पत्थरों का पारखी : बुलू इमाम



प्रमोद कुमार झा

झारखंड भारत का एक अनुपम राज्य है। देश के इस भू भाग में प्रकृति ने सब कुछ उन्मुक्त भाव से प्रदान किया है। खनिज सम्पदाएँ यहां प्रचुर मात्रा में तो हैं ही ,यहां सैकड़ों प्रकार के दुर्लभ औषधीय पेड़,पौधे और बनस्पतियाँ भी उपलब्ध हैं। अगर मानव जाति की उत्पत्ति से लेकर अब तक के विकास यात्रा का गहन अध्ययन किया जाय तो इसके विस्तृत अध्ययन में झारखंड के गुफाओं,पहाड़ों और पर्वत श्रृंखलाओं की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

एक अठहत्तर साल का युवा कई दशकों से अकेला इस अध्ययन में जुटा है। उनका नाम है पद्मश्री बुलु इमाम। आज बुलू साहेब 78 वर्ष के हो गए हैं ।उनको जन्मदिन की हार्दिक बधाइयाँ! पटना के विख्यात बैरिस्टर इमाम साहेब के परिवार में जन्म लेने। वाले बुलू साहेब श्री टूटू इमाम के सुपुत्र हैं। स्कूल की पढ़ाई तो की इन्होंने पर परीक्षा देकर डिग्री हासिल करना निरर्थक लगा। फिर गुरुदेव रवींद्र नाथ की तरह खूब अध्ययन किया ,दुनिया घूमते रहे पर दिल तो बसा था इस क्षेत्र के जंगल,पहाड़ , गुफाओं, भित्तिचित्रों में ! उन सबके अध्ययन में लगे रहे ! सैकड़ों लेख दुनिया भर की शोध पत्रिकाओं में,आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें दुनिया के प्रख्यात प्रकाशकों ने छापी हैं।

कवि ,चित्रकार,अन्वेषक, शोधकर्ता, प्रकृति प्रेमी पिछले लगभग पचहत्तर सालों से हजारीबाग में रह रहे हैं।'' संस्कृति" ,शहर के एक छोर पर एक बड़ा सा प्रांगण है। बुलू यहां पेड़ पौधों,परिवार एवं धरोहरों के साथ रहते हैं। उनसे मिलना एक संस्था से मिलने जैसा है।

बुलू इमाम दशकों से महात्मा बुद्ध के इस क्षेत्र से संबंधों पर तथ्यों की खोज करते रहे। बुद्ध के इटखोरी से संबंधों पर उन्होंने दर्ज़नो शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित किया ।उनके दशकों के प्रयास का फल है कि भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने वहां पुरातात्विक उत्खनन और संग्रहालय की योजना बनाई। इन्होंने छोटानागपुर के जंगली कुत्तों पर भी अध्ययन किया है।बुलू साहेब का मानना है कि दुनिया के श्रेष्ठ नस्ल के कुत्ते भी इसी श्रेणी के हैं।प्राचीन काल से यहां के नियासियों के स्थायी साथी,रक्षक ये कुत्ते रहे हैं। जिनके कई लेख अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं इस विषय पर।

बुलू जी ने छोटानागपुर के विभिन्न आदिवासी समूहों के इतिहास और उनकी विकास यात्रा पर भी गहन अध्ययन किया है,पुस्तकें लिखी हैं और शोध प्रबंध भी प्रस्तुत किये हैं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर। इनका एक विशेष अध्ययन का क्षेत्र चतरा की ऐतिहासिक गुफाएं है। उन गुफाओं के भीतर हज़ारों साल पुरानी भित्ति चित्र पर इनकी विशेष दखल है। बुलू साहेब यहां के मूल निवासियों के प्रकृति पर अधिकार और पर्यावरण संरक्षण के प्रचंड समर्थक हैं।

"संस्कृति " में इन्होंने एक अद्भुत संग्रहालय भी बना रखा है। यहां की सोहराय,कोहबर और अन्य भित्ति चित्र कला को इन्होंने अंतरर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई है। सैकड़ों कलाकार कनाडा,इटली ,फ्रांस और अन्य पश्चिमी देशों में जाकर इनके साथ अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं।। पूरी दुनिया से शोधकर्ता इनसे मिलने आते हैं और झारखंड की संस्कृति,कला,जीवन शैली की जानकारी लेने आते हैं।। बुलू साहेब की आधा दर्जन से अधिक अंग्रेज़ी पुस्तकें पश्चिमी देशों से प्रकाशित हैं।अभी भी दर्ज़नों पुस्तकों की पाण्डुलिपियाँ तैयार हैं।बुलू साहेब का उत्साह किसी युवा की तरह अब भी बरकरार है। वे अब भी अपने शोध में जुटे हैं,क्रियाशील हैं।

-,लेखक रांची दूरदर्शन के पूर्व निदेशक रह चुके हैं। कई किताबों का अनुवाद भी। अब स्वतंत्र रूप से लेखन।

 

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