाड़ की चोटी पर स्थित आंजन गुफा में हुआ था, जहां अंजनी माता की प्रस्तर मूर्ति विद्यमान है। हनुमान भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त थे और भगवान राम के वनवास काल एवं राम-रावण युद्ध में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। इस क्षेत्र के जनजातियों ने आश्रम बनाए थे जिन्हें सप्त जनाश्रम के नाम से संबोधित किया जाता था। इस आश्रम में सात जनजातियों शबर, वानर, निषाद, गिद्ध, नाग, किन्नर तथा राक्षस के प्रमुख सप्त ऋषि निवास करते हुए कठोर व्रत का पालन करते थे।
आंजन के गोदा भगत ने "आदिम खिरी" नामक पुस्तक में लिखा है कि हनुमान, जामवंत, बालि, सुग्रीव, नल, नील आदि वास्तव में बंदर भालू नहीं थे। वह महान शक्तिवान एवं विद्वान थे, इसलिए भगवान श्रीराम ने उन्हें निजी सचिव तथा अपनी सेना के सेनानायक को के रूप में नियुक्त किया था अर्थात यह अनार्य जाति के आदिवासी थे।
एस०सी० राय ने अपनी पुस्तक दि उरांव ऑफ छोटानागपुर में लिखा है कि बंदरों को उराँव न तो मारते हैं और न ही इसका मांस खाते हैं। बंदर उनका गोत्र भी है।
डॉ०हीरालाल शुक्ला ने कहा है रामायण में वानर शब्द बंदर का सूचक ना होकर "वन का नर" अर्थात "वनवासी" का घोतक है। उराँव, कोरबा, खेरवार, खड़िया, भुइयां, गोंड़, भील, बैगा आदि जनजातियां रामायण में वर्णित वानरों अर्थात "वन का नरों" की संताने ही मानी जा सकती है,जो वनों पहाड़ों,कंदराओं तथा गुफाओं में रहा करते थे।
एच०एन० रिस्ले ने अपनी किताब द ट्राइब्स एंड कास्ट ऑफ़ बंगाल में लिखा है कि भुइयां जनजाति अपने को पवन वंश के बताते हैं। इनका मानना है कि वे पवन पुत्र हैं और हनुमान जी से अपना संबंध जोड़ते हैं।

डॉ०भुनेश्वर अनुज अपनी किताब अतीत के दर्पण में झारखंड में लिखा है कि झारखंड में 200 ई० पूर्व से ही त्रि-देवताओं के रूप में भगवान शिव,भगवान विष्णु, और भगवान ब्रह्मा की पूजा अर्चना की जाने लगी थी। शिव और विष्णु के अनुयायियों की संख्या बहुत अधिक थी। इन देवताओं के अलावा काली की पूजा जनजाति एवं सदान दोनों ही समान रूप से करते चले आ रहें हैं। भगवान शिव, भगवान विष्णु और मां भगवती की मूर्तियां झारखंड के पर्वत शिखरों, घनघोर वनों तथा प्राय: प्रत्येक गांव में मड़ई अथवा देवी गुड़ी के नाम से स्थापित हैं। टांगीनाथ व देवघर का शिव मंदिर, इटखोरी स्थित भद्रकाली मंदिर, सिमडेगा का रामरेखा धाम, रजरप्पा का छिन्नमस्तिका का मंदिर, रांची का जगन्नाथपुर मंदिर सहित दर्जनों झारखंड के लोगों के परम्परागत आराध्य स्थल हैं। भगवान पुरुषोत्तम श्रीराम संसार के कण कण में बसे हैं। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण, तुलसीदास ने श्रीरामचरित्रमानस की रचना कर समस्त लोगों के कल्याणार्थ बीज मंत्र प्रस्तुत किए हैं।ठीक उसी प्रकार भगवान श्रीराम के औलोकिक गाथाएं नागपुरी कवियों व गायकों के द्वारा अनायास मिल जाता है। डॉ०विशेश्वर प्रसाद केसरी ने नागपुरी भाषा साहित्य की रूपरेखा में लिखा है

