रांची डिस्टलरी : पहला कारखाना

Johar

हिमकर श्याम

लालपुर चौक राजधानी रांची के व्यस्तम चौराहों में एक है। यही से एक सड़क कोकर की ओर जाती है। डिस्टलरी पुल से ठीक पहले बाईं ओर स्थित है झारखंड का पहला कारखाना। यह कारखाना वर्षों से बंद है, पर आज भी इसी के नाम से क्षेत्र जाना जाता है। रांची डिस्टलरी रांची का पहला संगठित उद्योग है। यहाँ इटालियन तकनीक से स्प्रिट बनाने का संयंत्र था, जो कि शराब बनाने का प्रमुख कच्चा माल हुआ करता है। वर्ष 1885 में निर्मित यह डिस्टलरी 1985-86 तक नियमित रूप से कार्यरत था और उत्कृष्ट उत्पादन क्षमता के साथ सैकड़ों लोगों को रोजगार मुहैया कराता था। पारिवारिक विवाद के कारण यह बंद पड़ा है। इस डिस्टलरी की शुरुआत राय बहादुर ठाकुर दास ने की थी।

जमालपुर (मिर्जापुर) के राय बहादुर ठाकुर दास इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से विज्ञान स्नातक (गोल्ड मेडलिस्ट) के साथ-साथ दूरदर्शी व्यवसायी थे। उन्होंने छोटानागपुर में सर्वप्रथम लाह का शोधीकरण आरम्भ किया। सरगुजा में लाह का पुश्तैनी कारोबार था। लाह के व्यवसाय के सिलसिले में छोटानागपुर आना-जाना लगा रहता था। तब छोटानागपुर लाह उत्पादन का प्रमुख केंद्र था। यहां के वनों में कुसुम, पलाश व बैर के पेड़ बहुतायत मात्रा में पाए जाते थे जो लाह उत्पादन के अनुकूल हैं। एक दिन राय बहादुर ठाकुर दास ने रांची को ही अपने व्यवसाय का मुख्य केंद्र बनाने का निर्णय लिया और यहाँ आ गये। मुरहू में लाह का कारखाना लगाया। मुरहू सहित पूरे खूंटी का इलाका आज भी सबसे ज्यादा लाह की खेती के लिए प्रसिद्ध है। उस जमाने में उन्हें शेलेक किंग कहा जाता था। लाह का यह व्यवसाय 1970 तक चलता रहा।

लाह के अलावा छोटानागपुर के जंगलों में महुआ के वृक्ष बहुतायत पाये जाते हैं। महुआ के बीज से तेल निकलता है। इसका फूल आदिवासियों के खाने के काम आते हैं। महुआ देशी शराब बनाने की आधारभूत सामग्री में से एक हैं। ब्रिटिश सरकार ने महुआ की क्षमता की पहचान की और राय बहादुर ठाकुर दास को महुआ से शराब बनाने के व्यवसाय की सलाह दी। ब्रिटिश सरकार की पहल पर महुआ पर आधारित आसवनी की शुरुआत जायसवाल परिवार ने की। 1875 में महुआ से शराब बनाने का काम मांडर में शुरू हुआ। वर्ष 1885 में रांची डिस्टिलरी के नाम से देश का पहला डिस्टलरी लालपुर में शुरू हुआ। डिस्टिलेशन या आसवन की प्रक्रिया में विभिन्न क्वथनांक वाले द्रवों के मिश्रण से उनको पहले वाष्पित करके और फिर द्रवित करके पृथक किया जाता है। पहले पॉट स्टील सिस्टम के तहत आसवन का काम होता था बाद में ब्लेयर पेटेंट सिस्टम से आसवन होने लगा।

