चलता-फिरता अजायबघर

Johar

झारखंड एक चलता-फिरता अजायबघर है। नाना प्रकार की वनस्पतियां, आदिम जनजातियां, उनके नृत्य, गीत और संस्कृति यहां हर आने वाले को आकर्षित करते हैं। उसी तरह, यहां के जंगल में भी पुकारते हैं। कल-कल करते झरने भी अपने मधुर संगीत से आने वालों को मुग्ध करते हैं। झारखंड की धरती कुछ ऐसी ही है, जहां आने पर मन खुद ब खुद मचलने लगता है और पैर स्वत: थिरकने लगते हैं।

कहना न होगा कि प्रकृति ने झारखंड को अपना खूब स्नेह लुटाया है। जंगलों में पलते-बढ़ते-मचलते जीव-जंतु किसे नहीं आकर्षित करते हैं। यहां की हरियाली आंखों को सुकून देती है। यहां के पहाड़ों का संगीत शांति का आलोक रचता है। एक बार जो आता है, बार-बार यहां आने का संकल्प लेकर जाता है। तो, ऐसी है हमारी धरती। पर्यटन के लिहाज इसका कोई जवाब नहीं है।

मनुष्य और वन्य प्राणी एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों का अस्तित्व दोनों के लिए जरूरी है। पारिस्थिकीय एवं पर्यावरण की दृष्टि से भी दोनों का रहना जरूरी है। लेकिन इधर, मनुष्य कुछ ज्यादा ही स्वार्थी और लालची हो गया है, जिसके कारण जीव-जंतुओं पर संकट उत्पन्न हो गया है। बाघों का घटना मनुष्य की लालची प्रवृत्ति के कारण ही हुआ है। इन्हें बचाने के लिए सरकार भी आगे आ रही है। इनके संरक्षण को लेकर आश्रयणी बनाए गए हैं। राज्य में 11 राष्ट्रीय उद्यान एवं आश्रयणियां हैं। जहां तरह-तरह की वनस्पतियों की प्रजातियां एवं वन्य प्राणी हैं। देश में बाघों की गणना पहली बार पलामू में ही सन 1932 को हुई थी। पलामू में एक समय काफी संख्या में बाघ पाए जाते थे। अब इनकी संख्या मात्र छह तक सिमट गई है।

पलामू व्याघ्र आरक्षित वन झारखंड के छोटानागपुर पठार के लातेहर जिले में स्थित है। यह 1974 में बाघ परियोजना के अंतर्गत गठित प्रथम 9 बाघ आरक्षों में से एक है। पलामू व्याघ्र आरक्ष 1,026 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें पलामू वन्यजीव अभयारण्य का क्षेत्रफल 980 वर्ग किलोमीटर है। अभयारण्य के कोर क्षेत्र 226 वर्ग किलोमीटर को बेतला राष्ट्रीय उद्यान के रूप में अधिसूचित किया गया है। पलामू आरक्ष के मुख्य आकर्षणों में शामिल हैं बाघ, हाथी, तेंदुआ, गौर, सांभर और चीतल।

पलामू में कई प्रकार के वन पाए जाते हैं, जैसे शुष्क मिश्रित वन, साल के वन, और बांस के झुरमुट, जिनमें सैकड़ों वन्य जीव रहते हैं। पलामू के वन तीन नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को सुरक्षा प्रदान करते हैं। ये नदियां हैं उत्तर कोयल, औरंगा और बूढ़ा। 200 से अधिक गांव पलामू व्याघ्र आरक्ष पर आर्थिक दृष्टि से निर्भर हैं। इन गांवों की मुख्य आबादी जनजातीय है। इन गांवों में लगभग एक लाख लोग रहते हैं। पलामू के खूबसूरत वन, घाटियां और पहाडिय़ां तथा वहां के शानदार जीव-जंतु बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। हर साल यहां हजारों लोग बाघ और अन्य जीव-जंतुओं को देखने यहां आते हैं।

बेतला के आगे ही महुआटांड़ में भेडिय़ा आश्रयणी बनाया गया है। यह देश का एकमात्र आश्रयणी है, जो भेडिय़ों के संरक्षण के लिए बनाया गया है। बुरहा, बोहाटा एवं अक्सी नदी इस घाटी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाती हैं। इस आश्रयणी में काफी संख्या में भेडिय़ां हैं। ये दिन के समय काफी चौकस रहते हैं। इस क्षेत्र से गुजरते हुए प्रकृति के मनोरम दृश्य देख आंखें तृप्त हो जाती हैं। हां, बेतला और महुआटाड़ के बीच हाथियों के विचरते झुंड को भी देखा जा सकता है।

हजार बागों वाले शहर हजारीबाग से 30 किमी दूर हजारीबाग आश्रयणी बनाया गया है। यह आश्रयणी आजादी से पहले जमींदारों के कब्जे में था। उससे भी पहले रामगढ़ के राजा के कब्जे में था। 1951-52 तक जंगल अपने पुराने मालिकों के हाथ में ही था। इस आश्रयणी का क्षेत्रफल 183.23 वर्ग किलोमीटर है। इसकी कुल भूमि है, 3786.08 हेक्टेअर। इस आश्रयणी में साल, आसन, बीजा, धऊ, सलाई, केंद, पियार, करंज, होलोरहिना, बांस, बऊहिनिया आदि के प्रमुख पेड़ बहुतायत हैं। वहीं, चीता, जंगली बिल्ली, सांभर, नीलगाय, किरण, चीतल, सूअर, भेडिय़ा, भालू आदि भी पाए जाते हैं। इनके अलावा चील, गिद्ध आदि भी दिख जाते हैं।

