पहाड़ बताते हैं अपनी कहानी



डा. नितीश प्रियदर्शी, भूवैज्ञानिक

छोटानागपुर के नाम से ख्यात झारखंड की भूमि रत्नगर्भा तो है ही, भौगोलिक, धाॢमक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से भी अति प्राचीन है। भौगोलिक दृष्टि से देखें तो यह अत्यंत प्राचीन काल से कई भूगर्भीय हलचलों की साक्षी रही है।

चकिया में गाते हैं झरने



एम अफसर खान 'सागर'

मानव सभ्यता को विकसित करने में यात्राओं का अहम योगदान रहा है। यात्रा से हमें एक नई ऊर्जा मिलती है, जीवन के ठहराव को यात्रा अविरल बना देती है, तभी तो एक खुशनुमा मंजर दिखता है पूरी पृथ्वी पर घूमते मानव कबीलों का। एक शहर से दूसरे शहर तक, नदियों, पहाड़ों, रेगिस्तानों, अभेद्य जंगलों को नापते इंसान हर सू मिल जायेंगे।

रांची, रंची और फांसी टुंगरी



अनिता रश्मि

चुटिया नागपुर के अपभ्रंश छोटानागपुर के इस जीवंत, ऐतिहासिक शहर राँची के मध्य में रिची बुरू है अर्थात राँची पहाड़ी। बुरू = पहाड़। आज दुकानों, पक्के मकानों, बड़ी इमारतों, झोपड़ियों अनेक उग आए मुहल्लों ने चारों ओर से उसे घेर लिया है। लेकिन एक समय ऐसा भी था, वह खुली हवा में साँस लेती थी। चारों ओर खूबसूरती की घनी हरी चादर। दूर-दूर तक खुलापन। दूर से ही ...

अँगारों में खिलता चुटिया



कभी के आरची या किशनपुर राँची में अनेक ऐतिहासिक स्थल हैं। उनमें से एक चुटिया है। नागवंशी राजा की चौथी पीढ़ी ने जंगलों को काटकर बसाया था इसे। इसे ही बनाई थी अपनी राजधानी। किला तो रहा नहीं अब लेकिन उसी समय का राम मंदिर अब भी गंदगी के बीच खिले कमल के समान है। हाँ, कई सरोवर, बाग, महल, मंदिर काल के गाल में समा गए।

1881 में अयोध्या की आबादी थी 11643


पिछले सैकड़ों सालों से बनती-उजड़ती अयोध्या की उदासी को कोई भी पढ़ सकता है। कण-कण में व्यापने वाले राम की यह अयोध्या क्यों इतनी उदास रही, पता नहीं। अलबत्ता राम मंदिर निर्माण की कार्यशाला में उन दिनों पत्थरों की तरासी का काम भी बंद ही था। राम नाम का कीर्तन चल रहा था और उसके उजड़े मुख्य द्वार को भव्य बनाने की तैयारी की जा रही थी। अयोध्या अब बदल ...

रांची डिस्टलरी : पहला कारखाना

Johar लालपुर चौक राजधानी रांची के व्यस्तम चौराहों में एक है। यही से एक सड़क कोकर की ओर जाती है। डिस्टलरी पुल से ठीक पहले बाईं ओर स्थित है झारखंड का पहला कारखाना। यह कारखाना वर्षों से बंद है, पर आज भी इसी के नाम से क्षेत्र जाना जाता है। रांची डिस्टलरी रांची का पहला संगठित उद्योग है। यहाँ इटालियन तकनीक से स्प्रिट बनाने का संयंत्र था, जो कि शराब बनाने ...

टैगोर हिल : जहां रहते थे रवींद्र के बड़े भाई

Johar टैगोर हिल के शिखर पर खुले मंडप के इस ब्रह्म मंदिर में जैसे आज भी कोई ध्यान मुद्रा में बैठा हो। चिर शांति। ध्यान मग्न पहाड़। शांत-चित्त लताएं, पेड़, पौधे। सैकड़ों सीढिय़ां चढऩे के बाद इस एहसास से आप अलग नहीं हो सकते। सीढिय़ों के दाए-बाएं शिलाखंड, पेड़, पौधे, पत्तियां जैसे आज भी अपनी कहानी सुनाने को बेताब हों कि वह व्यक्ति कहां-कहां टहलता रहा। पेड़-पौधों और शिलाओं से कैसे ...

झारखंड का अलौकि‍क गॉंव 'मलूटी'

Johar देवघर से तारापीठ जा रही थी दर्शन के लि‍ए। जब दुमका से आगे गई तो रास्‍ते में माईलस्‍टोन पर लि‍खा मि‍ला - मलूटी 55 कि‍लोमीटर। अब ये कैसे हो सकता था कि‍ उस रास्‍ते से गुजरूं और उस गांव में न जाऊं जि‍सके बारे में इतना सुन रखा है कि‍ मंदि‍रों का गांव है यह। मेरी उत्‍सुकता चरम पर और नजरें सड़क के दि‍शा-नि‍र्देश पर।

चलता-फिरता अजायबघर

Johar झारखंड एक चलता-फिरता अजायबघर है। नाना प्रकार की वनस्पतियां, आदिम जनजातियां, उनके नृत्य, गीत और संस्कृति यहां हर आने वाले को आकर्षित करते हैं। उसी तरह, यहां के जंगल में भी पुकारते हैं। कल-कल करते झरने भी अपने मधुर संगीत से आने वालों को मुग्ध करते हैं। झारखंड की धरती कुछ ऐसी ही है, जहां आने पर मन खुद ब खुद मचलने लगता है और पैर स्वत: थिरकने लगते हैं। ...
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