उस जमाने में महुआ, छोआ और गुड़ से शराब बनायी जाती थी। यह शराब पूरी तरह से रसायन से मुक्त होती थी। महुआ के पके फल को पूरी तरह से सुखाया जाता था। इसके बाद सभी फलों को बर्तन में पानी में मिलाकर पांच-छह रोज तक रखा जाता था। उसके बाद उस बर्तन को आग पर गरम किया जाता था और गरम होने पर जो भाप निकलती थी उसको पाइप के द्वारा दूसरे बर्तन मैं एकत्रित किया जाता था। भाप ठंडी होने पर महुआ की शराब होती थी। विजनगर, अनकापल्ली, सम्भल से लोटा गुड़ मंगाया जाता था। जायसवाल परिवार के द्वारा 1905 में मनकट्ठा में दूसरे आसवन प्लांट की शुरुआत की गयी। 1962-63 के पहले रांची डिस्टलरी तीन साल तक बंद रहा। केबी सहाय के मुख्यमंत्रित्वकाल में रांची डिस्टलरी का एक मामला बिहार विधानसभा में उठा था। स्प्रिट के मूल्य निर्धारण को लेकर विवाद था। स्प्रिट के मूल्य में अचानक वृद्धि कर दी गयी थी। विधानसभा में आबकारी विभाग के एडिशनल सेक्रेटरी की चिट्ठी का जिक्र करते हुए रांची डिस्टलरी के लक्ष्मीनारायण जायसवाल ने अपना पक्ष रखा।

जब पाकिस्तान का हमला हुआ और केंद्र सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए कहा तब रांची डिस्टलरी को 33 पैसे के बजाए 48 पैसा चार्ज करने की अनुमति दी गयी। यह पत्र 28 अगस्त, 1965 को लिखा गया था। इसके पूर्व स्प्रिट का मूल्य 27 पैसे था जिसे सरकार ने 33 पैसे निर्धारित किया था। स्प्रिट का मूल्य निर्धारण सरकार ही करती थी।

महुए और महुए के फूलों से बनी स्प्रिट में विशिष्ट अरुचिकर गंध होता था जिसका कारण एशेंसल ऑयल होता है। बाद में डिस्टलरी में मोलासेज स्प्रिट से शराब बनने लगी। आबकारी भाषा में स्प्रिट में सारे एल्कोहल जिनकी प्रूफ शक्ति सहज से निश्चित की जा सकती है, सम्मिलित है। मैथिल, एथिल, सामान्य प्रोपिल तथा आइसो प्रोपिल ऐल्कोहल इन शर्तों को पूरा करते हैं। सैकरामाइसीज नामक यीस्ट से किण्वन (फर्मेंटेशन) का काम होता था। डिस्टलरी से तैयार माल अविभाजित बिहार के सभी देशी शराब के मद्य भंडारागार में जाता था।

रायबहादुर ठाकुर अंग्रेजी हुकुमत में इंस्ट्रियल एडवाइजर थे। वर्ष 1934 में अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें राजा का टाइटल दिया था, जिसके बाद से उनका नाम राजा राय बहादुर ठाकुर दास पड़ा। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी के कहने पर रायबहादुर ठाकुर ने ब्रिटिश सरकार की उपाधि लौटा दी थी। डिस्टलरी के बगल में स्थित जायसवाल कोठी बनने के पूर्व ठाकुर दास हिंदपीढ़ी में रहते थे। हिंदपीढ़ी स्थित उनके आवास पर तत्कालीन गवर्नर दो बार आये थे। गवर्नर के स्वागत में रेड कारपेट बिछाया जाता था। वर्ष 1931-32 से जायसवाल कोठी रहने लगे।

ठाकुर दास को सिर्फ़ एक बेटी थी। विन्दा प्रसाद, गंगा प्रसाद और शालिग्राम प्रसाद ठाकुर दास के भाई थे। विंदा प्रसाद के बेटों रामनारायण जायसवाल और लक्ष्मीनारायण जायसवाल ने बाद में पारिवारिक व्यवसाय को संभाला। 1924 में डिस्टलरी का व्यवसायिक नाम लक्ष्मी नारायण-राम नारायण डिस्टलरी हो गया। लक्ष्मीनारायण जायसवाल शराब के व्यवसाय का विस्तार किया और डिस्टलरी को नई ऊँचाइयों पर ले गये। रांची डिस्टलरी प्राइवेट लिमिटेड के रूप में रजिस्टर्ड था। 1944-1945 में डिस्टलरी में प्रयुक्त होने वाले मुख्य रॉ मेटेरियल छोआ के लिए रांची रोड में गोदाम एक बनाया गया।

लक्ष्मीनारायण जायसवाल के बड़े बेटे शिव नारायण जायसवाल ने 1938 में डिस्टलरी का काम देखना शुरू किया और 1948 में पूरा व्यवसाय अपने हाथों में ले लिया। शिवनारायण जायसवाल ने बताया कि जहां लाह बनना है उस जगह को भट्टा कहा जाता था और शराब बनने की जगह को भट्टी कहा जाता है। उनका परिवार भट्टे के व्यवसाय के बाद पूरी तरह से भट्टी के व्यवसाय में आ गया। वर्ष 1980 में डिस्टलरी लक्ष्मी नारायण एंड सन्स के नाम से काम करने लगा।