दलमा हाथियों के लिए जाना जाता है। दलमा भी छोटानागपुर पठार पर स्थित है। इसका क्षेत्रफल 193.22 वर्ग किमी है। इस आश्रयणी का विशेष क्षेत्र मात्र 35 वर्ग किमी तक ही सीमित है। दलमा हाथियों के लिए सबसे अच्छा निवास स्थान है। यहां अभी सौ से ऊपर हाथी हैं। इस आश्रयणी में हम पहाड़ों की एक शृंखला देख सकते हैं। ये पहाड़ विभिन्न प्रकार के हैं, जिनकी ऊंचाई 150 से 984 मीटर तक है। इसके अलावा यहां गहरी घाटी और खुले मैदान भी देख सकते हैं। ये घाटी और मैदान पहाड़ों के बीच स्थित हैं। ऐसे स्थान में भला कौन नहीं रहना चाहेगा। यह पूर्वी सिंहभूम के उत्तर पूर्व किनारे पर स्थित है। इसकी सीमा पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले को भी छूती है। इस आश्रयणी का जंगली एवं पहाड़ी भाग सुर्वण रेखा नदी के क्षेत्र में है। इसका भू भाग पहाड़ी है। यहां की जलवायु समशीतोष्ण है। इसलिए इस क्षेत्र के जानवर और पक्षी मौज में रहते हैं। दलमा हाथियों के अलावा चीतों के लिए भी सुगम स्थल है। पर, इनकी संख्या कम है। यहां भौंकने वाले हिरण भी देख सकते हैं। आश्रयणी में काफी गुफाएं और पत्थर हैं जो कि भालुओं के लिए एक अच्छा निवास बन जाता है।

धनबाद शहर से 35 किमी पश्चिम में तोपचांची वन्य जीवन आश्रयणी है। इसे 1978 में अधिसूचित किया गया। इसमें एक विशाल और सुंदर झील है। इस झील के पीछे हरे-भरे पहाड़ हैं, जो झील की शोभा बढ़ाते हैं। इस आश्रयणी में चीता और जंगली बिल्ली खूब पाए जाते हैं। लंगूर, हिरण एवं जंगली सूअर भी खूब हैं। जानवरों के अलावा सैकड़ों वनस्पतियां भी यहां हैं।

चतरा का लावा लौंग आश्रयणी वनस्पतियों के लिए विख्यात है। चतरा से 36 किमी दूर दक्षिण-पश्चिम छोर पर है। इसके दक्षिण ओर अमानत नदी है। यहां कई प्रकार के जंगलों का मिश्रण देखा जा सकता है। यहां विविध प्रकार के बांस, मिश्रित झाड़ वन, सलाई जंगल एवं पहाड़ी साल पाए जाते हैं और इन्हीं के बीच सूअर, चीता, नीलगाय और सांभर भी विचरण करते हैं।

इनके अलावा भी कोडरमा वन्यजीव आश्रयणी, जिसे 1985 में अधिूसचित किया गया था, देख सकते हैं। यह दो जंगलों के विभाग का एक हिस्सा है। यहां से पास गया है।

जंगल में गया का भी कुछ हिस्सा पड़ता है। यहां जलवायु विविधता के कारण कई प्रकार के फल-फूल, पेड़, जानवरों पाए जाते हैं। इस आश्रयणी का कुछ हिस्सा पर्यटकों के लिए खुला है। यहां ऊंची समतल भूमि होने के कारण यह एक दर्शनीय स्थल बन गया है।

गिरिडीह का पारसनाथ वन्य जीव आश्रयणी जिले से 25 किमी दूर है। इसे 1978 में अधिसूचित किया गया था। पारसनाथ पहाड़ मधुवनी के नाम से विख्यात है। यहां पर 23 वें तीर्थंकर पारसनाथ ने निर्वाण प्राप्त किया था, जिसके कारण पहाड़ का नाम उन्हीं के नाम पर पड़ गया। पूरे दुनिया से यहां जैन तीर्थयात्री आते हैं। पारसनसाथ पहाड़ पर बहुत से वन्य प्राणी पाए जाते हैं। चीता, सांभर, नील सांड़, लोमड़ी, हाइना, भालू आदि यहां मस्ती में विचरण करते हैं। इसी तरह पालकोट, उधुवा झील पक्षी आश्रयणी भी पर्यटकों को आकर्षित करता है।

इन स्थलों को देखकर प्रकृति के सौंदर्य की असीम कल्पना कर सकते हैं। इन्हें और बेहतर, सुविधायुक्त बनाकर देश ही नहीं, देश के बाहर के पर्यटकों को भी रिझा सकते हैं। प्रकृति ने झारखंड को खूब दिया है। जरूरत है, इसके सात्विक दोहन की। इससे रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे और पलायन भी रुकेगा। आस-पास का क्षेत्र भी विकास की राह पर चल पड़ेगा। बस जरूरत है, थोड़ी इच्छाशक्ति की।


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