"केकर हाथ रंग रूपा अंगूठी, देहिया चमकी गेलइ,
केकर माँथे बउरा फूल, खोसवा धमकी गेलइ,
राम के हाथे रंग रूपा अंगूठी, दहिया चमकी गेलइ,
सीता के माथे बउरा फूल खोसवा धमकी गेलइ।"


वन गमन के बेला को दर्शाते हुए उन्होंने लिखा है:

"बिछूरिये जानकी रावन लेइये गेल,
नहीं भेंटे राम लक्ष्मन जनक दुलारी।
एक बन ढूंँढे़ दूसर बन ढूंँढे,
नहीं भेंटे राम लक्ष्मन जनक दुलारी।"

18 वीं शताब्दी में कवि विनन्दिया ने सीता के विरह में राम की विकलता का विस्तार से वर्णन किया है:
"प्राण पुडे़ निशि दिने, श्री राम जानकी बिने,
ना देखी नयने, रोदन करत बने बने।"

बैद्यनाथ राम ने "बनिता दंतोत्पाटन" में अपने नागपुरी डोमकच गीत में प्रस्तुत किया है:
"चतुरी सखी सिया समय विचारी चलु चलु,
ग्रह फिरि सुकुमारी, चलु चलु।
सुनी सहमी गयी राज दुलारी, होत देरी,
गारी देबैं महतारी, होत देरी।।"


कृष्ण कलाधार द्वारा रचित नीर मंजीर के तहत कहते हैं:
"दशरथ अंगना में बाजत मंजीर गोइ,
जनक अंगने ढ़रे नीर।
बाजत मृदंग एने ओने घन धिर गोइ,
जाबैं सीता संग रघुबीर।।"


विवाह गीत:
"केकर अंगना में, बांँस बुदवना, रे बाँसइर बुदउना।
गोई, केकर अंगना में ढिर बजउना।
राम कर अंगना में बांँस बुदावना, रे बाँसइर बुदउना।
गोई, सीता कर अंगना में ढिर बजउना।।"


श्री राम जन्म के संदर्भ में गाया गया नागपुरी डमकच:
"राम जनम सुनी, रिखी-मुनि धावैं।
आहू से रिखी मुनि, दुंभिए डेरा डालु।।
सोने का थारा में, राम नहुवावल।
सोने का छुरी सोना, नारी छिनावल।।
जीरा जवइन केरा, भरसी भरावल।
चंदन काठी सोना, पसंगी लगावल।।"


दशरथ जी द्वारा बरात चलने के गीत
"राजा दशरथ चलत बरियात, रे चलत बरियात।
केकइ कउशिला खेलाते अंगना।।
एक कोसे गेल बरात, दुई कोस गेल।
तीन कोसे बजना जे कुहके,सुइध छुटना।।
ढाक नरसिंगा बाजत बजना,रे बाजत बजना।
भेइर बाजा बाजे अधिक बजना।।"


वर्तमान समय में भगवान पुरुषोत्तम श्रीराम का पूजन संपूर्ण झारखंड में परंपरागत की जाती है। विशेष तौर पर श्रीरामनवमी महोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाने की परंपरा रही है। महावीरी पताकाओं के साथ भगवान श्रीराम का पूजा अर्चना की जाती है, शोभा यात्राएं निकाली जाती है, जो संपूर्ण भारत के लिए एक अनुकरणीय त्योहार के रूप में होता है। इस पर्व में झारखंड के समस्त सनातनी परंपरा से जुड़े लोग सम्मिलित होते हैं।

अयोध्या के पुण्य श्रीरामजन्मभूमि में पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामजी का भव्य मंदिर का पुनर्स्थापना समस्त जीवो के कल्याणकारी रहेगा। जिस रामराज्य की कल्पना सनातन समाज को त्रेतायुग से रही है। आज पुण: इस युग का आगमन हो रहा है। यह क्षण हम समस्त भारतवासियों के लिए गौरवान्वित का समय है।

लेखक विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हैं। ये उनके निजी विचार हैं। इसके हर शब्द के लिए वे खुद उत्तरदायी होंगे।

 

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