राजनीति में भी परिवार रहा सक्रिय : रायबहादुर के भतीजे राय साहब लक्ष्मीनारायण और रामनरायण दोनों की ही कांग्रेस के उस दौर के बड़े नेताओं में गिनती होती थी। परिवार से कई लोग विधायक और सांसद बने। जायसवाल परिवार के जुड़े राजा राम शास्त्री 1971 में लोकसभा के सदस्य बने। सरकार ने उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया था। राजाराम शास्त्री की बहन रामदुलारी शास्त्री बिहार विधानसभा की सदस्य थीं। लोकहा से चुन कर आयीं थीं। परिवार से जायसवाल परिवार को गांधी जी के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने के लिए ताम्रपत्र भी प्रदान किया गया था।

मेहमान बने थे बापू : महात्मा गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन के लिए रांची आये थे, जो रामगढ़ में हुआ था। उक्त अधिवेशन में ही भारत छोड़ो आंदोलन की नींव पड़ी। यह महत्वपूर्ण अधिवेशन मौलाना अब्दुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में हुआ था। दामोदर नदी के किनारे जंगलों में सैकड़ों पंडाल लगाये गये थे, जिसमें महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ श्रीकृष्ण सिंह, डॉ राजेन्द्र प्रसाद जैसे तमाम नेताओं की भागीदारी हुई थी। रांची में बापू बिरला कोठी में ठहरे थे। अभी बिरला हाउस को ही मोडिफाई करके बीआईटी एक्सटेंशन बना दिया गया है। तब गांधी जी रायबहादुर के लालपुर स्थित जायसवाल कोठी में रात के खाने पर बतौर मेहमान आमंत्रित हुए।

रांची के पहले नगर मुखिया : शिव नारायण जायसवाल रांची नगर पालिका के पहले मुखिया थे। वे इस पर 1962-76 तक रहे हैं। रांची की सड़कों पर पहली बार स्ट्रीट लाइट उन्होंने ही लगवाया था। उस जमाने में शाम के वक़्त लालटेन में तेल डालकर कर मुख्य सड़कों पर स्थित पोलों पर टांग दिया जाता था। शिव नारायण जायसवाल ने ही रांची निगम क्षेत्र में मैला प्रथा को खत्म कर सनेटरी सिस्टम की शुरुआत की थी। अपने परदादा ठाकुर दास के नाम पर उन्होंने एक सदर अस्पताल में एक वार्ड भी बनवाया था। नगर निगम का वर्तमान भवन उनके कार्यकाल में ही बना था। उन्होंने बताया कि तब निगम का काम सिस्टम के तहत होता था। उनके कार्यकाल में कभी हड़ताल नहीं हुआ और कर्मचारियों का समय पर वेतन मिलता था।

विंटेज गाड़ियों का संग्रह :

लालपुर स्थित जायसवाल कोठी में विंटेज गाड़ियों का संग्रह भी है। जहां मर्सडीज, फिएट, शेवरोले, फोर्ड समेत 35 अन्य कारें हैं। इन विंटेज गाड़ियों में वह फोर्ड कार भी जिस पर बापू बैठे थे। बापू लक्ष्मीनारायण और रामनरायण के साथ फोर्ड कार में बैठकर रामगढ़ के अधिवेशन के लिए रवाना हुए थे। इस गाड़ी को खुद लक्ष्मीनारायण ड्राइव कर रहे थे। बापू ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठे थे। पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद रांची में नजरबंद के दौरान (1917), पूर्व प्रंधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री (1940) और जाकिर हुसैन (1930) जैसे लोग भी इस कार से शहर की सैर कर चुके हैं। यही नहीं लॉड इरविन और लॉड लीनिथ ग्लो की भी यह कार सवारी बन चुकी है। 1918 मॉडल फोर्ड का (बीआरएफ-50) कोलकाता के रास्ते से मंगवायी थी। शिव नारायण जायसवाल के पोते आदित्य विक्रम जायसवाल की इन कारों के लिए म्यूजियम बनाने की योजना है, जहां इतिहास से जुड़ी सभी सामग्री को रखा जायेगा, ताकि लोग उनके महत्व को जानें।


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