अँगारों में खिलता चुटिया



- अनिता रश्मि

कभी के आरची या किशनपुर राँची में अनेक ऐतिहासिक स्थल हैं। उनमें से एक चुटिया है। नागवंशी राजा की चौथी पीढ़ी ने जंगलों को काटकर बसाया था इसे। इसे ही बनाई थी अपनी राजधानी। किला तो रहा नहीं अब लेकिन उसी समय का राम मंदिर अब भी गंदगी के बीच खिले कमल के समान है। हाँ, कई सरोवर, बाग, महल, मंदिर काल के गाल में समा गए।

बहू बाजार की तरफ़ से चुटिया में प्रवेश करते ही पुरातन श्रीराम मंदिर को देख याद करती है राँची कि यहीं उलगुलान के नायक, उलिहातु के वीर आइरन मैन बिरसा भगवान भी आए थे। इसे नागवंशी राजा रघुनाथ शाही ने 1685 में बनवाया था। कुछेक अन्य देवालय भी मिल जाएँगे यथा प्राचीन रामलखन जानकी देव मंडप, हनुमान मंदिर, राधाकृष्ण, साहु मंदिर, सरस्वती शिशु मंदिर आदि।

गंदगी से कराहता, डकारता बनस तालाब पुनः जिन्दा हो उठा, चारों ओर से घिरकर। रिलायन्स फ्रेश के पीछे स्थित इस तालाब के आजू-बाजू में नवीन बसाहट....कच्चे-पके मकानों की उगी नई खेप के बावजूद।

वर्त्तमान चुटिया खुद बीमार है, पस्त है, अति व्यस्त है। एक ओर बूचड़ों की दुकान के बाहर लटकते बकरों के साथ बहू बाजार, तो बगल में ही राँची जंक्शन पूरे दम-खम के साथ इस नगरिया को अन्य नगरों से जोड़ रहा है।

काफी पुराना चुटिया अतीत मोह से ऊपरी तौर पर बाहर आ चुका है। लेकिन अब भी सांस्कृतिक रूप से खिल उठता है कुछेक परंपराओं में। होली के अवसर पर फगडोल जतरा छोटानागपुर की राजधानी चुटिया में सालों से निकलता रहा है। राम मंदिर की स्थापना के समय से। अब भी जारी। इस अवसर पर अन्य मंदिरों के देव भी राम के संग जतरा ( यात्रा ) पर निकलते हैं। ढोल जतरा मैदान, अपर चुटिया उत्सव के उल्लास से सराबोर हो उठता है। मेले की धूम और अनुगूँज दूर-दूर तक।

प्रत्येक वर्ष मनाए जानेवाले मंडा पर्व की धूम भी कम नहीं। छऊ नृत्य, फूलखुँदी, लंबी पूजा, भोक्ताओं द्वारा पुष्प वितरण शिव भक्ति के इस अद्भुत एवं कठोर पूजन विधि को रोचक-रोमांचक बना डालते हैं ।
बीच में यह परंपरा बंद थी। फिर चुटिया ने ही पुनर्जीवन दिया और अब तो झारखण्ड के कई इलाकों की शान बन गई।

आधी रात को यहाँ अँगारों पर चलते भोगता, सोख्ता, भक्तों के धैर्य, भक्ति को देखने भीड़ उमड़ पड़ती है। लंबे-चौड़े गड्ढे में कोयले के लाल दहकते अँगारों पर चलते कई खाली पाँव.... और इसे कहते हैं फूलखुँदी! अँगारों और फूलों पर चलना एक है? फिर भी यह परंपरा कहलाती है - फूलखुँदी!
और मेरे मन की जमीन पर अँखुआई कविता यहीं की याद में - फूलखुँदी! कहानी में भी उतर आया यह रोमांचक आयोजन।

एक बार करमा पर्व के उत्साह को भी देखने अपने घर पर काम करनेवाली मुन्नी के साथ देवी मंडप लेन से पैदल ही चल पड़ी थी चुटिया के रास्ते पर। बहुत देर, बहुत दूर चलने पर मिली थी उसकी बस्ती.....शायद नीचे चुटिया में। सब त्यौहारी हड़िया की खुमार में डूबे। नगाड़े, ढोल, मांदर की थाप पर झूमते-नाचते नवीन पोशाकों में मेहनतकश लोग। बुजुर्गों के पैरों में भी मानो घुँघरूँ बाँध दिया गया हो। लाल किनारीवाली उजली साड़ियों में क्या अद्भुत उल्लास का राग!

खूब फोटो लिया था। उनका पूरा परिवेश, पूरी बस्ती, जीवन शैली भी याशिका कैमरे में कैद!....वहाँ याद आता रहा, बचपन में देखे गए कई करमा परब का उल्लास! दुखःद रहा, तस्वीरें हेजी आईं थीं। रात को चूमने निकली शाम, बादलों से भरा समय और रास्ते में अनजान स्टूडियो से खरीदी गई बैटरी में से किसी की मेहरबानी! गंझिन विशाल इलाका है यह चुटिया.... जरूरत की हर चीजों, प्रतिष्ठानों से लैश! हर तबके के, हर जात-धर्म के लोगों से समृद्ध! इधर कुछ नवीनतम बदलाव आकर्षक ।


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